आवण जाणा तिस का कटीऐ सदा सदा सुखु होहा ॥2॥
जो तुधु भाणा जंतु सो तुधु बुझई ॥
जो तुधु भाणा जंतु सु दरगह सिझई ॥
जिस नो तेरी नदरि हउमै तिसु गई ॥
जिस नो तू संतुसटु कलमल तिसु खई ॥
जिस कै सुआमी वलि निरभउ सो भई ॥
जिस नो तू किरपालु सचा सो थिअई ॥
जिस नो तेरी मइआ न पोहै अगनई ॥
तिस नो सदा दइआलु जिनि गुर ते मति लई ॥7॥
करि किरपा किरपाल आपे बखसि लै ॥
सदा सदा जपी तेरा नामु सतिगुर पाइ पै ॥
मन तन अंतरि वसु दूखा नासु होइ ॥
हथ देइ आपि रखु विआपै भउ न कोइ ॥
गुण गावा दिनु रैणि एतै कंमि लाइ ॥
संत जना कै संगि हउमै रोगु जाइ ॥
सरब निरंतरि खसमु एको रवि रहिआ ॥
गुर परसादी सचु सचो सचु लहिआ ॥
दइआ करहु दइआल अपणी सिफति देहु ॥
दरसनु देखि निहाल नानक प्रीति एह ॥1॥
एको जपीऐ मनै माहि इकस की सरणाइ ॥
इकसु सिउ करि पिरहड़ी दूजी नाही जाइ ॥
इको दाता मंगीऐ सभु किछु पलै पाइ ॥
मनि तनि सासि गिरासि प्रभु इको इकु धिआइ ॥
अंम्रितु नामु निधानु सचु गुरमुखि पाइआ जाइ ॥
वडभागी ते संत जन जिन मनि वुठा आइ ॥
जलि थलि महीअलि रवि रहिआ दूजा कोई नाहि ॥
नामु धिआई नामु उचरा नानक खसम रजाइ ॥2॥
जिस नो तू रखवाला मारे तिसु कउणु ॥
जिस नो तू रखवाला जिता तिनै भैणु ॥
जिस नो तेरा अंगु तिसु मुखु उजला ॥
जिस नो तेरा अंगु सु निरमली हूं निरमला ॥
जिस नो तेरी नदरि न लेखा पुछीऐ ॥
जिस नो तेरी खुसी तिनि नउ निधि भुंचीऐ ॥
जिस नो तू प्रभ वलि तिसु किआ मुहछंदगी ॥
जिस नो तेरी मिहर सु तेरी बंदिगी ॥8॥
होहु क्रिपाल सुआमी मेरे संतां संगि विहावे ॥
तुधहु भुले सि जमि जमि मरदे तिन कदे न चुकनि हावे ॥1॥
सतिगुरु सिमरहु आपणा घटि अवघटि घट घाट ॥
हरि हरि नामु जपंतिआ कोइ न बंधै वाट ॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पूरे गुरू की आत्मिक जीवन देने वाली बाणी उस मनुष्य के हृदय में बसती है जिस पर गुरू मेहर करे।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।