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रामकली
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- धंनु सु तेरे भगत जिन॑ी सचु तूं डिठा ॥
- फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बागु ॥
- फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥
- जपु तपु संजमु दइआ धरमु जिसु देहि सु पाए ॥
- मुहबति जिसु खुदाइ दी रता रंगि चलूलि ॥
- अंदरु विधा सचि नाइ बाहरि भी सचु डिठोमि ॥
- आपे कीतो रचनु आपे ही रतिआ ॥
- रामकली की वार राइ बलवंडि तथा सतै डूमि आखी
- लहणे दी फेराईऐ नानका दोही खटीऐ ॥
धंनु सु तेरे भगत जिन॑ी सचु तूं डिठा ॥
धंनु सु तेरे भगत जिन॑ी सचु तूं डिठा ॥
जिस नो तेरी दइआ सलाहे सोइ तुधु ॥
जिसु गुर भेटे नानक निरमल सोई सुधु ॥20॥
जिस नो तेरी दइआ सलाहे सोइ तुधु ॥
जिसु गुर भेटे नानक निरमल सोई सुधु ॥20॥
हिन्दी अर्थ: आपके वह भक्त भाग्यशाली हैं जिन्होंने आपका दीदार किया है। वही सख्श आपकी सिफत सालाह कर सकता है जिस पर आपकी मेहर होती है। हे नानक ! (प्रभू की मेहर से) जिसको गुरू मिल जाए। वह शुद्ध पवित्र (जीवन वाला) हो जाता है। 20।
फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बागु ॥
सलोक मः 5 ॥
फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बागु ॥
जो नर पीरि निवाजिआ तिन॑ा अंच न लाग ॥1॥
फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बागु ॥
जो नर पीरि निवाजिआ तिन॑ा अंच न लाग ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे फरीद ! (ये) धरती (तो) सुहावनी है (पर मनुष्य के मन के टोए-टिब्बों के कारण इस) में विषौला बाग़ (लगा हुआ) है (जिसमें दुखों की आग जल रही है)। जिस जिस मनुष्य को सतिगुरू ने महान बना दिया है (ऊँचा किया है)। उनको (दुख-अग्नि का) सेक नहीं लग सकता। 1।
फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥
मः 5 ॥
फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥
विरले केई पाईअनि॑ जिन॑ा पिआरे नेह ॥2॥
फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥
विरले केई पाईअनि॑ जिन॑ा पिआरे नेह ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे फरीद ! (उन लोगों की) जिंदगी आसान है और शरीर भी सुंदर रंग वाला (भाव। रोग-रहित) है जिनका प्यार प्यारे परमात्मा के साथ है ('विसूला बाग' और 'दुख-अगनी' उनको नहीं छूते। पर ऐसे लोग) कोई विरले ही मिलते हैं। 2।
जपु तपु संजमु दइआ धरमु जिसु देहि सु पाए ॥
पउड़ी ॥
जपु तपु संजमु दइआ धरमु जिसु देहि सु पाए ॥
जिसु बुझाइहि अगनि आपि सो नामु धिआए ॥
अंतरजामी अगम पुरखु इक द्रिसटि दिखाए ॥
साधसंगति कै आसरै प्रभ सिउ रंगु लाए ॥
अउगण कटि मुखु उजला हरि नामि तराए ॥
जनम मरण भउ कटिओनु फिरि जोनि न पाए ॥
अंध कूप ते काढिअनु लड़ु आपि फड़ाए ॥
नानक बखसि मिलाइअनु रखे गलि लाए ॥21॥
जपु तपु संजमु दइआ धरमु जिसु देहि सु पाए ॥
जिसु बुझाइहि अगनि आपि सो नामु धिआए ॥
अंतरजामी अगम पुरखु इक द्रिसटि दिखाए ॥
साधसंगति कै आसरै प्रभ सिउ रंगु लाए ॥
अउगण कटि मुखु उजला हरि नामि तराए ॥
जनम मरण भउ कटिओनु फिरि जोनि न पाए ॥
अंध कूप ते काढिअनु लड़ु आपि फड़ाए ॥
