Lulla Family

अंग 974

अंग
974
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: भगत बेणी जी
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
देव संसै गांठि न छूटै ॥
काम क्रोध माइआ मद मतसर इन पंचहु मिलि लूटे ॥1॥ रहाउ ॥
हम बड कबि कुलीन हम पंडित हम जोगी संनिआसी ॥
गिआनी गुनी सूर हम दाते इह बुधि कबहि न नासी ॥2॥
कहु रविदास सभै नही समझसि भूलि परे जैसे बउरे ॥
मोहि अधारु नामु नाराइन जीवन प्रान धन मोरे ॥3॥1॥
भगत बेणी जी की वाणी में योग-साधना का गहरा अनुभव झलकता है, नाड़ी और चक्र की भाषा के साथ। उनके बारे में जीवनी-विवरण कम हैं।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! (निताणे हो जाने के कारण जीवों के अंदर से) सहम की गाँठ नहीं खुलती। काम। क्रोध। माया (का मोह)। अहंकार और ईष्या-जलन – इन पाँचों ने मिल के (सब जीवों के आत्मिक गुणों को) लूट लिया है 1। रहाउ। (कामादिकों की लूट के कारण। जीवों के अंदर से) कभी भी ये (बन चुकी) धारणा नहीं हटती कि हम बड़े कवि हैं। अच्छी कुल वाले हैं। विद्वान हैं। जोगी हैं। सन्यासी हैं। ज्ञानवान हैं। गुणवान हैं। सूरमे हैं या दाते हैं (जिस भी तरफ जीव पड़े उसी का गुमान हो गया)। 2। हे रविदास ! कह- (जिनको कामादिक ने लूट लिया है। वह) सारे ही पागलों की भांति गलतियाँ किए जा रहे हैं और (यह) नहीं समझते (कि जिंदगी का असल आसरा प्रभू का नाम है); मुझे रविदास को परमात्मा का नाम ही आसरा है। नाम ही मेरी जिंद है। नाम ही मेरे प्राण हैं। नाम ही मेरा धन है। 3।
रामकली बाणी बेणी जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
इड़ा पिंगुला अउर सुखमना तीनि बसहि इक ठाई ॥
बेणी संगमु तह पिरागु मनु मजनु करे तिथाई ॥1॥
संतहु तहा निरंजन रामु है ॥
गुर गमि चीनै बिरला कोइ ॥
तहां निरंजनु रमईआ होइ ॥1॥ रहाउ ॥
देव सथानै किआ नीसाणी ॥
तह बाजे सबद अनाहद बाणी ॥
तह चंदु न सूरजु पउणु न पाणी ॥
साखी जागी गुरमुखि जाणी ॥2॥
उपजै गिआनु दुरमति छीजै ॥
अंम्रित रसि गगनंतरि भीजै ॥
एसु कला जो जाणै भेउ ॥
भेटै तासु परम गुरदेउ ॥3॥
दसम दुआरा अगम अपारा परम पुरख की घाटी ॥
ऊपरि हाटु हाट परि आला आले भीतरि थाती ॥4॥
जागतु रहै सु कबहु न सोवै ॥
तीनि तिलोक समाधि पलोवै ॥
बीज मंत्रु लै हिरदै रहै ॥
मनूआ उलटि सुंन महि गहै ॥5॥
जागतु रहै न अलीआ भाखै ॥
पाचउ इंद्री बसि करि राखै ॥
गुर की साखी राखै चीति ॥
मनु तनु अरपै क्रिसन परीति ॥6॥
कर पलव साखा बीचारे ॥
अपना जनमु न जूऐ हारे ॥
असुर नदी का बंधै मूलु ॥
पछिम फेरि चड़ावै सूरु ॥
अजरु जरै सु निझरु झरै ॥
जगंनाथ सिउ गोसटि करै ॥7॥
चउमुख दीवा जोति दुआर ॥
पलू अनत मूलु बिचकारि ॥
सरब कला ले आपे रहै ॥
मनु माणकु रतना महि गुहै ॥8॥
मसतकि पदमु दुआलै मणी ॥
माहि निरंजनु त्रिभवण धणी ॥
पंच सबद निरमाइल बाजे ॥
ढुलके चवर संख घन गाजे ॥
दलि मलि दैतहु गुरमुखि गिआनु ॥
बेणी जाचै तेरा नामु ॥9॥1॥
भगत बेणी जी की वाणी में योग-साधना का गहरा अनुभव झलकता है, नाड़ी और चक्र की भाषा के साथ। उनके बारे में जीवनी-विवरण कम हैं।

