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अंग 998

अंग
998
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुख सागरु अंम्रितु हरि नाउ ॥
मंगत जनु जाचै हरि देहु पसाउ ॥
हरि सति सति सदा हरि सति हरि सति मेरै मनि भावै जीउ ॥2॥
नवे छिद्र स्रवहि अपवित्रा ॥
बोलि हरि नाम पवित्र सभि किता ॥
जे हरि सुप्रसंनु होवै मेरा सुआमी हरि सिमरत मलु लहि जावै जीउ ॥3॥
माइआ मोहु बिखमु है भारी ॥
किउ तरीऐ दुतरु संसारी ॥
सतिगुरु बोहिथु देइ प्रभु साचा जपि हरि हरि पारि लंघावै जीउ ॥4॥
तू सरबत्र तेरा सभु कोई ॥
जो तू करहि सोई प्रभ होई ॥
जनु नानकु गुण गावै बेचारा हरि भावै हरि थाइ पावै जीउ ॥5॥1॥7॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) आपका नाम सुखों का खजाना है और आत्मिक जीवन देने वाला (अमृत) है। (आपका) दास मंगता (बन के आपके दर से) माँगता है। हे हरी ! मेहर कर (अपना नाम) दे। हे भाई ! परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। वह सदा कायम रहने वाला प्रभू मेरे मन को प्यारा लग रहा है। 2। (हे भाई ! मनुष्य के शरीर में नाक-कान आदि नौ छेद हैं। यह) नौ के नौ छेद बहते (सिमते) रहते हैं (और विकार-वासना के कारण) अपवित्र भी हैं। (जो मनुष्य हरी-नाम उचारता है) हरी-नाम उचार के उसने ये सारे पवित्र कर लिए हैं। हे भाई ! अगर मेरा मालिक प्रभू किसी जीव पर दयावान हो जाए। तो हरी-नाम सिमरते हुए (उसकी इन इन्द्रियों के विकारों की) मैल दूर हो जाती है। 3। हे भाई ! संसार-समुंद्र से पार लांघना मुश्किल है (क्योंकि इसमें) माया का मोह बहुत ही कठिन है। फिर इससे कैसे पार लांघा जाए। हे भाई ! गुरू जहाज़ (है) सदा कायम रहने वाला प्रभू (जिस मनुष्य को यह जहाज़) दे देता है। वह मनुष्य प्रभू का नाम जपता है। और गुरू उसको पार लंघा देता है। 4। हे प्रभू ! आप हर जगह बसता है। हरेक जीव आपका (पैदा किया हुआ) है। हे प्रभू ! जो कुछ करते हैं वही होता है। हे भाई ! प्रभू का दास गरीब नानक प्रभू के गुण गाता है। अगर उस को (यह काम) पसंद आ जाए तो वह इसको परवान कर लेता है। 5। 1। 7।
मारू महला 4 ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे ॥
सभि किलविख काटै हरि तेरे ॥
हरि धनु राखहु हरि धनु संचहु हरि चलदिआ नालि सखाई जीउ ॥1॥
जिस नो क्रिपा करे सो धिआवै ॥
नित हरि जपु जापै जपि हरि सुखु पावै ॥
गुर परसादी हरि रसु आवै जपि हरि हरि पारि लंघाई जीउ ॥1॥ रहाउ ॥
निरभउ निरंकारु सति नामु ॥
जग महि स्रेसटु ऊतम कामु ॥
दुसमन दूत जमकालु ठेह मारउ हरि सेवक नेड़ि न जाई जीउ ॥2॥
जिसु उपरि हरि का मनु मानिआ ॥
सो सेवकु चहु जुग चहु कुंट जानिआ ॥
जे उस का बुरा कहै कोई पापी तिसु जमकंकरु खाई जीउ ॥3॥
सभ महि एकु निरंजन करता ॥
सभि करि करि वेखै अपणे चलता ॥
जिसु हरि राखै तिसु कउणु मारै जिसु करता आपि छडाई जीउ ॥4॥
हउ अनदिनु नामु लई करतारे ॥
जिनि सेवक भगत सभे निसतारे ॥
