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961
रामकली
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अंम्रित बाणी सतिगुर पूरे की जिसु किरपालु होवै तिसु रिदै वसेहा ॥
अंम्रित बाणी सतिगुर पूरे की जिसु किरपालु होवै तिसु रिदै वसेहा ॥
आवण जाणा तिस का कटीऐ सदा सदा सुखु होहा ॥2॥
आवण जाणा तिस का कटीऐ सदा सदा सुखु होहा ॥2॥
हिन्दी अर्थ: पूरे गुरू की आत्मिक जीवन देने वाली बाणी उस मनुष्य के हृदय में बसती है जिस पर गुरू मेहर करे। उस मनुष्य का जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। उसको सदा ही सुख प्राप्त होता है।
जो तुधु भाणा जंतु सो तुधु बुझई ॥
पउड़ी ॥
जो तुधु भाणा जंतु सो तुधु बुझई ॥
जो तुधु भाणा जंतु सु दरगह सिझई ॥
जिस नो तेरी नदरि हउमै तिसु गई ॥
जिस नो तू संतुसटु कलमल तिसु खई ॥
जिस कै सुआमी वलि निरभउ सो भई ॥
जिस नो तू किरपालु सचा सो थिअई ॥
जिस नो तेरी मइआ न पोहै अगनई ॥
तिस नो सदा दइआलु जिनि गुर ते मति लई ॥7॥
जो तुधु भाणा जंतु सो तुधु बुझई ॥
जो तुधु भाणा जंतु सु दरगह सिझई ॥
जिस नो तेरी नदरि हउमै तिसु गई ॥
जिस नो तू संतुसटु कलमल तिसु खई ॥
जिस कै सुआमी वलि निरभउ सो भई ॥
जिस नो तू किरपालु सचा सो थिअई ॥
जिस नो तेरी मइआ न पोहै अगनई ॥
तिस नो सदा दइआलु जिनि गुर ते मति लई ॥7॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे प्रभू ! जो जीव आपको प्यारा लगता है। वह आपके साथ सांझ डाल लेता है। वह (जीवन-यात्रा में) सफल (हो के) आपकी हजूरी में पहुँचता है। जिस पर आपकी मेहर की नजर है। उसका स्वै भाव दूर हो जाता है। जिस पर आप खुश हो जाएँ उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। (हे भाई !) मालिक प्रभू जिस मनुष्य के पक्ष में हो। वह (दुनियां के डर-सहम से) निडर हो जाता है। हे प्रभू ! जिस पर आप दयालु हैं। वह (माया के हमलों के आगे) अडोल हो जाता है। जिस पर आपकी मेहर हो उसको (माया की) आग छू भी नहीं सकती। पर। (हे प्रभू !) आप उस पर सदा दयालु हैं। जिसने गुरू से (मनुष्य-जीवन जीने की) युक्ति (मति) सीखी। 7।
करि किरपा किरपाल आपे बखसि लै ॥
सलोक मः 5 ॥
करि किरपा किरपाल आपे बखसि लै ॥
सदा सदा जपी तेरा नामु सतिगुर पाइ पै ॥
मन तन अंतरि वसु दूखा नासु होइ ॥
हथ देइ आपि रखु विआपै भउ न कोइ ॥
गुण गावा दिनु रैणि एतै कंमि लाइ ॥
संत जना कै संगि हउमै रोगु जाइ ॥
सरब निरंतरि खसमु एको रवि रहिआ ॥
गुर परसादी सचु सचो सचु लहिआ ॥
दइआ करहु दइआल अपणी सिफति देहु ॥
दरसनु देखि निहाल नानक प्रीति एह ॥1॥
करि किरपा किरपाल आपे बखसि लै ॥
सदा सदा जपी तेरा नामु सतिगुर पाइ पै ॥
मन तन अंतरि वसु दूखा नासु होइ ॥
हथ देइ आपि रखु विआपै भउ न कोइ ॥
गुण गावा दिनु रैणि एतै कंमि लाइ ॥
