Lulla Family

अंग ९७६ · नट नारायण

अंग
976
नट नारायण
अंग बदलें या अंश चुनें · ४ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. गुर परसादी हरि नामु धिआइओ हम सतिगुर चरन पखे ॥1॥ रहाउ ॥
  2. मेरे मन जपि हरि हरि राम रंगे ॥
  3. मेरे मन जपि हरि हरि नामु मने ॥
  4. मेरे मन कलि कीरति हरि प्रवणे ॥

गुर परसादी हरि नामु धिआइओ हम सतिगुर चरन पखे ॥1॥ रहाउ ॥

अंग ९७५ से चला आ रहा अंश

गुर परसादी हरि नामु धिआइओ हम सतिगुर चरन पखे ॥1॥ रहाउ ॥
ऊतम जगंनाथ जगदीसुर हम पापी सरनि रखे ॥
तुम वड पुरख दीन दुख भंजन हरि दीओ नामु मुखे ॥1॥
हरि गुन ऊच नीच हम गाए गुर सतिगुर संगि सखे ॥
जिउ चंदन संगि बसै निंमु बिरखा गुन चंदन के बसखे ॥2॥
हमरे अवगन बिखिआ बिखै के बहु बार बार निमखे ॥
अवगनिआरे पाथर भारे हरि तारे संगि जनखे ॥3॥
जिन कउ तुम हरि राखहु सुआमी सभ तिन के पाप क्रिखे ॥
जन नानक के दइआल प्रभ सुआमी तुम दुसट तारे हरणखे ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: (पर जिसने भी) परमात्मा का नाम (जपा है) गुरू की कृपा से ही जपा है। (इस वास्ते) मैं भी सतिगुरू के चरण धोता हूँ (गुरू की शरण ही पड़ा हूँ)। 1। रहाउ। हे सबसे श्रेष्ठ ! हे जगत के नाथ ! हे जगत ईश्वर ! मैं पापी हूँ। पर आपकी शरण में आ पड़ा हूँ। मेरी रक्षा कर। आप बड़े पुरख हैं। आप दीनों के दुखों का नाश करने वाले हैं। हे हरी ! (जिसके ऊपर आप मेहर करते हैं। उसके) मुँह में आप अपना नाम देते हैं। 1। हे भाई ! परमात्मा के गुण बहुत ऊँचे हैं। हम जीव निचले स्तर के हैं। पर गुरू सतिगुरू मित्र की संगति में मैं प्रभू के गुण गाता हूँ। जैसे (अगर) चंदन के साथ नीम (का) वृक्ष उगा हुआ हो। तो उसमें चँदन के गुण आ बसते हैं (वैसे ही मेरा हाल हुआ है)। 2। हे भाई ! हम जीव माया के विषियों के विकार अनेकों बार घड़ी-मुड़ी करते रहते हैं। हम अवगुणों से इतने भर जाते हैं कि (मानो) पत्थर बन जाते हैं। पर परमात्मा अपने संत जनों की संगति में (महा-पापियों को भी) तार लेता है। 3। हे हरी ! हे स्वामी ! जिनकी आप रक्षा करते हैं। उनके सारे पाप नाश हो जाते हैं। हे दया के श्रोत प्रभू ! हे दास नानक के स्वामी ! आपने हरणाक्षस जैसे दुष्टों का भी उद्धार कर दिया है। 4। 3।

मेरे मन जपि हरि हरि राम रंगे ॥

नट महला 4 ॥
मेरे मन जपि हरि हरि राम रंगे ॥
हरि हरि क्रिपा करी जगदीसुरि हरि धिआइओ जन पगि लगे ॥1॥ रहाउ ॥
जनम जनम के भूल चूक हम अब आए प्रभ सरनगे ॥
तुम सरणागति प्रतिपालक सुआमी हम राखहु वड पापगे ॥1॥
तुमरी संगति हरि को को न उधरिओ प्रभ कीए पतित पवगे ॥
गुन गावत छीपा दुसटारिओ प्रभि राखी पैज जनगे ॥2॥
जो तुमरे गुन गावहि सुआमी हउ बलि बलि बलि तिनगे ॥
भवन भवन पवित्र सभि कीए जह धूरि परी जन पगे ॥3॥
तुमरे गुन प्रभ कहि न सकहि हम तुम वड वड पुरख वडगे ॥
जन नानक कउ दइआ प्रभ धारहु हम सेवह तुम जन पगे ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: नट महला 4॥ हे मेरे मन ! प्यार से परमात्मा का नाम जपा कर। हे मन ! जिस मनुष्य पर जगत के मालिक प्रभू ने कृपा की। उसने संत जनों के चरण लग के उस प्रभू का सिमरन किया है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! हम अनेकों जन्मों से गल्तियाँ करते आ रहे हैं। अब हम आपकी शरण आए हैं। हे स्वामी ! आप शरण पड़ों की पालना करने वाले हैं। हम पापियों की भी रक्षा कर। 1। हे प्रभू ! जो भी आपकी संगति में आया। वही (पापों-विकारों से) बच निकला। आप पापों में गिरे हुओं को पवित्र करने वाले हैं। (हे भाई !) प्रभू के गुण गा रहे (नामदेव) धोबी (छींबे) को (ब्राहमणों ने) दुष्ट-दुष्ट कह के दुत्कारा। पर प्रभू ने अपने सेवक की इज्जत रख ली। 2। हे स्वामी ! जो भी मनुष्य आपके गुण गाते हैं। मैं उनसे सदके-सदके जाता हूँ कुर्बान जाता हूँ। हे प्रभू ! जहाँ-जहाँ आपके सेवकों के चरणों की धूल लग गई। आपने वह सारे ही स्थान पवित्र कर दिए। 3। हे प्रभू ! आप बड़े हैं। आप बहुत बड़े अकाल पुरख हैं। हम जीव आपके गुण बयान नहीं कर सकते। हे प्रभू ! अपने सेवक नानक पर मेहर कर। ता कि मैं भी आपके सेवकों के चरणों की सेवा कर सकूँ। 4। 4।

