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अंग 966

अंग
966
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धंनु सु तेरे भगत जिन॑ी सचु तूं डिठा ॥
जिस नो तेरी दइआ सलाहे सोइ तुधु ॥
जिसु गुर भेटे नानक निरमल सोई सुधु ॥20॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आपके वह भक्त भाग्यशाली हैं जिन्होंने आपका दीदार किया है। वही सख्श आपकी सिफत सालाह कर सकता है जिस पर आपकी मेहर होती है। हे नानक ! (प्रभू की मेहर से) जिसको गुरू मिल जाए। वह शुद्ध पवित्र (जीवन वाला) हो जाता है। 20।
सलोक मः 5 ॥
फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बागु ॥
जो नर पीरि निवाजिआ तिन॑ा अंच न लाग ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे फरीद ! (ये) धरती (तो) सुहावनी है (पर मनुष्य के मन के टोए-टिब्बों के कारण इस) में विषौला बाग़ (लगा हुआ) है (जिसमें दुखों की आग जल रही है)। जिस जिस मनुष्य को सतिगुरू ने महान बना दिया है (ऊँचा किया है)। उनको (दुख-अग्नि का) सेक नहीं लग सकता। 1।
मः 5 ॥
फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥
विरले केई पाईअनि॑ जिन॑ा पिआरे नेह ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे फरीद ! (उन लोगों की) जिंदगी आसान है और शरीर भी सुंदर रंग वाला (भाव। रोग-रहित) है जिनका प्यार प्यारे परमात्मा के साथ है (‘विसूला बाग’ और ‘दुख-अगनी’ उनको नहीं छूते। पर ऐसे लोग) कोई विरले ही मिलते हैं। 2।
पउड़ी ॥
जपु तपु संजमु दइआ धरमु जिसु देहि सु पाए ॥
जिसु बुझाइहि अगनि आपि सो नामु धिआए ॥
अंतरजामी अगम पुरखु इक द्रिसटि दिखाए ॥
साधसंगति कै आसरै प्रभ सिउ रंगु लाए ॥
अउगण कटि मुखु उजला हरि नामि तराए ॥
जनम मरण भउ कटिओनु फिरि जोनि न पाए ॥
अंध कूप ते काढिअनु लड़ु आपि फड़ाए ॥
नानक बखसि मिलाइअनु रखे गलि लाए ॥21॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी । हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आप (नाम की दाति) देता है वह (मानो) जप तप संजम दया और धर्म प्राप्त कर लेता है (पर) आपका नाम वही सिमरता है जिसकी तृष्णा की अग्नि को आप खुद बुझाता है। घट-घट की जानने वाला अपहुँच व्यापक प्रभू जिस मनुष्य की ओर मेहर की एक निगाह करता है। वह सत्संग के आसरे रह के परमात्मा के साथ प्यार डाल लेता है। परमात्मा उसके सारे अवगुण काट के उसको सुर्खरू करता है और अपने नाम के द्वारा (संसार-समुंद्र से) पार लंघा देता है। उस (परमात्मा) ने उस मनुष्य का जनम-मरण का डर दूर कर दिया है। और उसको फिर जनम-मरण के चक्कर में नहीं डालता। प्रभू ने जिनको अपना पल्ला पकड़ाया है। उनको (माया के मोह के) घोर अंधेरे भरे कूएँ से (बाहर) निकाल लिया है। हे नानक ! प्रभू ने उन पर मेहर करके अपने साथ मिला लिया है। अपने गले से लगा लिया है। 21।
सलोक मः 5 ॥
मुहबति जिसु खुदाइ दी रता रंगि चलूलि ॥
नानक विरले पाईअहि तिसु जन कीम न मूलि ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ जिस मनुष्य को रॅब का प्यार (प्राप्त हो जाता है)। और वह (उसके प्यार के) गाढ़े रंग में रंगा जाता है। उस मनुष्य की कीमत नहीं आँकी जा सकती। पर। हे नानक ! ऐसे व्यक्ति विरले ही मिलते हैं। 1।
मः 5 ॥
अंदरु विधा सचि नाइ बाहरि भी सचु डिठोमि ॥
नानक रविआ हभ थाइ वणि त्रिणि त्रिभवणि रोमि ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ जब मेरा अंदरला (भाव। मन) सच्चे नाम में भेदा गया। तब मैंने बाहर भी उस सदा स्थिर प्रभू को देख लिया। हे नानक ! (अब मुझे ऐसे दिखता है कि) परमात्मा हरेक जगह मौजूद है। हरेक वन में। हरेक तीले में। सारे ही त्रिभवन। संसार में। रोम-रोम में। 2।
पउड़ी ॥
आपे कीतो रचनु आपे ही रतिआ ॥
आपे होइओ इकु आपे बहु भतिआ ॥
आपे सभना मंझि आपे बाहरा ॥
आपे जाणहि दूरि आपे ही जाहरा ॥
आपे होवहि गुपतु आपे परगटीऐ ॥
