मान मोह अरु लोभ विकारा बीओ चीति न घालिओ ॥
नाम रतनु गुणा हरि बणजे लादि वखरु लै चालिओ ॥1॥
सेवक की ओड़कि निबही प्रीति ॥
जीवत साहिबु सेविओ अपना चलते राखिओ चीति ॥1॥ रहाउ ॥
जैसी आगिआ कीनी ठाकुरि तिस ते मुखु नही मोरिओ ॥
सहजु अनंदु रखिओ ग्रिह भीतरि उठि उआहू कउ दउरिओ ॥2॥
आगिआ महि भूख सोई करि सूखा सोग हरख नही जानिओ ॥
जो जो हुकमु भइओ साहिब का सो माथै ले मानिओ ॥3॥
भइओ क्रिपालु ठाकुरु सेवक कउ सवरे हलत पलाता ॥
धंनु सेवकु सफलु ओहु आइआ जिनि नानक खसमु पछाता ॥4॥5॥
खुलिआ करमु क्रिपा भई ठाकुर कीरतनु हरि हरि गाई ॥
स्रमु थाका पाए बिस्रामा मिटि गई सगली धाई ॥1॥
अब मोहि जीवन पदवी पाई ॥
चीति आइओ मनि पुरखु बिधाता संतन की सरणाई ॥1॥ रहाउ ॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु निवारे निवरे सगल बैराई ॥
सद हजूरि हाजरु है नाजरु कतहि न भइओ दूराई ॥2॥
सुख सीतल सरधा सभ पूरी होए संत सहाई ॥
पावन पतित कीए खिन भीतरि महिमा कथनु न जाई ॥3॥
निरभउ भए सगल भै खोए गोबिद चरण ओटाई ॥
नानकु जसु गावै ठाकुर का रैणि दिनसु लिव लाई ॥4॥6॥
जो समरथु सरब गुण नाइकु तिस कउ कबहु न गावसि रे ॥
छोडि जाइ खिन भीतरि ता कउ उआ कउ फिरि फिरि धावसि रे ॥1॥
अपुने प्रभ कउ किउ न समारसि रे ॥
बैरी संगि रंग रसि रचिआ तिसु सिउ जीअरा जारसि रे ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै नामि सुनिऐ जमु छोडै ता की सरणि न पावसि रे ॥
काढि देइ सिआल बपुरे कउ ता की ओट टिकावसि रे ॥2॥
जिस का जासु सुनत भव तरीऐ ता सिउ रंगु न लावसि रे ॥
थोरी बात अलप सुपने की बहुरि बहुरि अटकावसि रे ॥3॥
भइओ प्रसादु क्रिपा निधि ठाकुर संतसंगि पति पाई ॥
कहु नानक त्रै गुण भ्रमु छूटा जउ प्रभ भए सहाई ॥4॥7॥
अंतरजामी सभ बिधि जानै तिस ते कहा दुलारिओ ॥
हसत पाव झरे खिन भीतरि अगनि संगि लै जारिओ ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मारू महला 5॥ हे भाई ! मान-मोह और लोभ आदि अन्य विकारों को परमात्मा का सेवक अपने चित्त में नहीं आने देता।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।