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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 997 · मारू

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अंग
997
मारू
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  1. गुरमुखा मनि परतीति है गुरि पूरै नामि समाणी ॥1॥
  2. हरि भाउ लगा बैरागीआ वडभागी हरि मनि राखु ॥
  3. हरि हरि भगति भरे भंडारा ॥

गुरमुखा मनि परतीति है गुरि पूरै नामि समाणी ॥1॥

अंग 996 से चला आ रहा अंश

गुरमुखा मनि परतीति है गुरि पूरै नामि समाणी ॥1॥
मन मेरे मै हरि हरि कथा मनि भाणी ॥
हरि हरि कथा नित सदा करि गुरमुखि अकथ कहाणी ॥1॥ रहाउ ॥
मै मनु तनु खोजि ढंढोलिआ किउ पाईऐ अकथ कहाणी ॥
संत जना मिलि पाइआ सुणि अकथ कथा मनि भाणी ॥
मेरै मनि तनि नामु अधारु हरि मै मेले पुरखु सुजाणी ॥2॥
गुर पुरखै पुरखु मिलाइ प्रभ मिलि सुरती सुरति समाणी ॥
वडभागी गुरु सेविआ हरि पाइआ सुघड़ सुजाणी ॥
मनमुख भाग विहूणिआ तिन दुखी रैणि विहाणी ॥3॥
हम जाचिक दीन प्रभ तेरिआ मुखि दीजै अंम्रित बाणी ॥
सतिगुरु मेरा मित्रु प्रभ हरि मेलहु सुघड़ सुजाणी ॥
जन नानक सरणागती करि किरपा नामि समाणी ॥4॥3॥5॥

हिन्दी अर्थ: गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के मन में (प्रभू की सिफत सालाह के लिए) श्रद्धा बनी रहती है। पूरे गुरू के द्वारा वे हरी नाम में लीन रहते हैं। 1। हे मेरे मन ! मुझे अपने अंदर परमात्मा की सिफत सालाह प्यारी लगती है। हे मन ! परमात्मा की सिफत सालाह सदा करते रहें। अकथ प्रभू की सिफत सालाह गुरू के द्वारा मिलती है (इस वास्ते हे मन ! गुरू की शरण पड़े रहें)। 1। रहाउ। हे भाई ! मैंने अपने मन को अपने तन को खोज के तलाश की है कि किस तरह अकथ प्रभू की सिफतसालाह की जा सके। हे भाई ! संत जनों को मिल के (अकथ प्रभू का मिलाप) हासिल हो सकता है; (संत जनों से) अकथ प्रभू की सिफत सालाह सुन के मन में प्यारी लगती है। हे भाई ! (संत गुरू की कृपा से) मेरे मन में परमात्मा का नाम आसरा बन गया है। (गुरू ही) मुझे सुजान अकाल-पुरख मिला सकता है। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू-पुरख ने प्रभू-पुरख से मिला दिया। (प्रभू को) मिल के उसकी सुरति सुरतियों के मालिक हरी में (सदा के लिए) टिक गई। हे भाई ! भाग्यशाली मनुष्यों ने गुरू का आसरा लिया। उनको सुंदर सुजान परमात्मा मिल गया। पर अपने मन के पीछे चलने वाले बद्-किस्मत होते हैं (छुटॅड़ स्त्री की तरह ही उनकी) जिंदगी दुखों में बीतती है। 3। हे प्रभू ! हम (जीव) आपके (दर पर) निमाणे मंगते हैं। हमारे मुँह में (गुरू की) आत्मिक जीवन देने वाली बाणी दें। हे हरी ! हे प्रभू ! मुझे सुंदर सुजान मित्र मिलाएँ। हे दास नानक ! (कह- हे प्रभू !) मैं आपकी शरण पड़ा हूँ। मेहर करें। मैं आपके नाम में लीन रहूँ। 4। 3। 5।

