लुल्ला परिवारLulla Family
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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

राग गोंड

राग · M5 + भगत

राग गोंड

दिन के मध्य का राग, कम सुना जाने वाला।

गोंड राग दिन के मध्य का है, ग्रंथ साहिब में कम मिलने वाला। नाम का सम्बन्ध मध्य-भारत के गोंड समुदाय से बताया जाता है, जिनकी अपनी एक प्राचीन संगीत-परम्परा है।

ग्रंथ में गोंड की रचनाएँ अंग आठ-सौ-साठ के क़रीब से शुरू होती हैं, संख्या में सीमित।

"सभु करता सभु भुगता ॥" गोंड M5
इस राग के सब अंग

इस राग के शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।

महला 4 (6)
  1. जे मनि चिति आस रखहि हरि ऊपरि ता मन चिंदे अनेक अनेक फल पाई ॥अंग 859
  2. ऐसा हरि सेवीऐ नित धिआईऐ जो खिन महि किलविख सभि करे बिनासा ॥अंग 860
  3. हरि सिमरत सदा होइ अनंदु सुखु अंतरि सांति सीतल मनु अपना ॥अंग 860
  4. जितने साह पातिसाह उमराव सिकदार चउधरी सभि मिथिआ झूठु भाउ दूजा जाणु ॥अंग 861
  5. हरि अंतरजामी सभतै वरतै जेहा हरि कराए तेहा को करईऐ ॥अंग 861
  6. हरि दरसन कउ मेरा मनु बहु तपतै जिउ त्रिखावंतु बिनु नीर ॥1॥अंग 861
महला 5 (22)
  1. सभु करता सभु भुगता ॥1॥ रहाउ ॥अंग 862
  2. फाकिओ मीन कपिक की निआई तू उरझि रहिओ कसुंभाइले ॥अंग 862
  3. जीअ प्रान कीए जिनि साजि ॥अंग 862
  4. नाम संगि कीनो बिउहारु ॥अंग 863
  5. निमाने कउ जो देतो मानु ॥अंग 863
  6. जा कै संगि इहु मनु निरमलु ॥अंग 863
  7. गुर की मूरति मन महि धिआनु ॥अंग 864
  8. गुरू गुरू गुरु करि मन मोर ॥अंग 864
  9. गुरु मेरी पूजा गुरु गोबिंदु ॥अंग 864
  10. राम राम संगि करि बिउहार ॥अंग 865
  11. उन कउ खसमि कीनी ठाकहारे ॥अंग 865
  12. कलि कलेस मिटे हरि नाइ ॥अंग 865
  13. धूप दीप सेवा गोपाल ॥अंग 866
  14. करि किरपा सुख अनद करेइ ॥अंग 866
  15. हरि हरि नामु जपहु मेरे मीत ॥अंग 866
  16. भव सागर बोहिथ हरि चरण ॥अंग 867
  17. संत का लीआ धरति बिदारउ ॥अंग 867
  18. नामु निरंजनु नीरि नराइण ॥अंग 867
  19. जा कउ राखै राखणहारु ॥अंग 868
  20. अचरज कथा महा अनूप ॥ प्रातमा पारब्रहम का रूपु ॥ रहाउ ॥अंग 868
  21. संतन कै बलिहारै जाउ ॥अंग 869
  22. करि नमसकार पूरे गुरदेव ॥अंग 869
भगत कबीर जी (11)
  1. संतु मिलै किछु सुनीऐ कहीऐ ॥अंग 870
  2. नरू मरै नरु कामि न आवै ॥अंग 870
  3. आकासि गगनु पातालि गगनु है चहु दिसि गगनु रहाइले ॥अंग 870
  4. भुजा बांधि भिला करि डारिओ ॥अंग 870
  5. ना इहु मानसु ना इहु देउ ॥अंग 871
  6. तूटे तागे निखुटी पानि ॥अंग 871
  7. खसमु मरै तउ नारि न रोवै ॥अंग 871
  8. ग्रिहि सोभा जा कै रे नाहि ॥अंग 872
  9. जैसे मंदर महि बलहर ना ठाहरै ॥अंग 872
  10. कूटनु सोइ जु मन कउ कूटै ॥अंग 872
  11. धंनु गुपाल धंनु गुरदेव ॥अंग 873
भगत नामदेव जी (7)
  1. असुमेध जगने ॥अंग 873
  2. नाद भ्रमे जैसे मिरगाए ॥अंग 873
  3. मो कउ तारि ले रामा तारि ले ॥अंग 873
  4. मोहि लागती तालाबेली ॥अंग 874
  5. हरि हरि करत मिटे सभि भरमा ॥अंग 874
  6. भैरउ भूत सीतला धावै ॥अंग 874
  7. बिलावलु गोंड ॥अंग 874
भगत रविदास जी (2)
  1. मुकंद मुकंद जपहु संसार ॥अंग 875
  2. जे ओहु अठसठि तीरथ न॑ावै ॥अंग 875

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