गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा ने बेअंत जीव पैदा किए हैं जो रजो। सतो। तमो (इन तीन गुणों में विचर रहे हैं। ये सारे उसके) हुकम में कार्य-व्यवहार कर रहे हैं। (दुनिया के सारे जीवों के लिए) छलावा (बनी हुई) यह बेचारी लक्ष्मी भी रज़ा में चल रही है। धर्मराज भी हुकम के आगे थर-थर काँपता है। 3। हे भाई ! दुनिया की सामग्री रज़ा में बँधी हुई है। एक सृजनहार प्रभू ही है जिस पर किसी का डर नहीं। हे नानक ! कह- परमात्मा अपने भगतों की सहायता करने वाला है। उसके दरबार में भक्तगण हमेशा शोभा पाते हैं। 4। 1।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! धुराव पाँच वर्षों का एक अनाथ बालक था। हरी-नाम सिमर के उसने अटॅल पदवी प्राप्त कर ली। (अजामल अपने) पुत्र (को आवाज देने) की खातिर ‘नारायण। नारायण’ कहा करता था। उसने जमदूतों को मार भगा दिया। 1। हे मेरे ठाकुर ! कितने ही बेअंत जीव आप बचा रहा है। मैं निमाणा हॅूँ। तुच्छ बुद्धि वाला हूँ। गुण हीन हूँ। मैं आपकी शरण आया हूँ। मैं आपके दर पर आ गिरा हूँ। 1। रहाउ। (हे भाई ! नाम सिमरन की बरकति से) बाल्मीकि चण्डाल (संसार-समुंद्र से) पार लांघ गया। बेचारे शिकारी जैसों का भी उद्धार हो गया। आँख झपकने जितने समय के लिए ही गज ने अपने मन में आराधना की और उसको प्रभू ने पार लंघा दिया। 1। हे भाई ! परमात्मा ने (अपने) भगत प्रहलाद की रक्षा की। (उसने पिता) हृणाकश्यप को नाखूनों से चीर दिया। दासी का पुत्र बिदर (परमात्मा की कृपा से) पवित्र (जीवन वाला) हो गया। उसने अपनी सारी कुलें रौशन कर लीं। 3। हे नानक ! (कह-) हे हरी ! अपने कौन-कौन से अपराध बताऊँ। मैं तो नाशवंत पदार्थों के मोह में डूबा रहता हूँ। हे प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। मैंने आपकी ओट पकड़ी है। मुझे अपनी बाँह पसार के पकड़ ले। 4। 2।
मारू महला 5 ॥ वित नवित भ्रमिओ बहु भाती अनिक जतन करि धाए ॥ जो जो करम कीए हउ हउमै ते ते भए अजाए ॥1॥ अवर दिन काहू काज न लाए ॥ सो दिनु मो कउ दीजै प्रभ जीउ जा दिन हरि जसु गाए ॥1॥ रहाउ ॥ पुत्र कलत्र ग्रिह देखि पसारा इस ही महि उरझाए ॥ माइआ मद चाखि भए उदमाते हरि हरि कबहु न गाए ॥2॥ इह बिधि खोजी बहु परकारा बिनु संतन नही पाए ॥ तुम दातार वडे प्रभ संम्रथ मागन कउ दानु आए ॥3॥ तिआगिओ सगला मानु महता दास रेण सरणाए ॥ कहु नानक हरि मिलि भए एकै महा अनंद सुख पाए ॥4॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ जो मनुष्य धन की खातिर (ही) कई तरह भटकता रहा। (धन की खातिर) अनेकों यत्न करके दौड़-भाग करता रहा; मैं मैं’ के आसरे वह जो जो भी काम करता रहा। वह सारे ही व्यर्थ चले गए। 1। हे प्रभू जी ! (जिंदगी के) दिनों में मुझे और और कामों में ना लगाए रख। मुझे वह दिन दे। जिस दिन मैं आपकी सिफत सालाह के गीत गाता रहूँ। 