जिसु तू आवहि चिति तिस नो सदा सुख ॥
जिसु तू आवहि चिति तिसु जम नाहि दुख ॥
जिसु तू आवहि चिति तिसु कि काड़िआ ॥
जिस दा करता मित्रु सभि काज सवारिआ ॥
जिसु तू आवहि चिति सो परवाणु जनु ॥
जिसु तू आवहि चिति बहुता तिसु धनु ॥
जिसु तू आवहि चिति सो वड परवारिआ ॥
जिसु तू आवहि चिति तिनि कुल उधारिआ ॥6॥
अंदरहु अंना बाहरहु अंना कूड़ी कूड़ी गावै ॥
देही धोवै चक्र बणाए माइआ नो बहु धावै ॥
अंदरि मैलु न उतरै हउमै फिरि फिरि आवै जावै ॥
नींद विआपिआ कामि संतापिआ मुखहु हरि हरि कहावै ॥
बैसनो नामु करम हउ जुगता तुह कुटे किआ फलु पावै ॥
हंसा विचि बैठा बगु न बणई नित बैठा मछी नो तार लावै ॥
जा हंस सभा वीचारु करि देखनि ता बगा नालि जोड़ु कदे न आवै ॥
हंसा हीरा मोती चुगणा बगु डडा भालण जावै ॥
उडरिआ वेचारा बगुला मतु होवै मंञु लखावै ॥
जितु को लाइआ तित ही लागा किसु दोसु दिचै जा हरि एवै भावै ॥
सतिगुरु सरवरु रतनी भरपूरे जिसु प्रापति सो पावै ॥
सिख हंस सरवरि इकठे होए सतिगुर कै हुकमावै ॥
रतन पदारथ माणक सरवरि भरपूरे खाइ खरचि रहे तोटि न आवै ॥
सरवर हंसु दूरि न होई करते एवै भावै ॥
जन नानक जिस दै मसतकि भागु धुरि लिखिआ सो सिखु गुरू पहि आवै ॥
आपि तरिआ कुटंब सभि तारे सभा स्रिसटि छडावै ॥1॥
पंडितु आखाए बहुती राही कोरड़ मोठ जिनेहा ॥
अंदरि मोहु नित भरमि विआपिआ तिसटसि नाही देहा ॥
कूड़ी आवै कूड़ी जावै माइआ की नित जोहा ॥
सचु कहै ता छोहो आवै अंतरि बहुता रोहा ॥
विआपिआ दुरमति कुबुधि कुमूड़ा मनि लागा तिसु मोहा ॥
ठगै सेती ठगु रलि आइआ साथु भि इको जेहा ॥
सतिगुरु सराफु नदरी विचदो कढै तां उघड़ि आइआ लोहा ॥
बहुतेरी थाई रलाइ रलाइ दिता उघड़िआ पड़दा अगै आइ खलोहा ॥
सतिगुर की जे सरणी आवै फिरि मनूरहु कंचनु होहा ॥
सतिगुरु निरवैरु पुत्र सत्र समाने अउगण कटे करे सुधु देहा ॥
नानक जिसु धुरि मसतकि होवै लिखिआ तिसु सतिगुर नालि सनेहा ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे प्रभू !) दास नानक भी (आपके दर से) एक ख़ैर माँगता है- मुझे दीदार दे और मुझे मन में अपना प्यार बख्श।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।