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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 958 · रामकली

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अंग
958
रामकली
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  1. विणु तुधु होरु जि मंगणा सिरि दुखा कै दुख ॥
  2. सो ऐसा दातारु मनहु न वीसरै ॥
  3. धंनु सु राग सुरंगड़े आलापत सभ तिख जाइ ॥
  4. धंनु सु वेला घड़ी धंनु धनु मूरतु पलु सारु ॥
  5. सिफति सलाहणु भगति विरले दितीअनु ॥
  6. हरि इकसै नालि मै दोसती हरि इकसै नालि मै रंगु ॥

विणु तुधु होरु जि मंगणा सिरि दुखा कै दुख ॥

मः 5 ॥
विणु तुधु होरु जि मंगणा सिरि दुखा कै दुख ॥
देहि नामु संतोखीआ उतरै मन की भुख ॥
गुरि वणु तिणु हरिआ कीतिआ नानक किआ मनुख ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे प्रभू ! आपके नाम के बिना (आपसे) कुछ और माँगना भारी दुख सहने के तुल्य है; (हे प्रभू !) मुझे अपना नाम दे ता कि मुझे संतोख आ जाए और मेरे मन की तृष्णा समाप्त हो जाए। हे नानक ! जिस गुरू ने जंगल और (जंगल की सूखी) घास हरी कर दी। मनुष्य को हरा करना उसके लिए कौन सी बड़ी बात है। 2।

सो ऐसा दातारु मनहु न वीसरै ॥

पउड़ी ॥
सो ऐसा दातारु मनहु न वीसरै ॥
घड़ी न मुहतु चसा तिसु बिनु ना सरै ॥
अंतरि बाहरि संगि किआ को लुकि करै ॥
जिसु पति रखै आपि सो भवजलु तरै ॥
भगतु गिआनी तपा जिसु किरपा करै ॥
सो पूरा परधानु जिस नो बलु धरै ॥
जिसहि जराए आपि सोई अजरु जरै ॥
तिस ही मिलिआ सचु मंत्रु गुर मनि धरै ॥3॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ ऐसी दातें देने वाला प्रभू मन से भूलना नहीं चाहिए। (क्योंकि) उसके बिना (उसको भुला के। जिंदगी की) घड़ी दो घड़ियाँ पल आदि (थोड़ा भी समय) आसान नहीं गुजरता। प्रभू जीव के (सदा) अंदर (बसता है।) उसके बाहर (चौगिर्दे भी) मौजूद है। कोई जीव कोई काम उससे लुका-छिपा के नहीं कर सकता। वही मनुष्य संसार-समुंद्र से पार लांघता है (संसार के विकारों से बचता है) जिसकी इज्जत की रक्षा प्रभू स्वयं करता है। वही भगत है। वही ज्ञानवान है। वही तपस्वी है। जिस पर प्रभू मेहर करता है। जिसको (विकारों का मुकाबला करने के लिए) प्रभू (आत्मिक) ताकत बख्शता है। उसकी कमाई सफल हो जाती है। वह आदर पाता है। (वैसे मानसिक ताकत भी एक ऐसी अवस्था है जिसकी प्राप्ति पर संभलने की बहुत आवश्यक्ता होती है। आम तौर पर मनुष्य रिद्धियों-सिद्धियों की ओर पलट जाता है) इस डाँवाडोल करने वाली अवस्था में वही मनुष्य संभलता है। जिसको प्रभू स्वयं संभलने की सहायता दे। जो मनुष्य गुरू का उपदेश हृदय में टिकाता है। उसको सदा-स्थिर प्रभू मिलता है। 3।

धंनु सु राग सुरंगड़े आलापत सभ तिख जाइ ॥

सलोकु मः 5 ॥
धंनु सु राग सुरंगड़े आलापत सभ तिख जाइ ॥
धंनु सु जंत सुहावड़े जो गुरमुखि जपदे नाउ ॥
जिनी इक मनि इकु अराधिआ तिन सद बलिहारै जाउ ॥
तिन की धूड़ि हम बाछदे करमी पलै पाइ ॥
जो रते रंगि गोविद कै हउ तिन बलिहारै जाउ ॥
आखा बिरथा जीअ की हरि सजणु मेलहु राइ ॥
गुरि पूरै मेलाइआ जनम मरण दुखु जाइ ॥
जन नानक पाइआ अगम रूपु अनत न काहू जाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ वह सुंदर राग मुबारक हैं जिनके गाने से (मन की) तृष्णा नाश हो जाए। वे सुंदर जीव भाग्यशाली हैं जो गुरू के सन्मुख हो के प्रभू का नाम जपते हैं। मैं उन लोगों से सदा सदके हूँ जो एक-मन हो के प्रभू को सिमरते हैं। हम (मैं) उनके चरणों की धूड़ चाहते हैं (चाहता हूँ)। पर ये धूड़ प्रभू की मेहर से मिलती है। जो मनुष्य परमात्मा के प्यार में रंगे हुए हैं। मैं उनसे कुर्बान हूँ मैं उनके आगे दिल का दुख बताता हॅूँ (और कहता हॅूँ कि) मुझे प्यारा प्रभू पातशाह मिलाओ। जिस मनुष्य को पूरे सतिगुरू ने प्रभू मिला दिया उसका सारी उम्र का दुख-कलेश मिट जाता है। और। हे नानक ! उस मनुष्य को अपहुँच प्रभू मिल जाता है और वह किसी और तरफ नहीं भटकता। 1।

