मन कठोरु अजहू न पतीना ॥ कहि कबीर हमरा गोबिंदु ॥ चउथे पद महि जन की जिंदु ॥4॥1॥4॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: पर (फिर भी) उसकी तसल्ली नहीं हुई (क्योंकि वह) मन का कठोर था। कबीर कहता है- (काज़ी को ये समझ ना आई कि) हमारा (प्रभू के सेवकों का रखवाला) परमात्मा है। प्रभू के दासों की जिंद हमेशा प्रभू के चरणों में टिकी रहती है (इस वास्ते उनको कोई डरा-धमका नहीं सकता)। 4। 1। 4।
गोंड ॥ ना इहु मानसु ना इहु देउ ॥ ना इहु जती कहावै सेउ ॥ ना इहु जोगी ना अवधूता ॥ ना इसु माइ न काहू पूता ॥1॥ इआ मंदर महि कौन बसाई ॥ ता का अंतु न कोऊ पाई ॥1॥ रहाउ ॥ ना इहु गिरही ना ओदासी ॥ ना इहु राज न भीख मंगासी ॥ ना इसु पिंडु न रकतू राती ॥ ना इहु ब्रहमनु ना इहु खाती ॥2॥ ना इहु तपा कहावै सेखु ॥ ना इहु जीवै न मरता देखु ॥ इसु मरते कउ जे कोऊ रोवै ॥ जो रोवै सोई पति खोवै ॥3॥ गुर प्रसादि मै डगरो पाइआ ॥ जीवन मरनु दोऊ मिटवाइआ ॥ कहु कबीर इहु राम की अंसु ॥ जस कागद पर मिटै न मंसु ॥4॥2॥5॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: गोंड ॥ (क्या मनुष्य। क्या देवते; क्या जती और क्या शिव-उपासक; क्या जोगी और क्या त्यागी; हरेक में एक वही बसता है; पर फिर भी सदा के लिए) ना ये मनुष्य है ना ये देवता; ना जती है ना शिव-उपासक। ना जोगी है ना त्यागी; ना इसकी कोई माँ है ना ये किसी का पुत्र है। 1। (हमारे) इस शरीर-रूपी घर में कौन बसता है। उसकी अस्लियत क्या है। इस बात की तह तक कोई नहीं पहुँच सका। 1। रहाउ। (गृहस्ती। उदासी; राजा। कंगाल; ब्राहमण। क्षत्रिय; सब में यही बसता है; फिर भी इनमें रहने के कारण सदा के लिए) ना ये गृहस्ती है ना उदासी। ना ये राजा है ना भिखारी। ना इसका कोई शरीर है ना ही इसमें रक्ती भर भी लहू है ना यह ब्राहमण है ना क्षत्रिय। 2। (तपे। शेख सब में यही है; सब शरीरों में आ के पैदा होता मरता भी प्रतीत होता है। फिर भी सदा के लिए) ना ये कोई तपस्वी है ना कोई शेख है; ना यह पैदा होता है ना मरता है। जो कोई जीव इस (अंदर बसते) को मरता समझ के रोता है वह दुखी ही होता है। 3। हे कबीर ! कह- (जब से) मैंने अपने गुरू की कृपा से (जिंदगी का सही) रास्ता पा लिया है। मैंने अपने जनम-मरण दोनों समाप्त करवा लिए हैं (भाव। मेरे जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो गया है; अब मुझे समझ आ गई है कि) हमारे अंदर बसने वाला ये परमात्मा की अंश है। और ये दोनों आपस में यूँ जुड़े हुए हैं जैसे कागज़ और (कागज़ पर लिखे हुए अक्षरों की) स्याही। 4। 2। 5।
गोंड ॥ तूटे तागे निखुटी पानि ॥ दुआर ऊपरि झिलकावहि कान ॥ कूच बिचारे फूए फाल ॥ इआ मुंडीआ सिरि चढिबो काल ॥1॥ इहु मुंडीआ सगलो द्रबु खोई ॥ आवत जात नाक सर होई ॥1॥ रहाउ ॥ तुरी नारि की छोडी बाता ॥ राम नाम वा का मनु राता ॥ लरिकी लरिकन खैबो नाहि ॥ मुंडीआ अनदिनु धापे जाहि ॥2॥ इक दुइ मंदरि इक दुइ बाट ॥ हम कउ साथरु उन कउ खाट ॥ मूड पलोसि कमर बधि पोथी ॥ हम कउ चाबनु उन कउ रोटी ॥3॥ मुंडीआ मुंडीआ हूए एक ॥ ए मुंडीआ बूडत की टेक ॥ सुनि अंधली लोई बेपीरि ॥ इन॑ मुंडीअन भजि सरनि कबीर ॥4॥3॥6॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: गोंड॥ (इसको घर के काम-काज का कोई फिकर ही नहीं। अगर) ताणी के धागे टूटे पड़े हैं (तो टूटे पड़े रहते हैं)। अगर पाण (लुग्दी। अरारोट मिश्रण) खत्म हो गया है (तो खत्म ही पड़ा है)। दरवाजे पर (बगैर संभाले) काने चमकते रहते हैं (जो इस्तेमाल ही नहीं किए जा रहे हैं); बेचारे फूए (कुच) तीला तीला हो रहे हैं; (पता नहीं इस साधू का क्या बनेगा)। इस साधु के सिर पर मौत सवार हो गई प्रतीत होती है। 