ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि नामु निधानु लै गुरमति हरि पति पाइ ॥
हलति पलति नालि चलदा हरि अंते लए छडाइ ॥
जिथै अवघट गलीआ भीड़ीआ तिथै हरि हरि मुकति कराइ ॥1॥
मेरे सतिगुरा मै हरि हरि नामु द्रिड़ाइ ॥
मेरा मात पिता सुत बंधपो मै हरि बिनु अवरु न माइ ॥1॥ रहाउ ॥
मै हरि बिरही हरि नामु है कोई आणि मिलावै माइ ॥
तिसु आगै मै जोदड़ी मेरा प्रीतमु देइ मिलाइ ॥
सतिगुरु पुरखु दइआल प्रभु हरि मेले ढिल न पाइ ॥2॥
जिन हरि हरि नामु न चेतिओ से भागहीण मरि जाइ ॥
ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि मरि जंमहि आवै जाइ ॥
ओइ जम दरि बधे मारीअहि हरि दरगह मिलै सजाइ ॥3॥
तू प्रभु हम सरणागती मो कउ मेलि लैहु हरि राइ ॥
हरि धारि क्रिपा जगजीवना गुर सतिगुर की सरणाइ ॥
हरि जीउ आपि दइआलु होइ जन नानक हरि मेलाइ ॥4॥1॥3॥
हउ पूंजी नामु दसाइदा को दसे हरि धनु रासि ॥
हउ तिसु विटहु खन खंनीऐ मै मेले हरि प्रभ पासि ॥
मै अंतरि प्रेमु पिरंम का किउ सजणु मिलै मिलासि ॥1॥
मन पिआरिआ मित्रा मै हरि हरि नामु धनु रासि ॥
गुरि पूरै नामु द्रिड़ाइआ हरि धीरक हरि साबासि ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि आपि मिलाइ गुरु मै दसे हरि धनु रासि ॥
बिनु गुर प्रेमु न लभई जन वेखहु मनि निरजासि ॥
हरि गुर विचि आपु रखिआ हरि मेले गुर साबासि ॥2॥
सागर भगति भंडार हरि पूरे सतिगुर पासि ॥
सतिगुरु तुठा खोलि देइ मुखि गुरमुखि हरि परगासि ॥
मनमुखि भाग विहूणिआ तिख मुईआ कंधी पासि ॥3॥
गुरु दाता दातारु है हउ मागउ दानु गुर पासि ॥
चिरी विछुंना मेलि प्रभ मै मनि तनि वडड़ी आस ॥
गुर भावै सुणि बेनती जन नानक की अरदासि ॥4॥2॥4॥
हरि हरि कथा सुणाइ प्रभ गुरमति हरि रिदै समाणी ॥
जपि हरि हरि कथा वडभागीआ हरि उतम पदु निरबाणी ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मारू महला 4 घरु 3 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम (ही असल) खजाना है; गुरू की शिक्षा पर चल के (ये खजाना) हासल कर; (जिसके पास ये खजाना होता है वह) प्रभू की हजूरी में इज्जत प।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।