संत जना कै संगि हउमै रोगु जाइ ॥
सरब निरंतरि खसमु एको रवि रहिआ ॥
गुर परसादी सचु सचो सचु लहिआ ॥
दइआ करहु दइआल अपणी सिफति देहु ॥
दरसनु देखि निहाल नानक प्रीति एह ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे कृपालु (प्रभू) ! मेहर करें। और आप स्वयं ही मुझे बख्श लें। सतिगुरू के चरणों में गिर के मैं सदा ही आपका नाम जपता रहूँ। (हे कृपालु !) मेरे मन में तन में आ बसें (ताकि) मेरे दुख समाप्त हो जाएँ; आप स्वयं मुझे अपना हाथ दे के रखें। कोई डर मुझ पर अपना जोर ना डाल सके। (हे कृपालु !) मुझे इसी काम में लगाए रखें कि मैं दिन-रात आपके गुण गाता रहूँ। गुरमुखों की संगति में रह के मेरा अहंकार का रोग काटा जाए। (हे भाई ! भले ही) पति-प्रभू सब जीवों में एक रस व्यापक है। पर उस सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को जिसने पाया है गुरू की मेहर से पाया है। हे दयालु प्रभू ! दया करें। मुझे अपनी सिफत-सालाह बख्शें। (मुझ) नानक की यही तमन्ना है कि आपके दर्शन करके प्रफुल्लित रहूँ। 1।
एको जपीऐ मनै माहि इकस की सरणाइ ॥
मः 5 ॥
एको जपीऐ मनै माहि इकस की सरणाइ ॥
इकसु सिउ करि पिरहड़ी दूजी नाही जाइ ॥
इको दाता मंगीऐ सभु किछु पलै पाइ ॥
मनि तनि सासि गिरासि प्रभु इको इकु धिआइ ॥
अंम्रितु नामु निधानु सचु गुरमुखि पाइआ जाइ ॥
वडभागी ते संत जन जिन मनि वुठा आइ ॥
जलि थलि महीअलि रवि रहिआ दूजा कोई नाहि ॥
नामु धिआई नामु उचरा नानक खसम रजाइ ॥2॥
एको जपीऐ मनै माहि इकस की सरणाइ ॥
इकसु सिउ करि पिरहड़ी दूजी नाही जाइ ॥
इको दाता मंगीऐ सभु किछु पलै पाइ ॥
मनि तनि सासि गिरासि प्रभु इको इकु धिआइ ॥
अंम्रितु नामु निधानु सचु गुरमुखि पाइआ जाइ ॥
वडभागी ते संत जन जिन मनि वुठा आइ ॥
जलि थलि महीअलि रवि रहिआ दूजा कोई नाहि ॥
नामु धिआई नामु उचरा नानक खसम रजाइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ एक प्रभू को ही मन में ध्याना चाहिए। एक प्रभू की ही शरण लेनी चाहिए। हे मन ! एक प्रभू के साथ ही प्रेम डालें। उसके बिना और कोई जगह-ठिकाना नहीं। एक प्रभू-दाते से ही माँगना चाहिए। हरेक चीज उसी से ही मिलती है। हे भाई ! मन से शरीर से श्वास-श्वास खाते-पीते एक प्रभू को ही सिमरें। प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम सदा कायम रहने वाला खजाना गुरू के द्वारा ही मिलता है। वह गुरमुख लोग बड़े ही भाग्यों वाले हैं जिनके मन में प्रभू आ बसता है। प्रभू जल में धरती में आकाश में (हर जगह) मौजूद है। उसके बिना (कहीं भी) कोई और नहीं। हे नानक ! (अरदास कर कि) मैं भी उस प्रभू का नाम सिमरूँ। नाम (मुँह से) उचारूँ और उस पति-प्रभू की रजा में रहूँ। 2।
जिस नो तू रखवाला मारे तिसु कउणु ॥
