मन कीआ इछा पूरीआ पाइआ धुरि संजोग ॥
नानक पाइआ सचु नामु सद ही भोगे भोग ॥1॥
मनमुखा केरी दोसती माइआ का सनबंधु ॥
वेखदिआ ही भजि जानि कदे न पाइनि बंधु ॥
जिचरु पैननि खावन॑े तिचरु रखनि गंढु ॥
जितु दिनि किछु न होवई तितु दिनि बोलनि गंधु ॥
जीअ की सार न जाणनी मनमुख अगिआनी अंधु ॥
कूड़ा गंढु न चलई चिकड़ि पथर बंधु ॥
अंधे आपु न जाणनी फकड़ु पिटनि धंधु ॥
झूठै मोहि लपटाइआ हउ हउ करत बिहंधु ॥
क्रिपा करे जिसु आपणी धुरि पूरा करमु करेइ ॥
जन नानक से जन उबरे जो सतिगुर सरणि परे ॥2॥
जो रते दीदार सेई सचु हाकु ॥
जिनी जाता खसमु किउ लभै तिना खाकु ॥
मनु मैला वेकारु होवै संगि पाकु ॥
दिसै सचा महलु खुलै भरम ताकु ॥
जिसहि दिखाले महलु तिसु न मिलै धाकु ॥
मनु तनु होइ निहालु बिंदक नदरि झाकु ॥
नउ निधि नामु निधानु गुर कै सबदि लागु ॥
तिसै मिलै संत खाकु मसतकि जिसै भागु ॥5॥
हरणाखी कू सचु वैणु सुणाई जो तउ करे उधारणु ॥
सुंदर बचन तुम सुणहु छबीली पिरु तैडा मन साधारणु ॥
दुरजन सेती नेहु रचाइओ दसि विखा मै कारणु ॥
ऊणी नाही झूणी नाही नाही किसै विहूणी ॥
पिरु छैलु छबीला छडि गवाइओ दुरमति करमि विहूणी ॥
ना हउ भुली ना हउ चुकी ना मै नाही दोसा ॥
जितु हउ लाई तितु हउ लगी तू सुणि सचु संदेसा ॥
साई सोुहागणि साई भागणि जै पिरि किरपा धारी ॥
पिरि अउगण तिस के सभि गवाए गल सेती लाइ सवारी ॥
करमहीण धन करै बिनंती कदि नानक आवै वारी ॥
सभि सुहागणि माणहि रलीआ इक देवहु राति मुरारी ॥1॥
काहे मन तू डोलता हरि मनसा पूरणहारु ॥
सतिगुरु पुरखु धिआइ तू सभि दुख विसारणहारु ॥
हरि नामा आराधि मन सभि किलविख जाहि विकार ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन रंगु लगा निरंकार ॥
ओनी छडिआ माइआ सुआवड़ा धनु संचिआ नामु अपारु ॥
अठे पहर इकतै लिवै मंनेनि हुकमु अपारु ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह बड़ा मालिक जिसने सारे संसार का उद्धार किया है (भाव।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।