Lulla Family

अंग 957

अंग
957
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रामकली की वार महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रामकली की वार महला 5 सतिगुर प्रसादि॥
सलोक मः 5 ॥
जैसा सतिगुरु सुणीदा तैसो ही मै डीठु ॥
विछुड़िआ मेले प्रभू हरि दरगह का बसीठु ॥
हरि नामो मंत्रु द्रिड़ाइदा कटे हउमै रोगु ॥
नानक सतिगुरु तिना मिलाइआ जिना धुरे पइआ संजोगु ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ सतिगुरू (के बारे में) जिस प्रकार का सुनते थे। वैसा ही मैंने (आँखों से) देख लिया है। गुरू प्रभू की हजूरी का बिचौला है। प्रभू से विछुड़ों को (दोबारा) प्रभू से मिला देता है। प्रभू के नाम सिमरन का उपदेश (जीव के हृदय में) दृढ़ कर देता है (और इस तरह उसका) अहंकार का रोग दूर कर देता है। पर। हे नानक ! प्रभू उनको ही गुरू से मिलाता है जिनके भाग्यों में धुर से ही ये मेल लिखा होता है। 1।
मः 5 ॥
इकु सजणु सभि सजणा इकु वैरी सभि वादि ॥
गुरि पूरै देखालिआ विणु नावै सभ बादि ॥
साकत दुरजन भरमिआ जो लगे दूजै सादि ॥
जन नानकि हरि प्रभु बुझिआ गुर सतिगुर कै परसादि ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ अगर एक प्रभू मित्र बन जाए तो सारे जीव मित्र बन जाते हैं; पर अगर एक अकाल-पुरख वैरी हो जाए तो सारे जीव वैरी बन जाते हैं (भाव। एक प्रभू को मित्र बनाने से सारे जीव प्यारे लगते हैं। और प्रभू से विछुड़ने पर जगत के सारे जीवों से दूरी बन जाती है)। ये बात पूरे गुरू ने दिखा दी है कि नाम-सिमरन के बिना (प्रभू को सज्जन बनाए बिना) और हरेक कार्य व्यर्थ है। (क्योंकि) ईश्वर से टूटे हुए विकारी व्यक्ति जो माया के स्वाद में मस्त रहते हैं वे भटकते फिरते हैं। दास नानक ने सतिगुरू की मेहर का सदका परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल ली है। 2।
पउड़ी ॥
थटणहारै थाटु आपे ही थटिआ ॥
आपे पूरा साहु आपे ही खटिआ ॥
आपे करि पासारु आपे रंग रटिआ ॥
कुदरति कीम न पाइ अलख ब्रहमटिआ ॥
अगम अथाह बेअंत परै परटिआ ॥
आपे वड पातिसाहु आपि वजीरटिआ ॥
कोइ न जाणै कीम केवडु मटिआ ॥
सचा साहिबु आपि गुरमुखि परगटिआ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ बनाने वाले (प्रभू) ने खुद ही ये (जगत-) रचना बनाई है। (इस जगत-हाट में) वह खुद ही पूरा शाह है। और खुद ही (अपने नाम की) कमाई कमा रहा है। प्रभू खुद ही (जगत-) पसारा पसार के खुद ही (इस पसारे के) रंगों में मिला हुआ है। उस अलख परमात्मा की रची हुई कुरदति का मूल्य नहीं डाला जा सकता। प्रभू अपहुँच है। (वह एक ऐसा समुंद्र है जिसकी) गहराई मापी नहीं जा सकती। उसका अंत नहीं पाया जा सकता। वह परे से परे है। प्रभू स्वयं ही बहुत बड़ा पातशाह है। स्वयं ही अपना सलाहकार है। कोई जीव प्रभू की बुजुर्गी का मूल्य नहीं डाल सकता। कोई नहीं जानता उसका कितना बड़ा (ऊँचा) ठिकाना है। प्रभू स्वयं ही सदा स्थिर रहने वाला मालिक है। गुरू के द्वारा ही उसके बारे में समझ पड़ती है। 1।
सलोकु मः 5 ॥
सुणि सजण प्रीतम मेरिआ मै सतिगुरु देहु दिखालि ॥
हउ तिसु देवा मनु आपणा नित हिरदै रखा समालि ॥
इकसु सतिगुर बाहरा ध्रिगु जीवणु संसारि ॥
