जिन कउ तुम॑रे वड कटाख है ते गुरमुखि हरि सिमरणे ॥1॥
इहु परपंचु कीआ प्रभ सुआमी सभु जगजीवनु जुगणे ॥
जिउ सललै सलल उठहि बहु लहरी मिलि सललै सलल समणे ॥2॥
जो प्रभ कीआ सु तुम ही जानहु हम नह जाणी हरि गहणे ॥
हम बारिक कउ रिद उसतति धारहु हम करह प्रभू सिमरणे ॥3॥
तुम जल निधि हरि मान सरोवर जो सेवै सभ फलणे ॥
जनु नानकु हरि हरि हरि हरि बांछै हरि देवहु करि क्रिपणे ॥4॥6॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन सेव सफल हरि घाल ॥
ले गुर पग रेन रवाल ॥
सभि दालिद भंजि दुख दाल ॥
हरि हो हो हो नदरि निहाल ॥1॥ रहाउ ॥
हरि का ग्रिहु हरि आपि सवारिओ हरि रंग रंग महल बेअंत लाल लाल हरि लाल ॥
हरि आपनी क्रिपा करी आपि ग्रिहि आइओ हम हरि की गुर कीई है बसीठी हम हरि देखे भई निहाल निहाल निहाल निहाल ॥1॥
हरि आवते की खबरि गुरि पाई मनि तनि आनदो आनंद भए हरि आवते सुने मेरे लाल हरि लाल ॥
जनु नानकु हरि हरि मिले भए गलतान हाल निहाल निहाल ॥2॥1॥7॥
मन मिलु संतसंगति सुभवंती ॥
सुनि अकथ कथा सुखवंती ॥
सभ किलविख पाप लहंती ॥
हरि हो हो हो लिखतु लिखंती ॥1॥ रहाउ ॥
हरि कीरति कलजुग विचि ऊतम मति गुरमति कथा भजंती ॥
जिनि जनि सुणी मनी है जिनि जनि तिसु जन कै हउ कुरबानंती ॥1॥
हरि अकथ कथा का जिनि रसु चाखिआ तिसु जन सभ भूख लहंती ॥
नानक जन हरि कथा सुणि त्रिपते जपि हरि हरि हरि होवंती ॥2॥2॥8॥
कोई आनि सुनावै हरि की हरि गाल ॥
तिस कउ हउ बलि बलि बाल ॥
सो हरि जनु है भल भाल ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।