पउड़ी ॥
जिस नो तू रखवाला मारे तिसु कउणु ॥
जिस नो तू रखवाला जिता तिनै भैणु ॥
जिस नो तेरा अंगु तिसु मुखु उजला ॥
जिस नो तेरा अंगु सु निरमली हूं निरमला ॥
जिस नो तेरी नदरि न लेखा पुछीऐ ॥
जिस नो तेरी खुसी तिनि नउ निधि भुंचीऐ ॥
जिस नो तू प्रभ वलि तिसु किआ मुहछंदगी ॥
जिस नो तेरी मिहर सु तेरी बंदिगी ॥8॥
जिस नो तू रखवाला मारे तिसु कउणु ॥
जिस नो तू रखवाला जिता तिनै भैणु ॥
जिस नो तेरा अंगु तिसु मुखु उजला ॥
जिस नो तेरा अंगु सु निरमली हूं निरमला ॥
जिस नो तेरी नदरि न लेखा पुछीऐ ॥
जिस नो तेरी खुसी तिनि नउ निधि भुंचीऐ ॥
जिस नो तू प्रभ वलि तिसु किआ मुहछंदगी ॥
जिस नो तेरी मिहर सु तेरी बंदिगी ॥8॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (हे प्रभू !) जिस मनुष्य को आप रक्षक मिले हैं। उसको कोई (विकार आदि) मार नहीं सकता। क्योंकि उसने तो (सारा) जगत (ही) जीत लिया है। (हे प्रभू !) जिसको आपका आसरा प्राप्त है वह (मानवता की जिम्मेवारी में) सुर्खरू हो गया है। वह बड़े ही पवित्र जीवन वाला बन गया है। (हे प्रभू !) जिसको आपकी (मेहर की) नजर नसीब हुई है उसको (जिंदगी में किए कामों का) हिसाब नहीं पूछा जाता। क्योंकि हे प्रभू ! जिसको आपकी खुशी प्राप्त हुई है उसने आपके नाम-रूप नौ खजानों का आनंद ले लिया है। हे प्रभू ! आप जिस व्यक्ति के पक्ष में हैं उसको किसी की मुहताजी नहीं रहती (क्योंकि) जिस पर आपकी मेहर है वह आपकी भक्ति करता है। 8।
होहु क्रिपाल सुआमी मेरे संतां संगि विहावे ॥
सलोक महला 5 ॥
होहु क्रिपाल सुआमी मेरे संतां संगि विहावे ॥
तुधहु भुले सि जमि जमि मरदे तिन कदे न चुकनि हावे ॥1॥
होहु क्रिपाल सुआमी मेरे संतां संगि विहावे ॥
तुधहु भुले सि जमि जमि मरदे तिन कदे न चुकनि हावे ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5। हे मेरे स्वामी ! मेरे पर दया करें। मेरी उम्र संतों की संगति में रह कर बीते। जो मनुष्य आपसे विछुड़ जाते हैं वे सदा पैदा होते मरते रहते हैं। उनकी आहें कभी खत्म नहीं होतीं। 1।
सतिगुरु सिमरहु आपणा घटि अवघटि घट घाट ॥
मः 5 ॥
सतिगुरु सिमरहु आपणा घटि अवघटि घट घाट ॥
हरि हरि नामु जपंतिआ कोइ न बंधै वाट ॥2॥
सतिगुरु सिमरहु आपणा घटि अवघटि घट घाट ॥
हरि हरि नामु जपंतिआ कोइ न बंधै वाट ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (हे भाई !) अपने गुरू को (अपने) हृदय में उठते-बैठते हर समय (हर जगह) याद रखें। परमात्मा का नाम सिमरते हुए जिंदगी के रास्ते में कोई विकार रुकावट नहीं डाल सकता। 2।
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 961 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 961 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।