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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 962 · रामकली

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अंग
962
रामकली
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  1. तिथै तू समरथु जिथै कोइ नाहि ॥
  2. दूजा तिसु न बुझाइहु पारब्रहम नामु देहु आधारु ॥
  3. अनद सूख बिस्राम नित हरि का कीरतनु गाइ ॥
  4. ना तू आवहि वसि बहुतु घिणावणे ॥
  5. आपे वैदु आपि नाराइणु ॥
  6. हुकमि उछलै हुकमे रहै ॥
  7. हउ तिसु ढाढी कुरबाणु जि तेरा सेवदारु ॥

तिथै तू समरथु जिथै कोइ नाहि ॥

अंग 961 से चला आ रहा अंश

तिथै तू समरथु जिथै कोइ नाहि ॥
ओथै तेरी रख अगनी उदर माहि ॥
सुणि कै जम के दूत नाइ तेरै छडि जाहि ॥
भउजलु बिखमु असगाहु गुर सबदी पारि पाहि ॥
जिन कउ लगी पिआस अंम्रितु सेइ खाहि ॥
कलि महि एहो पुंनु गुण गोविंद गाहि ॥
सभसै नो किरपालु सम॑ाले साहि साहि ॥
बिरथा कोइ न जाइ जि आवै तुधु आहि ॥9॥

हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू !) जहाँ और कोई (जीव सहायता करने लायक) नहीं। वहाँ हे प्रभू ! आप ही मदद करने योग्य हैं। माँ के पेट की आग में जीव को आपका ही आसरा होता है। (हे प्रभू ! आपका नाम) सुन के जमदूत (नजदीक नहीं फटकते)। आपके नाम की बरकति से (जीव को) छोड़ के चले जाते हैं। इस मुश्किल और अथाह संसार-समुंद्र को जीव गुरू के शबद (की सहायता) से पार कर लेते हैं। पर वही लोग आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीते हैं जिनके अंदर इसकी भूख-प्यास पैदा हुई है। जो संसार में नाम-सिमरन को ही सबसे अच्छा नेक काम जान के प्रभू के गुण गाते हैं। कृपालु प्रभू हरेक जीव की सांस-सांस संभाल करता है। हे प्रभू ! जो जीव आपकी शरण आता है वह (आपके दर से) खाली नहीं जाता। 9।

दूजा तिसु न बुझाइहु पारब्रहम नामु देहु आधारु ॥

सलोक मः 5 ॥
दूजा तिसु न बुझाइहु पारब्रहम नामु देहु आधारु ॥
अगमु अगोचरु साहिबो समरथु सचु दातारु ॥
तू निहचलु निरवैरु सचु सचा तुधु दरबारु ॥
कीमति कहणु न जाईऐ अंतु न पारावारु ॥
प्रभु छोडि होरु जि मंगणा सभु बिखिआ रस छारु ॥
से सुखीए सचु साह से जिन सचा बिउहारु ॥
जिना लगी प्रीति प्रभ नाम सहज सुख सारु ॥
नानक इकु आराधे संतन रेणारु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोक मः 5॥ हे पारब्रहम ! जिस मनुष्य को आप अपने नाम का आसरा देते हैं। उसको आप कोई और आसरा नहीं सुझाते; आप अपहुँच हैं। इन्द्रियों की दौड़ से परे है। आप हर शक्ति के मालिक हैं। आप सदा-स्थिर रहने वाले दाता हैं। आप अटल हैं। आपका किसी के साथ वैर नहीं। आपका दरबार सदा कायम रहने वाला है। आपका अंत नहीं पाया जा सकता। आपकी हद-बंदी नहीं मिल सकती। आपका मूल्य नहीं पाया जा सकता। (हे भाई !) परमात्मा को बिसार के और-और चीजें माँगनी- ये सब माया के चस्के हैं और राख के तुल्य हैं। (असल में) वही लोग सुखी हैं। वही सदा कायम रहने वाले शाह हैं जिन्होंने सदा-स्थिर रहने वाले नाम का व्यापार किया है। जिन लोगों की प्रीति प्रभू के नाम के साथ बनी है उनको आत्मिक अडोलता का श्रेष्ठ सुख नसीब है। हे नानक ! वह मनुष्य गुरमुखों की चरणों की धूल में रह कर एक प्रभू को आराधते हैं। 1।

अनद सूख बिस्राम नित हरि का कीरतनु गाइ ॥

मः 5 ॥
अनद सूख बिस्राम नित हरि का कीरतनु गाइ ॥
अवर सिआणप छाडि देहि नानक उधरसि नाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ प्रभू की सिफत सालाह करने से सदा आनंद सदा सुख और सदा शांति बनी रहती है। हे नानक ! और चतुराईयाँ छोड़ दे। नाम की बरकति से (संसार समुंद्र से आपका) उद्धार हो जाएगा। 2।

