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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 963 · रामकली

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अंग
963
रामकली
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  1. अंम्रित बाणी अमिउ रसु अंम्रितु हरि का नाउ ॥
  2. नानक नामु धिआईऐ गुरु पूरा मति देइ ॥
  3. वडिआई सचे नाम की हउ जीवा सुणि सुणे ॥
  4. मित्रु पिआरा नानक जी मै छडि गवाइआ रंगि कसुंभै भुली ॥
  5. ससु विराइणि नानक जीउ ससुरा वादी जेठो पउ पउ लूहै ॥
  6. जिसु तू वुठा चिति तिसु दरदु निवारणो ॥
  7. उसतति निंदा नानक जी मै हभ वञाई छोड़िआ हभु किझु तिआगी ॥
  8. फिरदी फिरदी नानक जीउ हउ फावी थीई बहुतु दिसावर पंधा ॥

अंम्रित बाणी अमिउ रसु अंम्रितु हरि का नाउ ॥

सलोक मः 5 ॥
अंम्रित बाणी अमिउ रसु अंम्रितु हरि का नाउ ॥
मनि तनि हिरदै सिमरि हरि आठ पहर गुण गाउ ॥
उपदेसु सुणहु तुम गुरसिखहु सचा इहै सुआउ ॥
जनमु पदारथु सफलु होइ मन महि लाइहु भाउ ॥
सूख सहज आनदु घणा प्रभ जपतिआ दुखु जाइ ॥
नानक नामु जपत सुखु ऊपजै दरगह पाईऐ थाउ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ प्रभू का नाम आत्मिक जीवन देने वाला जल है। अमृत का स्वाद देने वाला है; (हे भाई !) सतिगुरू की अमृत बरसाने वाली बाणी के द्वारा इस प्रभू नाम को मन में। शरीर में। हृदय में सिमरो और आठों पहर प्रभू की सिफत सालाह करो। हे गुर-सिखो ! (सिफतसालाह वाला यह) उपदेश सुनो। जिंदगी का असल मनोरथ यही है। मन में (प्रभू का) प्यार टिकाओ। ये मानस-जीवन रूपी बहुमूल्य निधि सफल हो जाएगी। प्रभू का सिमरन करने से दुख दूर हो जाता है। सुख, आत्मिक अडोलता और बेअंत खुशी प्राप्त होती है। हे नानक ! प्रभू का नाम जपने से (इस लोक में) सुख पैदा होता है और प्रभू की हजूरी में जगह मिलती है। 1।

नानक नामु धिआईऐ गुरु पूरा मति देइ ॥

मः 5 ॥
नानक नामु धिआईऐ गुरु पूरा मति देइ ॥
भाणै जप तप संजमो भाणै ही कढि लेइ ॥
भाणै जोनि भवाईऐ भाणै बखस करेइ ॥
भाणै दुखु सुखु भोगीऐ भाणै करम करेइ ॥
भाणै मिटी साजि कै भाणै जोति धरेइ ॥
भाणै भोग भोगाइदा भाणै मनहि करेइ ॥
भाणै नरकि सुरगि अउतारे भाणै धरणि परेइ ॥
भाणै ही जिसु भगती लाए नानक विरले हे ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! पूरा गुरू (तो यह) मति देता है कि प्रभू का नाम सिमरना चाहिए; (पर वैसे) जप तप संजम (आदिक कर्म-काण्ड) प्रभू की रजा में ही हो रहे हैं। रजा अनुसार ही प्रभू (इस कर्म-काण्ड में से जीवों को) निकाल लेता है। प्रभू की रजा अनुसार ही जीव जूनियों में भटकता है। रजा में ही प्रभू (जीव पर) बख्शिश करता है। उसकी रजा में ही (जीव को) दुख-सुख भोगना पड़ता है। अपनी रजा अनुसार ही प्रभू (जीवों पर) मेहर करता है। प्रभू अपनी रजा में ही शरीर बना के (उस में) जीवन डाल देता है। रजा में ही भोगों की ओर प्रेरता है और रजा के अनुसार ही भोगों से रोकता है। अपनी रजा अनुसार ही प्रभू (किसी को) नर्क में (किसी को) स्वर्ग में डालता है। प्रभू की रजा में ही जीव का नाश हो जाता है। अपनी रजा अनुसार ही जिस मनुष्य को बँदगी में जोड़ता है (वह मनुष्य बँदगी करता है। पर) हे नानक ! बँदगी करने वाले बँदे बहुत ही विरले विरले हैं। 2।

वडिआई सचे नाम की हउ जीवा सुणि सुणे ॥

पउड़ी ॥
वडिआई सचे नाम की हउ जीवा सुणि सुणे ॥
पसू परेत अगिआन उधारे इक खणे ॥
दिनसु रैणि तेरा नाउ सदा सद जापीऐ ॥
त्रिसना भुख विकराल नाइ तेरै ध्रापीऐ ॥
रोगु सोगु दुखु वंञै जिसु नाउ मनि वसै ॥
तिसहि परापति लालु जो गुर सबदी रसै ॥
खंड ब्रहमंड बेअंत उधारणहारिआ ॥
तेरी सोभा तुधु सचे मेरे पिआरिआ ॥12॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू के सच्चे नाम की सिफतें (करके और) सुन-सुन के मेरे अंदर जान पड़ जाती है (मुझे आत्मिक जीवन हासिल होता है)। (प्रभू का नाम) पशु-स्वभाव, प्रेत-स्वभाव और ज्ञान-हीनों का एक छिन में उद्धार कर देता है। हे प्रभू ! दिन-रात सदा ही आपका नाम जपना चाहिए। आपके नाम के द्वारा (माया की) डरावनी भूख-प्यास मिट जाती है। जिस मनुष्य के मन में प्रभू का नाम बस जाता है उसके मन में से (विकार-) रोग संशय और दुख दूर हो जाते हैं। पर ये नाम हीरा उस मनुष्य को ही हासिल होता है जो गुरू के शबद में रच-मिच जाता है। हे खंडों-ब्रहमण्डों के बेअंत जीवों का उद्धार करने वाले प्रभू ! हे सदा स्थिर रहने वाले मेरे प्यारे ! आपकी शोभा आपको ही फबती है (अपनी महानता को आप स्वयं ही जानते हैं)। 12।

