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960
रामकली
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जनु नानकु मंगै दानु इकु देहु दरसु मनि पिआरु ॥2॥
जनु नानकु मंगै दानु इकु देहु दरसु मनि पिआरु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू !) दास नानक भी (आपके दर से) एक ख़ैर माँगता है- मुझे दीदार दे और मुझे मन में अपना प्यार बख्श। 2।
जिसु तू आवहि चिति तिस नो सदा सुख ॥
पउड़ी ॥
जिसु तू आवहि चिति तिस नो सदा सुख ॥
जिसु तू आवहि चिति तिसु जम नाहि दुख ॥
जिसु तू आवहि चिति तिसु कि काड़िआ ॥
जिस दा करता मित्रु सभि काज सवारिआ ॥
जिसु तू आवहि चिति सो परवाणु जनु ॥
जिसु तू आवहि चिति बहुता तिसु धनु ॥
जिसु तू आवहि चिति सो वड परवारिआ ॥
जिसु तू आवहि चिति तिनि कुल उधारिआ ॥6॥
जिसु तू आवहि चिति तिस नो सदा सुख ॥
जिसु तू आवहि चिति तिसु जम नाहि दुख ॥
जिसु तू आवहि चिति तिसु कि काड़िआ ॥
जिस दा करता मित्रु सभि काज सवारिआ ॥
जिसु तू आवहि चिति सो परवाणु जनु ॥
जिसु तू आवहि चिति बहुता तिसु धनु ॥
जिसु तू आवहि चिति सो वड परवारिआ ॥
जिसु तू आवहि चिति तिनि कुल उधारिआ ॥6॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभु! जिस मनुष्य के चित्त में आप बसते हैं, उसे सदा का सुख मिलता है। उसे मृत्यु का भय नहीं सताता; चिंता उस पर हावी नहीं होती। जिसके मित्र स्वयं कर्तार हों, उसके काम सँवर जाते हैं। हे प्रभु! जिसकी स्मृति में आप बसते हैं, वह आपके दर पर स्वीकार होता है। उसके पास नाम का अपार धन इकट्ठा होता है। आपकी याद से उसे सारा संसार अपना परिवार दिखता है; वह अपनी कुलों को भी पार ले जाता है। 6।
अंदरहु अंना बाहरहु अंना कूड़ी कूड़ी गावै ॥
सलोक मः 5 ॥
अंदरहु अंना बाहरहु अंना कूड़ी कूड़ी गावै ॥
देही धोवै चक्र बणाए माइआ नो बहु धावै ॥
अंदरि मैलु न उतरै हउमै फिरि फिरि आवै जावै ॥
नींद विआपिआ कामि संतापिआ मुखहु हरि हरि कहावै ॥
बैसनो नामु करम हउ जुगता तुह कुटे किआ फलु पावै ॥
हंसा विचि बैठा बगु न बणई नित बैठा मछी नो तार लावै ॥
जा हंस सभा वीचारु करि देखनि ता बगा नालि जोड़ु कदे न आवै ॥
हंसा हीरा मोती चुगणा बगु डडा भालण जावै ॥
उडरिआ वेचारा बगुला मतु होवै मंञु लखावै ॥
जितु को लाइआ तित ही लागा किसु दोसु दिचै जा हरि एवै भावै ॥
सतिगुरु सरवरु रतनी भरपूरे जिसु प्रापति सो पावै ॥
सिख हंस सरवरि इकठे होए सतिगुर कै हुकमावै ॥
रतन पदारथ माणक सरवरि भरपूरे खाइ खरचि रहे तोटि न आवै ॥
सरवर हंसु दूरि न होई करते एवै भावै ॥
जन नानक जिस दै मसतकि भागु धुरि लिखिआ सो सिखु गुरू पहि आवै ॥
आपि तरिआ कुटंब सभि तारे सभा स्रिसटि छडावै ॥1॥
अंदरहु अंना बाहरहु अंना कूड़ी कूड़ी गावै ॥
देही धोवै चक्र बणाए माइआ नो बहु धावै ॥
अंदरि मैलु न उतरै हउमै फिरि फिरि आवै जावै ॥
