Lulla Family

अंग 961

अंग
961
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अंम्रित बाणी सतिगुर पूरे की जिसु किरपालु होवै तिसु रिदै वसेहा ॥
आवण जाणा तिस का कटीऐ सदा सदा सुखु होहा ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पूरे गुरू की आत्मिक जीवन देने वाली बाणी उस मनुष्य के हृदय में बसती है जिस पर गुरू मेहर करे। उस मनुष्य का जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। उसको सदा ही सुख प्राप्त होता है।
पउड़ी ॥
जो तुधु भाणा जंतु सो तुधु बुझई ॥
जो तुधु भाणा जंतु सु दरगह सिझई ॥
जिस नो तेरी नदरि हउमै तिसु गई ॥
जिस नो तू संतुसटु कलमल तिसु खई ॥
जिस कै सुआमी वलि निरभउ सो भई ॥
जिस नो तू किरपालु सचा सो थिअई ॥
जिस नो तेरी मइआ न पोहै अगनई ॥
तिस नो सदा दइआलु जिनि गुर ते मति लई ॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे प्रभू ! जो जीव आपको प्यारा लगता है। वह आपके साथ सांझ डाल लेता है। वह (जीवन-यात्रा में) सफल (हो के) आपकी हजूरी में पहुँचता है। जिस पर आपकी मेहर की नजर हैं। उसका स्वै भाव दूर हैं जाता है। जिस पर आप खुश हैं जाए उसके सारे पाप नष्ट हैं जाते हैं। (हे भाई !) मालिक प्रभू जिस मनुष्य के पक्ष में हो। वह (दुनियां के डर-सहम से) निडर हो जाता है। हे प्रभू ! जिस पर आप दयालु हैं। वह (माया के हमलों के आगे) अडोल हैं जाता है। जिस पर आपकी मेहर हैं उसका (माया की) आग छू भी नहीं सकती। पर। (हे प्रभू !) आप उस पर सदा दयालु है। जिसने गुरू से (मनुष्य-जीवन जीने की) युक्ति (मति) सीखी। 7।
सलोक मः 5 ॥
करि किरपा किरपाल आपे बखसि लै ॥
सदा सदा जपी तेरा नामु सतिगुर पाइ पै ॥
मन तन अंतरि वसु दूखा नासु होइ ॥
हथ देइ आपि रखु विआपै भउ न कोइ ॥
गुण गावा दिनु रैणि एतै कंमि लाइ ॥
संत जना कै संगि हउमै रोगु जाइ ॥
सरब निरंतरि खसमु एको रवि रहिआ ॥
गुर परसादी सचु सचो सचु लहिआ ॥
दइआ करहु दइआल अपणी सिफति देहु ॥
दरसनु देखि निहाल नानक प्रीति एह ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे कृपालु (प्रभू) ! मेहर कर। और आप स्वयं ही मुझे बख्श ले। सतिगुरू के चरणों में गिर के मैं सदा ही आपका नाम जपता रहॅूँ। (हे कृपालु !) मेरे मन में तन में आ बस (ता कि) मेरे दुख समाप्त हो जाएं; आप स्वयं मुझे अपना हाथ दे के रख। कोई डर मुझ पर अपना जोर ना डाल सके। (हे कृपालु !) मुझे इसी काम में लगाए रख कि मैं दिन-रात आपके गुण गाता रहूँ। गुरमुखों की संगति में रह के मेरा अहंकार का रोग काटा जाए। (हे भाई ! भले ही) पति-प्रभू सब जीवों में एक रस व्यापक है। पर उस सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को जिसने पाया है गुरू की मेहर से पाया है। हे दयालु प्रभू ! दया कर। मुझे अपनी सिफत-सालाह बख्श। (मुझ) नानक की यही तमन्ना है कि आपके दर्शन करके प्रफुल्लित रहूँ। 1।
मः 5 ॥
एको जपीऐ मनै माहि इकस की सरणाइ ॥
इकसु सिउ करि पिरहड़ी दूजी नाही जाइ ॥
इको दाता मंगीऐ सभु किछु पलै पाइ ॥
मनि तनि सासि गिरासि प्रभु इको इकु धिआइ ॥
अंम्रितु नामु निधानु सचु गुरमुखि पाइआ जाइ ॥