मेरे मन जपि हरि हरि नामु मने ॥

नट महला 4 ॥
मेरे मन जपि हरि हरि नामु मने ॥
जगंनाथि किरपा प्रभि धारी मति गुरमति नाम बने ॥1॥ रहाउ ॥
हरि जन हरि जसु हरि हरि गाइओ उपदेसि गुरू गुर सुने ॥
किलबिख पाप नाम हरि काटे जिव खेत क्रिसानि लुने ॥1॥
तुमरी उपमा तुम ही प्रभ जानहु हम कहि न सकहि हरि गुने ॥
जैसे तुम तैसे प्रभ तुम ही गुन जानहु प्रभ अपुने ॥2॥
माइआ फास बंध बहु बंधे हरि जपिओ खुल खुलने ॥
जिउ जल कुंचरु तदूऐ बांधिओ हरि चेतिओ मोख मुखने ॥3॥
सुआमी पारब्रहम परमेसरु तुम खोजहु जुग जुगने ॥
तुमरी थाह पाई नही पावै जन नानक के प्रभ वडने ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: नट महला 4॥ हे मेरे मन ! अपने अंदर (एकाग्र हो के) परमात्मा का नाम जपा कर। जगत के नाथ प्रभू ने जिस जीव पर मेहर की। गुरू की शिक्षा ले के उसकी मति नाम जपने वाली बन गई। 1। रहाउ। हे मेरे मन ! गुरू के उपदेश से। गुरू (का उपदेश) सुन के। जिन जनों ने परमात्मा की सिफत-सालाह का गीत गाना शुरू किया। परमात्मा के नाम ने उनके सारे पाप विकार (इस तरह) काट दिए। जैसे किसान ने अपने खेत काटे होते हैं। 1। हे प्रभू ! हे हरी ! आपकी महिमा आप स्वयं ही जानते हैं। हम जीव आपके गुण बयान नहीं कर सकते। हे प्रभू ! जैसे आप हैं वैसे आप स्वयं ही हैं; अपने गुण आप स्वयं ही जानते हैं। 2। हे मेरे मन ! जीव माया के मोह की फांसियों। माया के मोह के बँधनों में बहुत बँधे रहते हैं। हे मन ! जिन्होंने परमात्मा का नाम जपा। उनके बँधन खुल गए; जैसे तंदुए नामक जलचर ने हाथी को पानी में (अपनी तारों से) बाँध लिया था। (हाथी ने) परमात्मा को याद किया। (तंदुए से) उसको निजात मिल गई। 3। हे मेरे स्वामी ! हे पारब्रहम ! आप सबसे बड़े मालिक हैं। जुगों-जुगों से आपकी तलाश होती आ रही है। पर। हे दास के महान प्रभू ! किसी ने भी आपके गुणों की थाह नहीं पाई। कोई नहीं पा सकता। 4। 5।

मेरे मन कलि कीरति हरि प्रवणे ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

नट महला 4 ॥
मेरे मन कलि कीरति हरि प्रवणे ॥
हरि हरि दइआलि दइआ प्रभ धारी लगि सतिगुर हरि जपणे ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: नट महला 4॥ हे मेरे मन ! परमात्मा की सिफतसालाह (करा कर)। मानस जिंदगी का (यही उद्यम परमात्मा की हजूरी में) प्रवान होता है। (पर। हे मन ! जिस मनुष्य पर) दयालु प्रभू ने मेहर की। उसने ही गुरू के चरणों में लग के हरी-नाम जपा है। 1। रहाउ।

रचयिता और स्रोत

यह नट नारायण राग के क्रम का अंग 976 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९७६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English