नानक बखसि मिलाइअनु रखे गलि लाए ॥21॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी । हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आप (नाम की दाति) देते हैं वह (मानो) जप तप संजम दया और धर्म प्राप्त कर लेता है (पर) आपका नाम वही सिमरता है जिसकी तृष्णा की अग्नि को आप खुद बुझाते हैं। घट-घट की जानने वाला अपहुँच व्यापक प्रभू जिस मनुष्य की ओर मेहर की एक निगाह करता है। वह सत्संग के आसरे रह के परमात्मा के साथ प्यार डाल लेता है। परमात्मा उसके सारे अवगुण काट के उसको सुर्खरू करता है और अपने नाम के द्वारा (संसार-समुंद्र से) पार लंघा देता है। उस (परमात्मा) ने उस मनुष्य का जनम-मरण का डर दूर कर दिया है। और उसको फिर जनम-मरण के चक्कर में नहीं डालता। प्रभू ने जिनको अपना पल्ला पकड़ाया है। उनको (माया के मोह के) घोर अंधेरे भरे कूएँ से (बाहर) निकाल लिया है। हे नानक ! प्रभू ने उन पर मेहर करके अपने साथ मिला लिया है। अपने गले से लगा लिया है। 21।
मुहबति जिसु खुदाइ दी रता रंगि चलूलि ॥
सलोक मः 5 ॥
मुहबति जिसु खुदाइ दी रता रंगि चलूलि ॥
नानक विरले पाईअहि तिसु जन कीम न मूलि ॥1॥
मुहबति जिसु खुदाइ दी रता रंगि चलूलि ॥
नानक विरले पाईअहि तिसु जन कीम न मूलि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ जिस मनुष्य को रॅब का प्यार (प्राप्त हो जाता है)। और वह (उसके प्यार के) गाढ़े रंग में रंगा जाता है। उस मनुष्य की कीमत नहीं आँकी जा सकती। पर। हे नानक ! ऐसे व्यक्ति विरले ही मिलते हैं। 1।
अंदरु विधा सचि नाइ बाहरि भी सचु डिठोमि ॥
मः 5 ॥
अंदरु विधा सचि नाइ बाहरि भी सचु डिठोमि ॥
नानक रविआ हभ थाइ वणि त्रिणि त्रिभवणि रोमि ॥2॥
अंदरु विधा सचि नाइ बाहरि भी सचु डिठोमि ॥
नानक रविआ हभ थाइ वणि त्रिणि त्रिभवणि रोमि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ जब मेरा अंदरला (भाव। मन) सच्चे नाम में भेदा गया। तब मैंने बाहर भी उस सदा स्थिर प्रभू को देख लिया। हे नानक ! (अब मुझे ऐसे दिखता है कि) परमात्मा हरेक जगह मौजूद है। हरेक वन में। हरेक तीले में। सारे ही त्रिभवन। संसार में। रोम-रोम में। 2।
आपे कीतो रचनु आपे ही रतिआ ॥
पउड़ी ॥
आपे कीतो रचनु आपे ही रतिआ ॥
आपे होइओ इकु आपे बहु भतिआ ॥
आपे सभना मंझि आपे बाहरा ॥
आपे जाणहि दूरि आपे ही जाहरा ॥
आपे होवहि गुपतु आपे परगटीऐ ॥
कीमति किसै न पाइ तेरी थटीऐ ॥
गहिर गंभीरु अथाहु अपारु अगणतु तूं ॥
नानक वरतै इकु इको इकु तूं ॥22॥1॥2॥ सुधु ॥
आपे कीतो रचनु आपे ही रतिआ ॥
आपे होइओ इकु आपे बहु भतिआ ॥
आपे सभना मंझि आपे बाहरा ॥
आपे जाणहि दूरि आपे ही जाहरा ॥
आपे होवहि गुपतु आपे परगटीऐ ॥
कीमति किसै न पाइ तेरी थटीऐ ॥
गहिर गंभीरु अथाहु अपारु अगणतु तूं ॥
नानक वरतै इकु इको इकु तूं ॥22॥1॥2॥ सुधु ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। ये जगत-रचना प्रभू ने स्वयं ही रची है। और स्वयं ही इसमें मिला हुआ है। (कभी रचना को समेट के) एक स्वयं ही स्वयं हो जाता है। कभी अनेकों रंगों-रूपों वाला बन जाता है। प्रभू स्वयं ही सारे जीवों में मौजूद है। और निर्लिप भी स्वयं ही है। हे प्रभू ! आप खुद ही अपने आप को रचना से अलग जानते हैं। और खुद ही हर जगह हाजिर-नाजिर हैं। आप स्वयं ही छुपे हुए हैं। और प्रकट भी स्वयं ही हैं। आपकी इस रचना का मूल्य किसी ने नहीं पाया। आप गंभीर हैं। आपकी थाह नहीं पड़ सकती। आप बेअंत हैं। आपके गुण गिने नहीं जा सकते। हे नानक ! हर जगह एक प्रभू ही मौजूद है। हे प्रभू ! एक आप ही आप हैं। 22। सुधु।
रामकली की वार राइ बलवंडि तथा सतै डूमि आखी
रामकली की वार राइ बलवंडि तथा सतै डूमि आखी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाउ करता कादरु करे किउ बोलु होवै जोखीवदै ॥