1। (मेरा) ये (पति) साधू सारा (कमाया हुआ) धन गवाए जा रहा है (इसके सत्संगियों की) आवा-जाई से मेरे नाक में जान आई हुई है (नाक में दम किया हुआ है)। 1। रहाउ। तुरी और नाल (के इस्तेमाल) का इसे कोई चिंता ही नहीं। (भाव। कपड़ा बुनने का इसे कोई ख्याल ही नहीं है)। इसका मन सदा राम-नाम में लगा रहता है। (घर में) लड़की-लड़कों के खाने के लिए कुछ भी नहीं (रहता) पर इसके सत्संगी हर रोज आ के तृप्त हो के (खुब खा के) जाते हैं। 2। (नोट। शिकायत यही है कि संभाल नहीं सकता। काम करना छोड़ा नहीं है)। अगर एक-दो साधू (हमारे) घर बैठे हैं और एक-दो चले भी आ रहे हैं। (हर वक्त आवाजाही लगी रहती है)। हमें जमीन पर सोना पड़ता है। उनको चारपाई मुहईआ की जाती है। वे साधू कमर से पोथियाँ लटकाए सिरों पर हाथ फेरते चले आते हैं (कई बार उनके बेवक्त आ जाने पर) हमें तो भुने हुए दाने ही चबाने पड़ते हैं। उन्हें रोटियाँ मिलती हैं। 3। हे कबीर ! (कह- इन सत्संगियों से ये प्यार इसलिए है कि) सत्संगियों के दिल आपस में मिले हुए हैं। और ये सत्संगी (संसार-समुंद्र के विकारों में) डूबते हुओं का सहारा हैं। हे अंधी निगुरी लोई ! सुन। आप भी इन सत्संगियों की शरण पड़। 4। 3। 6।
गोंड ॥ खसमु मरै तउ नारि न रोवै ॥ उसु रखवारा अउरो होवै ॥ रखवारे का होइ बिनास ॥ आगै नरकु ईहा भोग बिलास ॥1॥ एक सुहागनि जगत पिआरी ॥ सगले जीअ जंत की नारी ॥1॥ रहाउ ॥ सोहागनि गलि सोहै हारु ॥ संत कउ बिखु बिगसै संसारु ॥ करि सीगारु बहै पखिआरी ॥ संत की ठिठकी फिरै बिचारी ॥2॥ संत भागि ओह पाछै परै ॥ गुर परसादी मारहु डरै ॥ साकत की ओह पिंड पराइणि ॥ हम कउ द्रिसटि परै त्रखि डाइणि ॥3॥ हम तिस का बहु जानिआ भेउ ॥ जब हूए क्रिपाल मिले गुरदेउ ॥ कहु कबीर अब बाहरि परी ॥ संसारै कै अंचलि लरी ॥4॥4॥7॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: गोंड ॥ (माया को स्त्री बना के रखने वाला) मनुष्य (आखिर) मर जाता है। ये (माया) पत्नी (उसके मरने पर) रोती भी नहीं। क्योंकि इसका रखवाला (पति) कोई पक्ष और बन जाता है (सो। ये कभी भी विधवा नहीं होती)। (इस माया का) रखवाला मर जाता है। मनुष्य यहाँ इस माया के भोगों (में मस्त रहने) के कारण आगे (अपने लिए) नर्क बना लेता है। 1। (ये माया) एक एैसी सोहागन नारि है जिसको सारा जगत प्यार करता है। सारे जीव-जंतु इसको अपनी स्त्री बना के रखना चाहते हैं (अपने वश में रखना चाहते हैं)। 1। रहाउ। इस सोहागनि नारी के गले में हार शोभा देता है (भाव। जीवों का मन-मोहनें के लिए सदा सजी-धजी सुंदर बनी रहती है)। (इस को देख-देख के) जगत खुश होता है। पर संतों को ये जहर (जैसी) लगती है। वेश्वा (की तरह) सदा श्रृंगार किए रहती है। पर संतों द्वारा धिक्कारी हुई बेचारी (संतों से) परे-परे ही फिरती है। 2। (ये माया) भाग के संतों की शरण पड़ने की कोशिश करती है। पर (संतों पर) गुरू की मेहर होने के कारण (ये संतों की) मार से डरती है (इस वास्ते नजदीक नहीं आती)। ये माया प्रभू से टूटे हुए लोगों की जिंद-जान बनी रहती है। पर मुझे (तो) ये भयानक डायन दिखती है। 3। तब से मैंने इस माया के भेद को पा लिया है। जब मेरे सतिगुरू जी मेरे पर दयालु हुए और मुझे मिल गए। हे कबीर ! अब आप बेशक कह- मुझसे तो यह माया परे हट गई है। और संसारी जीवों के पल्ले जा लगी है। 4। 4। 7।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर (फिर भी) उसकी तसल्ली नहीं हुई (क्योंकि वह) मन का कठोर था।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।