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अंग 977

अंग
977
राग नट नारायण
राग: नट नारायण · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि तुम वड अगम अगोचर सुआमी सभि धिआवहि हरि रुड़णे ॥
जिन कउ तुम॑रे वड कटाख है ते गुरमुखि हरि सिमरणे ॥1॥
इहु परपंचु कीआ प्रभ सुआमी सभु जगजीवनु जुगणे ॥
जिउ सललै सलल उठहि बहु लहरी मिलि सललै सलल समणे ॥2॥
जो प्रभ कीआ सु तुम ही जानहु हम नह जाणी हरि गहणे ॥
हम बारिक कउ रिद उसतति धारहु हम करह प्रभू सिमरणे ॥3॥
तुम जल निधि हरि मान सरोवर जो सेवै सभ फलणे ॥
जनु नानकु हरि हरि हरि हरि बांछै हरि देवहु करि क्रिपणे ॥4॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे हरी ! आप बहुत अपहुँच है। मनुष्य की इन्द्रियों की पहुँच से परे है। हे स्वामी ! सारे जीव आपको सुंदर स्वरूप को सिमरते हैं। हे हरी ! जिन पर आपकी बहुत मेहर भरी निगाह है। वे लोग गुरू की शरण पड़ कर आपको सिमरते हैं। 1। ये जगत-रचना स्वामी प्रभू ने स्वयं ही की है। (इस में) हर जगह जगत का जीवन-प्रभू स्वयं ही व्यापक है। जैसे पानी में पानी की बहुत लहरें उठती हैं। और वे (फिर) पानी में मिल के पानी हो जाती है। 2। हे प्रभू ! जो (ये परपंच) तूने बनाया है इसको आप खुद ही जानता है। हम जीव आपकी गहराई नहीं समझ सकते। हे प्रभू ! हम आपके बच्चे हैं। हमारे हृदय में अपनी सिफत-सालाह टिका के रख। ताकि हम आपका सिमरन करते रहें। 3। हे प्रभू ! आप (सब खजानों का) समुंद्र है। आप (सब अमूल्य पदार्थों से भरा हुआ) मानसरोवर है। जो मनुष्य आपकी सेवा-भगती करता है उसको सारे फल मिल जाते हैं। हे हरी ! आपका दास नानक आपके दर से आपका नाम माँगता है। दया करके ये दाति दे। 4। 6।
नट नाराइन महला 4 पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन सेव सफल हरि घाल ॥
ले गुर पग रेन रवाल ॥
सभि दालिद भंजि दुख दाल ॥
हरि हो हो हो नदरि निहाल ॥1॥ रहाउ ॥
हरि का ग्रिहु हरि आपि सवारिओ हरि रंग रंग महल बेअंत लाल लाल हरि लाल ॥
हरि आपनी क्रिपा करी आपि ग्रिहि आइओ हम हरि की गुर कीई है बसीठी हम हरि देखे भई निहाल निहाल निहाल निहाल ॥1॥
हरि आवते की खबरि गुरि पाई मनि तनि आनदो आनंद भए हरि आवते सुने मेरे लाल हरि लाल ॥
जनु नानकु हरि हरि मिले भए गलतान हाल निहाल निहाल ॥2॥1॥7॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: नट नाराइन महला 4 पड़ताल सतिगुर प्रसादि॥ हे मेरे मन ! परमात्मा की सेवा-भक्ति (कर। ये) मेहनत फल देने वाली है। गुरू के चरणों की धूड़ ले के (अपने माथे पर लगा। इस तरह अपने) सारे दरिद्र नाश कर ले। (गुरू के चरणों की धूड़) सारे दुखों को दलने वाली है। हे मन ! हे मन ! हे मन ! परमात्मा की मेहर की निगाह से निहाल हो जाते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (ये मनुष्य का शरीर) परमात्मा का घर है। परमात्मा ने स्वयं इसको सजाया है। उस बेअंत और अत्यंत सुंदर प्रभू का (ये मनुष्य शरीर) रंग-महल है। हे भाई ! जिस पर परमात्मा ने अपनी कृपा की। (उसके हृदय-) घर में वह स्वयं आ बसता है। हे भाई ! मैंने उस परमात्मा के मिलाप के लिए गुरू का बिचौला-पन किया है (गुरू को विचौलिया बनाया है। गुरू की शरण ली है। गुरू की कृपा से) उस हरी को देख के निहाल हो गई हूँ। बहुत ही निहाल हो गई हूँ। 1। हे भाई ! गुरू के माध्यम से ही (जब) मैंने (अपने हृदय में) परमात्मा के आ बसने की ख़बर सुनी। (जब) मैंने सुंदर लाल प्रभू का आना सुना। मेरे मन में मेरे तन में खुशियां ही खुशियां हो गई। (हे भाई ! गुरू की कृपा से) दास नानक उस परमात्मा को मिल के मस्त हाल हो गया। निहाल हो गया। निहाल हो गया। 2। 1। 7।
नट महला 4 ॥
मन मिलु संतसंगति सुभवंती ॥
सुनि अकथ कथा सुखवंती ॥
सभ किलविख पाप लहंती ॥
हरि हो हो हो लिखतु लिखंती ॥1॥ रहाउ ॥
हरि कीरति कलजुग विचि ऊतम मति गुरमति कथा भजंती ॥
जिनि जनि सुणी मनी है जिनि जनि तिसु जन कै हउ कुरबानंती ॥1॥
हरि अकथ कथा का जिनि रसु चाखिआ तिसु जन सभ भूख लहंती ॥
नानक जन हरि कथा सुणि त्रिपते जपि हरि हरि हरि होवंती ॥2॥2॥8॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: नट महला 4॥ हे (मेरे) मन ! गुरू की संगति में जुड़ा रह। (ये संगति) भले गुण पैदा करने वाली है। (हे मेरे मन !) अकथ परमात्मा की सिफतसालाह (गुरू की संगति में) सुना कर। (ये सिफत सालाह) आत्मिक आनंद देने वाली है; हे मन ! ये सारे पाप-विकार दूर कर देती है; हे मन ! (ये कथा आपके अंदर) हरी नाम का लेख लिखने के योग्य है। 1। रहाउ। हे मन ! इस संसार में परमात्मा की सिफतसालाह। गुरू की शिक्षा पर चल के परमात्मा की सिफत-सालाह करनी श्रेष्ठ कर्म है। हे मन ! जिस मनुष्य ने ये सिफत-सालाह सुनी है जिस मनुष्य ने ये सिफत-सालाह मन में बसाई है। मैं उस मनुष्य से सदके जाता हूँ। 1। हे मन ! अकथ परमात्मा की सिफत-सालाह का स्वाद जिस मनुष्य ने चखा है। ये उस मनुष्य की (माया की) सारी भूख दूर कर देती है। हे नानक ! परमात्मा की सिफत-सालाह सुन के उसके सेवक (माया की ओर से) तृप्त हो जाते हैं। परमात्मा का नाम जप के वह परमात्मा का रूप हो जाते हैं। 2। 2। 8।
नट महला 4 ॥
कोई आनि सुनावै हरि की हरि गाल ॥
तिस कउ हउ बलि बलि बाल ॥
सो हरि जनु है भल भाल ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: नट महला 4॥ हे भाई ! अगर कोई मनुष्य (गुरू से संदेशा) ला के मुझे परमात्मा की बात सुनाए; तो मैं उससे सदके जाऊँ; कुर्बान जाऊँ। वह मनुष्य (मेरे लिए तो) बढ़िया है भाग्यशाली है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।