हिन्दी अर्थ: रामकली बाणी बेणी जीउ की सतिगुर प्रसादि॥ (जो मनुष्य गुरू की कृपा से उस मिलन-अवस्था में पहुँचा है। उसके वास्ते) ईड़ा। पिंगला और सुखमना तीनों ही एक ही जगह बसती हैं। त्रिबेणी संगम प्रयाग तीर्थ भी (उस मनुष्य के लिए) वहीं बसते हैं। भाव। उस मनुष्य को ईड़ा। पिंगुला सुखमना के अभ्यास की आवश्यक्ता नहीं रह जाती; उसको तृवेणी और प्रयाग के स्नान की जरूरत नहीं रहती। (उस मनुष्य का) मन प्रभू के (मिलाप रूप तृवेणी में) स्नान करता है। 1। हे संत जनो ! माया-रहित राम उस अवस्था में (मनुष्य के मन में) बसता है। जिस अवस्था से सांझ कोई विरला मनुष्य सतिगुरू की शरण पड़ कर बनाता है। निरंजन सोहाना राम प्रकट होता है। 1। रहाउ। (अगर कोई पूछे कि) जिस अवस्था में प्रभू (मन के अंदर) आ टिकता है। उसकी पहचान क्या है (तो उक्तर ये है कि) उस अवस्था में सतिगुरू का शबद प्रभू की सिफत सालाह की बाणी (मनुष्य के हृदय में) हिल्लौरे पैदा करती हैं; (जगत के अंधेरे को दूर करने के लिए) चाँद और सूरज (उतने समर्थ) नहीं (जितना वह हिलौरा मन के अंधेरे को दूर करने के लिए होता है)। पवन पानी (आदि तत्व जगत को उतना सुख) नहीं (दे सकते। जितना सुख ये हिलौरा मनुष्य के मन को देता है); मनुष्य की सुरति गुरू की शिक्षा के साथ जाग उठती है। गुरू के द्वारा सूझ पड़ जाती है। 2। (प्रभू-मिलाप वाली अवस्था में मनुष्य की) प्रभू के साथ गहरी जान-पहचान बन जाती है। दुमर्ति नाश हो जाती है; ऊँची उड़ान में (पहुँचा हुआ मन) नाम-अमृत के रस के साथ रस जाता है; जो मनुष्य इस (अवस्था में पहुँच सकने वाले) हुनर का भेद जान लेता है। उसको अकाल-पुरख मिल जाता है। 3। अपहुँच। बेअंत और परम पुरख प्रभू के प्रकट होने का ठिकाना (मनुष्य के शरीर का दिमाग़-रूप) दसवाँ-द्वार है; शरीर के ऊपरी हिस्से में (सिर। मानो) एक हाट है। उस हाट में (दिमाग़। मानो) एक आला है। इस आले के द्वारा प्रभू का प्रकाश होता है। 4। (जिसके अंदर परमात्मा प्रकट हो गया) वह सदा जागता रहता है (सचेत रहता है)। (माया की नींद में) कभी सोता नहीं; वह एक ऐसी समाधि में टिका रहता है जहाँ से माया के तीनों गुण और तीनों लोकों की माया परे ही रहती है; वह मनुष्य प्रभू का नाम-मंत्र अपने हृदय में टिका के रखता है। (जिसकी बरकति से) उसका मन माया की ओर से पलट के (सचेत रहता है)। उस अवस्था में ठिकाना पकड़ता है जहाँ कोई फुरना नहीं उठता। 5। वह मनुष्य सदा जागता है। (सचेत रहता है)। कभी झूठ नहीं बोलता; पाँचों ही इन्द्रियों को अपने काबू में रखता है। सतिगुरू का उपदेश अपने मन में संभाल के रखता है। अपना मन। अपना शरीर प्रभू के प्यार से सदके करता है। 6। वह मनुष्य (जगत को) हाथ (की उंगलियाँ। वृक्ष की) टहनियाँ और पत्ते समझता है (इसलिए मूल प्रभू को छोड़ के इसके पसारे में फंस के) अपनी जिंदगी जूए के खेल में नहीं गवाता; विकारों की नींद का श्रोत ही बंद कर देता है। मन को अज्ञानता के अंधेरे से पलट के (इसमें ज्ञान का) सूरज चढ़ाता है; (मिलाप का उसके अंदर) एक चश्मा फूट पड़ता है। (वह एक ऐसी मौज) का आनंद लेता है। जिसको कभी बुढ़ापा नहीं (भाव। कभी खत्म नहीं होता)। (सदा के लिए) परमात्मा के साथ मेल कर लेता है। 7। प्रभू की ज्योति द्वारा उसके अंदर (मानो) चार मुँह वाला दीपक जग उठता है (जिसके कारण हर तरफ प्रकाश ही प्रकाश रहता है); (उसके अंदर। मानो। एक ऐसा फूल खिल उठता है। जिसके) बीच में प्रभू-रूप मकरंद होता है और उसकी बेअंत पक्तियाँ होती हैं (अनंत रचना वाला प्रभू उसके अंदर प्रकट हो जाता है) वह मनुष्य सारी ताकतों के मालिक प्रभू को अपने अंदर बसा लेता है। उसका मन मोती (बन के प्रभू के गुण रूप) रत्नों में जुड़ा रहता है। 8। उसके माथे पर (मानो) कमल फूल (खिल उठता है। और) उस फूल के चारों तरफ हीरे (परोए जाते हैं); उस बंदे के धुर अंदर त्रिलोकी का मालिक प्रभू आ टिकता है। (उसके अंदर मानो एक ऐसा सुंदर राग होता है कि) पाँचों ही किस्मों के सुंदर साज बज उठते हैं। बड़े शंख बजने लग जाते हैं। उसके ऊपर चवर झूलने लगता है (भाव। उसका मन शहनशाहों का शाह बन जाता है)। सतिगुरू से मिला हुआ प्रभू के नाम का ये प्रकाश कामादिक विकारों को मार खत्म कर देता है। हे प्रभू ! (आपका दास) बेणी (भी आपके दर से) (ये) नाम ही माँगता है। 9। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! (निताणे हो जाने के कारण जीवों के अंदर से) सहम की गाँठ नहीं खुलती।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।