कीमति किसै न पाइ तेरी थटीऐ ॥
गहिर गंभीरु अथाहु अपारु अगणतु तूं ॥
नानक वरतै इकु इको इकु तूं ॥22॥1॥2॥ सुधु ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। ये जगत-रचना प्रभू ने स्वयं ही रची है। और स्वयं ही इसमें मिला हुआ है। (कभी रचना को समेट के) एक स्वयं ही स्वयं हो जाता है। कभी अनेकों रंगों-रूपों वाला बन जाता है। प्रभू स्वयं ही सारे जीवों में मौजूद है। और निर्लिप भी स्वयं ही है। हे प्रभू ! आप खुद ही अपने आप को रचना से अलग जानता है। और खुद ही हर जगह हाजर-नाजर है। आप स्वयं ही छुपा हुआ है। और प्रकट भी स्वयं ही है। आपकी इस रचना का मूल्य किसी ने नहीं पाया। आप गंभीर है। आपकी थाह नहीं पड़ सकती। आप बेअंत है। आपके गुण गिने नहीं जा सकते। हे नानक ! हर जगह एक प्रभू ही मौजूद है। हे प्रभू ! एक आप ही आप है। 22। सुधु।
रामकली की वार राइ बलवंडि तथा सतै डूमि आखी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाउ करता कादरु करे किउ बोलु होवै जोखीवदै ॥
दे गुना सति भैण भराव है पारंगति दानु पड़ीवदै ॥
नानकि राजु चलाइआ सचु कोटु सताणी नीव दै ॥
लहणे धरिओनु छतु सिरि करि सिफती अंम्रितु पीवदै ॥
मति गुर आतम देव दी खड़गि जोरि पराकुइ जीअ दै ॥
गुरि चेले रहरासि कीई नानकि सलामति थीवदै ॥
सहि टिका दितोसु जीवदै ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रामकली की वार राइ बलवंडि तथा सतै डूमि आखी सतिगुर प्रसादि॥ (किसी पुरुख की) प्रसिद्धि जो कादर-कर्ता स्वयं (ऊँचा) करे। उसको तौलने के लिए (किसी तरफ) कोई बात नहीं हो सकती (भाव। मैं बलवंड बेचारा कौन हूँ जो गुरू के ऊँचे मरतबे को बयान कर सकूँ।) संसार-समुंद्र से पार लंघा सकने वाली आत्म-अवस्था की बख्शिश हासिल करने के लिए जो सत्य आदि ईश्वरीय गुण (लोग बड़े बड़े प्रयत्नों से अपने अंदर पैदा करते हैं। वह गुण सतिगुरू जी के तो) बहिन-भाई हैं (भाव।) उनके अंदर तो स्वभाविक (रूप से ही सतिवादी गुण) मौजूद हैं। (इस महान नामवर गुरू) नानक देव जी ने सॅच-रूप किला बना के और पक्की नींव रख के (धर्म का) राज चलाया है। गुरू अकाल-पुरख की (बख्शी हुई) मति-रूपी तलवार से। जोर से बल से (अंदर से पहले जीवन निकाल के) आत्मिक जिंदगी बख्श के। (बाबा) लहिणा जी के सिर पर। जो सिफत-सालाह करके आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी रहे थे। गुरू नानक देव जी ने (गुरुता का) छत्र धरा। (अब) अपनी सलामती में ही गुरू नानक देव जी ने अपने सिख (बाबा लहिणा जी के) आगे माथा टेका। और सतिगुरू जी ने जीवित रहते हुए ही (अपने जीते जी गुरू गद्दी का) तिलक (बाबा लहिणा जी को) दे दिया। 1।
लहणे दी फेराईऐ नानका दोही खटीऐ ॥
जोति ओहा जुगति साइ सहि काइआ फेरि पलटीऐ ॥
झुलै सु छतु निरंजनी मलि तखतु बैठा गुर हटीऐ ॥
करहि जि गुर फुरमाइआ सिल जोगु अलूणी चटीऐ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (जब गुरू नानक देव जी ने गुरूता का तिलक बाबा लहणा जी को दे दिया। तब) गुरू नानक साहिब की महिमा की धूम की बरकति से। बाबा लहिणा जी की महिमा की धूम पड़ गई; क्योंकि (बाबा लहिणा जी के अंदर) वही (गुरू नानक साहिब वाली) ज्योति थी। जीवन का ढंग भी वही (गुरू नानक साहिब वाला) था। गुरू (नानक देव जी) ने (केवल शरीर ही) दोबारा बदला था। (बाबा लहणा जी के सिर पर) सुंदर रॅबी छत्र झूल रहा है। गुरू नानक देव जी की दुकान में (बाबा लहणा) (गुरू नानक देव जी से ‘नाम’ पदार्थ ले के बाँटने के लिए) गद्दी संभाल के बैठा है। (बाबा लहिणा जी) गुरू नानक साहिब के फरमाए हुए हुकम को पाल रहे हैं- यह ‘हुकम पालण’-रूप जोग की कमाई अलूणी सिल चाटने (जैसा बड़ा ही करड़ा काम) है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आपके वह भक्त भाग्यशाली हैं जिन्होंने आपका दीदार किया है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।