नानक तिसु सरणाई भजि पउ आपे बखसि मिलाइ ॥4॥5॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपिओ नामु सुक जनक गुर बचनी हरि हरि सरणि परे ॥
दालदु भंजि सुदामे मिलिओ भगती भाइ तरे ॥
भगति वछलु हरि नामु क्रितारथु गुरमुखि क्रिपा करे ॥1॥
मेरे मन नामु जपत उधरे ॥
ध्रू प्रहिलादु बिदरु दासी सुतु गुरमुखि नामि तरे ॥1॥ रहाउ ॥
कलजुगि नामु प्रधानु पदारथु भगत जना उधरे ॥
नामा जैदेउ कबीरु त्रिलोचनु सभि दोख गए चमरे ॥
गुरमुखि नामि लगे से उधरे सभि किलबिख पाप टरे ॥2॥
जो जो नामु जपै अपराधी सभि तिन के दोख परहरे ॥
बेसुआ रवत अजामलु उधरिओ मुखि बोलै नाराइणु नरहरे ॥
नामु जपत उग्रसैणि गति पाई तोड़ि बंधन मुकति करे ॥3॥
जन कउ आपि अनुग्रहु कीआ हरि अंगीकारु करे ॥
सेवक पैज रखै मेरा गोविदु सरणि परे उधरे ॥
जन नानक हरि किरपा धारी उर धरिओ नामु हरे ॥4॥1॥
सिध समाधि जपिओ लिव लाई साधिक मुनि जपिआ ॥
जती सती संतोखी धिआइआ मुखि इंद्रादिक रविआ ॥
सरणि परे जपिओ ते भाए गुरमुखि पारि पइआ ॥1॥
मेरे मन नामु जपत तरिआ ॥
धंना जटु बालमीकु बटवारा गुरमुखि पारि पइआ ॥1॥ रहाउ ॥
सुरि नर गण गंधरबे जपिओ रिखि बपुरै हरि गाइआ ॥
संकरि ब्रहमै देवी जपिओ मुखि हरि हरि नामु जपिआ ॥
हरि हरि नामि जिना मनु भीना ते गुरमुखि पारि पइआ ॥2॥
कोटि कोटि तेतीस धिआइओ हरि जपतिआ अंतु न पाइआ ॥
बेद पुराण सिम्रिति हरि जपिआ मुखि पंडित हरि गाइआ ॥
नामु रसालु जिना मनि वसिआ ते गुरमुखि पारि पइआ ॥3॥
अनत तरंगी नामु जिन जपिआ मै गणत न करि सकिआ ॥
गोबिदु क्रिपा करे थाइ पाए जो हरि प्रभ मनि भाइआ ॥
गुरि धारि क्रिपा हरि नामु द्रिड़ाइओ जन नानक नामु लइआ ॥4॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा को किसी की मुथाजी नहीं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।