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अंग 992

अंग
992
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भणति नानकु जनो रवै जे हरि मनो मन पवन सिउ अंम्रितु पीजै ॥
मीन की चपल सिउ जुगति मनु राखीऐ उडै नह हंसु नह कंधु छीजै ॥3॥9॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: दास नानक कहता है अगर मनुष्य का मन परमात्मा का सिमरन करे। तो मनुष्य मन की एकाग्रता के साथ श्वास-श्वास (नाम जप के) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीता है। इस तरीके से मछली की चंचलता वाला मन वश में रखा जा सकता है। मन विकारों की ओर नहीं दौड़ता। और शरीर भी विकारों में खचित नहीं होता। 3। 9।
मारू महला 1 ॥
माइआ मुई न मनु मुआ सरु लहरी मै मतु ॥
बोहिथु जल सिरि तरि टिकै साचा वखरु जितु ॥
माणकु मन महि मनु मारसी सचि न लागै कतु ॥
राजा तखति टिकै गुणी भै पंचाइण रतु ॥1॥
बाबा साचा साहिबु दूरि न देखु ॥
सरब जोति जगजीवना सिरि सिरि साचा लेखु ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहमा बिसनु रिखी मुनी संकरु इंदु तपै भेखारी ॥
मानै हुकमु सोहै दरि साचै आकी मरहि अफारी ॥
जंगम जोध जती संनिआसी गुरि पूरै वीचारी ॥
बिनु सेवा फलु कबहु न पावसि सेवा करणी सारी ॥2॥
निधनिआ धनु निगुरिआ गुरु निंमाणिआ तू माणु ॥
अंधुलै माणकु गुरु पकड़िआ निताणिआ तू ताणु ॥
होम जपा नही जाणिआ गुरमती साचु पछाणु ॥
नाम बिना नाही दरि ढोई झूठा आवण जाणु ॥3॥
साचा नामु सलाहीऐ साचे ते त्रिपति होइ ॥
गिआन रतनि मनु माजीऐ बहुड़ि न मैला होइ ॥
जब लगु साहिबु मनि वसै तब लगु बिघनु न होइ ॥
नानक सिरु दे छुटीऐ मनि तनि साचा सोइ ॥4॥10॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (जो मनुष्य मालिक-प्रभू को अपने अंदर बसता नहीं देखता। प्रभू को अपने हृदय में नहीं बसाता) उसकी माया की तृष्णा नहीं समाप्त होती। उसका मन विकारों से नहीं हटता। उसका हृदय-सरोवर मैं-मैं की लहरों से भरा रहता है। वही जीवन-बेड़ा (संसार-समुंद्र की विकार-लहरों के) पानियों पर तैर के (प्रभू-चरनों में) टिका रहता है जिसमें सदा-स्थिर रहने वाला नाम-सौदा है। जिस मन में नाम-मोती बसता है। उस मन को वह मोती विकारों से बचा लेता है। सच्चे नाम में जुड़े रहने के कारण उस मन में दरार नहीं आता (वह मन माया में डोलता नहीं); प्रभू के डर-अदब में रंगी हुई जीवात्मा प्रभू के गुणों में प्रवृति रहने के कारण अंदर ही हृदय-तख़्त पर टिका रहता है (बाहर नहीं भटकता)। 1। हे भाई ! सदा कायम रहने वाले मालिक प्रभू को (अपने आप से) दूर बसता ना समझ (सच्चा मालिक आपके अपने अंदर बस रहा है)। उस जगत-के-आसरे प्रभू की ज्योति सब जीवों के अंदर मौजूद है। प्रभू का हुकम हरेक जीव पर सदा अटल है। 1। रहाउ। ब्रहमा-विष्णु शिव-इंद्र और अनेकों ऋषि-मुनि। चाहे कोई तप करता है चाहे कोई त्यागी है। वही परमात्मा के दर पर शोभा पाता है जो परमात्मा का हुकम मानता है (जो परमात्मा की रजा में अपनी मर्जी लीन करता है)। अपनी मन-मर्जी करने वाले अहंकारी आत्मिक मौत मरते हैं। हमने गुरू के द्वारा ये विचार (करके देख) लिया है कि जंगम हों। योद्धे हों। जती हों। सन्यासी हों। प्रभू की भक्ति के बिना कभी भी कोई अपनी मेहनत-कमाई का फल प्राप्त नहीं कर सकता। सेवा-सिमरन ही सबसे श्रेष्ठ करणी है। 2। हे प्रभू ! गरीबों के लिए आपका नाम खजाना है (गरीब होते हुए भी वह बादशाहों वाला दिल रखते हैं)। जिनकी कोई बाँह नहीं पकड़ता। उनका आप रहबर बनता है; जिसको कोई आदर-मान नहीं देता (नाम की दाति दे के) उनको (जगत में) आदर-सम्मान दिलाता है। जिस भी (आत्मिक आँखों से) अंधे ने गुरू-ज्योति (का पल्ला) पकड़ा है उस निआसरे का आप आसरा बन जाता है। हवन-जप आदि से परमात्मा से सांझ नहीं बनती। गुरू की दी हुई मति पर चलने से वह सदा-स्थिर प्रभू (जीव का) दर्दी बन जाता है। परमात्मा के नाम के बिना परमात्मा के दर पर सहारा नहीं मिलता। जनम-मरण का नाशवंत चक्कर बना रहता है। 3। हे भाई ! परमात्मा का सदा कायम रहने वाला नाम सदा सलाहना चाहिए। सच्चे नाम की ही बरकति से संतोषी जीवन मिलता है। प्रभू की गहरी-सांझ रूप रतन से मन को चमकाना चाहिए। फिर ये (विकारों में) मैला नहीं होता। प्रभू-मालिक जब तक मन में बसा रहता है (जीवन-सफर में विकारों की ओर से) कोई रुकावट नहीं पैदा होती। हे नानक ! स्वैभाव गवाने से ही विकारों से निजात मिलती है। और वह सदा-थिर प्रभू मन में और शरीर में टिका रहता है। 4। 10।
