Lulla Family

अंग 979

अंग
979
राग नट नारायण
राग: नट नारायण · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
खुले भ्रम भीति मिले गोपाला हीरै बेधे हीर ॥
बिसम भए नानक जसु गावत ठाकुर गुनी गहीर ॥2॥2॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! गुणों के खजाने मालिक-प्रभू के गुण गाते-गाते (गुण गाने वाले मनुष्य) आनंद-मगन ही हो जाते हैं। (उनके अंदर से माया के पीछे) भटकते फिरने की भिक्ति खुल जाती है। उनको सृष्टि का पालनहार प्रभू मिल जाता है। (प्रभू उनकी जिंद को अपने चरणों में ऐसे जोड़ लेता है जैसे) हीरे को हीरा भेद लेता है। 2। 2। 3।
नट महला 5 ॥
अपना जनु आपहि आपि उधारिओ ॥
आठ पहर जन कै संगि बसिओ मन ते नाहि बिसारिओ ॥1॥ रहाउ ॥
बरनु चिहनु नाही किछु पेखिओ दास का कुलु न बिचारिओ ॥
करि किरपा नामु हरि दीओ सहजि सुभाइ सवारिओ ॥1॥
महा बिखमु अगनि का सागरु तिस ते पारि उतारिओ ॥
पेखि पेखि नानक बिगसानो पुनह पुनह बलिहारिओ ॥2॥3॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: नट महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा ने सदा खुद ही अपने सेवक को विकारों से बचाया है। प्रभू अपने सेवक के साथ आठों पहर बसता है। (प्रभू ने अपने सेवक को अपने) मन से कभी भी नहीं भुलाया। 1। रहाउ। (हे भाई ! प्रभू ने अपने सेवक का बाहरी) रंग-रूप कुछ भी कभी नहीं देखा। सेवक के (ऊँचे-नीचे) कुल को भी नहीं विचारा। (सेवक को सदा ही) हरी ने मेहर कर के अपना नाम बख्शा है। (नाम की बरकति से उसको) आत्मिक अडोलता और प्रेम में टिका के उसका जीवन सुंदर बना दिया है। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई ! यह जगत तृष्णा की) आग का समुंद्र है (इसमें से पार लांघना) बहुत मुश्किल है। (परमात्मा ने सदा अपने सेवक को) इसमें से (खुद) पार लंघाया है। सेवक अपने परमात्मा के दर्शन कर-करके खुश होता है और उससे बार-बार बलिहार जाता है। 2। 3। 4।
नट महला 5 ॥
हरि हरि मन महि नामु कहिओ ॥
कोटि अप्राध मिटहि खिन भीतरि ता का दुखु न रहिओ ॥1॥ रहाउ ॥
खोजत खोजत भइओ बैरागी साधू संगि लहिओ ॥
सगल तिआगि एक लिव लागी हरि हरि चरन गहिओ ॥1॥
कहत मुकत सुनते निसतारे जो जो सरनि पइओ ॥
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपुना कहु नानक अनदु भइओ ॥2॥4॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: नट महला 5॥ हे भाई ! (जिस भी मनुष्य ने) परमात्मा का नाम अपने मन में सिमरा है। एक छिन में ही उसके करोड़ों पाप मिट जाते हैं। उसका कोई भी दुख रह नहीं जाता। 1। रहाउ। जो मनुष्य प्रभू की तलाश करते-करते (उसी का ही) मतवाला बन गया। उसने प्रभू को गुरू की संगति में पा लिया। हे भाई ! (और) सारे (ख्याल) छोड़ के जिस मनुष्य की लगन एक परमात्मा में लग गई। जिसने परमात्मा के चरण (अपने मन में कस के) पकड़ लिए।1। हे नानक ! कह- (हे भाई !) परमात्मा का नाम उचारने वाले माया के बँधनों से आजाद हो जाते हैं। नाम सुनने वालों को प्रभू संसार-समुंद्र से पार लंघा देता है; जो जो भी मनुष्य प्रभू की शरण पड़ता है (प्रभू उसको पार लंघा देता है)। हे भाई ! अपने मालिक प्रभू को बार-बार सिमर के आत्मिक आनंद बना रहता है। 2। 4। 5।
नट महला 5 ॥
चरन कमल संगि लागी डोरी ॥
सुख सागर करि परम गति मोरी ॥1॥ रहाउ ॥
अंचला गहाइओ जन अपुने कउ मनु बीधो प्रेम की खोरी ॥
जसु गावत भगति रसु उपजिओ माइआ की जाली तोरी ॥1॥
पूरन पूरि रहे किरपा निधि आन न पेखउ होरी ॥
