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959
रामकली
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वडा साहिबु गुरू मिलाइआ जिनि तारिआ सगल जगतु ॥
वडा साहिबु गुरू मिलाइआ जिनि तारिआ सगल जगतु ॥
मन कीआ इछा पूरीआ पाइआ धुरि संजोग ॥
नानक पाइआ सचु नामु सद ही भोगे भोग ॥1॥
मन कीआ इछा पूरीआ पाइआ धुरि संजोग ॥
नानक पाइआ सचु नामु सद ही भोगे भोग ॥1॥
हिन्दी अर्थ: वह बड़ा मालिक जिसने सारे संसार का उद्धार किया है (भाव। जो सारे संसार के उद्धार में समर्थ है) मुझे गुरू ने मिलाया है। उसके मन की सब कामनाएं पूरी हो जाती हैं (भाव। वह वासना-रहित हो जाता है) जिसको धुर से ये भाग्य बनता है उसको हे नानक ! प्रभू का सदा-स्थिर रहने वाला नाम मिलता है। और वह सदा ही आनंद पाता है (सदा ही खिला रहता है)। 1।
मनमुखा केरी दोसती माइआ का सनबंधु ॥
मः 5 ॥
मनमुखा केरी दोसती माइआ का सनबंधु ॥
वेखदिआ ही भजि जानि कदे न पाइनि बंधु ॥
जिचरु पैननि खावन॑े तिचरु रखनि गंढु ॥
जितु दिनि किछु न होवई तितु दिनि बोलनि गंधु ॥
जीअ की सार न जाणनी मनमुख अगिआनी अंधु ॥
कूड़ा गंढु न चलई चिकड़ि पथर बंधु ॥
अंधे आपु न जाणनी फकड़ु पिटनि धंधु ॥
झूठै मोहि लपटाइआ हउ हउ करत बिहंधु ॥
क्रिपा करे जिसु आपणी धुरि पूरा करमु करेइ ॥
जन नानक से जन उबरे जो सतिगुर सरणि परे ॥2॥
मनमुखा केरी दोसती माइआ का सनबंधु ॥
वेखदिआ ही भजि जानि कदे न पाइनि बंधु ॥
जिचरु पैननि खावन॑े तिचरु रखनि गंढु ॥
जितु दिनि किछु न होवई तितु दिनि बोलनि गंधु ॥
जीअ की सार न जाणनी मनमुख अगिआनी अंधु ॥
कूड़ा गंढु न चलई चिकड़ि पथर बंधु ॥
अंधे आपु न जाणनी फकड़ु पिटनि धंधु ॥
झूठै मोहि लपटाइआ हउ हउ करत बिहंधु ॥
क्रिपा करे जिसु आपणी धुरि पूरा करमु करेइ ॥
जन नानक से जन उबरे जो सतिगुर सरणि परे ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ मन के पीछे चलने वाले लोगों की मित्रता निरी माया की खातिर ही ताना-बाना होती है। वह कभी (मित्रता की) पक्की गाँठ नहीं डालते। जल्दी ही साथ छोड़ जाते हैं। मनमुख को जब तक पहनने-खाने को मिलता रहे तब तक ही जोड़ के रखते हैं। जिस दिन उनके खाने-पहनने की बात रास नहीं आती। उस दिन वे फीके बोल बोलने लगते हैं; अंधे ज्ञान-हीन मनुष्यों को (सिर्फ शरीर का ही फिक्र रहता है) आत्मा की कोई सूझ नहीं होती। मनमुखों का कच्चा ताना-बाना (बहुत समय तक) नहीं चलता जैसे कीचड़ से बंधा हुआ पत्थरों का बाँध (जल्दी ही गिर जाता है); अंधे मनमुख अपने असल को नहीं समझते (सिर्फ बाहरी) व्यर्थ की व्यथा को रोते-पीटते रहते हैं। निकम्मे मोह में फंसे हुए मनमुखों की उम्र 'मैं मैं' करते हुए गुजर जाती है। हे नानक ! जिस-जिस मनुष्य पर प्रभू अपनी कृपा करता है। धुर से ही पूरी बख्शिश करता है वह लोग (इस झूठे मोह में से) बच जाते हैं। वे सतिगुरू की शरण पड़ते हैं। 2।
