ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
मेरे मन जपि अहिनिसि नामु हरे ॥
कोटि कोटि दोख बहु कीने सभ परहरि पासि धरे ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु जपहि आराधहि सेवक भाइ खरे ॥
किलबिख दोख गए सभ नीकरि जिउ पानी मैलु हरे ॥1॥
खिनु खिनु नरु नाराइनु गावहि मुखि बोलहि नर नरहरे ॥
पंच दोख असाध नगर महि इकु खिनु पलु दूरि करे ॥2॥
वडभागी हरि नामु धिआवहि हरि के भगत हरे ॥
तिन की संगति देहि प्रभ जाचउ मै मूड़ मुगध निसतरे ॥3॥
क्रिपा क्रिपा धारि जगजीवन रखि लेवहु सरनि परे ॥
नानकु जनु तुमरी सरनाई हरि राखहु लाज हरे ॥4॥1॥
राम जपि जन रामै नामि रले ॥
राम नामु जपिओ गुर बचनी हरि धारी हरि क्रिपले ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि अगम अगोचरु सुआमी जन जपि मिलि सलल सलले ॥
हरि के संत मिलि राम रसु पाइआ हम जन कै बलि बलले ॥1॥
पुरखोतमु हरि नामु जनि गाइओ सभि दालद दुख दलले ॥
विचि देही दोख असाध पंच धातू हरि कीए खिन परले ॥2॥
हरि के संत मनि प्रीति लगाई जिउ देखै ससि कमले ॥
उनवै घनु घन घनिहरु गरजै मनि बिगसै मोर मुरले ॥3॥
हमरै सुआमी लोच हम लाई हम जीवहि देखि हरि मिले ॥
जन नानक हरि अमल हरि लाए हरि मेलहु अनद भले ॥4॥2॥
मेरे मन जपि हरि हरि नामु सखे ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु नट नाराइन महला 4 ओंकार एक है, नाम उसका सत्य है, वह आदिपुरुष संसार का रचयिता है, अभय है, वैर भावना से रहित होने के कारण प्रेमस्वरूप है, वह अकाल ब्रह्म मूर्ति अमर है, जन्म-मरण क।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।