गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! जिन मनुष्यों ने) बार-बार गुरू के चरणों में (लग के) (अपने हृदय में प्रभू-चरणों की) बहुत प्रीति पैदा कर ली। गुरू की संगति में रह के अपने जीवन अच्छे बना लिए। गुरू के वचनों पर पूरी श्रद्धा बना ली। वे मनुष्य परमात्मा को बहुत प्यारे लगते हैं। 6। हे भाई ! पूर्बले जनम में जिस मनुष्य ने थोड़े-थोड़े शुभ-कर्म कमाए। (उनकी बरकति से अब भी) प्रभू के नाम में प्यार बनाया। गुरू की कृपा से उसने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पा लिया। वह मनुष्य (सदा) नाम-रस को सलाहता है। नाम-रस को हृदय में बसाता है। 7। हे नानक ! (कह-) हे हरी ! हे लाल ! हे सोहणे लाल ! (सब जीव-जंतु) सारे आपके ही रूप हैं आपके ही रंग हैं। जैसा रंग आप (किसी जीव को) देता है (उस पर) वैसा ही रंग चढ़ता है। इन बिचारे जीवों की अपनी कोई बिसात नहीं। 8। 3।
नट महला 4 ॥ राम गुर सरनि प्रभू रखवारे ॥ जिउ कुंचरु तदूऐ पकरि चलाइओ करि ऊपरु कढि निसतारे ॥1॥ रहाउ ॥ प्रभ के सेवक बहुतु अति नीके मनि सरधा करि हरि धारे ॥ मेरे प्रभि सरधा भगति मनि भावै जन की पैज सवारे ॥1॥ हरि हरि सेवकु सेवा लागै सभु देखै ब्रहम पसारे ॥ एकु पुरखु इकु नदरी आवै सभ एका नदरि निहारे ॥2॥ हरि प्रभु ठाकुरु रविआ सभ ठाई सभु चेरी जगतु समारे ॥ आपि दइआलु दइआ दानु देवै विचि पाथर कीरे कारे ॥3॥ अंतरि वासु बहुतु मुसकाई भ्रमि भूला मिरगु सिंङ्हारे ॥ बनु बनु ढूढि ढूढि फिरि थाकी गुरि पूरै घरि निसतारे ॥4॥ बाणी गुरू गुरू है बाणी विचि बाणी अंम्रितु सारे ॥ गुरु बाणी कहै सेवकु जनु मानै परतखि गुरू निसतारे ॥5॥ सभु है ब्रहमु ब्रहमु है पसरिआ मनि बीजिआ खावारे ॥ जिउ जन चंद्रहांसु दुखिआ ध्रिसटबुधी अपुना घरु लूकी जारे ॥6॥ प्रभ कउ जनु अंतरि रिद लोचै प्रभ जन के सास निहारे ॥ क्रिपा क्रिपा करि भगति द्रिड़ाए जन पीछै जगु निसतारे ॥7॥ आपन आपि आपि प्रभु ठाकुरु प्रभु आपे स्रिसटि सवारे ॥ जन नानक आपे आपि सभु वरतै करि क्रिपा आपि निसतारे ॥8॥4॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: नट महला 4॥ हे मेरे राम ! हे मेरे प्रभू ! (जिस पर भी आप मेहर करता है उसको) गुरू की शरण में डाल कर (विकारों से उसका) रक्षक बनता है। जैसे जब तेंदूए ने हाथी को पकड़ कर खींच लिया था। तब तूने ही उसे ऊँचा कर के निकाल के (तेंदूए की पकड़ से) बचा लिया था। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू के भगत बहुत ही सुंदर जीवन वाले होते हैं। प्रभू (उनके मन में) श्रद्धा पैदा करके उनको (अपने नाम का) सहारा देता है। हे भाई ! प्रभू ने स्वयं ही (अपने सेवक के अंदर) श्रद्धा-भक्ति पैदा की होती है। सेवक उसको प्यारा लगता है। प्रभू स्वयं ही सेवक की इज्जत बचाता है। 1। हे भाई ! प्रभू का जो सेवक प्रभू की सेवा-भक्ति में लगता है। वह हर जगह प्रभू का ही पसारा देखता है। उसको वही सर्व-व्यापक हर जगह दिखाई देता है (उसको दिखता है कि) प्रभू स्वयं ही सब जीवों पर मेहर की निगाह से देख रहा है। 2। हे भाई ! मालिक हरी प्रभू सब जगहों में भरपूर है। दासी की तरह सारे जगत को संभालता है। दया का श्रोत प्रभू खुद ही सब जीवों पर दया करता है। सबको दान देता है। पत्थरों में भी वह स्वयं ही कीड़े पैदा करता है (और उनको रिज़क पहुँचाता है)। 