जो रते दीदार सेई सचु हाकु ॥
पउड़ी ॥
जो रते दीदार सेई सचु हाकु ॥
जिनी जाता खसमु किउ लभै तिना खाकु ॥
मनु मैला वेकारु होवै संगि पाकु ॥
दिसै सचा महलु खुलै भरम ताकु ॥
जिसहि दिखाले महलु तिसु न मिलै धाकु ॥
मनु तनु होइ निहालु बिंदक नदरि झाकु ॥
नउ निधि नामु निधानु गुर कै सबदि लागु ॥
तिसै मिलै संत खाकु मसतकि जिसै भागु ॥5॥
जो रते दीदार सेई सचु हाकु ॥
जिनी जाता खसमु किउ लभै तिना खाकु ॥
मनु मैला वेकारु होवै संगि पाकु ॥
दिसै सचा महलु खुलै भरम ताकु ॥
जिसहि दिखाले महलु तिसु न मिलै धाकु ॥
मनु तनु होइ निहालु बिंदक नदरि झाकु ॥
नउ निधि नामु निधानु गुर कै सबदि लागु ॥
तिसै मिलै संत खाकु मसतकि जिसै भागु ॥5॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिन लोगों को प्रभू के दर्शन का रंग चढ़ गया है। उन्हें ही सच्चे प्रभू का रूप समझो। जिन्होंने पति-प्रभू के साथ सांझ डाल ली है। यतन करें कि किसी ना किसी तरह उनकी चरण-धूड़ मिल जाए। क्योंकि जो मन (विकारों से) मैला हो के विकार-रूप ही बन चुका है वह उनकी संगति में पवित्र हो जाता है। (उनकी संगति की बरकति से) प्रभू का दर दिखाई दे जाता है। और। भरम-भुलेखों के कारण (बंद हुआ आत्मिक) दरवाजा खुल जाता है। (पर ये प्रभू की अपनी मेहर ही है) जिसको अपना ठिकाना दिखा देता है। उसको (उसके उस ठिकाने से फिर) धक्का नहीं मिलता। उस प्रभू की मेहर की रत्ती भर भी निगाह से उसका तन-मन खिल उठता है। (हे भाई !) गुरू के शबद में जुड़ें। परमात्मा का नाम रूपी नौ खजाने (मिल जाएंगे)। जिसके माथे पर भाग्य जाग उठे। उसको गुरू के चरणों की धूल मिलती है। 5।
हरणाखी कू सचु वैणु सुणाई जो तउ करे उधारणु ॥
सलोक मः 5 ॥
हरणाखी कू सचु वैणु सुणाई जो तउ करे उधारणु ॥
सुंदर बचन तुम सुणहु छबीली पिरु तैडा मन साधारणु ॥
दुरजन सेती नेहु रचाइओ दसि विखा मै कारणु ॥
ऊणी नाही झूणी नाही नाही किसै विहूणी ॥
पिरु छैलु छबीला छडि गवाइओ दुरमति करमि विहूणी ॥
ना हउ भुली ना हउ चुकी ना मै नाही दोसा ॥
जितु हउ लाई तितु हउ लगी तू सुणि सचु संदेसा ॥
साई सोुहागणि साई भागणि जै पिरि किरपा धारी ॥
पिरि अउगण तिस के सभि गवाए गल सेती लाइ सवारी ॥
करमहीण धन करै बिनंती कदि नानक आवै वारी ॥
सभि सुहागणि माणहि रलीआ इक देवहु राति मुरारी ॥1॥
हरणाखी कू सचु वैणु सुणाई जो तउ करे उधारणु ॥
सुंदर बचन तुम सुणहु छबीली पिरु तैडा मन साधारणु ॥
दुरजन सेती नेहु रचाइओ दसि विखा मै कारणु ॥
ऊणी नाही झूणी नाही नाही किसै विहूणी ॥
पिरु छैलु छबीला छडि गवाइओ दुरमति करमि विहूणी ॥
ना हउ भुली ना हउ चुकी ना मै नाही दोसा ॥
जितु हउ लाई तितु हउ लगी तू सुणि सचु संदेसा ॥
