ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जैसा सतिगुरु सुणीदा तैसो ही मै डीठु ॥
विछुड़िआ मेले प्रभू हरि दरगह का बसीठु ॥
हरि नामो मंत्रु द्रिड़ाइदा कटे हउमै रोगु ॥
नानक सतिगुरु तिना मिलाइआ जिना धुरे पइआ संजोगु ॥1॥
इकु सजणु सभि सजणा इकु वैरी सभि वादि ॥
गुरि पूरै देखालिआ विणु नावै सभ बादि ॥
साकत दुरजन भरमिआ जो लगे दूजै सादि ॥
जन नानकि हरि प्रभु बुझिआ गुर सतिगुर कै परसादि ॥2॥
थटणहारै थाटु आपे ही थटिआ ॥
आपे पूरा साहु आपे ही खटिआ ॥
आपे करि पासारु आपे रंग रटिआ ॥
कुदरति कीम न पाइ अलख ब्रहमटिआ ॥
अगम अथाह बेअंत परै परटिआ ॥
आपे वड पातिसाहु आपि वजीरटिआ ॥
कोइ न जाणै कीम केवडु मटिआ ॥
सचा साहिबु आपि गुरमुखि परगटिआ ॥1॥
सुणि सजण प्रीतम मेरिआ मै सतिगुरु देहु दिखालि ॥
हउ तिसु देवा मनु आपणा नित हिरदै रखा समालि ॥
इकसु सतिगुर बाहरा ध्रिगु जीवणु संसारि ॥
जन नानक सतिगुरु तिना मिलाइओनु जिन सद ही वरतै नालि ॥1॥
मेरै अंतरि लोचा मिलण की किउ पावा प्रभ तोहि ॥
कोई ऐसा सजणु लोड़ि लहु जो मेले प्रीतमु मोहि ॥
गुरि पूरै मेलाइआ जत देखा तत सोइ ॥
जन नानक सो प्रभु सेविआ तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥2॥
देवणहारु दातारु कितु मुखि सालाहीऐ ॥
जिसु रखै किरपा धारि रिजकु समाहीऐ ॥
कोइ न किस ही वसि सभना इक धर ॥
पाले बालक वागि दे कै आपि कर ॥
करदा अनद बिनोद किछू न जाणीऐ ॥
सरब धार समरथ हउ तिसु कुरबाणीऐ ॥
गाईऐ राति दिनंतु गावण जोगिआ ॥
जो गुर की पैरी पाहि तिनी हरि रसु भोगिआ ॥2॥
भीड़हु मोकलाई कीतीअनु सभ रखे कुटंबै नालि ॥
कारज आपि सवारिअनु सो प्रभ सदा सभालि ॥
प्रभु मात पिता कंठि लाइदा लहुड़े बालक पालि ॥
दइआल होए सभ जीअ जंत्र हरि नानक नदरि निहाल ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रामकली की वार महला 5 सतिगुर प्रसादि॥।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।