लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 996 · मारू

इस पृष्ठ पर
अंग
996
मारू
अंग बदलें या अंश चुनें · 3 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. हरि हरि नामु निधानु लै गुरमति हरि पति पाइ ॥
  2. हउ पूंजी नामु दसाइदा को दसे हरि धनु रासि ॥
  3. हरि हरि कथा सुणाइ प्रभ गुरमति हरि रिदै समाणी ॥

गुरु राम दास जी · शबद · राग मारू

हरि हरि नामु निधानु लै गुरमति हरि पति पाइ ॥

मारू महला 4 घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि नामु निधानु लै गुरमति हरि पति पाइ ॥
हलति पलति नालि चलदा हरि अंते लए छडाइ ॥
जिथै अवघट गलीआ भीड़ीआ तिथै हरि हरि मुकति कराइ ॥1॥
मेरे सतिगुरा मै हरि हरि नामु द्रिड़ाइ ॥
मेरा मात पिता सुत बंधपो मै हरि बिनु अवरु न माइ ॥1॥ रहाउ ॥
मै हरि बिरही हरि नामु है कोई आणि मिलावै माइ ॥
तिसु आगै मै जोदड़ी मेरा प्रीतमु देइ मिलाइ ॥
सतिगुरु पुरखु दइआल प्रभु हरि मेले ढिल न पाइ ॥2॥
जिन हरि हरि नामु न चेतिओ से भागहीण मरि जाइ ॥
ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि मरि जंमहि आवै जाइ ॥
ओइ जम दरि बधे मारीअहि हरि दरगह मिलै सजाइ ॥3॥
तू प्रभु हम सरणागती मो कउ मेलि लैहु हरि राइ ॥
हरि धारि क्रिपा जगजीवना गुर सतिगुर की सरणाइ ॥
हरि जीउ आपि दइआलु होइ जन नानक हरि मेलाइ ॥4॥1॥3॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 4 घरु 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! परमात्मा का नाम (ही असल) खजाना है; गुरू की शिक्षा पर चल के (ये खजाना) हासिल करें; (जिसके पास ये खजाना होता है वह) प्रभू की हजूरी में इज्जत पाता है। (ये खजाना) इस लोक में और परलोक में साथ निभाता है। और आखिरी वक्त भी परमात्मा (दुखों से) बचा लेता है। हे भाई! जीवन के जिस रास्ते में पत्तन से दूर के बिखड़े रास्ते हैं। बहुत ही संकरी गलियाँ हैं (जिनमें आत्मिक जीवन का दम घुटता जाता है) वहाँ परमात्मा ही निजात दिलवाता है। 1। हे मेरे सतिगुरू! परमात्मा का नाम मेरे हृदय में दृढ़ कर दें। हे मेरी माँ! हरी ही मेरी माँ है। हरी ही मेरा पिता है। हरी ही मेरे पुत्र हैं। हरी ही मेरा संबंधी है। हे माँ! हरी के बिना और कोई मेरा (पक्का साक) नहीं। 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा का नाम ही मेरा (असल) प्यारा (मित्र) है। हे माँ! अगर कोई (उस मित्र को) ला के (मेरे साथ) मिलाप करवा सकता है। मैं उसके आगे नित्य आरजू करता रहूँ। भला कि कहीं मेरा प्रीतम मुझे मिला दे। हे माँ! गुरू ही दयावान पुरख है जो हरी प्रभू के साथ मिला देता है और रत्ती भर भी देरी नहीं होती। 2। हे भाई! जिन मनुष्यों ने कभी परमात्मा का सिमरन नहीं किया। वे बद्-किस्मत हैं। हे भाई! (नाम-हीन मनुष्य) आत्मिक मौत मरा रहता है। वह (नाम से वंचित) बंदे बार-बार जूनियों में भटकाए जाते हैं। वह जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। हे भाई! नाम-हीन मनुष्य पैदा होता है मरता रहता है। हे भाई! उन (नाम से वंचित हुए) बंदों की जमराज के दर बाँध कर मार-पिटाई होती है। प्रभू की दरगाह में उनको (ये) सजा मिलती है। 3। हे पातशाह! आप हमारे मालिक हैं। हम जीव आपकी शरण में हैं। हे पातशाह! मुझे (अपने चरणों में) जोड़े रखें। हे हरी! हे जगत के जीवन हरी! (मेरे पर) मेहर करें। मुझे गुरू की शरण सतिगुरू की शरण में (सदा) रखें। हे दास नानक! (कहें: हे भाई!) जिस मनुष्य पर परमात्मा स्वयं दयावान होता है। उसको (गुरू की शरण में रख के) अपने साथ मिला लेता है। 4। 1। 3।

