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अंग 956

अंग
956
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सचु पुराणा होवै नाही सीता कदे न पाटै ॥
नानक साहिबु सचो सचा तिचरु जापी जापै ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (पर) प्रभू का नाम (-रूपी पटोला) कभी पुराना नहीं होता। (नाम से) सिला हुआ कभी फटता नहीं (उस प्रभू से जुड़ा हुआ मन उससे कभी टूटता नहीं)। हे नानक ! प्रभू-पति सदा कायम रहने वाला है। पर इस बात की समझ तब ही पड़ती है जब उसको सिमरें। 1।
मः 1 ॥
सच की काती सचु सभु सारु ॥
घाड़त तिस की अपर अपार ॥
सबदे साण रखाई लाइ ॥
गुण की थेकै विचि समाइ ॥
तिस दा कुठा होवै सेखु ॥
लोहू लबु निकथा वेखु ॥
होइ हलालु लगै हकि जाइ ॥
नानक दरि दीदारि समाइ ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ अगर प्रभू के नाम की छुरी हो। प्रभू का नाम ही (उस छुरी का) सारा लोहा हो। उस छुरी की संरचना बहुत सुंदर होती है; ये छुरी सतिगुरू के शबद की सान पर रख कर तेज (धार) की जाती है। और ये प्रभू के गुणों की म्यान में टिकी रहती है। अगर शेख इस छुरी का कुठा हुआ हो (भाव। अगर ‘शेख’ का जीवन प्रभू के नाम। सतिगुरू के शबद और प्रभू की सिफत-सालाह में घड़ा हुआ हो) तो उसके अंदर से लालच रूपी लहू अवश्य निकल जाता है। इस तरह हलाल हो के (कुठा जा के) वह प्रभू में जुड़ता है। और। हे नानक ! प्रभू के दर पर (पहुँच के) उसके दर्शन में लीन हो जाता है। 2।
मः 1 ॥
कमरि कटारा बंकुड़ा बंके का असवारु ॥
गरबु न कीजै नानका मतु सिरि आवै भारु ॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ कमर पर सुंदर सी कटार हो और सुंदर घोड़े पर सवार हो। (फिर भी) हे नानक ! गुमान ना करें। (क्या पता है) मत कहीं सिर के बल ही गिर ही ना पड़े। 3।
पउड़ी ॥
सो सतसंगति सबदि मिलै जो गुरमुखि चलै ॥
सचु धिआइनि से सचे जिन हरि खरचु धनु पलै ॥
भगत सोहनि गुण गावदे गुरमति अचलै ॥
रतन बीचारु मनि वसिआ गुर कै सबदि भलै ॥
आपे मेलि मिलाइदा आपे देइ वडिआई ॥19॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है वह साध-संगति में आ के गुरू के शबद में जुड़ता है। जिन मनुष्यों के पल्ले प्रभू का नाम-रूपी धन है (जिंदगी के सफर के लिए) खर्च है वह सदा कायम रहने वाले प्रभू को सिमरते हैं और उसी का रूप हो जाते हैं। बँदगी करने वाले लोग प्रभू के गुण गाते हैं और सुंदर लगते हैं। सतिगुरू की मति को ले के वे अडोल हो जाते हैं। सतिगुरू के सोहाने शबद के द्वारा उनके मन में प्रभू के श्रेष्ठ नाम की विचार आ बसती है। (भगत जनों को) प्रभू खुद ही अपने में मिलाता है। स्वयं ही उनको शोभा देता है। 19।
सलोक मः 3 ॥
आसा अंदरि सभु को कोइ निरासा होइ ॥
नानक जो मरि जीविआ सहिला आइआ सोइ ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हरेक जीव आशाओं में (फसा हुआ) है (भाव। नित्य-नई आशाएं तमन्नाएं बनाता रहता है)। कोई विरला मनुष्य है जो आशाओं से बचा रहता है। हे नानक ! जो मनुष्य आशाओं से हट के (प्रभू के सिमरन में) जीवन गुजारता है उसका आना सफल है। 1।
मः 3 ॥
ना किछु आसा हथि है केउ निरासा होइ ॥
किआ करे एह बपुड़ी जां भोुलाए सोइ ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ आसा’ के हाथ में कोई ताकत नहीं (कि जीवों को फसा सके; सो। अपने उद्यम से भी) मनुष्य ‘आशा’ से नहीं बच सकता। ये बेचारी ‘आसा’ क्या कर सकती है। भुलाता तो वह प्रभू खुद है। 2।
पउड़ी ॥
ध्रिगु जीवणु संसार सचे नाम बिनु ॥
प्रभु दाता दातार निहचलु एहु धनु ॥