दे गुना सति भैण भराव है पारंगति दानु पड़ीवदै ॥
नानकि राजु चलाइआ सचु कोटु सताणी नीव दै ॥
लहणे धरिओनु छतु सिरि करि सिफती अंम्रितु पीवदै ॥
मति गुर आतम देव दी खड़गि जोरि पराकुइ जीअ दै ॥
गुरि चेले रहरासि कीई नानकि सलामति थीवदै ॥
सहि टिका दितोसु जीवदै ॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाउ करता कादरु करे किउ बोलु होवै जोखीवदै ॥
दे गुना सति भैण भराव है पारंगति दानु पड़ीवदै ॥
नानकि राजु चलाइआ सचु कोटु सताणी नीव दै ॥
लहणे धरिओनु छतु सिरि करि सिफती अंम्रितु पीवदै ॥
मति गुर आतम देव दी खड़गि जोरि पराकुइ जीअ दै ॥
गुरि चेले रहरासि कीई नानकि सलामति थीवदै ॥
सहि टिका दितोसु जीवदै ॥1॥
हिन्दी अर्थ: रामकली की वार राइ बलवंडि तथा सतै डूमि आखी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (किसी पुरुख की) प्रसिद्धि जो कादर-कर्ता स्वयं (ऊँचा) करे। उसको तौलने के लिए (किसी तरफ) कोई बात नहीं हो सकती (भाव। मैं बलवंड बेचारा कौन हूँ जो गुरू के ऊँचे मरतबे को बयान कर सकूँ।) संसार-समुंद्र से पार लंघा सकने वाली आत्म-अवस्था की बख्शिश हासिल करने के लिए जो सत्य आदि ईश्वरीय गुण (लोग बड़े बड़े प्रयत्नों से अपने अंदर पैदा करते हैं। वह गुण सतिगुरू जी के तो) बहिन-भाई हैं (भाव।) उनके अंदर तो स्वभाविक (रूप से ही सतिवादी गुण) मौजूद हैं। (इस महान नामवर गुरू) नानक देव जी ने सॅच-रूप किला बना के और पक्की नींव रख के (धर्म का) राज चलाया है। गुरू अकाल-पुरख की (बख्शी हुई) मति-रूपी तलवार से। जोर से बल से (अंदर से पहले जीवन निकाल के) आत्मिक जिंदगी बख्श के। (बाबा) लहिणा जी के सिर पर। जो सिफत-सालाह करके आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी रहे थे। गुरू नानक देव जी ने (गुरुता का) छत्र धरा। (अब) अपनी सलामती में ही गुरू नानक देव जी ने अपने सिख (बाबा लहिणा जी के) आगे माथा टेका। और सतिगुरू जी ने जीवित रहते हुए ही (अपने जीते जी गुरू गद्दी का) तिलक (बाबा लहिणा जी को) दे दिया। 1।
लहणे दी फेराईऐ नानका दोही खटीऐ ॥
लहणे दी फेराईऐ नानका दोही खटीऐ ॥
जोति ओहा जुगति साइ सहि काइआ फेरि पलटीऐ ॥
झुलै सु छतु निरंजनी मलि तखतु बैठा गुर हटीऐ ॥
करहि जि गुर फुरमाइआ सिल जोगु अलूणी चटीऐ ॥
जोति ओहा जुगति साइ सहि काइआ फेरि पलटीऐ ॥
झुलै सु छतु निरंजनी मलि तखतु बैठा गुर हटीऐ ॥
करहि जि गुर फुरमाइआ सिल जोगु अलूणी चटीऐ ॥
हिन्दी अर्थ: (जब गुरू नानक देव जी ने गुरूता का तिलक बाबा लहणा जी को दे दिया। तब) गुरू नानक साहिब की महिमा की धूम की बरकति से। बाबा लहिणा जी की महिमा की धूम पड़ गई; क्योंकि (बाबा लहिणा जी के अंदर) वही (गुरू नानक साहिब वाली) ज्योति थी। जीवन का ढंग भी वही (गुरू नानक साहिब वाला) था। गुरू (नानक देव जी) ने (केवल शरीर ही) दोबारा बदला था। (बाबा लहणा जी के सिर पर) सुंदर रॅबी छत्र झूल रहा है। गुरू नानक देव जी की दुकान में (बाबा लहणा) (गुरू नानक देव जी से 'नाम' पदार्थ ले के बाँटने के लिए) गद्दी संभाल के बैठा है। (बाबा लहिणा जी) गुरू नानक साहिब के फरमाए हुए हुकम को पाल रहे हैं- यह 'हुकम पालण'-रूप जोग की कमाई अलूणी सिल चाटने (जैसा बड़ा ही करड़ा काम) है।
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 966 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; सत्ता और बलवंड।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 966 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।