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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 990 · मारू

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अंग
990
मारू
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  1. पाप पथर तरणु न जाई ॥
  2. करणी कागदु मनु मसवाणी बुरा भला दुइ लेख पए ॥
  3. बिमल मझारि बससि निरमल जल पदमनि जावल रे ॥
  4. पतित पुनीत असंख होहि हरि चरनी मनु लाग ॥
  5. सखी सहेली गरबि गहेली ॥

गुरु नानक देव जी · सलोक · राग मारू

पाप पथर तरणु न जाई ॥

अंग 989 से चला आ रहा अंश

पाप पथर तरणु न जाई ॥
भउ बेड़ा जीउ चड़ाऊ ॥
कहु नानक देवै काहू ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: पापों के पत्थर लाद के जिंदगी की बेड़ी इन बवण्डरों में से पार नहीं लांघ सकती। अगर परमात्मा के डर-अदब की बेड़ी तैयार की जाए। और उस बेड़ी में जीव सवार हो। तब ही (संसार-समुंद्र के विकारों के बवण्डरों में से) पार लांघा जा सकता है। पर हे नानक! कहें-ऐसी बेड़ी किसी विरले को ही परमात्मा देता है। 4। 2।

गुरु नानक देव जी · सलोक · राग मारू

करणी कागदु मनु मसवाणी बुरा भला दुइ लेख पए ॥

मारू महला 1 घरु 1 ॥
करणी कागदु मनु मसवाणी बुरा भला दुइ लेख पए ॥
जिउ जिउ किरतु चलाए तिउ चलीऐ तउ गुण नाही अंतु हरे ॥1॥
चित चेतसि की नही बावरिआ ॥
हरि बिसरत तेरे गुण गलिआ ॥1॥ रहाउ ॥
जाली रैनि जालु दिनु हूआ जेती घड़ी फाही तेती ॥
रसि रसि चोग चुगहि नित फासहि छूटसि मूड़े कवन गुणी ॥2॥
काइआ आरणु मनु विचि लोहा पंच अगनि तितु लागि रही ॥
कोइले पाप पड़े तिसु ऊपरि मनु जलिआ संन॑ी चिंत भई ॥3॥
भइआ मनूरु कंचनु फिरि होवै जे गुरु मिलै तिनेहा ॥
एकु नामु अंम्रितु ओहु देवै तउ नानक त्रिसटसि देहा ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1 घरु 1॥ हे हरी! आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता (आपने आश्चर्यजनक खेल रचा है कि आपकी कुदरति में जीवों का) आचरण, मानो, कागज है। मन दवात है (उस बन रहे आचरण-कागज़ पर मन के संस्कारों की स्याही से) अच्छे-बुरे (नए) लेख लिखे जा रहे हैं (भाव, मन में अब तक के इकट्ठे हुए संस्कारों की प्रेरणा से जीव जो नए अच्छे-बुरे काम करता है। वह काम आचरण-रूप कागज़ पर नए अच्छे-बुरे संस्कार उकरते जाते हैं)। (इसी तरह) पिछले किए कर्मों के संस्कारों का समूह-रूप स्वभाव ज्यों-ज्यों जीवों को प्रेरित करता है वैसे वैसे ही वह जीवन-राह पर चल सकता है। 1। हे कमले मन! आप परमात्मा को क्यों याद नहीं करते। ज्यों-ज्यों आप परमात्मा को बिसार रहे हैं। त्यों-त्यों आपके (अंदर से) गुण घटते जा रहे हैं। 1। रहाउ। (हे मन पंछी! परमात्मा को बिसारने से आपकी जिंदगी का हरेक) दिन और हरेक रात (आपको माया में फसाने के लिए) जाल का काम दे रहा है। आपकी उम्र की जितनी भी घड़ियां हैं वह सारी ही (आपको फसाने के लिए) फंदे बनती जा रही हैं। आप बड़े स्वाद ले ले के विकारों की चोग चुग रहे हैं और विकारों में दिन-ब-दिन और फँसते जा रहे हैं। हे मूर्ख मन! इनमें से किन गुणों के साथ खलासी हासिल करेंगे। 2। मनुष्य का शरीर। मानो, (लोहार की) भट्टी है। उस भट्टी में मन। मानो, लोहा है और उस पर कामादिक पाँच अग्नियाँ जल रही हैं। (कामादिक की तपस को तेज करने के लिए) उस पर पापों के (जलते) कोयले पड़े हुए हैं। मन (इस आग में) जल रहा है। चिंता की संनी है (जो इसको पकड़ के हर तरफ से जलाने में मदद दे रही है)। 3। पर हे नानक! अगर समर्थ गुरू मिल जाए तो वह जल के निकम्मा लोहा हो चुके मन को भी सोना बना देता है। वह आत्मिक जीवन देने वाला परमात्मा का नाम देता है जिसकी बरकति से शरीर टिक जाता है (भाव, इन्द्रियां विकारों से हट जाती हैं)। 4। 3।