सासि सासि आराधे निरमलु सोइ जनु ॥
अंतरजामी अगमु रसना एकु भनु ॥
रवि रहिआ सरबति नानकु बलि जाई ॥20॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सदा कायम रहने वाले प्रभू का नाम सिमरन के बिना जगत में जीना धिक्कारयोग्य है। प्रभू ही (सबका) दाता है सब दातें देने वाला है; सो। उसका ये (नाम-) धन ही (ऐसा है जो) कभी नाश होने वाला नहीं। वही मनुष्य पवित्र (जीवन वाला) है जो (प्रभू को) हरेक सांस के साथ याद करता है। (हे भाई !) जीभ से उस एक प्रभू को याद कर जो सबके दिल की जानता है और जो (जीवों की) पहुँच से परे है। नानक उस प्रभू से सदके है जो सभी में व्यापक है। 20।
सलोकु मः 1 ॥
सरवर हंस धुरे ही मेला खसमै एवै भाणा ॥
सरवर अंदरि हीरा मोती सो हंसा का खाणा ॥
बगुला कागु न रहई सरवरि जे होवै अति सिआणा ॥
ओना रिजकु न पइओ ओथै ओन॑ा होरो खाणा ॥
सचि कमाणै सचो पाईऐ कूड़ै कूड़ा माणा ॥
नानक तिन कौ सतिगुरु मिलिआ जिना धुरे पैया परवाणा ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (गुरू-) सरोवर और (गुरमुख-) हंस का मेल धुर से चला । पति-प्रभू को ये बात अच्छी लगती है। हंसों (गुरमुखों) की ख़ुराक (प्रभू की सिफतसलाह रूपी) हीरे मोती है जो (गुरू-) सरोवर में मिलते हैं। कौए और बगुला (मनमुख) भले ही कितना ही समझदार (चतुर) हो वहाँ (गुरू की संगति में) नहीं रह सकता। (क्योंकि) उन (कौए बगुले मनमुखों) की ख़ुराक वहाँ नहीं। उनकी खुराक अलग ही होती है। अगर सदा कायम रहने वाले प्रभू की बँदगी-रूपी कमाई करें तो सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू मिलता है। (पर) झूठ की कमाई का गुमान भी झूठा ही है। (पर। इन मनमुखों के भी क्या वश।) हे नानक ! जिनको धुर से प्रभू की आज्ञा मिली है उनको ही सतिगुरू (-सरोवर) मिलता है। 1।
मः 1 ॥
साहिबु मेरा उजला जे को चिति करेइ ॥
नानक सोई सेवीऐ सदा सदा जो देइ ॥
नानक सोई सेवीऐ जितु सेविऐ दुखु जाइ ॥
अवगुण वंञनि गुण रवहि मनि सुखु वसै आइ ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ मेरा मालिक (-प्रभू) पवित्र है जो कोई भी उसको अपने हृदय में बसाता है (वह भी पवित्र हो जाता है)। हे नानक ! जो प्रभू सदा ही (जीवों को दातें) देता है उसको सिमरना चाहिए। हे नानक ! उस प्रभू को ही सिमरना चाहिए जिसका सिमरन करने से दुख दूर हो जाता है। अवगुण दूर हो जाते हैं। गुण (हृदय में) बस जाते हैं और सुख मन में आ बसता है। 2।
पउड़ी ॥
आपे आपि वरतदा आपि ताड़ी लाईअनु ॥
आपे ही उपदेसदा गुरमुखि पतीआईअनु ॥
इकि आपे उझड़ि पाइअनु इकि भगती लाइअनु ॥
जिसु आपि बुझाए सो बुझसी आपे नाइ लाईअनु ॥
नानक नामु धिआईऐ सची वडिआई ॥21॥1॥ सुधु ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (सृष्टि में) प्रभू स्वयं ही (हर जगह) मौजूद है उसने स्वयं ही ताड़ी (समाधि) लगाई हुई है (भाव। खुद ही गुप्त रूप में व्याप्त है)। (गुरू-रूप हो के) स्वयं ही (जीवों को) उपदेश दे रहा है। गुरू के माध्यम से स्वयं ही उसने सृष्टि को पतियाया हुआ है। कई जीव उसने खुद ही गलत राह पर डाले हुए हैं और कई जीव उसने बँदगी में लगाए हुए हैं। प्रभू स्वयं जिस जीव को समझ देता है वह ही (सही रास्ते को) समझता है। उसने स्वयं ही (सृष्टि) अपने नाम में लगाई हुई है। हे नानक ! प्रभू का नाम सिमरना चाहिए। ये ही सदा कायम रहने वाली वडिआई है। 21।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(पर) प्रभू का नाम (-रूपी पटोला) कभी पुराना नहीं होता।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।