मित्रु पिआरा नानक जी मै छडि गवाइआ रंगि कसुंभै भुली ॥

सलोक मः 5 ॥
मित्रु पिआरा नानक जी मै छडि गवाइआ रंगि कसुंभै भुली ॥
तउ सजण की मै कीम न पउदी हउ तुधु बिनु अढु न लहदी ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक जी ! मैं कुसंभ (जैसी माया) के रंग में गलती कर बैठी और प्यारा मित्र प्रभू बिसार के गवा बैठी। हे सज्जन प्रभू ! (इस गलती के कारण) मुझसे आपकी कद्र ना हो सकी। पर आपके बगैर मैं आधी कौड़ी की भी नहीं हूँ। 1।

ससु विराइणि नानक जीउ ससुरा वादी जेठो पउ पउ लूहै ॥

मः 5 ॥
ससु विराइणि नानक जीउ ससुरा वादी जेठो पउ पउ लूहै ॥
हभे भसु पुणेदे वतनु जा मै सजणु तूहै ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक जी ! अविद्या (जीव-स्त्री की) वैरनि है। शरीर का मोह (शरीर की पालना के लिए नित्य) झगड़ा करता है (भाव। खाने को माँगता है)। मौत का डर बार-बार दुखी करता है। पर। (हे प्रभू !) अगर आप मेरा मित्र बने। तो ये सारे बेशक ख़ाक छानते फिरें (भाव मेरे पर ये सारे कोई प्रभाव नहीं डाल सकते)। 2।

जिसु तू वुठा चिति तिसु दरदु निवारणो ॥

पउड़ी ॥
जिसु तू वुठा चिति तिसु दरदु निवारणो ॥
जिसु तू वुठा चिति तिसु कदे न हारणो ॥
जिसु मिलिआ पूरा गुरू सु सरपर तारणो ॥
जिस नो लाए सचि तिसु सचु सम॑ालणो ॥
जिसु आइआ हथि निधानु सु रहिआ भालणो ॥
जिस नो इको रंगु भगतु सो जानणो ॥
ओहु सभना की रेणु बिरही चारणो ॥
सभि तेरे चोज विडाण सभु तेरा कारणो ॥13॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! जिस मनुष्य के मन में आप बस जाते हैं उसके मन का दुख दर्द आप दूर कर देते हैं। वह मानस जन्म की बाजी कभी हारता नहीं। (हे भाई !) जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाए। (गुरू) उसको जरूर (संसार समुंद्र से) बचा लेता है (क्योंकि गुरू) जिस मनुष्य को सच्चे हरी में जोड़ता है। वह सदा हरी को (अपने मन में) संभाल के रखता है। (हे भाई !) जिस मनुष्य के हाथ में नाम-खजाना आ जाता है। वह माया की भटकना से हट जाता है। उसी मनुष्य को भगत समझो जिसके मन में (माया की जगह) एक प्रभू का ही प्यार है। प्रभू के चरणों का वह प्रेमी सबके चरणों की धूल (बना रहता) है। (पर) हे प्रभू ! ये सारे आपके ही आश्चर्य तमाशे हैं। ये सारा आपका ही खेल है। 13।

उसतति निंदा नानक जी मै हभ वञाई छोड़िआ हभु किझु तिआगी ॥

सलोक मः 5 ॥
उसतति निंदा नानक जी मै हभ वञाई छोड़िआ हभु किझु तिआगी ॥
हभे साक कूड़ावे डिठे तउ पलै तैडै लागी ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! (कह- हे प्रभू) जी ! किसी को अच्छा और किसी को बुरा कहना -ये सब कुछ मैंने छोड़ दिया है। त्याग दिया है; मैंने देख लिया है कि (दुनिया के) सारे संबंध झूठे हैं (भाव। कोई सिरे तक निभने वाला नहीं)। इसलिए (हे प्रभू !) मैं आपके पल्ले आ लगी हूँ। 1।

फिरदी फिरदी नानक जीउ हउ फावी थीई बहुतु दिसावर पंधा ॥

मः 5 ॥
फिरदी फिरदी नानक जीउ हउ फावी थीई बहुतु दिसावर पंधा ॥
ता हउ सुखि सुखाली सुती जा गुर मिलि सजणु मै लधा ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक जी ! मैं भटकती-भटकती व और और देशों में दर-ब-दर फिरती व्याकुल हो गई थी। पर जब सतिगुरू को मिल के मुझे सज्जन-प्रभू मिल गया तो मैं बड़े सुख से सो गई (भाव। मेरे अंदर पूर्ण आत्मिक आनंद बन गया)। 2।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 963 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 963 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।