नींद विआपिआ कामि संतापिआ मुखहु हरि हरि कहावै ॥
बैसनो नामु करम हउ जुगता तुह कुटे किआ फलु पावै ॥
हंसा विचि बैठा बगु न बणई नित बैठा मछी नो तार लावै ॥
जा हंस सभा वीचारु करि देखनि ता बगा नालि जोड़ु कदे न आवै ॥
हंसा हीरा मोती चुगणा बगु डडा भालण जावै ॥
उडरिआ वेचारा बगुला मतु होवै मंञु लखावै ॥
जितु को लाइआ तित ही लागा किसु दोसु दिचै जा हरि एवै भावै ॥
सतिगुरु सरवरु रतनी भरपूरे जिसु प्रापति सो पावै ॥
सिख हंस सरवरि इकठे होए सतिगुर कै हुकमावै ॥
रतन पदारथ माणक सरवरि भरपूरे खाइ खरचि रहे तोटि न आवै ॥
सरवर हंसु दूरि न होई करते एवै भावै ॥
जन नानक जिस दै मसतकि भागु धुरि लिखिआ सो सिखु गुरू पहि आवै ॥
आपि तरिआ कुटंब सभि तारे सभा स्रिसटि छडावै ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5। अगर मनुष्य मन से माया में फसा हुआ है और करतूतें भी काली हैं। पर झूठ-मूठ में (विष्णु-पद) गाता है। शरीर को स्नान करवाता है (शरीर पर) चक्र बनवाता है। और वैसे माया की खातिर भटकता फिरता है। (इन चक्र आदि से) मन में से अहंकार की मैल नहीं उतरती। वह बार-बार जनम के चक्कर में पड़ा रहता है; गफ़लत की नींद में दबा हुआ। काम का मारा हुआ। मुँह से ही 'हरे ! हरे !' कहता है। अपना नाम भी वैश्णव (विष्णु का भक्त) रखा हुआ है। पर करतूतों के कारण अहंकार में जकड़ा हुआ है। (सो। शरीर धोने, चक्र बनाने आदि कर्म चावल के छिलके के कूटने के तूल्य हैं) चावल का छिलका कूटने से (उनमें से) चावल नहीं निकलने वाले। हंसों में बैठा हुआ बगला हंस नहीं बन जाता। (हंसों में) बैठा हुआ भी वह सदा मछली (पकड़ने) के लिए ताड़ी लगाता है; जब हंस मिल के विचार करके देखते हैं तो (यही नतीजा निकलता है कि) बगलों के साथ उनका मेल फबता नहीं। (क्योंकि) हंसों की खुराक़ हीरे-मोती हैं और बगला मेंढकियाँ तलाशने जाता है; बेचारा बगला (आखिर हंसों के झुंड में से) उड़ ही जाता है कि कहीं मेरी पोल खुल ही ना जाए। पर। दोष किस को दिया जाय। परमात्मा को भी यही बात भाती है; जिधर कोई जीव लगाया जाता है उधर ही वह लगता है। सतिगुरू (मानो) एक सरोवर है जो रत्नों से नाको-नाक भरा हुआ है। जिसके भाग्य हों उसी को ही मिलता है। सतिगुरू के हुकम अनुसार ही सिख-हंस (गुरू की शरण-रूप) सरोवर में आ एकत्र होते हैं। उस सरोवर में (प्रभू के गुण रूप) हीरे-मोती नाको-नाक भरे हुए हैं। सिख इनको खुद इस्तेमाल करते व औरों को बाँटते हैं ये हीरे-मोती खत्म नहीं होते। करतार को ऐसा ही भाता है कि सिख-हंस गुरू-सरोवर से दूर नहीं जाता। हे नानक ! धुर से ही जिसके माथे पर लिखे लेख हों वह सिख सतिगुरू की शरण आता है। (गुरू शरण आ के) वह स्वयं तैर जाता है। सारे संबंधियों को तैरा लेता है और सारे जगत को बचा लेता है। 1।
पंडितु आखाए बहुती राही कोरड़ मोठ जिनेहा ॥
मः 5 ॥
