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अंग 965

अंग
965
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आतमु जिता गुरमती आगंजत पागा ॥
जिसहि धिआइआ पारब्रहमु सो कलि महि तागा ॥
साधू संगति निरमला अठसठि मजनागा ॥
जिसु प्रभु मिलिआ आपणा सो पुरखु सभागा ॥
नानक तिसु बलिहारणै जिसु एवड भागा ॥17॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: क्योंकि गुरू की मति ले के वह अपने मन को जीत लेता है। और उसको अविनाशी प्रभू मिल जाता है। जिस ही मनुष्य ने परमात्मा प्रभू को सिमरा है वह संसार में (विकारों का) मुकाबला करने के योग्य हो जाता है। गुरमुखों की संगति में उसका मन पवित्र हो जाता है। मानो। उसने अढ़सठ तीर्थों का स्नान करि लिया है। भाग्यशाली है वह मनुष्य जिसको प्यारा प्रभू मिल गया। हे नानक ! (कह-) मैं सदके हूँ उस पर से जिसके इतने बड़े भाग्य हैं। 17।
सलोक मः 5 ॥
जां पिरु अंदरि तां धन बाहरि ॥
जां पिरु बाहरि तां धन माहरि ॥
बिनु नावै बहु फेरु फिराहरि ॥
सतिगुरि संगि दिखाइआ जाहरि ॥
जन नानक सचे सचि समाहरि ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ जब पति-प्रभू जीव-स्त्री के हृदय में प्रत्यक्ष मौजूद हो। तो जीव-स्त्री मायावी धंधों झमेलों से निर्लिप रहती है। जब पति-प्रभू याद से दूर हो जाए। तो जीव-स्त्री मायावी-धंधों में खचित होने लग जाती है। प्रभू की याद के बिना जीव अनेकों भटकनों में भटकता है। हे दास नानक ! जिस मनुष्य को गुरू ने हृदय में प्रत्यक्ष प्रभू दिखा दिया। वह सदा स्थिर प्रभू में ही टिका रहता है। 1।
मः 5 ॥
आहर सभि करदा फिरै आहरु इकु न होइ ॥
नानक जितु आहरि जगु उधरै विरला बूझै कोइ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! मनुष्य अन्य सारे उद्यम करता फिरता है। पर एक प्रभू के सिमरन का प्रयास नहीं करता। जिस उद्यम से जगत विकारों से बच सकता है (उस उद्यम को) कोई विरला मनुष्य ही समझता है।
पउड़ी ॥
वडी हू वडा अपारु तेरा मरतबा ॥
रंग परंग अनेक न जापनि॑ करतबा ॥
जीआ अंदरि जीउ सभु किछु जाणला ॥
सभु किछु तेरै वसि तेरा घरु भला ॥
तेरै घरि आनंदु वधाई तुधु घरि ॥
माणु महता तेजु आपणा आपि जरि ॥
सरब कला भरपूरु दिसै जत कता ॥
नानक दासनि दासु तुधु आगै बिनवता ॥18॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! आपका बेअंत ही बड़ा रुतबा है। (संसार में) आपके अनेकों ही किस्मों के करिश्मे हैं रहे हैं जो समझे नहीं जा सकते। सब जीवों के अंदर आप ही जिंद-रूप है। आप (जीवों की) हरेक बात जानता है। सुंदर है आपका ठिकाना। सारी सृष्टि आपके ही वश में है। (इतनी सृष्टि का मालिक होते हुए भी) आपके हृदय में सदा आनंद और खुशियाँ हैं। आप अपने इतने बड़े मान-सम्मान के प्रताप को खुद ही जरता है (सहता है)। (हे भाई !) सारी ताकतों का मालिक प्रभू हर जगह दिख रहा है। हे प्रभू ! नानक आपके दासों का दास आपके आगे (ही) अरदास विनती करता है। 18।
सलोक मः 5 ॥
छतड़े बाजार सोहनि विचि वपारीए ॥
वखरु हिकु अपारु नानक खटे सो धणी ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (इसके ऊपर दिखते आकाश छत के नीचे) छता हुआ (बेअंत जगत-मण्डल। जैसे) बाजार हैं। इनमें (प्रभू के नाम का व्यापार करने वाले जीव-) व्यापारी ही खूबसूरत लगते हैं। हे नानक ! (इस जगत-मण्डल में) वह मनुष्य धनवान हैं जो एक अखुट हरी-नाम का सौदा ही कमाता है। 1।