गुरु नानक देव जी · सलोक · राग मारू

बिमल मझारि बससि निरमल जल पदमनि जावल रे ॥

मारू महला 1 ॥
बिमल मझारि बससि निरमल जल पदमनि जावल रे ॥
पदमनि जावल जल रस संगति संगि दोख नही रे ॥1॥
दादर तू कबहि न जानसि रे ॥
भखसि सिबालु बससि निरमल जल अंम्रितु न लखसि रे ॥1॥ रहाउ ॥
बसु जल नित न वसत अलीअल मेर चचा गुन रे ॥
चंद कुमुदनी दूरहु निवससि अनभउ कारनि रे ॥2॥
अंम्रित खंडु दूधि मधु संचसि तू बन चातुर रे ॥
अपना आपु तू कबहु न छोडसि पिसन प्रीति जिउ रे ॥3॥
पंडित संगि वसहि जन मूरख आगम सास सुने ॥
अपना आपु तू कबहु न छोडसि सुआन पूछि जिउ रे ॥4॥
इकि पाखंडी नामि न राचहि इक हरि हरि चरणी रे ॥
पूरबि लिखिआ पावसि नानक रसना नामु जपि रे ॥5॥4॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ हे मेंढक! साफ सरोवर के साफ-सुथरे पानी में कमल-फूल और जाला बसते हैं। कमल फूल उस जाले और पानी की संगति में रहता है। पर उनकी संगति में उसको कोई दाग नहीं लगता (कमल-फूल हमेशा निर्लिप ही रहता है)। 1। हे मेंढक! आप कभी भी समझदारी नहीं करते। आप साफ-सुथरे पानी में बसते हैं। पर आप उस साफ-पवित्र पानी को पहचानते नहीं (उसकी कद्र नहीं जानते। और सदा) जाला ही खाते रहते हैं (जो उस साफ पानी में पड़ जाता है)। 1। रहाउ। हे मेंढक! (आपका) सदा पानी का वास है। भौरा (पानी में) नहीं बसता। (फिर भी) वह (फूल की) चोटी का रस लेता है (चूसता है)। कुमुदनी चाँद को दूर से (देख के खिल उठती है और) सिर झुका देती है। क्योंकि उसके अंदर चाँद के लिए दिल से कसक है। 2। (थन के) दूध में (परमात्मा) खण्ड और शहद (जैसी) अमृत (मिठास इकट्टी करता है)। पर जैसे (थन से चिपके हुए) चिच्चड़ की (लहू के साथ) प्रीति है (दूध से नहीं, वैसे ही) हे पानी के चतुर मेंढक! आप (भी) अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ते (पानी में बसते कमल के फूल की आपको समझ नहीं। आप पानी का जाला ही प्रसन्न होकर खाते हैं)। 3। विद्वानों की संगति में मूर्ख लोग बसते हैं। उनसे वे वेद-शास्त्र भी सुनते हैं (पर, रहते मूर्ख ही हैं। अपनी मूर्खता का स्वभाव नहीं त्यागते)। जैसे कुत्ते की पूँछ (कभी अपना टेढ़ा-पन नहीं छोड़ती, वैसे ही हे मेंढक!) आप कभी अपना स्वभाव नहीं छोड़ते। 4। कई ऐसे पाखण्डी लोग होते हैं जो परमात्मा के नाम से प्यार नहीं डालते (सदा पाखण्ड की ओर ही रुचि रखते हैं)। कई ऐसे हैं (भाग्यशाली) जो प्रभू-चरणों में सुरति जोड़ते हैं। हे नानक! आप परमात्मा का नाम अपनी जीभ से जपा करें। धुर से परमात्मा से मिली बख्शिश के अनुसार आपको ये दाति प्राप्त हो जाएगी। 5। 4।

