कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: कबीर जी घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ अगर कोई भला मनुष्य मिल जाए तो (उसकी शिक्षा) सुननी चाहिए। और (जीवन के राह की गुंझलें) पूछनी चाहिए। पर अगर कोई बुरा आदमी मिल जाए। तो वहाँ चुप रहना ही ठीक है। 1। हे भाई ! (जगत में रहते हुए) कैसे बोल बोलें। जिनकी बरकति से परमात्मा के नाम के साथ सुरति टिकी रहे। 1। रहाउ। (क्योंकि) भलों के साथ बात करने से कोई भलाई की बात निकलेगी। और मूर्ख से बात करने पर बेकार की झख मारने वाली बात होगी। 2। (फिर) ज्यों-ज्यों (मूर्ख के साथ) बातें करेंगे (उसके कुसंग में) विकार ही विकार बढ़ते हैं; (पर इसका मतलब ये नहीं कि किसी के भी साथ उठना-बैठना नहीं चाहिए)। अगर भले मनुष्यों के साथ भी नहीं बोलेंगे। (भाव। अगर भलों के पास भी नहीं बैठेंगे) तो विचार की बातें कैसे कर सकते हैं। 3। हे कबीर ! सच बात ये है कि (जैसे) खाली घड़ा बोलता है। अगर वह (पानी के साथ) भरा हुआ हो तो वह कभी छलकता नहीं (इसी तरह बहुती फालआप बातें गुणहीन मनुष्य ही करता है। जो गुणवान है वह अडोल रहता है। सो। जगत में कोई ऐसा उद्यम करें। जिससे गुण ग्रहण कर सकें। और ये गुण मिल सकते हैं भले लोगों के पास से ही)। 4। 1।
गोंड ॥ नरू मरै नरु कामि न आवै ॥ पसू मरै दस काज सवारै ॥1॥ अपने करम की गति मै किआ जानउ ॥ मै किआ जानउ बाबा रे ॥1॥ रहाउ ॥ हाड जले जैसे लकरी का तूला ॥ केस जले जैसे घास का पूला ॥2॥ कहु कबीर तब ही नरु जागै ॥ जम का डंडु मूंड महि लागै ॥3॥2॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: गोंड ॥ (मेरे कभी विचार में भी नहीं आता कि मैं किस शरीर पर गुमान करके बुरे काम करता रहता हूँ। मेरा असल तो यही है ना कि) जब मनुष्य मर जाता है तो मनुष्य (का शरीर) किसी काम नहीं आता। पर पशु मरता है तो (फिर भी उसका शरीर मनुष्य के) कई काम सँवारता है। 1। हे बाबा ! मैं कभी सोचता ही नहीं कि मैं कैसे नित्य के कर्म किए जा रहा हूँ। (मैं बुरी तरफ ही लगा रहता हूँ। और) मुझे ख्याल ही नहीं आता। 1। रहाउ। (हे बाबा ! मैंने कभी सोचा ही नहीं कि मौत आने से इस शरीर की) हड्डियां लकड़ी के ढेर की तरह जल जाती हैं। और (इसके) बाल घास के पूले की तरह जल जाते हैं (और जिस शरीर का बाद में ये हाल होता है। उस पर सारी उम्र मैं ऐसे ही गर्व करता रहता हूँ)। 2। पर। हे कबीर ! सच ये है कि मनुष्य इस मूर्खता से तब ही जागता है (तब ही पछताता है) जब मौत का डंडा इसके सिर पर आ बजता है। 3। 2।