महला 5 ॥
कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥
जिनि इहु रचनु रचाइआ तिस ही माहि समाहि ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे कबीर ! ना कोई हमारा ही सदा का साथी है। और ना ही हम ही सदा के लिए साथी बन सकते हैं (बेड़ी की यात्रा का मेला है)। जिस परमात्मा ने ये रचना रची है। हम तो उसी की याद में टिके रहते हैं। 2।
पउड़ी ॥
सफलिउ बिरखु सुहावड़ा हरि सफल अंम्रिता ॥
मनु लोचै उन॑ मिलण कउ किउ वंञै घिता ॥
वरना चिहना बाहरा ओहु अगमु अजिता ॥
ओहु पिआरा जीअ का जो खोल॑ै भिता ॥
सेवा करी तुसाड़ीआ मै दसिहु मिता ॥
कुरबाणी वंञा वारणै बले बलि किता ॥
दसनि संत पिआरिआ सुणहु लाइ चिता ॥
जिसु लिखिआ नानक दास तिसु नाउ अंम्रितु सतिगुरि दिता ॥19॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ परमात्मा (जैसे) एक खूबसूरत फलदार वृक्ष है जिस पर आत्मिक जीवन देने वाले फल लगे हुए हैं। मेरा मन उस प्रभू को मिलने के लिए तड़पता है (पर पता नहीं लगता कि) कैसे मिला जाए क्योंकि ना उसका कोई रंग है ना निशान। उस तक पहॅु। चा नहीं जा सकता। उसको जीता नहीं जा सकता। जो सज्जन। (मुझे) ये भेद समझा दे। वह मेरी जिंद-जान को प्यारा लगेगा। हे मित्र ! मुझे (यह भेद) बताओ। मैं आपकी सेवा करूँगा। मैं आपसे सदके कुर्बान वारने जाऊँगा। प्यारे संत (गुरसिख वह भेद) बताते हैं (और कहते हैं कि) ध्यान से सुन- हे दास नानक ! जिसके माथे पर लेख लिखा (उघड़ता) है उसको सतिगुरू ने प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम बख्शा है। 19।
सलोक महला 5 ॥
कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥
धरती भारि न बिआपई उन कउ लाहू लाहि ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे कबीर ! अगर विकारी मनुष्य (सौभाग्यवश) और ताक छोड़ के सतिगुरू की संगति में आ के बैठें। तो विकारियों का असर उस संगत पर नहीं पड़ता। हाँ। विकारी लोगों को अवश्य लाभ पहुँचता है। वे विकारी व्यक्ति जरूर लाभ उठाते हैं। 1।
महला 5 ॥
कबीर चावल कारणे तुख कउ मुहली लाइ ॥
संगि कुसंगी बैसते तब पूछे धरम राइ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे कबीर ! (तोख से) चावल (अलग करने) के लिए (छाँटने वक्त) तोखों को मोहली (की चोट) बजती है। इसी तरह जो मनुष्य विकारियों की सोहबत में बैठता है (वह भी विकारों की मार खाता है। विकार करने लग जाता है) उससे धर्मराज लेखा माँगता है। 2।
पउड़ी ॥
आपे ही वड परवारु आपि इकातीआ ॥
आपणी कीमति आपि आपे ही जातीआ ॥
सभु किछु आपे आपि आपि उपंनिआ ॥
आपणा कीता आपि आपि वरंनिआ ॥
धंनु सु तेरा थानु जिथै तू वुठा ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! आप खुद ही (जगत रूप) बड़े परिवार वाला है। और (इससे निर्लिप) अकेला रहने वाला भी है। अपनी बुजुर्गी की कद्र बनाने वाला भी आप स्वयं ही है। और कद्र जानने वाला भी आप खुद ही है। ये सारा जगत आपका अपना ही (सरगुण) रूप है। और ये आपसे ही इस दिखाई देते रूप में आया है। इस सारे पैदा किए हुए जगत को रंग-रूप देने वाला भी आप खुद ही है। वह स्थान भाग्यशाली है जहाँ। हे प्रभू ! आप बसता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “क्योंकि गुरू की मति ले के वह अपने मन को जीत लेता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।