धंनु सु वेला घड़ी धंनु धनु मूरतु पलु सारु ॥

मः 5 ॥
धंनु सु वेला घड़ी धंनु धनु मूरतु पलु सारु ॥
धंनु सु दिनसु संजोगड़ा जितु डिठा गुर दरसारु ॥
मन कीआ इछा पूरीआ हरि पाइआ अगम अपारु ॥
हउमै तुटा मोहड़ा इकु सचु नामु आधारु ॥
जनु नानकु लगा सेव हरि उधरिआ सगल संसारु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ वह वक्त वह घड़ी भाग्यशाली हैं। वह महूरत मुबारक है। वह पल सोहाना है। वह दिन और वह संजोग मुबारक हैं जब सतिगुरू के दर्शन होते हैं। (सतिगुरू के दीदार की बरकति से) मन की सारी तमन्नाएं पूरी हो जाती हैं (भाव। मन वासना-रहित हो जाता है) और अगम-बेअंत प्रभू मिल जाता है। अहंम् नाश हो जाता है। मोह समाप्त हो जाता है और प्रभू का सदा कायम रहने वाला नाम ही (जीवन का) आसरा बन जाता है। दास नानक भी (गुरू के दीदार की बरकति से ही) प्रभू के सिमरान में लगा है (जिस सिमरन के सदका) सारा जगत (विकार आदि से) बच जाता है। 2।

सिफति सलाहणु भगति विरले दितीअनु ॥

पउड़ी ॥
सिफति सलाहणु भगति विरले दितीअनु ॥
सउपे जिसु भंडार फिरि पुछ न लीतीअनु ॥
जिस नो लगा रंगु से रंगि रतिआ ॥
ओना इको नामु अधारु इका उन भतिआ ॥
ओना पिछै जगु भुंचै भोगई ॥
ओना पिआरा रबु ओनाहा जोगई ॥
जिसु मिलिआ गुरु आइ तिनि प्रभु जाणिआ ॥
हउ बलिहारी तिन जि खसमै भाणिआ ॥4॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सिफत-सालाह और भगती (की दाति) उस (प्रभू) ने किसी विरले (भाग्यशाली) को दी है। जिस (मनुष्य) को उसने (सिफतसालाह के) खजाने सौंपे हैं; उससे फिर किए कर्मों का लेखा नहीं मांगा। क्योंकि जिस-जिस मनुष्य को (सिफतसालाह से) इश्क-मुहब्बत हो गई। वह उसी रंग में (सदा के लिए) रंगे गए। प्रभू की याद ही उनकी जिंदगी का आसरा बन जाता है यही एक नाम उनकी (आत्मिक) खुराक हो जाता है। ऐसे लोगों के पद्चिन्हों पर चल के (सारा) जगत (सिफतसालाह की) खुराक खाता है भोगता है। उन्हें ईश्वर (इतना) प्यारा लगता है कि ईश्वर उनके प्यार के वश में हो जाता है। पर प्रभू से (सिर्फ) उस मनुष्य ने जान-पहचान बनाई है जिसे गुरू आ के मिल गया है। मैं सदके हूँ उन (सौभाग्यशाली) लोगों पर से जो पति-प्रभू को भा गए हैं। 4।

हरि इकसै नालि मै दोसती हरि इकसै नालि मै रंगु ॥

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सलोक मः 5 ॥
हरि इकसै नालि मै दोसती हरि इकसै नालि मै रंगु ॥
हरि इको मेरा सजणो हरि इकसै नालि मै संगु ॥
हरि इकसै नालि मै गोसटे मुहु मैला करै न भंगु ॥
जाणै बिरथा जीअ की कदे न मोड़ै रंगु ॥
हरि इको मेरा मसलती भंनण घड़न समरथु ॥
हरि इको मेरा दातारु है सिरि दातिआ जग हथु ॥
हरि इकसै दी मै टेक है जो सिरि सभना समरथु ॥
सतिगुरि संतु मिलाइआ मसतकि धरि कै हथु ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ मेरी एक प्रभू के साथ ही मित्रता है। सिर्फ प्रभू से ही मेरा प्यार है। केवल प्रभू ही मेरा सच्चा मित्र है एक प्रभू से ही मेरा सच्चा साथ है। और केवल प्रभू से ही मेरा मेल-जोल है। (क्योंकि) वह प्रभू कभी मुँह मोटा नहीं करता। कभी माथे पर त्योड़ी नहीं डालता। मेरे दिल की वेदना को समझता है। वह कभी मेरे प्यार को धक्का नहीं देता। (सब जीवों को) पैदा करने वाला और मारने की ताकत रखने वाला एक परमात्मा ही मेरा सलाहकार है; जगत के सब दानियों के सिर पर जिस प्रभू का हाथ है केवल वही मुझे दातें देने वाला है। जो परमात्मा सब जीवों के सिर पर बली है मुझे केवल उसी का आसरा है। वह शांति का श्रोत परमात्मा सतिगुरू ने मेरे माथे पर हाथ रख के मुझे मिलाया है।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 958 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 958 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।