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अंग 959

अंग
959
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
वडा साहिबु गुरू मिलाइआ जिनि तारिआ सगल जगतु ॥
मन कीआ इछा पूरीआ पाइआ धुरि संजोग ॥
नानक पाइआ सचु नामु सद ही भोगे भोग ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: वह बड़ा मालिक जिसने सारे संसार का उद्धार किया है (भाव। जो सारे संसार के उद्धार में समर्थ है) मुझे गुरू ने मिलाया है। उसके मन की सब कामनाएं पूरी हो जाती हैं (भाव। वह वासना-रहित हो जाता है) जिसको धुर से ये भाग्य बनता है उसको हे नानक ! प्रभू का सदा-स्थिर रहने वाला नाम मिलता है। और वह सदा ही आनंद पाता है (सदा ही खिला रहता है)। 1।
मः 5 ॥
मनमुखा केरी दोसती माइआ का सनबंधु ॥
वेखदिआ ही भजि जानि कदे न पाइनि बंधु ॥
जिचरु पैननि खावन॑े तिचरु रखनि गंढु ॥
जितु दिनि किछु न होवई तितु दिनि बोलनि गंधु ॥
जीअ की सार न जाणनी मनमुख अगिआनी अंधु ॥
कूड़ा गंढु न चलई चिकड़ि पथर बंधु ॥
अंधे आपु न जाणनी फकड़ु पिटनि धंधु ॥
झूठै मोहि लपटाइआ हउ हउ करत बिहंधु ॥
क्रिपा करे जिसु आपणी धुरि पूरा करमु करेइ ॥
जन नानक से जन उबरे जो सतिगुर सरणि परे ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ मन के पीछे चलने वाले लोगों की मित्रता निरी माया की खातिर ही ताना-बाना होता है। वह कभी (मित्रता की) पक्की गाँठ नहीं डालते। जल्दी ही साथ छोड़ जाते हैं। मनमुख को जब तक पहनने-खाने को मिलता रहे तब तक ही जोड़ के रखते हैं। जिस दिन उनके खाने-पहनने की बात रास नहीं आती। उस दिन वे फीके बोल बोलने लगते हैं; अंधे ज्ञान-हीन मनुष्यों को (सिर्फ शरीर का ही फिक्र रहता है) आत्मा की कोई सूझ नहीं होती। मनमुखों का कच्चा ताना-बाना (बहुत समय तक) नहीं चलता जैसे कीचड़ से बंधा हुआ पत्थरों का बाँध (जल्दी ही गिर जाता है); अंधे मनमुख अपने असल को नहीं समझते (सिर्फ बाहरी) व्यर्थ की व्यथा को रोते-पीटते रहते हैं। निकम्मे मोह में फंसे हुए मनमुखों की उम्र ‘मैं मैं’ करते हुए गुजर जाती है। हे नानक ! जिस-जिस मनुष्य पर प्रभू अपनी कृपा करता है। धुर से ही पूरी बख्शिश करता है वह लोग (इस झूठे मोह में से) बच जाते हैं। वे सतिगुरू की शरण पड़ते हैं। 2।
पउड़ी ॥
जो रते दीदार सेई सचु हाकु ॥
जिनी जाता खसमु किउ लभै तिना खाकु ॥
मनु मैला वेकारु होवै संगि पाकु ॥
दिसै सचा महलु खुलै भरम ताकु ॥
जिसहि दिखाले महलु तिसु न मिलै धाकु ॥
मनु तनु होइ निहालु बिंदक नदरि झाकु ॥
नउ निधि नामु निधानु गुर कै सबदि लागु ॥
तिसै मिलै संत खाकु मसतकि जिसै भागु ॥5॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिन लोगों को प्रभू के दर्शन का रंग चढ़ गया है। उन्हें ही सच्चे प्रभू का रूप समझो। जिन्होंने पति-प्रभू के साथ सांझ डाल ली है। यतन करो कि किसी ना किसी तरह उनकी चरण-धूड़ मिल जाए। क्योंकि जो मन (विकारों से) मैला हो के विकार-रूप ही बन चुका है वह उनकी संगति में पवित्र हो जाता है। (उनकी संगति की बरकति से) प्रभू का दर दिखाई दे जाता है। और। भरम-भुलेखों के कारण (बंद होया हुआ आत्मिक) दरवाजा खुल जाता है। (पर ये प्रभू की अपनी मेहर ही है) जिसको अपना ठिकाना दिखा देता है। उसको (उसके उस ठिकाने से फिर) धक्का नहीं मिलता। उस प्रभू की मेहर की रक्ती भर भी निगाह से उसका तन-मन खिल उठता है। (हे भाई !) गुरू के शबद में जुड़। परमात्मा का नाम रूपी नौ खजाने (मिल जाएंगे)। जिसके माथे पर भाग्य जाग उठे। उसको गुरू के चरणों की धूल मिलती है। 5।
