मेरे सतिगुर के मनि बचन न भाए सभ फोकट चार सीगारे ॥3॥ मटकि मटकि चलु सखी सहेली मेरे ठाकुर के गुन सारे ॥ गुरमुखि सेवा मेरे प्रभ भाई मै सतिगुर अलखु लखारे ॥4॥ नारी पुरखु पुरखु सभ नारी सभु एको पुरखु मुरारे ॥ संत जना की रेनु मनि भाई मिलि हरि जन हरि निसतारे ॥5॥ ग्राम ग्राम नगर सभ फिरिआ रिद अंतरि हरि जन भारे ॥ सरधा सरधा उपाइ मिलाए मो कउ हरि गुर गुरि निसतारे ॥6॥ पवन सूतु सभु नीका करिआ सतिगुरि सबदु वीचारे ॥ निज घरि जाइ अंम्रित रसु पीआ बिनु नैना जगतु निहारे ॥7॥ तउ गुन ईस बरनि नही साकउ तुम मंदर हम निक कीरे ॥ नानक क्रिपा करहु गुर मेलहु मै रामु जपत मनु धीरे ॥8॥5॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: पर उसको अपने मन में गुरू के बचन प्यारे नहीं लगते। उसके ये सारे (शारीरिक) सुंदर श्रृंगार फोके ही रह जाते हैं। 3। हे सखी ! हे सहेली ! मालिक प्रभू के गुण हृदय में बसाए रख। (और इस तरह) आत्मिक अडोलता से जीवन-यात्रा में चल। हे सहेलिए ! गुरू की शरण पड़ कर की हुई सेवा-भक्ति प्रभू को प्यारी लगती है। हे सतिगुरू ! मुझे (भी) अलख प्रभू की सूझ बख्श। 4। हे सखी ! (वैसे तो चाहे) स्त्री है (चाहे) मर्द है। (भले ही) मर्द है (भले ही) स्त्री है। सब में हर जगह एक ही सर्व-व्यापक परमात्मा बस रहा है; पर जिस मनुष्य को संत जनों (के चरणों) की धूड़ (अपने) मन को प्यारी लगती है। उसको ही प्रभू संसार-समुंद्र से पार लंघाता है। हे सखी ! संत-जनों को मिलने से ही प्रभू पार लंघाता है। 5। हे सखी ! गाँव-गाँव शहर-शहर सब जगह घूम के देख लिया है (परमात्मा ऐसे बाहर ढूँढने पर नहीं मिलता)। संतजनों ने परमात्मा को अपने हृदय में पाया है। हे हरी ! (मेरे अंदर भी) श्रद्धा पैदा करके मुझे भी (गुरू के द्वारा) अपने चरणों में जोड़। मुझे भी गुरू के द्वारा संसार-समुंद्र से पार लंघा ले। 6। हे सखी ! जिस मनुष्य ने गुरू (के चरणों) में (जुड़ के) गुरू के शबद को अपनी सुरति में टिका के (नाम सिमरन की बरकति से) अपने श्वासों की लड़ी को सुंदर बना लिया। उसने माया के मोह को दूर करके जगत (की अस्लियत) को देख के। अंतरात्मे टिक के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस लिया। हे प्रभू ! मैं आपके गुण बयान नहीं कर सकता। आप एक सुंदर मन्दिर है हम जीव उसमें रहने वाले एक छोटे-छोटे कीड़े हैं। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !् मेरे पर) मेहर कर। मुझे गुरू से मिला दे। ताकि मेरा मन नाम जप-जप के (आपके चरणों में) सदा टिका रहे। 8। 5।
नट महला 4 ॥ मेरे मन भजु ठाकुर अगम अपारे ॥ हम पापी बहु निरगुणीआरे करि किरपा गुरि निसतारे ॥1॥ रहाउ ॥ साधू पुरख साध जन पाए इक बिनउ करउ गुर पिआरे ॥ राम नामु धनु पूजी देवहु सभु तिसना भूख निवारे ॥1॥ पचै पतंगु म्रिग भ्रिंग कुंचर मीन इक इंद्री पकरि सघारे ॥ पंच भूत सबल है देही गुरु सतिगुरु पाप निवारे ॥2॥ सासत्र बेद सोधि सोधि देखे मुनि नारद बचन पुकारे ॥ राम नामु पड़हु गति पावहु सतसंगति गुरि निसतारे ॥3॥ प्रीतम प्रीति लगी प्रभ केरी जिव सूरजु कमलु निहारे ॥ मेर सुमेर मोरु बहु नाचै जब उनवै घन घनहारे ॥4॥ साकत कउ अंम्रित बहु सिंचहु सभ डाल फूल बिसुकारे ॥ जिउ जिउ निवहि साकत नर सेती छेड़ि छेड़ि कढै बिखु खारे ॥5॥ संतन संत साध मिलि रहीऐ गुण बोलहि परउपकारे ॥ संतै संतु मिलै मनु बिगसै जिउ जल मिलि कमल सवारे ॥6॥ लोभ लहरि सभु सुआनु हलकु है हलकिओ सभहि बिगारे ॥ मेरे ठाकुर कै दीबानि खबरि होुई गुरि गिआनु खड़गु लै मारे ॥7॥ राखु राखु राखु प्रभ मेरे मै राखहु किरपा धारे ॥ नानक मै धर अवर न काई मै सतिगुरु गुरु निसतारे ॥8॥6॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: नट महला 4॥ हे मेरे मन ! अपहुँच और बेअंत मालिक प्रभू के गुण याद किया कर (और कहा कर- हे प्रभू !) हम जीव पापी हैं। गुणों से बहुत दूर हैं। कृपा करके हमें गुरू के माध्यम से (गुरू की शरण डाल के संसार-समुंद्र से) पार लंघा ले। 1। रहाउ। हे प्यारे गुरू ! जो मनुष्य संत जनों की संगति प्राप्त करता है वह भी गुरमुख बन जाता है। मैं भी (आपके दर पर) विनती करता हूँ (मुझे भी संत जनों की संगति बख्श। और) मुझे परमात्मा का नाम-धन सरमाया दे जो मेरे भीतर से माया की तृष्णा माया की भूख सब दूर कर दे। 1। हे भाई ! पतंगा (दीपक की लाट पर) जल जाता है; हिरन। भौरा। हाथी। मछली इनको भी एक-एक विकार-वासना अपने वश में करके मार देते हैं। पर मानस शरीर में तो ये कामादिक पाँचों ही बलवान हैं। (मनुष्य इनका मुकाबला कैसे करे।)। गुरू ही सतिगुरू ही इन विकारों को दूर करता है। 2। हे भाई ! वेद-शास्त्र कई बार विचार के देख लिए हैं। नारद आदि ऋषि-मुनि भी (जीवन-जुगति के बारे में) जो वचन जोर दे के कह रहे हैं (वह भी विचार लिए हैं। पर असल बात ये है भाई !) परमात्मा का नाम सिमरना सीखोगे तब ही उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त करेंगे। गुरू ने साध-संगति में ही (अनेकों जीव संसार-समुंद्र से) पार लंघाए हैं। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में प्रीतम प्रभू का प्यार बना है (वह उसके मिलाप के लिए इस तरह तमन्ना बनाए रखता है) जैसे कमल का फूल सूरज को देखता है (और खिलता है। जैसे) जब बादल (बरसने के लिए) बहुत झुकता है तब ऊँचे पहाड़ों (की ओर से घटाएं आती देख के) मोर बहुत नाचता है। 4। हे भाई ! परमात्मा से टूटा हुआ मनुष्य (मानो। एक विषौला वृक्ष है) उसको चाहे कितना ही अमृत सें सींचते जाएँ। उसकी टहनियाँ उसके फल सब विषौले ही रहेंगे। साकत मनुष्य से ज्यों-ज्यों लोग विनम्रता का प्रयोग करते हैं। त्यों-त्यों वह छेड़-खानियाँ कर करके (अपने अंदर से) कड़वा जहर ही निकालता है। 5। (इस वास्ते। हे भाई ! साकत से सांझ डालने की जगह) संत जनों से गुरमुखों से मिल के रहना चाहिए। संत जन दूसरों की भलाई के लिए भले वचन ही बोलते हैं। जैसे पानी को मिल के कमल फूल खिलते हैं। वैसे ही जब कोई संत किसी संत को मिलता है तब उसका मन खिल उठता है। 6। हे भाई ! लोभ की लहर निरोल हलकाया हुआ कुक्ता ही है (जिस तरह) हलकाया हुआ कुक्ता सबको (काट-काट के) बिगाड़ता जाता है (वैसे ही लोभी मनुष्य औरों को भी अपनी संगति में लोभी बनाए जाता है)। (इस लोभ से बचने के लिए जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर प्रभू-दर पे पुकार करता है। तब) परमात्मा की हजूरी में उसकी आरजू की खबर पहुँचती है। परमात्मा गुरू के माध्यम से आत्मिक जीवन की सूझ की तलवार ले के उसके अंदर से लोभ के हलकाए हुए कुत्ते को मार देता है। 7। हे मेरे प्रभू ! (इस लोभ-कुत्ते से) मुझे भी बचा ले। बचा ले। बचा ले। कृपा करके मुझे भी बचा ले। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मेरा और कोई आसरा नहीं। गुरू ही मेरा आसरा है। गुरू ही पार लंघाता है। (मुझे गुरू की शरण रख)। 8। 6। छका1। छका = छक्का। जोड़ 6।
छका 1 ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर उसको अपने मन में गुरू के बचन प्यारे नहीं लगते।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।