गुरु नानक देव जी · सलोक · राग मारू

पतित पुनीत असंख होहि हरि चरनी मनु लाग ॥

मारू महला 1 ॥
सलोकु ॥
पतित पुनीत असंख होहि हरि चरनी मनु लाग ॥
अठसठि तीरथ नामु प्रभ नानक जिसु मसतकि भाग ॥1॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ श्लोक॥ बेअंत वह विकारी मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं जिनका मन परमात्मा के चरणों में लग जाता है। अढ़सठ तीर्थ परमात्मा का नाम ही है। पर, हे नानक! (ये नाम उसको ही मिलता है) जिसके माथे पर (अच्छे) भाग्य हों। 1।

गुरु नानक देव जी · सलोक · राग मारू

सखी सहेली गरबि गहेली ॥

सबदु ॥
सखी सहेली गरबि गहेली ॥
सुणि सह की इक बात सुहेली ॥1॥
जो मै बेदन सा किसु आखा माई ॥
हरि बिनु जीउ न रहै कैसे राखा माई ॥1॥ रहाउ ॥
हउ दोहागणि खरी रंञाणी ॥
गइआ सु जोबनु धन पछुताणी ॥2॥
तू दाना साहिबु सिरि मेरा ॥
खिजमति करी जनु बंदा तेरा ॥3॥
भणति नानकु अंदेसा एही ॥
बिनु दरसन कैसे रवउ सनेही ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: शब्द॥ हे अपने ही रस के गुमान में मस्त सखिए! (हे मेरे कान! हे मेरी जीभ!)। पति-प्रभू की ही सिफत-सालाह की ही बात सुनें (और करें)। ये बात सुख देने वाली है। 1। हे (मेरी) माँ! मैं किसे बताऊँ अपने दिल की पीड़ा। (बेगानी पीड़ा की सार कोई नहीं समझ सकता)। हे माँ! परमात्मा (की याद) के बिना मेरी जिंद रह नहीं सकती। सिमरन के बिना मुझे और कोई तरीका सूझता नहीं जिससे मैं इसको घबराहट से बचा सकूँ। 1। रहाउ। जिस स्त्री का जब वह जोबन गुजर जाता है जो उसको पति से मिल सकता है तब वह पछताती है। (इसी तरह अगर मेरी एक सांस भी प्रभू-मिलाप के बिना गुजरे तो) मैं (अपने आप को) बुरे भाग्यों वाली (समझती हूँ)। मैं बड़ी दुखी (होती हूँ)। 2। (हे प्रभू!) आप मेरे सिर पर मालिक हैं। आप मेरे दिल का हाल जानते हैं (मेरी तमन्ना है कि) आपकी चाकरी करता रहूँ। मैं आपका दास बना रहूँ। मैं आपका गुलाम बना रहूँ। 3। नानक कहता है: मुझे यही चिंता रहती है कि मैं कहीं परमात्मा के दर्शनों से वंचित ही ना रह जाऊँ। कोई ऐसा तरीका हो जिससे मैं उस प्यारे प्रभू से मिल सकूँ। 4। 5।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 990 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 990 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।