पंडितु आखाए बहुती राही कोरड़ मोठ जिनेहा ॥
अंदरि मोहु नित भरमि विआपिआ तिसटसि नाही देहा ॥
कूड़ी आवै कूड़ी जावै माइआ की नित जोहा ॥
सचु कहै ता छोहो आवै अंतरि बहुता रोहा ॥
विआपिआ दुरमति कुबुधि कुमूड़ा मनि लागा तिसु मोहा ॥
ठगै सेती ठगु रलि आइआ साथु भि इको जेहा ॥
सतिगुरु सराफु नदरी विचदो कढै तां उघड़ि आइआ लोहा ॥
बहुतेरी थाई रलाइ रलाइ दिता उघड़िआ पड़दा अगै आइ खलोहा ॥
सतिगुर की जे सरणी आवै फिरि मनूरहु कंचनु होहा ॥
सतिगुरु निरवैरु पुत्र सत्र समाने अउगण कटे करे सुधु देहा ॥
नानक जिसु धुरि मसतकि होवै लिखिआ तिसु सतिगुर नालि सनेहा ॥
पंडितु आखाए बहुती राही कोरड़ मोठ जिनेहा ॥
अंदरि मोहु नित भरमि विआपिआ तिसटसि नाही देहा ॥
कूड़ी आवै कूड़ी जावै माइआ की नित जोहा ॥
सचु कहै ता छोहो आवै अंतरि बहुता रोहा ॥
विआपिआ दुरमति कुबुधि कुमूड़ा मनि लागा तिसु मोहा ॥
ठगै सेती ठगु रलि आइआ साथु भि इको जेहा ॥
सतिगुरु सराफु नदरी विचदो कढै तां उघड़ि आइआ लोहा ॥
बहुतेरी थाई रलाइ रलाइ दिता उघड़िआ पड़दा अगै आइ खलोहा ॥
सतिगुर की जे सरणी आवै फिरि मनूरहु कंचनु होहा ॥
सतिगुरु निरवैरु पुत्र सत्र समाने अउगण कटे करे सुधु देहा ॥
नानक जिसु धुरि मसतकि होवै लिखिआ तिसु सतिगुर नालि सनेहा ॥
हिन्दी अर्थ: महला 5। बहुत सारे शास्त्र आदि पढ़ने के कारण (ही अगर अपने आप को कोई मनुष्य) पंडित कहलवाता है (पर) है वह कोड़कू मोठ जैसा (जैसा उबालने पर गलता नहीं)। उसके मन में मोह (प्रबल) है। उस पण्डित की (विद्या वाली) सारी दौड़-भाग झूठ-मूठ है (क्योंकि) उसको सदा माया की ही झाक लगी रहती है। यदि उसे कोई ये अस्लियत बताए तो उसको खिझ चढ़ती है (क्योंकि शास्त्र आदि पढ़ के भी) उसके मन में गुस्सा बहुत है। (ऐसा पंडित असल में) बुरी कोझी मति का मारा हुआ महा मूर्ख होता है क्योंकि उसके मन में माया का मोह (बलवान) है। ऐसे ठॅग के साथ एक और ऐसा ही ठॅग मिल जाता है। दोनों का बाखूब मेल बन जाता है। जब सर्राफ़ सतिगुरू ध्यान से परख करता है तो (ये बाहर से विद्या से चमकता सोना दिखने वाला। पर अंदर से) लोहा उघड़ आता है। कई जगह चाहे इसे मिला मिला के रखें। पर इसका पाज खुल के अस्लियत सामने आ ही जाती है। (ऐसा व्यक्ति भी) यदि सतिगुरू की शरण में आ जाए तो जले हुए लोहे से (जंग लगे लोहे से) सोना बन जाता है। सतिगुरू को किसी के साथ वैर नहीं। उसको पुत्र और वैरी एक समान ही प्यारे लगते हैं (अगर कोई भी उसकी शरण आए उसके) अवगुण काट के (गुरू) उसके शरीर को शुद्ध कर देता है। हे नानक ! जिस मनुष्य के माथे पर धुर से लेख लिखें हों। उसका गुरू से प्रेम बनता है;
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 960 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 960 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।