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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 964 · रामकली

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अंग
964
रामकली
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  1. सभे दुख संताप जां तुधहु भुलीऐ ॥
  2. तैडी बंदसि मै कोइ न डिठा तू नानक मनि भाणा ॥
  3. पाव सुहावे जां तउ धिरि जुलदे सीसु सुहावा चरणी ॥
  4. मिलि नारी सतसंगि मंगलु गावीआ ॥
  5. हभि गुण तैडे नानक जीउ मै कू थीए मै निरगुण ते किआ होवै ॥
  6. देह छिजंदड़ी ऊण मझूणा गुरि सजणि जीउ धराइआ ॥
  7. वडा तेरा दरबारु सचा तुधु तखतु ॥
  8. सोइ सुणंदड़ी मेरा तनु मनु मउला नामु जपंदड़ी लाली ॥
  9. हठ मंझाहू मै माणकु लधा ॥
  10. जिस कै मसतकि करमु होइ सो सेवा लागा ॥

सभे दुख संताप जां तुधहु भुलीऐ ॥

पउड़ी ॥
सभे दुख संताप जां तुधहु भुलीऐ ॥
जे कीचनि लख उपाव तां कही न घुलीऐ ॥
जिस नो विसरै नाउ सु निरधनु कांढीऐ ॥
जिस नो विसरै नाउ सो जोनी हांढीऐ ॥
जिसु खसमु न आवै चिति तिसु जमु डंडु दे ॥
जिसु खसमु न आवी चिति रोगी से गणे ॥
जिसु खसमु न आवी चिति सु खरो अहंकारीआ ॥
सोई दुहेला जगि जिनि नाउ विसारीआ ॥14॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ीं । जब हे प्रभू ! आपकी याद से टूट जाएं तो (मन को) सारे दुख-कलेश (आ व्यापते हैं)। (आपकी याद के बिना और) अगर लाखों यतन भी किए जायं। किसी भी उपाय से (उन दुखों-कलेशों से) खलासी नहीं होती। (हे भाई !) जिस मनुष्य को प्रभू का नाम (सिमरना) भूल जाए वह कंगाल कहा जाता है जिस मनुष्य को प्रभू का नाम (सिमरना) भूल जाए (जैसे कोई कंगाल मंगता दर-दर पर भटकता है। वैसे ही) वह जूनियों में भटकता फिरता है। जिस मनुष्य के चित्त में पति-प्रभू नहीं आता उसको जमराज सजा देता है जिस मनुष्य के चित्त में पति-प्रभू नहीं आता ऐसे लोग रोगी गिने जाते हैं। ऐसा सख्श बहुत अहंकारी होता है (हर वक्त 'मैं मैं' ही करता है)। जिस मनुष्य ने प्रभू का नाम भुला दिया है वही जगत में दुखी है। 14।

तैडी बंदसि मै कोइ न डिठा तू नानक मनि भाणा ॥

सलोक मः 5 ॥
तैडी बंदसि मै कोइ न डिठा तू नानक मनि भाणा ॥
घोलि घुमाई तिसु मित्र विचोले जै मिलि कंतु पछाणा ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे (गुरू) नानक (जी) ! आपकी कोई बात मुझे बंदिश नहीं लगती। मैं तो आपको (बल्कि) मन में प्यारा लगने वाला देखा है। मैं उस प्यारे बिचोलिए (गुरू) से सदके हूँ जिसको मिल के मैंने अपने पति-प्रभू को पहचाना है (पति-प्रभू के साथ सांझ डाल ली है)। 1।

पाव सुहावे जां तउ धिरि जुलदे सीसु सुहावा चरणी ॥

मः 5 ॥
पाव सुहावे जां तउ धिरि जुलदे सीसु सुहावा चरणी ॥
मुखु सुहावा जां तउ जसु गावै जीउ पइआ तउ सरणी ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5। वह पैर सुंदर हैं जो आपकी ओर चलते हैं। वह सिर भाग्यशाली है जो आपके कदमों पर गिरता है; मुँह मन-मोहक लगता है जो आपका यश गाता है। जीवात्मा खूबसूरत लगने लगती है जब आपकी शरण पड़ती है। 2।

मिलि नारी सतसंगि मंगलु गावीआ ॥

पउड़ी ॥
मिलि नारी सतसंगि मंगलु गावीआ ॥
घर का होआ बंधानु बहुड़ि न धावीआ ॥
बिनठी दुरमति दुरतु सोइ कूड़ावीआ ॥
सीलवंति परधानि रिदै सचावीआ ॥
अंतरि बाहरि इकु इक रीतावीआ ॥
मनि दरसन की पिआस चरण दासावीआ ॥
सोभा बणी सीगारु खसमि जां रावीआ ॥
मिलीआ आइ संजोगि जां तिसु भावीआ ॥15॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिस जीव-स्त्री ने सत्संग में मिल के प्रभू की सिफत-सालाह के गीत गाए। उसके शरीर घर का ठुक बन गया (उसकी सारी ज्ञान-इन्द्रियाँ उसके वश में आ गई)। वह फिर (माया के पीछे) भटकती नहीं। (उसके अंदर से) बुरी मति पाप व नाशवंत पदार्थों की झाक खत्म हो जाती है। ऐसी जीव-स्त्री अच्छे स्वभाव वाली हो जाती है। (सहेलियों में) आदर-मान पाती है। उसके हृदय में प्रभू के प्रति लगन टिकी रहती है। उसको अपने अंदर व सारी सृष्टि में एक प्रभू ही दिखता है। बस ! यही उसकी जीवन-जुगति बन जाती है। उस जीव-स्त्री के मन में प्रभू के दीदार की तमन्ना बनी रहती है। वह प्रभू के चरणों की ही दासी बनी रहती है। जब उस जीव-स्त्री को पति-प्रभू ने अपने साथ मिला लिया। तो ये मिलाप ही उसके लिए शोभा और श्रृंगार होता है ! जब उस प्रभू को वह जिंद-वधू प्यारी लग जाती है। तो प्रभू की संयोग-सक्ता की बरकति से वह प्रभू की ज्योति में मिल जाती है। 15।

