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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 965 · रामकली

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अंग
965
रामकली
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  1. आतमु जिता गुरमती आगंजत पागा ॥
  2. जां पिरु अंदरि तां धन बाहरि ॥
  3. आहर सभि करदा फिरै आहरु इकु न होइ ॥
  4. वडी हू वडा अपारु तेरा मरतबा ॥
  5. छतड़े बाजार सोहनि विचि वपारीए ॥
  6. कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥
  7. सफलिउ बिरखु सुहावड़ा हरि सफल अंम्रिता ॥
  8. कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥
  9. कबीर चावल कारणे तुख कउ मुहली लाइ ॥
  10. आपे ही वड परवारु आपि इकातीआ ॥

आतमु जिता गुरमती आगंजत पागा ॥

अंग 964 से चला आ रहा अंश

आतमु जिता गुरमती आगंजत पागा ॥
जिसहि धिआइआ पारब्रहमु सो कलि महि तागा ॥
साधू संगति निरमला अठसठि मजनागा ॥
जिसु प्रभु मिलिआ आपणा सो पुरखु सभागा ॥
नानक तिसु बलिहारणै जिसु एवड भागा ॥17॥

हिन्दी अर्थ: क्योंकि गुरू की मति ले के वह अपने मन को जीत लेता है। और उसको अविनाशी प्रभू मिल जाता है। जिस ही मनुष्य ने परमात्मा प्रभू को सिमरा है वह संसार में (विकारों का) मुकाबला करने के योग्य हो जाता है। गुरमुखों की संगति में उसका मन पवित्र हो जाता है। मानो। उसने अढ़सठ तीर्थों का स्नान करि लिया है। भाग्यशाली है वह मनुष्य जिसको प्यारा प्रभू मिल गया। हे नानक ! (कह-) मैं सदके हूँ उस पर से जिसके इतने बड़े भाग्य हैं। 17।

जां पिरु अंदरि तां धन बाहरि ॥

सलोक मः 5 ॥
जां पिरु अंदरि तां धन बाहरि ॥
जां पिरु बाहरि तां धन माहरि ॥
बिनु नावै बहु फेरु फिराहरि ॥
सतिगुरि संगि दिखाइआ जाहरि ॥
जन नानक सचे सचि समाहरि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ जब पति-प्रभू जीव-स्त्री के हृदय में प्रत्यक्ष मौजूद हो। तो जीव-स्त्री मायावी धंधों झमेलों से निर्लिप रहती है। जब पति-प्रभू याद से दूर हो जाए। तो जीव-स्त्री मायावी-धंधों में खचित होने लग जाती है। प्रभू की याद के बिना जीव अनेकों भटकनों में भटकता है। हे दास नानक ! जिस मनुष्य को गुरू ने हृदय में प्रत्यक्ष प्रभू दिखा दिया। वह सदा स्थिर प्रभू में ही टिका रहता है। 1।

आहर सभि करदा फिरै आहरु इकु न होइ ॥

मः 5 ॥
आहर सभि करदा फिरै आहरु इकु न होइ ॥
नानक जितु आहरि जगु उधरै विरला बूझै कोइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! मनुष्य अन्य सारे उद्यम करता फिरता है। पर एक प्रभू के सिमरन का प्रयास नहीं करता। जिस उद्यम से जगत विकारों से बच सकता है (उस उद्यम को) कोई विरला मनुष्य ही समझता है।

वडी हू वडा अपारु तेरा मरतबा ॥

पउड़ी ॥
वडी हू वडा अपारु तेरा मरतबा ॥
रंग परंग अनेक न जापनि॑ करतबा ॥
जीआ अंदरि जीउ सभु किछु जाणला ॥
सभु किछु तेरै वसि तेरा घरु भला ॥
तेरै घरि आनंदु वधाई तुधु घरि ॥
माणु महता तेजु आपणा आपि जरि ॥
सरब कला भरपूरु दिसै जत कता ॥
नानक दासनि दासु तुधु आगै बिनवता ॥18॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! आपका बेअंत ही बड़ा रुतबा है। (संसार में) आपके अनेकों ही किस्मों के करिश्मे हो रहे हैं जो समझे नहीं जा सकते। सब जीवों के अंदर आप ही जिंद-रूप हैं। आप (जीवों की) हरेक बात जानते हैं। सुंदर है आपका ठिकाना। सारी सृष्टि आपके ही वश में है। (इतनी सृष्टि का मालिक होते हुए भी) आपके हृदय में सदा आनंद और खुशियाँ हैं। आप अपने इतने बड़े मान-सम्मान के प्रताप को खुद ही जरते हैं (सहते हैं)। (हे भाई !) सारी ताकतों का मालिक प्रभू हर जगह दिख रहा है। हे प्रभू ! नानक आपके दासों का दास आपके आगे (ही) अरदास विनती करता है। 18।