3। हे भाई ! (हिरन के अंदर ही) कस्तूरी की खूब सारी सुगंधि मौजूद होती है। पर भुलेखे में भूल के हिरन (उस सुगंधि को झाड़ियों में) तलाशता फिरता है (यही हाल स्त्री-जीव का होता है। प्रभू तो इसके अंदर ही बसता है। पर ये बेचारी जीव-स्त्री) जंगल-जंगल ढूँढ-ढूँढ के भटक-भटक के थक जाती है। (आखिर) पूरे गुरू ने इसको घर में (ही बसता प्रभू दिखाया और संसार-समुंद्र से) पार लंघाया। 4। (हे भाई ! गुरू की) बाणी (सिख की) गुरू है। गुरू बाणी मे मौजूद है। (गुरू की) बाणी में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (है। जिसको सिख हर वक्त अपने हृदय में) संभाल के रखता है। गुरू बाणी उचारता है। (गुरू का) सेवक उस बाणी पर श्रद्धा धरता है। गुरू उस सिख को यकीनी तौर पर संसार-समुंद्र से पार लंघा देता है। 5। हे भाई ! हर जगह परमात्मा भरपूर है मौजूद है (पर जीव को ये समझ नहीं आती। जीव अपने) मन में बीजे कर्मों के फल खाता है (और दुखी होता है।) जैसे ध्रिष्टबुद्धि भले चंद्रहांस का बुरा लोचते-लोचते अपने ही घर को आग से जला बैठा। 6। हे भाई ! प्रभू का भगत प्रभू को अपने हृदय में देखने के लिए उत्सुक रहता है। प्रभू (भी अपने) सेवक-भक्त की हर वक्त रक्षा करता रहता है। अपने भक्त के पद्-चिन्हों पर चलने वाले जगत को भी पार लंघाता है। 7। हे भाई ! मालिक-प्रभू अपने आप को आप ही जगत के रूप में प्रकट करता है। आप ही अपनी रची सृष्टि को सुंदर बनाता है। हे दास नानक ! (कह-) प्रभू स्वयं ही हर जगह मौजूद है। कृपा करके स्वयं ही (जीवों को संसार-समुंद्र से) पार लंघाता है। 8। 4।
नट महला 4 ॥ राम करि किरपा लेहु उबारे ॥ जिउ पकरि द्रोपती दुसटां आनी हरि हरि लाज निवारे ॥1॥ रहाउ ॥ करि किरपा जाचिक जन तेरे इकु मागउ दानु पिआरे ॥ सतिगुर की नित सरधा लागी मो कउ हरि गुरु मेलि सवारे ॥1॥ साकत करम पाणी जिउ मथीऐ नित पाणी झोल झुलारे ॥ मिलि सतसंगति परम पदु पाइआ कढि माखन के गटकारे ॥2॥ नित नित काइआ मजनु कीआ नित मलि मलि देह सवारे ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: नट महला 4॥ हे मेरे राम ! मेहर कर। (मुझे विकारों के हमलों से) बचा ले (उसी तरह बचा ले) जैसे (जब) दुष्ट द्रोपदी को पकड़ कर लाए थे (तब) हे हरी ! तूने उसको नग्न होने की शर्म से बचाया था। 1। रहाउ। हे प्यारे हरी ! मेहर कर। हम (आपके दर के) मंगते हैं। मैं (आपके दर से) एक दान माँगता हूं। (मेरे मन में) सदा गुरू को मिलने की तमन्ना बनी रहती है। हे हरी ! मुझे गुरू मिला (और मेरा जीवन) सवार। 1। हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य के काम (इस तरह व्यर्थ) हैं जैसे पानी को मथना। साकत मनुष्य (जैसे) सदा पानी ही मथता रहता है। पर जिस मनुष्य ने साध-संगति में मिल के सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लिया। वह (मानो। दूध में से) मक्खन निकाल के मक्खन का स्वाद चखता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य सदा शरीर का स्नान करता रहा। जो मनुष्य सदा शरीर को ही मल-मल के साफ-सुथरा बनाता रहता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! जिन मनुष्यों ने) बार-बार गुरू के चरणों में (लग के) (अपने हृदय में प्रभू-चरणों की) बहुत प्रीति पैदा कर ली।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।