मन मेरे मै हरि हरि कथा मनि भाणी ॥
हरि हरि कथा नित सदा करि गुरमुखि अकथ कहाणी ॥1॥ रहाउ ॥
मै मनु तनु खोजि ढंढोलिआ किउ पाईऐ अकथ कहाणी ॥
संत जना मिलि पाइआ सुणि अकथ कथा मनि भाणी ॥
मेरै मनि तनि नामु अधारु हरि मै मेले पुरखु सुजाणी ॥2॥
गुर पुरखै पुरखु मिलाइ प्रभ मिलि सुरती सुरति समाणी ॥
वडभागी गुरु सेविआ हरि पाइआ सुघड़ सुजाणी ॥
मनमुख भाग विहूणिआ तिन दुखी रैणि विहाणी ॥3॥
हम जाचिक दीन प्रभ तेरिआ मुखि दीजै अंम्रित बाणी ॥
सतिगुरु मेरा मित्रु प्रभ हरि मेलहु सुघड़ सुजाणी ॥
जन नानक सरणागती करि किरपा नामि समाणी ॥4॥3॥5॥
हरि भाउ लगा बैरागीआ वडभागी हरि मनि राखु ॥
मिलि संगति सरधा ऊपजै गुर सबदी हरि रसु चाखु ॥
सभु मनु तनु हरिआ होइआ गुरबाणी हरि गुण भाखु ॥1॥
मन पिआरिआ मित्रा हरि हरि नाम रसु चाखु ॥
गुरि पूरै हरि पाइआ हलति पलति पति राखु ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु धिआईऐ हरि कीरति गुरमुखि चाखु ॥
तनु धरती हरि बीजीऐ विचि संगति हरि प्रभ राखु ॥
अंम्रितु हरि हरि नामु है गुरि पूरै हरि रसु चाखु ॥2॥
मनमुख त्रिसना भरि रहे मनि आसा दह दिस बहु लाखु ॥
बिनु नावै ध्रिगु जीवदे विचि बिसटा मनमुख राखु ॥
ओइ आवहि जाहि भवाईअहि बहु जोनी दुरगंध भाखु ॥3॥
त्राहि त्राहि सरणागती हरि दइआ धारि प्रभ राखु ॥
संतसंगति मेलापु करि हरि नामु मिलै पति साखु ॥
हरि हरि नामु धनु पाइआ जन नानक गुरमति भाखु ॥4॥4॥6॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि भगति भरे भंडारा ॥
गुरमुखि रामु करे निसतारा ॥
जिस नो क्रिपा करे मेरा सुआमी सो हरि के गुण गावै जीउ ॥1॥
हरि हरि क्रिपा करे बनवाली ॥
हरि हिरदै सदा सदा समाली ॥
हरि हरि नामु जपहु मेरे जीअड़े जपि हरि हरि नामु छडावै जीउ ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के मन में (प्रभू की सिफत सालाह के लिए) श्रद्धा बनी रहती है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।