गुरु राम दास जी · शबद · राग मारू

हउ पूंजी नामु दसाइदा को दसे हरि धनु रासि ॥

मारू महला 4 ॥
हउ पूंजी नामु दसाइदा को दसे हरि धनु रासि ॥
हउ तिसु विटहु खन खंनीऐ मै मेले हरि प्रभ पासि ॥
मै अंतरि प्रेमु पिरंम का किउ सजणु मिलै मिलासि ॥1॥
मन पिआरिआ मित्रा मै हरि हरि नामु धनु रासि ॥
गुरि पूरै नामु द्रिड़ाइआ हरि धीरक हरि साबासि ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि आपि मिलाइ गुरु मै दसे हरि धनु रासि ॥
बिनु गुर प्रेमु न लभई जन वेखहु मनि निरजासि ॥
हरि गुर विचि आपु रखिआ हरि मेले गुर साबासि ॥2॥
सागर भगति भंडार हरि पूरे सतिगुर पासि ॥
सतिगुरु तुठा खोलि देइ मुखि गुरमुखि हरि परगासि ॥
मनमुखि भाग विहूणिआ तिख मुईआ कंधी पासि ॥3॥
गुरु दाता दातारु है हउ मागउ दानु गुर पासि ॥
चिरी विछुंना मेलि प्रभ मै मनि तनि वडड़ी आस ॥
गुर भावै सुणि बेनती जन नानक की अरदासि ॥4॥2॥4॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 4॥ हे भाई! मैं हरी-नाम सरमाए की तलाश करता फिरता हूँ। अगर कोई मुझे उस नाम-धन। नाम-राशि के बारे में बता दे। और, मुझे हरी-प्रभू के साथ जोड़ दे तो मैं उसके सदके जाऊँ। बलिहार जाऊँ। हे भाई! मेरे हृदय में प्यारे प्रभू का प्रेम बस रहा है। वह सज्जन मुझे कैसे मिले। मैं उससे किस प्रकार मिलूँ। 1। हे मेरे मन! हे प्यारे मित्र! परमात्मा का नाम ही मुझे (असल) धन (असल) सरमाया (प्रतीत होता है)। जिस मनुष्य के हृदय में पूरे गुरू ने प्रभू का नाम पक्का कर दिया। उसको परमात्मा धीरज देता है उसको साबाश देता है। 1। रहाउ। हे हरी! आप खुद ही मुझे गुरू मिला दें। ताकि गुरू मुझे आपका नाम-धन सरमाया दिखा दे। हे सज्जनो! अपने मन में निर्णय करके देख लें। गुरू के बिना प्रभू का प्यार हासिल नहीं होता। परमात्मा ने गुरू में अपने आप को रखा हुआ है। गुरू ही उससे मिलाता है। गुरू की उपमा (वडिआई) करें। 2। हे भाई! पूरे गुरू के पास परमात्मा की भक्ति के समुंद्र। भक्ति के खजाने मौजूद हैं। जिस गुरमुख मनुष्य पर गुरू मेहरवान होता है (ये खजाने) खोल के (उसको) दे देता है। मुँह से उसको उपदेश करता है जिसके कारण उसके अंदर रब्बी नूर प्रकट हो जाता है। पर अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री बद्-किस्मत होती है। वह गुरू के नजदीक होते हुए भी वैसे ही आत्मिक मौत मरी रहती है जैसे कोई मनुष्य सरोवर के किनारे पर खड़ा हुआ भी प्यासा मर जाता है। 3। हे भाई! गुरू सब दातें देने में समर्थ है। मैं गुरू से यह खै़र माँगता हूँ कि मुझे चिरों से विछड़े हुए को प्रभू मिला दे। मेरे मन में मेरे हृदय में ये बड़ी तमन्ना है। हे गुरू! अगर आपको भाए तो दास नानक की ये विनती सुनें। अरदास सुनें। 4। 2। 4।

गुरु राम दास जी · शबद · राग मारू

हरि हरि कथा सुणाइ प्रभ गुरमति हरि रिदै समाणी ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

मारू महला 4 ॥
हरि हरि कथा सुणाइ प्रभ गुरमति हरि रिदै समाणी ॥
जपि हरि हरि कथा वडभागीआ हरि उतम पदु निरबाणी ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 4॥ हे मन! सदा हरी-प्रभू की महिमा सुनते रहें। गुरू की मति पर चलने से ही ये हरी-कथा हृदय में टिक सकती है। हे भाग्यशाली मन! (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा की सिफत सालाह याद करते रहें। (इस तरह) उत्तम और वासना-रहित आत्मिक दर्जा मिल जाता है।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 996 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 996 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।