हरि भाउ लगा बैरागीआ वडभागी हरि मनि राखु ॥

मारू महला 4 ॥
हरि भाउ लगा बैरागीआ वडभागी हरि मनि राखु ॥
मिलि संगति सरधा ऊपजै गुर सबदी हरि रसु चाखु ॥
सभु मनु तनु हरिआ होइआ गुरबाणी हरि गुण भाखु ॥1॥
मन पिआरिआ मित्रा हरि हरि नाम रसु चाखु ॥
गुरि पूरै हरि पाइआ हलति पलति पति राखु ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु धिआईऐ हरि कीरति गुरमुखि चाखु ॥
तनु धरती हरि बीजीऐ विचि संगति हरि प्रभ राखु ॥
अंम्रितु हरि हरि नामु है गुरि पूरै हरि रसु चाखु ॥2॥
मनमुख त्रिसना भरि रहे मनि आसा दह दिस बहु लाखु ॥
बिनु नावै ध्रिगु जीवदे विचि बिसटा मनमुख राखु ॥
ओइ आवहि जाहि भवाईअहि बहु जोनी दुरगंध भाखु ॥3॥
त्राहि त्राहि सरणागती हरि दइआ धारि प्रभ राखु ॥
संतसंगति मेलापु करि हरि नामु मिलै पति साखु ॥
हरि हरि नामु धनु पाइआ जन नानक गुरमति भाखु ॥4॥4॥6॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 4॥ हे बैरागी जीव ! बड़े भाग्यों से (आपके अंदर) परमात्मा का प्यार बना है। अब परमात्मा (के नाम) को (अपने) मन में संभाल के रखें। हे भाई ! संगति में मिल के (ही नाम जपने की) श्रद्धा पैदा होती है। (आप भी संगति में टिक के) गुरू के शबद द्वारा परमात्मा के नाम का स्वाद चखते रहें। (जो मनुष्य नाम-रस चखता है उसका) तन मन हर वक्त खिला रहता है। हे भाई ! गुरू की बाणी के द्वारा (आप भी) परमात्मा के गुण उचारा करें। 1। हे प्यारे मित्र मन ! सदा परमात्मा के नाम का स्वाद चखा करें। परमात्मा (का नाम) पूरे गुरू के द्वारा मिलता है (आप भी गुरू की शरण पड़ें। और) इस लोक और परलोक में अपनी इज्जत बचा लें। 1। रहाउ। हे भाई ! सदा परमात्मा का नाम ध्याना चाहिए। (हे भाई ! आप) गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा की सिफतसालाह (का स्वाद) चखा करें। ये शरीर (मानो) धरती है। (इसमें) परमात्मा (का नाम-बीज) बीजना चाहिए। संगति में (टिके रहने से) परमात्मा स्वयं (उस नाम-खेती का) रखवाला बनता है। हे भाई ! परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाला है। पूरे गुरू के द्वारा (आप भी) परमात्मा (के नाम) का स्वाद चखते रहें। 2। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे तृष्णा (की मैल) के साथ लिबड़े रहते हैं। (उनके) मन में (माया की ही) आशा (टिकी रहती है)। वे आम तौर पर (माया की खातिर) भटकते रहते हैं। नाम से वंचित रह कर उनका जीना धिक्कारयोग्य है। मनमुखों का ठिकाना (विकारों के) गंद में रहता है। वे सदा पैदा होते मरते रहते हैं। अनेकों जूनियों में भटकाए जाते हैं (विकारों की) गंदगी (उनकी हमेशा की) खुराक है। 3। हे हरी ! हे प्रभू ! मेहर करें। (हमारी) रक्षा करें। हम आपकी शरण आए हैं। हमें बचा लें बचा लें। संतों की संगति में हमारा मिलाप बनाए रखें। (वहीं ही) हरी-नाम मिलता है (जिसको नाम मिलता है उसको लोक-परलोक में) आदर मिलता है। हे दास नानक ! (संतों की संगति में ही) परमात्मा का नाम-धन मिलता है। आप भी गुरू की मति ले के नाम उचारते रहें। 4। 4। 6।

हरि हरि भगति भरे भंडारा ॥

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मारू महला 4 घरु 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि भगति भरे भंडारा ॥
गुरमुखि रामु करे निसतारा ॥
जिस नो क्रिपा करे मेरा सुआमी सो हरि के गुण गावै जीउ ॥1॥
हरि हरि क्रिपा करे बनवाली ॥
हरि हिरदै सदा सदा समाली ॥
हरि हरि नामु जपहु मेरे जीअड़े जपि हरि हरि नामु छडावै जीउ ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 4 घरु 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई ! गुरू के पास) परमात्मा की भगती के खजाने भरे पड़े हैं। परमात्मा गुरू के माध्यम से (ही) पार-उतारा करता है। मेरा मालिक-प्रभू जिस मनुष्य पर मेहर करता है वह मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के गुण गाता है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य पर हरी परमात्मा कृपा करता है। वह मनुष्य सदा ही सदा ही परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रखता है। हे मेरी जिंदे ! आप परमात्मा का नाम सदा जपा करें। प्रभू का नाम ही विकारों से खलासी कराता है। 1। रहाउ।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 997 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 997 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।