मंगत जनु जाचै हरि देहु पसाउ ॥
हरि सति सति सदा हरि सति हरि सति मेरै मनि भावै जीउ ॥2॥
नवे छिद्र स्रवहि अपवित्रा ॥
बोलि हरि नाम पवित्र सभि किता ॥
जे हरि सुप्रसंनु होवै मेरा सुआमी हरि सिमरत मलु लहि जावै जीउ ॥3॥
माइआ मोहु बिखमु है भारी ॥
किउ तरीऐ दुतरु संसारी ॥
सतिगुरु बोहिथु देइ प्रभु साचा जपि हरि हरि पारि लंघावै जीउ ॥4॥
तू सरबत्र तेरा सभु कोई ॥
जो तू करहि सोई प्रभ होई ॥
जनु नानकु गुण गावै बेचारा हरि भावै हरि थाइ पावै जीउ ॥5॥1॥7॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे ॥
सभि किलविख काटै हरि तेरे ॥
हरि धनु राखहु हरि धनु संचहु हरि चलदिआ नालि सखाई जीउ ॥1॥
जिस नो क्रिपा करे सो धिआवै ॥
नित हरि जपु जापै जपि हरि सुखु पावै ॥
गुर परसादी हरि रसु आवै जपि हरि हरि पारि लंघाई जीउ ॥1॥ रहाउ ॥
निरभउ निरंकारु सति नामु ॥
जग महि स्रेसटु ऊतम कामु ॥
दुसमन दूत जमकालु ठेह मारउ हरि सेवक नेड़ि न जाई जीउ ॥2॥
जिसु उपरि हरि का मनु मानिआ ॥
सो सेवकु चहु जुग चहु कुंट जानिआ ॥
जे उस का बुरा कहै कोई पापी तिसु जमकंकरु खाई जीउ ॥3॥
सभ महि एकु निरंजन करता ॥
सभि करि करि वेखै अपणे चलता ॥
जिसु हरि राखै तिसु कउणु मारै जिसु करता आपि छडाई जीउ ॥4॥
हउ अनदिनु नामु लई करतारे ॥
जिनि सेवक भगत सभे निसतारे ॥
दस अठ चारि वेद सभि पूछहु जन नानक नामु छडाई जीउ ॥5॥2॥8॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
डरपै धरति अकासु नख्यत्रा सिर ऊपरि अमरु करारा ॥
पउणु पाणी बैसंतरु डरपै डरपै इंद्रु बिचारा ॥1॥
एका निरभउ बात सुनी ॥
सो सुखीआ सो सदा सुहेला जो गुर मिलि गाइ गुनी ॥1॥ रहाउ ॥
देहधार अरु देवा डरपहि सिध साधिक डरि मुइआ ॥
लख चउरासीह मरि मरि जनमे फिरि फिरि जोनी जोइआ ॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) आपका नाम सुखों का खजाना है और आत्मिक जीवन देने वाला (अमृत) है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।