सलोक मः 5 ॥
हरणाखी कू सचु वैणु सुणाई जो तउ करे उधारणु ॥
सुंदर बचन तुम सुणहु छबीली पिरु तैडा मन साधारणु ॥
दुरजन सेती नेहु रचाइओ दसि विखा मै कारणु ॥
ऊणी नाही झूणी नाही नाही किसै विहूणी ॥
पिरु छैलु छबीला छडि गवाइओ दुरमति करमि विहूणी ॥
ना हउ भुली ना हउ चुकी ना मै नाही दोसा ॥
जितु हउ लाई तितु हउ लगी तू सुणि सचु संदेसा ॥
साई सोुहागणि साई भागणि जै पिरि किरपा धारी ॥
पिरि अउगण तिस के सभि गवाए गल सेती लाइ सवारी ॥
करमहीण धन करै बिनंती कदि नानक आवै वारी ॥
सभि सुहागणि माणहि रलीआ इक देवहु राति मुरारी ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे सुंदर जीव स्त्री ! मैं आपको एक सच्ची बात सुनाती हूँ जो आपका उद्धार करेगी। हे सुंदरी ! आप वह सुंदर बचन सुन- आपका पति-प्रभू मन को आसरा देने वाला है (उसको बिसार के) तूने दुर्जन से प्यार डाल लिया है। मुझे बता। मैं देखूँ इसका क्या कारण है। आप किसी बात में कम नहीं। किसी गुण की कमी नहीं। पर आप कर्मों की मारी ने बुरी मति के पीछे लग के सुंदर बाँका पति भुला दिया है। मैंने भूल नहीं की। मैंने कोई गलती नहीं की। मेरे में दोष नहीं। (हे सखी !) आप सच्चा उक्तर सुन ले- मुझे जिस तरफ उसने लगाया है। मैं उधर लगी हूँ। वही जीव-स्त्री सोहाग-भाग्य वाली हो सकती हैजिस पर पति ने स्वयं मेहर की है। पति-प्रभू ने उस स्त्री के सारे ही अवगुण दूर कर दिए हैं और उसको गले से लगा के सँवार दिया है। मैं भाग्यहीन जीव-स्त्री आरजू करती हूँ। मुझ नानक की कब बारी आएगी। हे प्रभू ! सारी सुहागनें मौजें कर रही हैं। मुझे भी (मिलने के लिए) एक रात दे। 1।
मः 5 ॥
काहे मन तू डोलता हरि मनसा पूरणहारु ॥
सतिगुरु पुरखु धिआइ तू सभि दुख विसारणहारु ॥
हरि नामा आराधि मन सभि किलविख जाहि विकार ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन रंगु लगा निरंकार ॥
ओनी छडिआ माइआ सुआवड़ा धनु संचिआ नामु अपारु ॥
अठे पहर इकतै लिवै मंनेनि हुकमु अपारु ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे मन ! आप क्यों डोलता है। परमात्मा आपकी कामना पूरी करने वाला है। गुरू को अकाल-पुरख को सिमर। वह सारे दुख नाश करने वाला है। हे मन ! प्रभू का नाम जप। आपके सारे पाप और विकार दूर हैं जाएंगे। जिनके माथे पर धुर से लेख लिखा हैं। उनके हृदय में परमात्मा का प्यार पैदा होता है। वे माया का बुरा चस्का छोड़ देते हैं। और बेअंत प्रभू का नाम-धन इकट्ठा करते हैं। वे आठों पहर एक प्रभू की ही याद में जुड़े रहते हैं। प्रभू का ही हुकम मानते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह बड़ा मालिक जिसने सारे संसार का उद्धार किया है (भाव।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।