गोंड ॥ आकासि गगनु पातालि गगनु है चहु दिसि गगनु रहाइले ॥ आनद मूलु सदा पुरखोतमु घटु बिनसै गगनु न जाइले ॥1॥ मोहि बैरागु भइओ ॥ इहु जीउ आइ कहा गइओ ॥1॥ रहाउ ॥ पंच ततु मिलि काइआ कीन॑ी ततु कहा ते कीनु रे ॥ करम बध तुम जीउ कहत हौ करमहि किनि जीउ दीनु रे ॥2॥ हरि महि तनु है तन महि हरि है सरब निरंतरि सोइ रे ॥ कहि कबीर राम नामु न छोडउ सहजे होइ सु होइ रे ॥3॥3॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: गोंड ॥ (ये जीवात्मा जिसका अंश है वह) चेतन-सक्ता आकाश से पाताल तक हर तरफ मौजूद है। वही (जीवों के) सुख का मूल कारण है। वह सदा कायम रहने वाला है। वह ही (है जिसको) उक्तम पुरुष (परमात्मा कहते) हैं। (जीवों का) शरीर नाश हो जाता है। पर (शरीर में बसती जीवात्मा का श्रोत) चेतन-सक्ता नाश नहीं होती। 1। मेरा निष्चय अब इस बात पर टिक गया है कि ये जीवात्मा कभी मरती नहीं (क्योंकि ये जीवात्मा उस सर्व-व्यापक सदा-स्थिर चेतन-सक्ता का अंश है)। 1। रहाउ। पाँच तत्वों ने मिल के ये शरीर बनाया है (पर इन तत्वों का भी कोई अलग अस्तित्व नहीं है)। ये तत्व भी और कहाँ से बनने थे। (ये भी चेतन-सक्ता से ही बने हैं)। आप लोग। हे भाई ! ये कहते हैं कि जीवात्मा किए हुए कर्मों की बँधी हुई है। (पर। दरअसल बात ये है कि) कर्मों को भी पहले चेतन-सक्ता के बिना और किसने वजूद में लाना था। (भाव। कर्मों को भी पहले ये चेतन-सक्ता ही अस्तित्व में वजूद में लाती है)। 2। हे भाई ! उस चेतन-सक्ता प्रभू के अंदर ये (जीवों का) शरीर वजूद में आता है और शरीरों में वह प्रभू बसता है। सबके अंदर वही है। कहीं भी दूरी नहीं। सो। कबीर कहता है- ऐसे चेतन-सक्ता परमात्मा का नाम मैं कभी नहीं भुलाउंगा। (नाम सिमरन की बरकति से ये समझ आती है कि) जो कुछ जगत में हो रहा है सहज ही (उस चेतन-सक्ता प्रभू की रज़ा में) हो रहा है। 3। 3।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: रागु गोंड बाणी कबीर जीउ की घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ मेरी बाँहे बाँध के ढेम की तरह (मुझे इन लोगों ने हाथी के आगे) फेंक दिया है। (महावत ने) गुस्से में आ के हाथी के सिर के ऊपर (चोट) मारी है। पर हाथी (मुझे पैरों के तले लिताड़ने के बजाय) चिल्लाता हुआ (और तरफ को) भागता है। (जैसे कह रहा हो-) मैं बलिहार जाऊँ इस अच्छे आदमी पर। 1। हे मेरे प्रभू ! मुझे आपका भरोसा है काज़ी तो कह रहा है कि (इस कबीर पर) हाथी चढ़ा दे। (सो। आपकी बरकति से मुझे कोई फिक्र नहीं है)। 1। रहाउ। (काज़ी कहता है-) रे महावत, नहीं तो मैं आपका सर उतरवा दूँगा। इस हाथी पर चोट मार और (कबीर की तरफ़) हाँक। पर हाथी चलता ही नहीं (वह तो ऐसे दिखता है जैसे) प्रभू के चरणों में मस्त है (जैसे) उसके हृदय में परमात्मा (प्रकट हो के) बस रहा है। 2। भला मैंने अपने प्रभू के सेवक ने इनका क्या बिगाड़ा था। मेरी पोटली बाँध के (इन्होंने मुझे) हाथी के आगे फेंक दिया। (उधर) हाथी (मेरे शरीर की बनी हुई) पोटली को बार-बार सिर झुका (के नमस्कार कर) रहा है। पर काज़ी को (तुअस्सब के) अंधेरे में ये समझ नहीं आई। 3। (काज़ी ने हाथी को मेरे ऊपर चढ़ाने की) तीन बार कोशिशें कीं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।