जन नानक सतिगुरु तिना मिलाइओनु जिन सद ही वरतै नालि ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे मेरे प्यारे सज्जन प्रभू ! (मेरी विनती) सुन। मुझे गुरू के दीदार करा दे; मैं गुरू को अपना मन दे दूँगा और उसको सदा अपने हृदय में संभाल के रखूँगा। (क्योंकि) एक गुरू के बिना जगत में जीना धिक्कारयोग्य है (गुरू के बताए हुए राह पर चले बिना जगत में धिक्कारना ही मिलती हैं)। हे दास नानक ! उस (प्रभू) ने उन (भाग्यशालियों) को गुरू मिलाया है। जिनके साथ प्रभू स्वयं बसता है। 1।
मः 5 ॥
मेरै अंतरि लोचा मिलण की किउ पावा प्रभ तोहि ॥
कोई ऐसा सजणु लोड़ि लहु जो मेले प्रीतमु मोहि ॥
गुरि पूरै मेलाइआ जत देखा तत सोइ ॥
जन नानक सो प्रभु सेविआ तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे प्रभू ! मेरे हृदय में आपको मिलने की तमन्ना है। आपको कैसे मिलूँ। (हे भाई !) मुझे कोई ऐसा मित्र ढूँढ दो जो मुझे प्यारे प्रभू से मिला दे। (मेरी आरजू सुन के) पूरे गुरू ने मुझे प्रभू से मिला दिया है। (अब) मैं जिधर देखता हूँ उधर ही प्रभू दिखाई देता है। हे दास नानक ! (कह-) मैं अब उस प्रभू को सिमरता हूँ। उस प्रभू के बराबर का कोई और नहीं। 2।
पउड़ी ॥
देवणहारु दातारु कितु मुखि सालाहीऐ ॥
जिसु रखै किरपा धारि रिजकु समाहीऐ ॥
कोइ न किस ही वसि सभना इक धर ॥
पाले बालक वागि दे कै आपि कर ॥
करदा अनद बिनोद किछू न जाणीऐ ॥
सरब धार समरथ हउ तिसु कुरबाणीऐ ॥
गाईऐ राति दिनंतु गावण जोगिआ ॥
जो गुर की पैरी पाहि तिनी हरि रसु भोगिआ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (सब जीवों को रिजक) देने वाले प्रभू को किसी मुँह से भी सराहा नहीं जा सकता (कोई भी जीव उसकी सिफत पूरी तरह नहीं कर सकता)। प्रभू मेहर करके जिस जीव की रक्षा करता है उसको रिजक पहुँचाता है। (दरअसल) कोई जीव किसी (और जीव) के आसरे नहीं। सब जीवों का आसरा एक परमात्मा ही है। वह स्वयं ही (अपना) हाथ दे के बालक की तरह पालता है। प्रभू स्वयं ही चोज-तमाशे कर रहा है। (उसके इन चोज-तमाशों की) कोई समझ नहीं पड़ सकती। मैं सदके हॅूँ उस प्रभू से जो सब जीवों का आसरा है और सब कुछ करने की ताकत रखता है। रात-दिन प्रभू की उस्तति करनी चाहिए। परमात्मा ही एक ऐसी हस्ती है जिसके गुण गाने चाहिए। (पर) उन लोगों ने प्रभू (के गुण गाने) का आनंद पाया है जो सतिगुरू के चरणों में पड़ते हैं। 2।
सलोक मः 5 ॥
भीड़हु मोकलाई कीतीअनु सभ रखे कुटंबै नालि ॥
कारज आपि सवारिअनु सो प्रभ सदा सभालि ॥
प्रभु मात पिता कंठि लाइदा लहुड़े बालक पालि ॥
दइआल होए सभ जीअ जंत्र हरि नानक नदरि निहाल ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (हे मन !) उस प्रभू को सदा याद कर जो आपके सारे काम आप सवाँरता है। जो आपको दुखों से खलासी देता है और आपके सारे परिवार समेत आपकी रक्षा करता है। माता-पिता की तरह अंजाने बालकों को पाल के प्रभू (जीवों को) गले से लगाता है। हे नानक ! जिस मनुष्य की ओर प्रभू मेहर की निगाह से देखता है। उस पर सब जीव दयालु हो जाते हैं। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रामकली की वार महला 5 सतिगुर प्रसादि॥।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।