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956
रामकली
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- सचु पुराणा होवै नाही सीता कदे न पाटै ॥
- सच की काती सचु सभु सारु ॥
- कमरि कटारा बंकुड़ा बंके का असवारु ॥
- सो सतसंगति सबदि मिलै जो गुरमुखि चलै ॥
- आसा अंदरि सभु को कोइ निरासा होइ ॥
- ना किछु आसा हथि है केउ निरासा होइ ॥
- ध्रिगु जीवणु संसार सचे नाम बिनु ॥
- सरवर हंस धुरे ही मेला खसमै एवै भाणा ॥
- साहिबु मेरा उजला जे को चिति करेइ ॥
- आपे आपि वरतदा आपि ताड़ी लाईअनु ॥
सचु पुराणा होवै नाही सीता कदे न पाटै ॥
सचु पुराणा होवै नाही सीता कदे न पाटै ॥
नानक साहिबु सचो सचा तिचरु जापी जापै ॥1॥
नानक साहिबु सचो सचा तिचरु जापी जापै ॥1॥
हिन्दी अर्थ: (पर) प्रभू का नाम (-रूपी पटोला) कभी पुराना नहीं होता। (नाम से) सिला हुआ कभी फटता नहीं (उस प्रभू से जुड़ा हुआ मन उससे कभी टूटता नहीं)। हे नानक ! प्रभू-पति सदा कायम रहने वाला है। पर इस बात की समझ तब ही पड़ती है जब उसको सिमरें। 1।
सच की काती सचु सभु सारु ॥
मः 1 ॥
सच की काती सचु सभु सारु ॥
घाड़त तिस की अपर अपार ॥
सबदे साण रखाई लाइ ॥
गुण की थेकै विचि समाइ ॥
तिस दा कुठा होवै सेखु ॥
लोहू लबु निकथा वेखु ॥
होइ हलालु लगै हकि जाइ ॥
नानक दरि दीदारि समाइ ॥2॥
सच की काती सचु सभु सारु ॥
घाड़त तिस की अपर अपार ॥
सबदे साण रखाई लाइ ॥
गुण की थेकै विचि समाइ ॥
तिस दा कुठा होवै सेखु ॥
लोहू लबु निकथा वेखु ॥
होइ हलालु लगै हकि जाइ ॥
नानक दरि दीदारि समाइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ अगर प्रभू के नाम की छुरी हो। प्रभू का नाम ही (उस छुरी का) सारा लोहा हो। उस छुरी की संरचना बहुत सुंदर होती है; ये छुरी सतिगुरू के शबद की सान पर रख कर तेज (धार) की जाती है। और ये प्रभू के गुणों की म्यान में टिकी रहती है। अगर शेख इस छुरी का कुठा हुआ हो (भाव। अगर 'शेख' का जीवन प्रभू के नाम। सतिगुरू के शबद और प्रभू की सिफत-सालाह में घड़ा हुआ हो) तो उसके अंदर से लालच रूपी लहू अवश्य निकल जाता है। इस तरह हलाल हो के (कुठा जा के) वह प्रभू में जुड़ता है। और। हे नानक ! प्रभू के दर पर (पहुँच के) उसके दर्शन में लीन हो जाता है। 2।
कमरि कटारा बंकुड़ा बंके का असवारु ॥
मः 1 ॥
कमरि कटारा बंकुड़ा बंके का असवारु ॥
गरबु न कीजै नानका मतु सिरि आवै भारु ॥3॥
कमरि कटारा बंकुड़ा बंके का असवारु ॥
गरबु न कीजै नानका मतु सिरि आवै भारु ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ कमर पर सुंदर सी कटार हो और सुंदर घोड़े पर सवार हो। (फिर भी) हे नानक ! गुमान ना करें। (क्या पता है) मत कहीं सिर के बल ही गिर ही ना पड़े। 3।
सो सतसंगति सबदि मिलै जो गुरमुखि चलै ॥
पउड़ी ॥
सो सतसंगति सबदि मिलै जो गुरमुखि चलै ॥
सचु धिआइनि से सचे जिन हरि खरचु धनु पलै ॥
भगत सोहनि गुण गावदे गुरमति अचलै ॥
रतन बीचारु मनि वसिआ गुर कै सबदि भलै ॥
आपे मेलि मिलाइदा आपे देइ वडिआई ॥19॥
सो सतसंगति सबदि मिलै जो गुरमुखि चलै ॥
सचु धिआइनि से सचे जिन हरि खरचु धनु पलै ॥
भगत सोहनि गुण गावदे गुरमति अचलै ॥
रतन बीचारु मनि वसिआ गुर कै सबदि भलै ॥
