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अंग 964

अंग
964
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पउड़ी ॥
सभे दुख संताप जां तुधहु भुलीऐ ॥
जे कीचनि लख उपाव तां कही न घुलीऐ ॥
जिस नो विसरै नाउ सु निरधनु कांढीऐ ॥
जिस नो विसरै नाउ सो जोनी हांढीऐ ॥
जिसु खसमु न आवै चिति तिसु जमु डंडु दे ॥
जिसु खसमु न आवी चिति रोगी से गणे ॥
जिसु खसमु न आवी चिति सु खरो अहंकारीआ ॥
सोई दुहेला जगि जिनि नाउ विसारीआ ॥14॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ीं । जब हे प्रभू ! आपकी याद से टूट जाएं तो (मन को) सारे दुख-कलेश (आ व्यापते हैं)। (आपकी याद के बिना और) अगर लाखों यतन भी किए जायं। किसी भी उपाय से (उन दुखों-कलेशों से) खलासी नहीं होती। (हे भाई !) जिस मनुष्य को प्रभू का नाम (सिमरना) भूल जाए वह कंगाल कहा जाता है जिस मनुष्य को प्रभू का नाम (सिमरना) भूल जाए (जैसे कोई कंगाल मंगता दर-दर पर भटकता है। वैसे ही) वह जूनियों में भटकता फिरता है। जिस मनुष्य के चित्त में पति-प्रभू नहीं आता उसको जमराज सजा देता है जिस मनुष्य के चित्त में पति-प्रभू नहीं आता ऐसे लोग रोगी गिने जाते हैं। ऐसा सख्श बहुत अहंकारी होता है (हर वक्त ‘मैं मैं’ ही करता है)। जिस मनुष्य ने प्रभू का नाम भुला दिया है वही जगत में दुखी है। 14।
सलोक मः 5 ॥
तैडी बंदसि मै कोइ न डिठा तू नानक मनि भाणा ॥
घोलि घुमाई तिसु मित्र विचोले जै मिलि कंतु पछाणा ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे (गुरू) नानक (जी) ! आपकी कोई बात मुझे बंदिश नहीं लगती। मैं तो आपको (बल्कि) मन में प्यारा लगने वाला देखा है। मैं उस प्यारे बिचोलिए (गुरू) से सदके हूँ जिसको मिल के मैंने अपने पति-प्रभू को पहचाना है (पति-प्रभू के साथ सांझ डाल ली है)। 1।
मः 5 ॥
पाव सुहावे जां तउ धिरि जुलदे सीसु सुहावा चरणी ॥
मुखु सुहावा जां तउ जसु गावै जीउ पइआ तउ सरणी ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5। वह पैर सुंदर हैं जो आपकी ओर चलते हैं। वह सिर भाग्यशाली है जो आपके कदमों पर गिरता है; मुँह मन-मोहक लगता है जो आपका यश गाता है। जीवात्मा खूबसूरत लगने लगती है जब आपकी शरण पड़ती है। 2।
पउड़ी ॥
मिलि नारी सतसंगि मंगलु गावीआ ॥
घर का होआ बंधानु बहुड़ि न धावीआ ॥
बिनठी दुरमति दुरतु सोइ कूड़ावीआ ॥
सीलवंति परधानि रिदै सचावीआ ॥
अंतरि बाहरि इकु इक रीतावीआ ॥
मनि दरसन की पिआस चरण दासावीआ ॥
सोभा बणी सीगारु खसमि जां रावीआ ॥
मिलीआ आइ संजोगि जां तिसु भावीआ ॥15॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिस जीव-स्त्री ने सत्संग में मिल के प्रभू की सिफत-सालाह के गीत गाए। उसके शरीर घर का ठुक बन गया (उसकी सारी ज्ञान-इन्द्रियाँ उसके वश में आ गई)। वह फिर (माया के पीछे) भटकती नहीं। (उसके अंदर से) बुरी मति पाप व नाशवंत पदार्थों की झाक खत्म हो जाती है। ऐसी जीव-स्त्री अच्छे स्वभाव वाली हो जाती है। (सहेलियों में) आदर-मान पाती है। उसके हृदय में प्रभू के प्रति लगन टिकी रहती है। उसको अपने अंदर व सारी सृष्टि में एक प्रभू ही दिखता है। बस ! यही उसकी जीवन-जुगति बन जाती है। उस जीव-स्त्री के मन में प्रभू के दीदार की तमन्ना बनी रहती है। वह प्रभू के चरणों की ही दासी बनी रहती है। जब उस जीव-स्त्री को पति-प्रभू ने अपने साथ मिला लिया। तो ये मिलाप ही उसके लिए शोभा और श्रृंगार होता है ! जब उस प्रभू को वह जिंद-वधू प्यारी लग जाती है। तो प्रभू की संयोग-सक्ता की बरकति से वह प्रभू की ज्योति में मिल जाती है। 15।
