विणु तुधु होरु जि मंगणा सिरि दुखा कै दुख ॥
देहि नामु संतोखीआ उतरै मन की भुख ॥
गुरि वणु तिणु हरिआ कीतिआ नानक किआ मनुख ॥2॥
सो ऐसा दातारु मनहु न वीसरै ॥
घड़ी न मुहतु चसा तिसु बिनु ना सरै ॥
अंतरि बाहरि संगि किआ को लुकि करै ॥
जिसु पति रखै आपि सो भवजलु तरै ॥
भगतु गिआनी तपा जिसु किरपा करै ॥
सो पूरा परधानु जिस नो बलु धरै ॥
जिसहि जराए आपि सोई अजरु जरै ॥
तिस ही मिलिआ सचु मंत्रु गुर मनि धरै ॥3॥
धंनु सु राग सुरंगड़े आलापत सभ तिख जाइ ॥
धंनु सु जंत सुहावड़े जो गुरमुखि जपदे नाउ ॥
जिनी इक मनि इकु अराधिआ तिन सद बलिहारै जाउ ॥
तिन की धूड़ि हम बाछदे करमी पलै पाइ ॥
जो रते रंगि गोविद कै हउ तिन बलिहारै जाउ ॥
आखा बिरथा जीअ की हरि सजणु मेलहु राइ ॥
गुरि पूरै मेलाइआ जनम मरण दुखु जाइ ॥
जन नानक पाइआ अगम रूपु अनत न काहू जाइ ॥1॥
धंनु सु वेला घड़ी धंनु धनु मूरतु पलु सारु ॥
धंनु सु दिनसु संजोगड़ा जितु डिठा गुर दरसारु ॥
मन कीआ इछा पूरीआ हरि पाइआ अगम अपारु ॥
हउमै तुटा मोहड़ा इकु सचु नामु आधारु ॥
जनु नानकु लगा सेव हरि उधरिआ सगल संसारु ॥2॥
सिफति सलाहणु भगति विरले दितीअनु ॥
सउपे जिसु भंडार फिरि पुछ न लीतीअनु ॥
जिस नो लगा रंगु से रंगि रतिआ ॥
ओना इको नामु अधारु इका उन भतिआ ॥
ओना पिछै जगु भुंचै भोगई ॥
ओना पिआरा रबु ओनाहा जोगई ॥
जिसु मिलिआ गुरु आइ तिनि प्रभु जाणिआ ॥
हउ बलिहारी तिन जि खसमै भाणिआ ॥4॥
हरि इकसै नालि मै दोसती हरि इकसै नालि मै रंगु ॥
हरि इको मेरा सजणो हरि इकसै नालि मै संगु ॥
हरि इकसै नालि मै गोसटे मुहु मैला करै न भंगु ॥
जाणै बिरथा जीअ की कदे न मोड़ै रंगु ॥
हरि इको मेरा मसलती भंनण घड़न समरथु ॥
हरि इको मेरा दातारु है सिरि दातिआ जग हथु ॥
हरि इकसै दी मै टेक है जो सिरि सभना समरथु ॥
सतिगुरि संतु मिलाइआ मसतकि धरि कै हथु ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 5॥ हे प्रभू ! आपके नाम के बिना (आपसे) कुछ और माँगना भारी दुख सहने के तुल्य है; (हे प्रभू !) मुझे अपना नाम दे ता कि मुझे संतोख आ जाए और मेरे मन की तृष्णा समाप्त हो जाए।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।