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अंग 975

अंग
975
राग नट नारायण
राग: नट नारायण · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु नट नाराइन महला 4
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
मेरे मन जपि अहिनिसि नामु हरे ॥
कोटि कोटि दोख बहु कीने सभ परहरि पासि धरे ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु जपहि आराधहि सेवक भाइ खरे ॥
किलबिख दोख गए सभ नीकरि जिउ पानी मैलु हरे ॥1॥
खिनु खिनु नरु नाराइनु गावहि मुखि बोलहि नर नरहरे ॥
पंच दोख असाध नगर महि इकु खिनु पलु दूरि करे ॥2॥
वडभागी हरि नामु धिआवहि हरि के भगत हरे ॥
तिन की संगति देहि प्रभ जाचउ मै मूड़ मुगध निसतरे ॥3॥
क्रिपा क्रिपा धारि जगजीवन रखि लेवहु सरनि परे ॥
नानकु जनु तुमरी सरनाई हरि राखहु लाज हरे ॥4॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: रागु नट नाराइन महला 4 ओंकार एक है, नाम उसका सत्य है, वह आदिपुरुष संसार का रचयिता है, अभय है, वैर भावना से रहित होने के कारण प्रेमस्वरूप है, वह अकाल ब्रह्म मूर्ति अमर है, जन्म-मरण के चक्र से रहित है, स्वजन्मा अर्थात् स्वयं ही प्रकाशमान हुआ है, जिसे गुरु-कृपा से पाया जाता है। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम दिन-रात (सदा) जपा कर। अगर अनेकों और करोड़ों पाप भी किए हुए हों। तो (परमात्मा का नाम) सबको दूर कर के (मनुष्य के हृदय में से) किनारे फेंक देता है। 1। रहाउ। हे मेरे मन ! जो मनुष्य सेवक-भावना से परमात्मा का नाम जपते-आराधते हैं। वह सच्चे जीवन वाले बन जाते हैं। (जो प्राणी नाम जपता है उसके अंदर से) सारे विकार सारे पाप (इस तरह) निकल जाते हैं। जैसे पानी (कपड़ों की) मैल दूर कर देता है। 1। हे मेरे मन ! (जो मनुष्य) हर छिन (हर पल) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाते हैं मुँह से परमात्मा का नाम उचारते रहते हैं। (कामादिक) पाँच विकार जो काबू में नहीं आ सकते और जो (आम तौर पर जीवों के) शरीर में (टिके रहते हैं)। (परमात्मा का नाम उनके शरीर में से) एक पल एक छिन में ही दूर कर देता है। 2। हे मेरे मन ! परमात्मा की भक्ति करने वाले लोग बहुत भाग्यशाली लोग परमात्मा का नाम (हर वक्त) सिमरते रहते हैं। हे प्रभू ! ऐसे भक्तों की संगति मुझे बख्श ! मेरे जैसे अनेकों मूर्ख (उनकी संगति में रह के संसार समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 3। हे जगत के आसरे प्रभू ! मेहर कर। मेहर कर। मैं आपकी शरण आ पड़ा हूँ। मुझे (इन पाँचों से) बचा ले। हे हरी ! आपका दास नानक आपकी शरण आया है (नानक की) इज्जत रख ले। 4। 1।
नट महला 4 ॥
राम जपि जन रामै नामि रले ॥
राम नामु जपिओ गुर बचनी हरि धारी हरि क्रिपले ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि अगम अगोचरु सुआमी जन जपि मिलि सलल सलले ॥
हरि के संत मिलि राम रसु पाइआ हम जन कै बलि बलले ॥1॥
पुरखोतमु हरि नामु जनि गाइओ सभि दालद दुख दलले ॥
विचि देही दोख असाध पंच धातू हरि कीए खिन परले ॥2॥
हरि के संत मनि प्रीति लगाई जिउ देखै ससि कमले ॥
उनवै घनु घन घनिहरु गरजै मनि बिगसै मोर मुरले ॥3॥
हमरै सुआमी लोच हम लाई हम जीवहि देखि हरि मिले ॥
जन नानक हरि अमल हरि लाए हरि मेलहु अनद भले ॥4॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: नट महला 4॥ (हे भाई !) परमात्मा का नाम जप के परमात्मा के सेवक परमात्मा के नाम में ही लीन हो जाते हैं। (पर) गुरू के बचनों पर चल के परमात्मा का नाम (सिर्फ उस मनुष्य ने) जपा है (जिस पर) परमात्मा ने खुद मेहर की है। 1। रहाउ। हे भाई ! मालिक प्रभू अपहुँच है। इन्द्रियों के माध्यम से उस तक पहुँच नहीं हो सकती। उसके भगत उसका नाम जप के (ऐसे हो जाते हैं जैसे) पानी में पानी मिल के (एक रूप हो जाता है)। हे भाई ! जिन संत जनों ने (साध-संगति में) मिल के परमात्मा के नाम का स्वाद चखा है। मैं उन संत जनों से सदके हूँ। कुर्बान हूँ। 1। हे भाई ! जिस सेवक ने उक्तम पुरख प्रभू का नाम जपा। प्रभू ने उसके सारे दुख-दलिद्र नाश कर दिए। मानस-शरीर में कामादिक पाँच बली विकार बसते हैं। (नाम जपने वाले के अंदर से) प्रभू ये विकार एक छिन में नाश कर देता है। 2। हे भाई ! संत-जनों के मन में परमात्मा ने (अपने चरणों में) प्रीति इस तरह लगाई है। जैसे (चकोर) चंद्रमा को (प्यार से) देखता है। जैसे (भँवरा) कमल के फूल को देखता है। जैसे नाचता हुआ मोर अपने मन में (तब) खुश होता है (जब) बादल झुकते हैं और बहुत गरजते हैं। 3। हे भाई ! मेरे मालिक प्रभू ने मेरे अंदर (अपने नाम की) लगन लगा दी है। मैं उसको देख-देख के उसके चरणों में जुड़ के आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ। हे दास नानक ! (कह-) हे हरी ! तूने खुद ही मुझे अपने नाम का नशा लगाया है। मुझे (अपने चरणों में) जोड़े रख। इसी में ही मुझे सुंदर आनंद है। 4। 2।
नट महला 4 ॥
मेरे मन जपि हरि हरि नामु सखे ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: नट महला 4॥ हे मेरे मन ! सदा परमात्मा का नाम जपा कर। (हरी नाम ही असल) मित्र है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु नट नाराइन महला 4 ओंकार एक है, नाम उसका सत्य है, वह आदिपुरुष संसार का रचयिता है, अभय है, वैर भावना से रहित होने के कारण प्रेमस्वरूप है, वह अकाल ब्रह्म मूर्ति अमर है, जन्म-मरण क।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।