1। रहाउ। पुत्र-स्त्री घर का पसारा देख के जीव इस (खिलारे) में ही व्यस्त रहते हैं। माया का नशा चख के मस्त रहते हैं। कभी भी परमात्मा के गुण नहीं गाते। 2। इस तरह कई किस्म की खोज करके देखी है (सब माया में ही प्रवृक्त दिखाई देते हैं)। सो। संत जनों के बिना (किसी और जगह) परमात्मा की प्राप्ति नहीं। हे प्रभू ! आप सब दातें देने वाला है। आप सब ताकतों का मालिक है। (मैं आपके दर से आपके नाम का) दान माँगने आया हूँ। 3। हे नानक ! कह- मैंने सारा सम्मान सारा बड़प्पन छोड़ दिया है। मैं उन दासों की चरण धूड़ माँगता हूँ। मैं उन दासों की शरण आया हूँ। जो प्रभू को मिल के प्रभू के साथ एक-रूप हो गए हैं। उनकी शरण में ही बड़ा सुख बड़ा आनंद मिलता है। 4। 3।
मारू महला 5 ॥ कवन थान धीरिओ है नामा कवन बसतु अहंकारा ॥ कवन चिहन सुनि ऊपरि छोहिओ मुख ते सुनि करि गारा ॥1॥ सुनहु रे तू कउनु कहा ते आइओ ॥ एती न जानउ केतीक मुदति चलते खबरि न पाइओ ॥1॥ रहाउ ॥ सहन सील पवन अरु पाणी बसुधा खिमा निभराते ॥ पंच तत मिलि भइओ संजोगा इन महि कवन दुराते ॥2॥ जिनि रचि रचिआ पुरखि बिधातै नाले हउमै पाई ॥ जनम मरणु उस ही कउ है रे ओहा आवै जाई ॥3॥ बरनु चिहनु नाही किछु रचना मिथिआ सगल पसारा ॥ भणति नानकु जब खेलु उझारै तब एकै एकंकारा ॥4॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ (हे भाई ! आपका वह) नाम (आपके अंदर) कहाँ टिका हुआ है (जिसको ले ले के कोई आपको गालियाँ निकालता है।) वह अहंकार क्या चीज है (जिससे आप आफरा फिरता है) । हे भाई ! सुन। आपको वह कौन से जख़्म लगे हैं किसी के मुँह से गालियाँ सुन के। जिसके कारण आप क्रोधित हैं जाता है। 1। हे भाई ! सुन (विचार कि) आप कौन है (आपकी अस्लियत क्या है।)। आप कहाँ से (इस जगत में) आया है। मैं तो इतनी बात भी नहीं जानता (कि जीव को अनेकों जूनियों में) चलते हुए कितना समय लग जाता है। किसी को भी ये खबर नहीं मिल सकती। (फिर। बताओ। अपने ऊपर कैसा गुमान।)। 1। रहाउ। हे भाई ! हवा और पानी (ये दोनों तत्व) बर्दाश्त कर सकने के स्वभाव वाले हैं। धरती तो नि। संदेह क्षमा का रूप ही है। पाँच तत्व मिल के (मनुष्य का) शरीर बनता है। इन पाँच तत्वों में से बुराई किस में है। 1। (पर जीवों के भी क्या वश।) जिस सृजनहार करतार ने यह रचना रची है। उसने (शरीर बनाने के समय) अहंकार भी साथ में ही (हरेक के अंदर) डाल दी है। उस (अहंकार) को ही जनम-मरण (का चक्कर) है। वह अहंकार ही पैदा होता मरता है (भाव। उस अहंकार के कारण ही जीव के लिए पैदा होने मरने का चक्कर बना रहता है)। 3। हे भाई ! यह सारा जगत पसारा नाशवंत है। इस रचना में (स्थिरता का) कोई वर्ण-चिन्ह नहीं। नानक कहता है- (हे भाई !) जब परमात्मा इस खेल को उजाड़ता है तब एक स्वयं ही स्वयं हो जाता है। 4। 4।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! परमात्मा ने बेअंत जीव पैदा किए हैं जो रजो।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।