मारू महला 1 ॥
जोगी जुगति नामु निरमाइलु ता कै मैलु न राती ॥
प्रीतम नाथु सदा सचु संगे जनम मरण गति बीती ॥1॥
गुसाई तेरा कहा नामु कैसे जाती ॥
जा तउ भीतरि महलि बुलावहि पूछउ बात निरंती ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहमणु ब्रहम गिआन इसनानी हरि गुण पूजे पाती ॥
एको नामु एकु नाराइणु त्रिभवण एका जोती ॥2॥
जिहवा डंडी इहु घटु छाबा तोलउ नामु अजाची ॥
एको हाटु साहु सभना सिरि वणजारे इक भाती ॥3॥
दोवै सिरे सतिगुरू निबेड़े सो बूझै जिसु एक लिव लागी जीअहु रहै निभराती ॥
सबदु वसाए भरमु चुकाए सदा सेवकु दिनु राती ॥4॥
ऊपरि गगनु गगन परि गोरखु ता का अगमु गुरू पुनि वासी ॥
गुर बचनी बाहरि घरि एको नानकु भइआ उदासी ॥5॥11॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ जिस जोगी की जीवन-जुगति परमात्मा का पवित्र-नाम (सिमरना) है। उसके मन में (विकारों वाली) रक्ती भर भी मैल नहीं रह जाती। सबका प्यारा। सबका पति और सदा कायम रहने वाला प्रभू सदा उस (योगी) के हृदय में बसता है (इस वास्ते) जनम-मरण का चक्कर पैदा करने वाली उसकी आत्मिक अवस्था समाप्त हो जाती है। 1। हे धरती के पति-प्रभू ! जब आप मुझे अंतरात्मे चरणों में बुलाता है (जोड़ता है) तब मैं (आपसे) ये भेद की बात पूछता हूँ कि आपका कहीं कोई खास नाम है और कैसे आपके कोई विशेष जाति है (भाव। जब आप अपनी मेहर से मुझे अपने चरणों में जोड़ता है तब मुझे समझ आती है कि ना कोई आपका खास नाम है और ना ही आपकी कोई खास जाति है)। 1। रहाउ। वह ब्राहमण ब्रहम (परमात्मा का रूप हैं जाता) है जो परमात्मा के ज्ञान-जल में अपने मन को स्नान कराता है जो सदा प्रभू के गुण गाता है (मानों। पुष्प) पत्रों से प्रभू को पूजता है। जो सिर्फ परमात्मा को जो सिर्फ परमात्मा के नाम को (हृदय में सदा बसाए रखता है। जिसको) ये सारा संसार प्रभू की ज्योति का पसारा दिखता है। 2। (ज्यों-ज्यों) मैं अपनी जीभ को तराजू की डण्डी बनाता हूँ। अपने इस हृदय की तराजू का एक छाबा बनाता हूँ। (इस छाबे में) अतुल्य प्रभू का नाम तौलता हूँ (और दूसरे छाबे में अपने अंदर स्वै भाव को निकाल के रखता जाता हूँ। त्यों-त्यों ये जगत मुझे) एक हाट की तरह दिखता है जहाँ सारे ही जीव एक ही किस्म के (भाव। प्रभू नाम के) बनजारे दिखते हैं और सबके सिर के ऊपर (भाव। सबको जिंद-पिंड की राशि देने वाला) शाहूकार परमात्मा स्वयं खुद है। 3। जो मनुष्य गुरू का शबद अपने हृदय में बसाता है (इस तरह अपने मन की) भटकना समाप्त करता है और दिन-रात सदा का सेवक बना रहता है। (गुरू-शबद की बरकति से) जिस मनुष्य की सुरति एक परमात्मा में टिकी रहती है जो अंतरात्मे भटकना-रहित हो जाता है उसको सही जीवन-जुगति की समझ आ जाती है। सतिगुरू उसका जनम-मरण का चक्र समाप्त कर देता है। 4। (दुनिया के मायावी फुरनों की पहुँच से दूर) ऊँचा वह चिक्त-आकाश है (वह आत्मिक अवस्था है) जहाँ सृष्टि का पालक परमात्मा बस सकता है; उस प्रभू (के मिलाप) का वह ठिकाना अपहुँच है (क्योंकि जीव बार-बार माया की ओर पलटता रहता है)। फिर भी गुरू के द्वारा उस ठिकाने का वाशिंदे बन जाया जाता है। नानक गुरू के बताए हुए रास्ते पर चल के जगत के मोह से उपराम हो गया है। (इस तरह) अपने अंदर और सारे जगत में एक प्रभू को ही देखता है। 5। 11।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “दास नानक कहता है अगर मनुष्य का मन परमात्मा का सिमरन करे।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।