छतड़े बाजार सोहनि विचि वपारीए ॥

सलोक मः 5 ॥
छतड़े बाजार सोहनि विचि वपारीए ॥
वखरु हिकु अपारु नानक खटे सो धणी ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (इसके ऊपर दिखते आकाश छत के नीचे) छता हुआ (बेअंत जगत-मण्डल। जैसे) बाजार हैं। इनमें (प्रभू के नाम का व्यापार करने वाले जीव-) व्यापारी ही खूबसूरत लगते हैं। हे नानक ! (इस जगत-मण्डल में) वह मनुष्य धनवान हैं जो एक अखुट हरी-नाम का सौदा ही कमाता है। 1।

कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥

महला 5 ॥
कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥
जिनि इहु रचनु रचाइआ तिस ही माहि समाहि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे कबीर ! ना कोई हमारा ही सदा का साथी है। और ना ही हम ही सदा के लिए साथी बन सकते हैं (बेड़ी की यात्रा का मेला है)। जिस परमात्मा ने ये रचना रची है। हम तो उसी की याद में टिके रहते हैं। 2।

सफलिउ बिरखु सुहावड़ा हरि सफल अंम्रिता ॥

पउड़ी ॥
सफलिउ बिरखु सुहावड़ा हरि सफल अंम्रिता ॥
मनु लोचै उन॑ मिलण कउ किउ वंञै घिता ॥
वरना चिहना बाहरा ओहु अगमु अजिता ॥
ओहु पिआरा जीअ का जो खोल॑ै भिता ॥
सेवा करी तुसाड़ीआ मै दसिहु मिता ॥
कुरबाणी वंञा वारणै बले बलि किता ॥
दसनि संत पिआरिआ सुणहु लाइ चिता ॥
जिसु लिखिआ नानक दास तिसु नाउ अंम्रितु सतिगुरि दिता ॥19॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ परमात्मा (जैसे) एक खूबसूरत फलदार वृक्ष है जिस पर आत्मिक जीवन देने वाले फल लगे हुए हैं। मेरा मन उस प्रभू को मिलने के लिए तड़पता है (पर पता नहीं लगता कि) कैसे मिला जाए क्योंकि ना उसका कोई रंग है ना निशान। उस तक पहॅु। चा नहीं जा सकता। उसको जीता नहीं जा सकता। जो सज्जन। (मुझे) ये भेद समझा दे। वह मेरी जिंद-जान को प्यारा लगेगा। हे मित्र ! मुझे (यह भेद) बताओ। मैं आपकी सेवा करूँगा। मैं आपसे सदके कुर्बान वारने जाऊँगा। प्यारे संत (गुरसिख वह भेद) बताते हैं (और कहते हैं कि) ध्यान से सुन- हे दास नानक ! जिसके माथे पर लेख लिखा (उघड़ता) है उसको सतिगुरू ने प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम बख्शा है। 19।

कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥

सलोक महला 5 ॥
कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥
धरती भारि न बिआपई उन कउ लाहू लाहि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे कबीर ! अगर विकारी मनुष्य (सौभाग्यवश) और ताक छोड़ के सतिगुरू की संगति में आ के बैठें। तो विकारियों का असर उस संगत पर नहीं पड़ता। हाँ। विकारी लोगों को अवश्य लाभ पहुँचता है। वे विकारी व्यक्ति जरूर लाभ उठाते हैं। 1।

कबीर चावल कारणे तुख कउ मुहली लाइ ॥

महला 5 ॥
कबीर चावल कारणे तुख कउ मुहली लाइ ॥
संगि कुसंगी बैसते तब पूछे धरम राइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे कबीर ! (तोख से) चावल (अलग करने) के लिए (छाँटने वक्त) तोखों को मोहली (की चोट) बजती है। इसी तरह जो मनुष्य विकारियों की सोहबत में बैठता है (वह भी विकारों की मार खाता है। विकार करने लग जाता है) उससे धर्मराज लेखा माँगता है। 2।

आपे ही वड परवारु आपि इकातीआ ॥

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पउड़ी ॥
आपे ही वड परवारु आपि इकातीआ ॥
आपणी कीमति आपि आपे ही जातीआ ॥
सभु किछु आपे आपि आपि उपंनिआ ॥
आपणा कीता आपि आपि वरंनिआ ॥
धंनु सु तेरा थानु जिथै तू वुठा ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! आप खुद ही (जगत रूप) बड़े परिवार वाले हैं। और (इससे निर्लिप) अकेले रहने वाले भी हैं। अपनी बुजुर्गी की कद्र बनाने वाले भी आप स्वयं ही हैं। और कद्र जानने वाले भी आप खुद ही हैं। ये सारा जगत आपका अपना ही (सरगुण) रूप है। और ये आपसे ही इस दिखाई देते रूप में आया है। इस सारे पैदा किए हुए जगत को रंग-रूप देने वाले भी आप खुद ही हैं। वह स्थान भाग्यशाली है जहाँ। हे प्रभू ! आप बसते हैं।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 965 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 965 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।