नानक मेलि लीओ दासु अपुना प्रीति न कबहू थोरी ॥2॥5॥6॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: नट महला 5॥ आपके सुंदर चरणों से मेरे प्रेम की तार लग गई है। हे सुखों के समुंद्र हरी ! मेरी आत्मिक अवस्था ऊँची बना दे। 1। रहाउ। हे सुख सागर ! तूने अपने सेवक को अपना पल्ला स्वयं पकड़वाया है। (आपके सेवक का) मन (आपके) प्यार की खुमारी में भेदा गया है। आपका यश गाते हुए (आपके सेवक के हृदय में आपकी) भगती का (ऐसा) स्वाद पैदा हैं गया है (जिसने) माया के फंदे को तोड़ दिया है। 1। हे नानक ! (कह-) हे सर्व-व्यापक प्रभू ! हे कृपा के खजाने प्रभू ! आप हर जगह भरपूर है। मैं (कहीं भी आपके बिना) किसी और को नहीं देखता। अपने सेवक को (अपने चरणों में) तूने स्वयं जोड़ लिया है। (जिसके कारण आपके चरणों की) प्रीति (आपके सेवक के हृदय में) कभी कम नहीं होती। 2। 5। 6।
नट महला 5 ॥
मेरे मन जपु जपि हरि नाराइण ॥
कबहू न बिसरहु मन मेरे ते आठ पहर गुन गाइण ॥1॥ रहाउ ॥
साधू धूरि करउ नित मजनु सभ किलबिख पाप गवाइण ॥
पूरन पूरि रहे किरपा निधि घटि घटि दिसटि समाइणु ॥1॥
जाप ताप कोटि लख पूजा हरि सिमरण तुलि न लाइण ॥
दुइ कर जोड़ि नानकु दानु मांगै तेरे दासनि दास दसाइणु ॥2॥6॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: नट महला 5॥ हे मेरे मन ! हरी नारायण के नाम का जाप जपा कर। हे प्रभू ! आप मेरे मन से कभी भी ना भूल। (मेरा मन) आठों पहर आपके गुण गाता रहे। 1। रहाउ। (हे प्रभू ! मेहर कर) मैं गुरू के चरणों की धूड़ में सदा स्नान करता रहूँ। (गुरू के चरणों की धूल) सारे पाप दूर करने के समर्थ है। हे सबमें बस रहे प्रभू ! हे कृपा के खजाने प्रभू ! आप मुझे हरेक शरीर में समाया हुआ दिखता रहे। 1। हे प्रभू ! हे हरी ! करोड़ों जप-तप और लाखों पूजा (पाठ) आपके सिमरन की बराबरी नहीं कर सकते। (आपका दास) नानक दोनों हाथ जोड़ के (आपसे) ख़ैर माँगता है (कि मैं आपके) दासों के दासों का दास (बना रहूँ)। 2। 6। 7।
नट महला 5 ॥
मेरै सरबसु नामु निधानु ॥
करि किरपा साधू संगि मिलिओ सतिगुरि दीनो दानु ॥1॥ रहाउ ॥
सुखदाता दुख भंजनहारा गाउ कीरतनु पूरन गिआनु ॥
कामु क्रोधु लोभु खंड खंड कीन॑े बिनसिओ मूड़ अभिमानु ॥1॥
किआ गुण तेरे आखि वखाणा प्रभ अंतरजामी जानु ॥
चरन कमल सरनि सुख सागर नानकु सद कुरबानु ॥2॥7॥8॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: नट महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम-खजाना मेरे वास्ते दुनिया का सारा धन पदार्थ है। (परमात्मा) ने कृपा करके (मुझे) गुरू की संगति में मिला दिया। (और) गुरू ने (मुझे परमात्मा के नाम का) दान दिया। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा सारे सुख देने वाला है। सारे दुखों को नाश करने वाला हैं (ज्यों-ज्यों) मैं उसकी सिफत सालाह के गीत गाता हूँ। (मुझे) आत्मिक जीवन की मुकम्मल सूझ (प्राप्त होती जाती है)। मैंने काम-क्रोध-लोभ (आदि विकारों के) टुकड़े-टुकड़े कर दिए। (जीवों को) मूर्ख (बना देने वाला) अहंकार (मेरे अंदर से) नाश हो गया। 1। हे प्रभू ! आप सुजान है। आप हरेक के दिल की जानने वाला है। मैं आपके कौन-कौन से गुण बता के गिनूँ। हे सुखों के सागर प्रभू ! (आपका दास) नानक आपके सुंदर चरणों की शरण आया है। और आपसे सदा सदके होता है। 2। 7। 8।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! गुणों के खजाने मालिक-प्रभू के गुण गाते-गाते (गुण गाने वाले मनुष्य) आनंद-मगन ही हो जाते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।