दस अठ चारि वेद सभि पूछहु जन नानक नामु छडाई जीउ ॥5॥2॥8॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 4॥ हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम सदा जपा कर। परमात्मा आपके सारे पाप काट सकता है। हे मन ! हरी-नाम का धन संभाल के रख। हरी-नाम-धन इकट्ठा करता रह। यही धन हर वक्त मनुष्य के साथ मददगार बनता है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा कृपा करता है। वह मनुष्य उसको ध्याता है। वह मनुष्य सदा हरी-नाम का जाप जपता है और हरी-नाम जप के आत्मिक आनंद भोगता है। गुरू की कृपा से जिस मनुष्य को हरी-नाम का स्वाद आता है वह हरी-नाम सदा जप के (अपनी जीवन-बेड़ी को संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा को किसी का डर नहीं। परमात्मा की कोई विशेष शकल-सूरति बताई नहीं जा सकती। परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। (उसका नाम जपना) दुनियाँ में (अन्य सारे कामों से) बढ़िया और अच्छा काम है। (जो मनुष्य नाम जपता है वह) वैरी जमदूतों को आत्मिक मौत अवश्य ही मार सकता है। ये आत्मिक मौत परमात्मा की सेवा-भगती करने वालों के नजदीक नहीं फटकती। 2। हे भाई ! जिस सेवक पर परमात्मा प्रसन्न होता है। वह सेवक सदा के लिए सारे संसार में शोभा वाला हो जाता है। अगर कोई कुकर्मी उस सेवक की बखीली करे। उसको जमदूत खा जाता है। (वह मनुष्य आत्मिक मौत मर जाता है)। 3। (हे भाई !) सब जीवों में एक ही निर्लिप करतार बस रहा है। अपने सारे चोज-तमाशे कर-करके वह स्वयं ही देख रहा है। करतार जिस मनुष्य की स्वयं रक्षा करता है। करतार जिसको खुद बचाता है उसको कोई मार नहीं सकता। 4। हे भाई ! मैं हर वक्त (उस) करतार का नाम जपता हूँ। जिसने अपने सारे सेवक-भक्त संसार-समुंद्र से (सदा ही) पार लंघाए हैं। हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) अठारह पुराण चार वेद (आदि धर्म-पुस्तकों) को पूछ के देखो (वे भी यही कहते हैं कि) परमात्मा का नाम ही जीव को बचाता है। 5। 2। 8।
मारू महला 5 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
डरपै धरति अकासु नख्यत्रा सिर ऊपरि अमरु करारा ॥
पउणु पाणी बैसंतरु डरपै डरपै इंद्रु बिचारा ॥1॥
एका निरभउ बात सुनी ॥
सो सुखीआ सो सदा सुहेला जो गुर मिलि गाइ गुनी ॥1॥ रहाउ ॥
देहधार अरु देवा डरपहि सिध साधिक डरि मुइआ ॥
लख चउरासीह मरि मरि जनमे फिरि फिरि जोनी जोइआ ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5 घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! धरती। आकाश। तारे- इन सबके सिर पर परमात्मा का कठोर हुकम चल रहा है (इनमें से कोई भी) रजा से आकी नहीं हो सकता। हवा। पानी। आग (आदि हरेक तत्व) रज़ा में चल रहे हैं। बेचारा इन्द्र (भी) प्रभू के आदेश में चल रहा है (भले ही लोगों के विचार में वह सारे देवताओं का राजा है)। 1। हे भाई ! (हमने) एक ही बात सुनी हुई है जो मनुष्य को डरों से रहित कर देती है (वह यह है कि) जो मनुष्य गुरू को मिल के परमात्मा के गुण गाता है (और रज़ा के अनुसार जीना सीख लेता है) वह सुखी जीवन वाला है वह सदा आराम से रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! सारे जीव और देवता हुकम में चल रहे हैं। सिद्ध और साधिक भी (हुकम के आगे) थर-थर काँपते हैं। चौरासी लाख जूनियों के सारे जीव (जो रज़ा में नहीं चलते) जनम-मरण के चक्करों में पड़े रहते हैं। बार-बार जूनियों में डाले जाते हैं। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) आपका नाम सुखों का खजाना है और आत्मिक जीवन देने वाला (अमृत) है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।