वडभागी ते संत जन जिन मनि वुठा आइ ॥
जलि थलि महीअलि रवि रहिआ दूजा कोई नाहि ॥
नामु धिआई नामु उचरा नानक खसम रजाइ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ एक प्रभू को ही मन में ध्याना चाहिए। एक प्रभू की ही शरण लेनी चाहिए। हे मन ! एक प्रभू के साथ ही प्रेम डाल। उसके बिना और कोई जगह-ठिकाना नहीं। एक प्रभू-दाते से ही माँगना चाहिए। हरेक चीज उसी से ही मिलती है। हे भाई ! मन से शरीर से श्वास-श्वास खाते-पीते एक प्रभू को ही सिमर। प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम सदा कायम रहने वाला खजाना गुरू के द्वारा ही मिलता है। वह गुरमुख लोग बड़े ही भाग्यों वाले हैं जिनके मन में प्रभू आ बसता है। प्रभू जल में धरती में आकाश में (हर जगह) मौजूद है। उसके बिना (कहीं भी) कोई और नहीं। हे नानक ! (अरदास कर कि) मैं भी उस प्रभू का नाम सिमरूँ। नाम (मुँह से) उचारूँ और उस पति-प्रभू की रजा में रहूँ। 2।
पउड़ी ॥
जिस नो तू रखवाला मारे तिसु कउणु ॥
जिस नो तू रखवाला जिता तिनै भैणु ॥
जिस नो तेरा अंगु तिसु मुखु उजला ॥
जिस नो तेरा अंगु सु निरमली हूं निरमला ॥
जिस नो तेरी नदरि न लेखा पुछीऐ ॥
जिस नो तेरी खुसी तिनि नउ निधि भुंचीऐ ॥
जिस नो तू प्रभ वलि तिसु किआ मुहछंदगी ॥
जिस नो तेरी मिहर सु तेरी बंदिगी ॥8॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (हे प्रभू !) जिस मनुष्य को आप रक्षक मिला है। उसको कोई (विकार आदि) मार नहीं सकता। क्योंकि उसने तो (सारा) जगत (ही) जीत लिया है। (हे प्रभू !) जिसको आपका आसरा प्राप्त है वह (मानवता की जिम्मेवारी में) सुर्खरू हैं गया है। वह बड़े ही पवित्र जीवन वाला बन गया है। (हे प्रभू !) जिसको आपकी (मेहर की) नजर नसीब हुई है उसको (जिंदगी में किए कामों का) हिसाब नहीं पूछा जाता। क्योंकि हे प्रभू ! जिसको आपकी खुशी प्राप्त हुई है उसने आपके नाम-रूप नौ खजानों का आनंद ले लिया है। हे प्रभू ! आप जिस व्यक्ति के पक्ष में है उसको किसी की मुथाजी नहीं रहती (क्योंकि) जिस पर आपकी मेहर है वह आपकी भक्ति करता है। 8।
सलोक महला 5 ॥
होहु क्रिपाल सुआमी मेरे संतां संगि विहावे ॥
तुधहु भुले सि जमि जमि मरदे तिन कदे न चुकनि हावे ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5। हे मेरे स्वामी ! मेरे पर दया कर। मेरी उम्र संतों की संगति में रह कर बीते। जो मनुष्य आपसे विछुड़ जाते हैं वे सदा पैदा होते मरते रहते हैं। उनकी आहें कभी खत्म नहीं होतीं। 1।
मः 5 ॥
सतिगुरु सिमरहु आपणा घटि अवघटि घट घाट ॥
हरि हरि नामु जपंतिआ कोइ न बंधै वाट ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (हे भाई !) अपने गुरू को (अपने) हृदय में उठते-बैठते हर समय (हर जगह) याद रखो। परमात्मा का नाम सिमरते हुए जिंदगी के रास्ते में कोई विकार रुकावट नहीं डाल सकता। 2।
पउड़ी ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पूरे गुरू की आत्मिक जीवन देने वाली बाणी उस मनुष्य के हृदय में बसती है जिस पर गुरू मेहर करे।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।