ना तू आवहि वसि बहुतु घिणावणे ॥

पउड़ी ॥
ना तू आवहि वसि बहुतु घिणावणे ॥
ना तू आवहि वसि बेद पड़ावणे ॥
ना तू आवहि वसि तीरथि नाईऐ ॥
ना तू आवहि वसि धरती धाईऐ ॥
ना तू आवहि वसि कितै सिआणपै ॥
ना तू आवहि वसि बहुता दानु दे ॥
सभु को तेरै वसि अगम अगोचरा ॥
तू भगता कै वसि भगता ताणु तेरा ॥10॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे प्रभू ! बहुत दिखावे वाले तरले लेने से। भी आप किसी जीव के वश में नहीं आता (किसी पर रीझता नहीं)। वेद पढ़ने-पढ़ाने से। भी आप किसी जीव के वश में नहीं आता (किसी पर रीझता नहीं)। तीर्थ पर स्नान करने से। भी आप किसी जीव के वश में नहीं आता (किसी पर रीझता नहीं)। (रमते साधुओं की तरह) सारी धरती गाहने से। भी आप किसी जीव के वश में नहीं आता (किसी पर रीझता नहीं)। किसी चतुराई-सयानप से। भी आप किसी जीव के वश में नहीं आता (किसी पर रीझता नहीं)। बहुत दान देने से। भी आप किसी जीव के वश में नहीं आता (किसी पर रीझता नहीं)। हे अपहुँच और अगोचर प्रभू ! हरेक जीव आपके अधीन है (इन दिखावे के उद्यमों से कोई जीव आपकी प्रसन्नता प्राप्त नहीं कर सकता)। आप सिर्फ उन पर रीझते हैं जो सदा आपका सिमरन करते हैं। (क्योंकि) आपका भजन-सिमरन करने वालों को (सिर्फ) आपका आसरा-सहारा होता है। 10।

आपे वैदु आपि नाराइणु ॥

सलोक मः 5 ॥
आपे वैदु आपि नाराइणु ॥
एहि वैद जीअ का दुखु लाइण ॥
गुर का सबदु अंम्रित रसु खाइण ॥
नानक जिसु मनि वसै तिस के सभि दूख मिटाइण ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ परमात्मा स्वयं ही (आत्मा के रोग हटाने वाला) हकीम है। ये (दुनियावी) हकीम (पाखण्डी धार्मिक आगू) आत्मा पर बल्कि दुख चिपका देते हैं; (आत्मा का रोग काटने के लिए) खाने योग्य चीज (औषधि) सतिगुरू का शबद है (जिसमें से) अमृत का स्वाद (आता है)। हे नानक ! जिस मनुष्य के मन में (गुरू का शबद) बसता है उसके सारे दुख मिट जाते हैं। 1।

हुकमि उछलै हुकमे रहै ॥

मः 5 ॥
हुकमि उछलै हुकमे रहै ॥
हुकमे दुखु सुखु सम करि सहै ॥
हुकमे नामु जपै दिनु राति ॥
नानक जिस नो होवै दाति ॥
हुकमि मरै हुकमे ही जीवै ॥
हुकमे नान॑ा वडा थीवै ॥
हुकमे सोग हरख आनंद ॥
हुकमे जपै निरोधर गुरमंत ॥
हुकमे आवणु जाणु रहाए ॥
नानक जा कउ भगती लाए ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5। प्रभू के हुकम अनुसार जीव भटकता है। हुकम अनुसार ही टिका रहता है; प्रभू के हुकम में ही जीव दुख-सुख को एक समान जान के सहता है। वह उसके हुकम में ही दिन-रात उसका नाम जपता है। हे नानक ! जिस मनुष्य पर प्रभू बख्शिश करता है। प्रभू के हुकम में जीव मरता है। हुकम में ही जीता है। हुकम में ही (पहले) छोटा सा (और फिर) बड़ा हो जाता है; हुकम में ही (जीव को) चिंता और खुशी आनंद घटित होते हैं। प्रभू के हुकम में ही (कोई जीव) गुरू का शबद जपता है जो विकारों को दूर करने के समर्थ है। उसका पैदा होना मरना भी प्रभू अपने अनुसार ही रोकता है हे नानक ! जिस मनुष्य को प्रभू अपनी भक्ति में जोड़ता है । 2।

हउ तिसु ढाढी कुरबाणु जि तेरा सेवदारु ॥

पउड़ी ॥
हउ तिसु ढाढी कुरबाणु जि तेरा सेवदारु ॥
हउ तिसु ढाढी बलिहार जि गावै गुण अपार ॥
सो ढाढी धनु धंनु जिसु लोड़े निरंकारु ॥
सो ढाढी भागठु जिसु सचा दुआर बारु ॥
ओहु ढाढी तुधु धिआइ कलाणे दिनु रैणार ॥
मंगै अंम्रित नामु न आवै कदे हारि ॥
कपड़ु भोजनु सचु रहदा लिवै धार ॥
सो ढाढी गुणवंतु जिस नो प्रभ पिआरु ॥11॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे प्रभू ! मैं उस ढाढी से सदके जाता हूँ जो आपकी सेवा-भक्ति करता है। मैं उस ढाढी से वारने जाता हूँ जो आपके बेअंत गुण गाता है। भाग्यशाली है वह ढाढी। जिसको अकाल-पुरख स्वयं चाहता है। मुबारक है वह ढाढी। जिसको प्रभू का सच्चा दर प्राप्त है। हे प्रभू ! ऐसा (सौभाग्यशाली) ढाढी सदा आपको ध्याता है। दिन-रात आपके गुण गाता है। आपसे आपका आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल माँगता है। वह ढाढी मानस जन्म की बाजी हार के आपके पास नहीं आता (जीत के ही आता है)। हे प्रभू ! आपका सदा-स्थिर नाम ही (उस ढाढी के पास। पर्दा ढकने के लिए) कपड़ा है। और (आत्मिक) खुराक है। वह सदा एक-रस आपकी याद में जुड़ा रहता है। (दरअसल) गुणवान वही ढाढी है जिसको प्रभू का प्यार हासिल है। 11।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 962 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 962 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।