गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ प्रभू का नाम आत्मिक जीवन देने वाला जल है। अमृत का स्वाद देने वाला है; (हे भाई !) सतिगुरू की अमृत बरसाने वाली बाणी के द्वारा इस प्रभू नाम को मन में। शरीर में। हृदय में सिमरो और आठों पहर प्रभू की सिफत सालाह करो। हे गुर-सिखो ! (सिफतसालाह वाला यह) उपदेश सुनो। जिंदगी का असल मनोरथ यही है। मन में (प्रभू का) प्यार टिकाओ। ये मानस-जीवन रूपी बहुमूल्य निधि सफल हो जाएगी। प्रभू का सिमरन करने से दुख दूर हो जाता है। सुख। आत्मिक अडोलता और बेअंत खुशी प्राप्त होती है। हे नानक ! प्रभू का नाम जपने से (इस लोक में) सुख पैदा होता है और प्रभू की हजूरी में जगह मिलती है। 1।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! पूरा गुरू (तो यह) मति देता है कि प्रभू का नाम सिमरना चाहिए; (पर वैसे) जप तप संजम (आदिक कर्म-काण्ड) प्रभू की रजा में ही हो रहे हैं। रजा अनुसार ही प्रभू (इस कर्म-काण्ड में से जीवों को) निकाल लेता है। प्रभू की रजा अनुसार ही जीव जूनियों में भटकता है। रजा में ही प्रभू (जीव पर) बख्शिश करता है। उसकी रजा में ही (जीव को) दुख-सुख भोगना पड़ता है। अपनी रजा अनुसार ही प्रभू (जीवों पर) मेहर करता है। प्रभू अपनी रजा में ही शरीर बना के (उस में) जीवन डाल देता है। रजा में ही भोगों की ओर प्रेरता है और रजा के अनुसार ही भोगों से रोकता है। अपनी रजा अनुसार ही प्रभू (किसी को) नर्क में (किसी को) स्वर्ग में डालता है। प्रभू की रजा में ही जीव का नाश हो जाता है। अपनी रजा अनुसार ही जिस मनुष्य को बँदगी में जोड़ता है (वह मनुष्य बँदगी करता है। पर) हे नानक ! बँदगी करने वाले बँदे बहुत ही विरले विरले हैं। 2।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू के सच्चे नाम की सिफतें (करके और) सुन-सुन के मेरे अंदर जान पड़ जाती है (मुझे आत्मिक जीवन हासिल होता है)। (प्रभू का नाम) पशु-स्वभाव। प्रेत-स्वभाव और ज्ञान-हीनों का एक छिन में उद्धार कर देता है। हे प्रभू ! दिन-रात सदा ही आपका नाम जपना चाहिए। आपके नाम के द्वारा (माया की) डरावनी भूख-प्यास मिट जाती है। जिस मनुष्य के मन में प्रभू का नाम बस जाता है उसके मन में से (विकार-) रोग संशय और दुख दूर हो जाते हैं। पर ये नाम हीरा उस मनुष्य को ही हासिल होता है जो गुरू के शबद में रच-मिच जाता है। हे खंडों-ब्रहमण्डों के बेअंत जीवों का उद्धार करने वाले प्रभू ! हे सदा स्थिर रहने वाले मेरे प्यारे ! आपकी शोभा आपको ही फबती है (अपनी महानता को आप स्वयं ही जानता है)। 12।
सलोक मः 5 ॥ मित्रु पिआरा नानक जी मै छडि गवाइआ रंगि कसुंभै भुली ॥ तउ सजण की मै कीम न पउदी हउ तुधु बिनु अढु न लहदी ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक जी ! मैं कुसंभ (जैसी माया) के रंग में गलती कर बैठी और प्यारा मित्र प्रभू बिसार के गवा बैठी। हे सज्जन प्रभू ! (इस गलती के कारण) मुझसे आपकी कद्र ना हैं सकी। पर आपके बगैर मैं आधी कौड़ी की भी नहीं हूँ। 1।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक जी ! अविद्या (जीव-स्त्री की) वैरनि है। शरीर का मोह (शरीर की पालना के लिए नित्य) झगड़ा करता है (भाव। खाने को माँगता है)। मौत का डर बार-बार दुखी करता है। पर। (हे प्रभू !) अगर आप मेरा मित्र बने। तो ये सारे बेशक ख़ाक छानते फिरें (भाव मेरे पर ये सारे कोई प्रभाव नहीं डाल सकते)। 2।
पउड़ी ॥ जिसु तू वुठा चिति तिसु दरदु निवारणो ॥ जिसु तू वुठा चिति तिसु कदे न हारणो ॥ जिसु मिलिआ पूरा गुरू सु सरपर तारणो ॥ जिस नो लाए सचि तिसु सचु सम॑ालणो ॥ जिसु आइआ हथि निधानु सु रहिआ भालणो ॥ जिस नो इको रंगु भगतु सो जानणो ॥ ओहु सभना की रेणु बिरही चारणो ॥ सभि तेरे चोज विडाण सभु तेरा कारणो ॥13॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! जिस मनुष्य के मन में आप बस जाता है उसके मन का दुख दर्द आप दूर कर देता है। वह मानस जन्म की बाजी कभी हारता नहीं। (हे भाई !) जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाए। (गुरू) उसको जरूर (संसार समुंद्र से) बचा लेता है (क्योंकि गुरू) जिस मनुष्य को सच्चे हरी में जोड़ता है। वह सदा हरी को (अपने मन में) संभाल के रखता है। (हे भाई !) जिस मनुष्य के हाथ में नाम-खजाना आ जाता है। वह माया की भटकना से हट जाता है। उसी मनुष्य को भगत समझो जिसके मन में (माया की जगह) एक प्रभू का ही प्यार है। प्रभू के चरणों का वह प्रेमी सबके चरणों की धूल (बना रहता) है। (पर) हे प्रभू ! ये सारे आपके ही आश्चर्य तमाशे हैं। ये सारा आपका ही खेल है। 13।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! (कह- हे प्रभू) जी ! किसी को अच्छा और किसी को बुरा कहना -ये सब कुछ मैंने छोड़ दिया है। त्याग दिया है; मैंने देख लिया है कि (दुनिया के) सारे संबंध झूठे हैं (भाव। कोई सिरे तक निभने वाला नहीं)। इसलिए (हे प्रभू !) मैं आपके पल्ले आ लगी हूँ। 1।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक जी ! मैं भटकती-भटकती व और और देशों में दर-ब-दर फिरती व्याकुल हो गई थी। पर जब सतिगुरू को मिल के मुझे सज्जन-प्रभू मिल गया तो मैं बड़े सुख से सो गई (भाव। मेरे अंदर पूर्ण आत्मिक आनंद बन गया)। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्लोक महला 5॥ प्रभू का नाम आत्मिक जीवन देने वाला जल है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।