सलोक मः 5 ॥
हभि गुण तैडे नानक जीउ मै कू थीए मै निरगुण ते किआ होवै ॥
तउ जेवडु दातारु न कोई जाचकु सदा जाचोवै ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! (कह- हे प्रभू) जी ! सारे गुण आपके ही हैं। आपसे ही मुझे मिले हैं। मुझ गुण-हीन से कुछ नहीं हैं सकता। आपके जितना बड़ा कोई दातार नहीं। मैं मँगते ने सदा आपसे ही माँगना है। 1।
मः 5 ॥
देह छिजंदड़ी ऊण मझूणा गुरि सजणि जीउ धराइआ ॥
हभे सुख सुहेलड़ा सुता जिता जगु सबाइआ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ मेरा शरीर जर्जर होता जा रहा था। चित्त में खिचाव सा हो रहा था और चिंतातुर हो रहा था; पर जब प्यारे सतिगुरू ने जीवात्मा को धरवास दिया तो (अब) सारे ही सुख मिल गए है। मैं सकून में टिका हुआ हूँ। (ऐसा प्रतीत होता है जैसे मैंने) सारा जहान जीत लिया है। 2।
पउड़ी ॥
वडा तेरा दरबारु सचा तुधु तखतु ॥
सिरि साहा पातिसाहु निहचलु चउरु छतु ॥
जो भावै पारब्रहम सोई सचु निआउ ॥
जे भावै पारब्रहम निथावे मिलै थाउ ॥
जो कीन॑ी करतारि साई भली गल ॥
जिन॑ी पछाता खसमु से दरगाह मल ॥
सही तेरा फुरमानु किनै न फेरीऐ ॥
कारण करण करीम कुदरति तेरीऐ ॥16॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे प्रभू ! आपका दरबार बड़ा है। आपका तख्त सदा स्थिर रहने वाला है। आपका चवर और छत्र अटल है। आप (दुनिया के सारे) शाहों के सिर पर पातशाह है। (हे भाई !) वह न्याय अटल है जो परमात्मा को अच्छा लगता है। अगर उसे ठीक लगे तो निआसरों को आसरा मिल जाता है। (जीवों के लिए) वही बात ठीक है जो करतार ने (खुद उनके लिए) की है। जिन लोगों ने पति-प्रभू के साथ सांझ डाल ली। वह हजूरी पहलवान बन जाते हैं (कोई विकार उनको छू नहीं सकता)। हे प्रभू ! आपका हुकम (सदा) ठीक होता है। किसी जीव ने (कभी) वह मोड़ा नहीं। हे सृष्टि के रचयता ! हे जीवों पर बख्शिश करने वाले ! (ये सारी) आपकी ही (रची हुई) कुदरति है। 16।
सलोक मः 5 ॥
सोइ सुणंदड़ी मेरा तनु मनु मउला नामु जपंदड़ी लाली ॥
पंधि जुलंदड़ी मेरा अंदरु ठंढा गुर दरसनु देखि निहाली ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5। (हे प्रभू !) आपकी शोभा सुन के मेरा तन मन हरा हैं आता है। आपका नाम जपते हुए मुझे खुशी की लाली चढ़ जाती है। आपके राह पर चलते हुए मेरा हृदय ठंडा हैं जाता है और सतिगुरू का दीदार करके मेरा मन खिल उठता है। 1।
मः 5 ॥
हठ मंझाहू मै माणकु लधा ॥
मुलि न घिधा मै कू सतिगुरि दिता ॥
ढूंढ वञाई थीआ थिता ॥
जनमु पदारथु नानक जिता ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ मैंने अपने हृदय में एक लाल पाया है। (पर वह मैंने कोई) मोल दे के नहीं लिया। (ये लाल) मुझे सतिगुरू ने दिया है। (इसकी बरकति से) मेरी भटकना समाप्त हो गई है। मैं टिक गया हूँ। हे नानक ! मैंने मानस जीवन-रूपी कीमती वस्तु (का लाभ) हासिल कर लिया है। 2।
पउड़ी ॥
जिस कै मसतकि करमु होइ सो सेवा लागा ॥
जिसु गुर मिलि कमलु प्रगासिआ सो अनदिनु जागा ॥
लगा रंगु चरणारबिंद सभु भ्रमु भउ भागा ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस मनुष्य के माथे पर प्रभू की कृपा (के लेख) हों वह प्रभू की सेवा-भक्ति में लगता है। गुरू को मिल के जिस मनुष्य का हृदय-कमल खिल उठता है। वह (विकारों के हमलों से) सदा सचेत रहता है। जिस मनुष्य (के मन) में प्रभू के सुंदर चरणों का प्यार होता है। उसकी भटकना उसका डर-भय दूर हो जाता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।