हभि गुण तैडे नानक जीउ मै कू थीए मै निरगुण ते किआ होवै ॥

सलोक मः 5 ॥
हभि गुण तैडे नानक जीउ मै कू थीए मै निरगुण ते किआ होवै ॥
तउ जेवडु दातारु न कोई जाचकु सदा जाचोवै ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! (कह- हे प्रभू) जी ! सारे गुण आपके ही हैं। आपसे ही मुझे मिले हैं। मुझ गुण-हीन से कुछ नहीं हो सकता। आपके जितना बड़ा कोई दातार नहीं। मैं मँगते ने सदा आपसे ही माँगना है। 1।

देह छिजंदड़ी ऊण मझूणा गुरि सजणि जीउ धराइआ ॥

मः 5 ॥
देह छिजंदड़ी ऊण मझूणा गुरि सजणि जीउ धराइआ ॥
हभे सुख सुहेलड़ा सुता जिता जगु सबाइआ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ मेरा शरीर जर्जर होता जा रहा था। चित्त में खिचाव सा हो रहा था और चिंतातुर हो रहा था; पर जब प्यारे सतिगुरू ने जीवात्मा को धरवास दिया तो (अब) सारे ही सुख मिल गए है। मैं सकून में टिका हुआ हूँ। (ऐसा प्रतीत होता है जैसे मैंने) सारा जहान जीत लिया है। 2।

वडा तेरा दरबारु सचा तुधु तखतु ॥

पउड़ी ॥
वडा तेरा दरबारु सचा तुधु तखतु ॥
सिरि साहा पातिसाहु निहचलु चउरु छतु ॥
जो भावै पारब्रहम सोई सचु निआउ ॥
जे भावै पारब्रहम निथावे मिलै थाउ ॥
जो कीन॑ी करतारि साई भली गल ॥
जिन॑ी पछाता खसमु से दरगाह मल ॥
सही तेरा फुरमानु किनै न फेरीऐ ॥
कारण करण करीम कुदरति तेरीऐ ॥16॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे प्रभू ! आपका दरबार बड़ा है। आपका तख्त सदा स्थिर रहने वाला है। आपका चवर और छत्र अटल है। आप (दुनिया के सारे) शाहों के सिर पर पातशाह हैं। (हे भाई !) वह न्याय अटल है जो परमात्मा को अच्छा लगता है। अगर उसे ठीक लगे तो निआसरों को आसरा मिल जाता है। (जीवों के लिए) वही बात ठीक है जो करतार ने (खुद उनके लिए) की है। जिन लोगों ने पति-प्रभू के साथ सांझ डाल ली। वह हजूरी पहलवान बन जाते हैं (कोई विकार उनको छू नहीं सकता)। हे प्रभू ! आपका हुकम (सदा) ठीक होता है। किसी जीव ने (कभी) वह मोड़ा नहीं। हे सृष्टि के रचयता ! हे जीवों पर बख्शिश करने वाले ! (ये सारी) आपकी ही (रची हुई) कुदरति है। 16।

सोइ सुणंदड़ी मेरा तनु मनु मउला नामु जपंदड़ी लाली ॥

सलोक मः 5 ॥
सोइ सुणंदड़ी मेरा तनु मनु मउला नामु जपंदड़ी लाली ॥
पंधि जुलंदड़ी मेरा अंदरु ठंढा गुर दरसनु देखि निहाली ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5। (हे प्रभू !) आपकी शोभा सुन के मेरा तन मन हरा हो आता है। आपका नाम जपते हुए मुझे खुशी की लाली चढ़ जाती है। आपके राह पर चलते हुए मेरा हृदय ठंडा हो जाता है और सतिगुरू का दीदार करके मेरा मन खिल उठता है। 1।

हठ मंझाहू मै माणकु लधा ॥

मः 5 ॥
हठ मंझाहू मै माणकु लधा ॥
मुलि न घिधा मै कू सतिगुरि दिता ॥
ढूंढ वञाई थीआ थिता ॥
जनमु पदारथु नानक जिता ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ मैंने अपने हृदय में एक लाल पाया है। (पर वह मैंने कोई) मोल दे के नहीं लिया। (ये लाल) मुझे सतिगुरू ने दिया है। (इसकी बरकति से) मेरी भटकना समाप्त हो गई है। मैं टिक गया हूँ। हे नानक ! मैंने मानस जीवन-रूपी कीमती वस्तु (का लाभ) हासिल कर लिया है। 2।

जिस कै मसतकि करमु होइ सो सेवा लागा ॥

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पउड़ी ॥
जिस कै मसतकि करमु होइ सो सेवा लागा ॥
जिसु गुर मिलि कमलु प्रगासिआ सो अनदिनु जागा ॥
लगा रंगु चरणारबिंद सभु भ्रमु भउ भागा ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस मनुष्य के माथे पर प्रभू की कृपा (के लेख) हों वह प्रभू की सेवा-भक्ति में लगता है। गुरू को मिल के जिस मनुष्य का हृदय-कमल खिल उठता है। वह (विकारों के हमलों से) सदा सचेत रहता है। जिस मनुष्य (के मन) में प्रभू के सुंदर चरणों का प्यार होता है। उसकी भटकना उसका डर-भय दूर हो जाता है।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 964 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 964 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।