साई सोुहागणि साई भागणि जै पिरि किरपा धारी ॥
पिरि अउगण तिस के सभि गवाए गल सेती लाइ सवारी ॥
करमहीण धन करै बिनंती कदि नानक आवै वारी ॥
सभि सुहागणि माणहि रलीआ इक देवहु राति मुरारी ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे सुंदर जीव स्त्री ! मैं आपको एक सच्ची बात सुनाती हूँ जो आपका उद्धार करेगी। हे सुंदरी ! आप वह सुंदर बचन सुनें- आपका पति-प्रभू मन को आसरा देने वाला है (उसको बिसार के) आपने दुर्जन से प्यार डाल लिया है। मुझे बताएँ। मैं देखूँ इसका क्या कारण है। आप किसी बात में कम नहीं। किसी गुण की कमी नहीं। पर कर्मों की मारी आपने बुरी मति के पीछे लग के सुंदर बाँका पति भुला दिया है। मैंने भूल नहीं की। मैंने कोई गलती नहीं की। मेरे में दोष नहीं। (हे सखी !) आप सच्चा उत्तर सुन लें- मुझे जिस तरफ उसने लगाया है। मैं उधर लगी हूँ। वही जीव-स्त्री सोहाग-भाग्य वाली हो सकती है जिस पर पति ने स्वयं मेहर की है। पति-प्रभू ने उस स्त्री के सारे ही अवगुण दूर कर दिए हैं और उसको गले से लगा के सँवार दिया है। मैं भाग्यहीन जीव-स्त्री आरजू करती हूँ। मुझ नानक की कब बारी आएगी। हे प्रभू ! सारी सुहागनें मौजें कर रही हैं। मुझे भी (मिलने के लिए) एक रात दें। 1।
काहे मन तू डोलता हरि मनसा पूरणहारु ॥
मः 5 ॥
काहे मन तू डोलता हरि मनसा पूरणहारु ॥
सतिगुरु पुरखु धिआइ तू सभि दुख विसारणहारु ॥
हरि नामा आराधि मन सभि किलविख जाहि विकार ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन रंगु लगा निरंकार ॥
ओनी छडिआ माइआ सुआवड़ा धनु संचिआ नामु अपारु ॥
अठे पहर इकतै लिवै मंनेनि हुकमु अपारु ॥
काहे मन तू डोलता हरि मनसा पूरणहारु ॥
सतिगुरु पुरखु धिआइ तू सभि दुख विसारणहारु ॥
हरि नामा आराधि मन सभि किलविख जाहि विकार ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन रंगु लगा निरंकार ॥
ओनी छडिआ माइआ सुआवड़ा धनु संचिआ नामु अपारु ॥
अठे पहर इकतै लिवै मंनेनि हुकमु अपारु ॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे मन ! आप क्यों डोलते हैं। परमात्मा आपकी कामना पूरी करने वाला है। गुरू को अकाल-पुरख को सिमरें। वह सारे दुख नाश करने वाला है। हे मन ! प्रभू का नाम जपें। आपके सारे पाप और विकार दूर हो जाएंगे। जिनके माथे पर धुर से लेख लिखा है। उनके हृदय में परमात्मा का प्यार पैदा होता है। वे माया का बुरा चस्का छोड़ देते हैं। और बेअंत प्रभू का नाम-धन इकट्ठा करते हैं। वे आठों पहर एक प्रभू की ही याद में जुड़े रहते हैं। प्रभू का ही हुकम मानते हैं।
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 959 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 959 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।