आपे मेलि मिलाइदा आपे देइ वडिआई ॥19॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है वह साध-संगति में आ के गुरू के शबद में जुड़ता है। जिन मनुष्यों के पल्ले प्रभू का नाम-रूपी धन है (जिंदगी के सफर के लिए) खर्च है वह सदा कायम रहने वाले प्रभू को सिमरते हैं और उसी का रूप हो जाते हैं। बँदगी करने वाले लोग प्रभू के गुण गाते हैं और सुंदर लगते हैं। सतिगुरू की मति को ले के वे अडोल हो जाते हैं। सतिगुरू के सोहाने शबद के द्वारा उनके मन में प्रभू के श्रेष्ठ नाम की विचार आ बसती है। (भगत जनों को) प्रभू खुद ही अपने में मिलाता है। स्वयं ही उनको शोभा देता है। 19।
आसा अंदरि सभु को कोइ निरासा होइ ॥
सलोक मः 3 ॥
आसा अंदरि सभु को कोइ निरासा होइ ॥
नानक जो मरि जीविआ सहिला आइआ सोइ ॥1॥
आसा अंदरि सभु को कोइ निरासा होइ ॥
नानक जो मरि जीविआ सहिला आइआ सोइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हरेक जीव आशाओं में (फसा हुआ) है (भाव। नित्य-नई आशाएं तमन्नाएं बनाता रहता है)। कोई विरला मनुष्य है जो आशाओं से बचा रहता है। हे नानक ! जो मनुष्य आशाओं से हट के (प्रभू के सिमरन में) जीवन गुजारता है उसका आना सफल है। 1।
ना किछु आसा हथि है केउ निरासा होइ ॥
मः 3 ॥
ना किछु आसा हथि है केउ निरासा होइ ॥
किआ करे एह बपुड़ी जां भोुलाए सोइ ॥2॥
ना किछु आसा हथि है केउ निरासा होइ ॥
किआ करे एह बपुड़ी जां भोुलाए सोइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ आसा' के हाथ में कोई ताकत नहीं (कि जीवों को फसा सके; सो। अपने उद्यम से भी) मनुष्य 'आशा' से नहीं बच सकता। ये बेचारी 'आसा' क्या कर सकती है। भुलाता तो वह प्रभू खुद है। 2।
ध्रिगु जीवणु संसार सचे नाम बिनु ॥
पउड़ी ॥
ध्रिगु जीवणु संसार सचे नाम बिनु ॥
प्रभु दाता दातार निहचलु एहु धनु ॥
सासि सासि आराधे निरमलु सोइ जनु ॥
अंतरजामी अगमु रसना एकु भनु ॥
रवि रहिआ सरबति नानकु बलि जाई ॥20॥
ध्रिगु जीवणु संसार सचे नाम बिनु ॥
प्रभु दाता दातार निहचलु एहु धनु ॥
सासि सासि आराधे निरमलु सोइ जनु ॥
अंतरजामी अगमु रसना एकु भनु ॥
रवि रहिआ सरबति नानकु बलि जाई ॥20॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सदा कायम रहने वाले प्रभू का नाम सिमरन के बिना जगत में जीना धिक्कारयोग्य है। प्रभू ही (सबका) दाता है सब दातें देने वाला है; सो। उसका ये (नाम-) धन ही (ऐसा है जो) कभी नाश होने वाला नहीं। वही मनुष्य पवित्र (जीवन वाला) है जो (प्रभू को) हरेक सांस के साथ याद करता है। (हे भाई !) जीभ से उस एक प्रभू को याद कर जो सबके दिल की जानता है और जो (जीवों की) पहुँच से परे है। नानक उस प्रभू से सदके है जो सभी में व्यापक है। 20।
सरवर हंस धुरे ही मेला खसमै एवै भाणा ॥
सलोकु मः 1 ॥
सरवर हंस धुरे ही मेला खसमै एवै भाणा ॥
सरवर अंदरि हीरा मोती सो हंसा का खाणा ॥
बगुला कागु न रहई सरवरि जे होवै अति सिआणा ॥
ओना रिजकु न पइओ ओथै ओन॑ा होरो खाणा ॥
सचि कमाणै सचो पाईऐ कूड़ै कूड़ा माणा ॥
नानक तिन कौ सतिगुरु मिलिआ जिना धुरे पैया परवाणा ॥1॥
सरवर हंस धुरे ही मेला खसमै एवै भाणा ॥
सरवर अंदरि हीरा मोती सो हंसा का खाणा ॥
बगुला कागु न रहई सरवरि जे होवै अति सिआणा ॥
ओना रिजकु न पइओ ओथै ओन॑ा होरो खाणा ॥
सचि कमाणै सचो पाईऐ कूड़ै कूड़ा माणा ॥
नानक तिन कौ सतिगुरु मिलिआ जिना धुरे पैया परवाणा ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (गुरू-) सरोवर और (गुरमुख-) हंस का मेल धुर से चला आ रहा है । पति-प्रभू को ये बात अच्छी लगती है। हंसों (गुरमुखों) की ख़ुराक (प्रभू की सिफतसलाह रूपी) हीरे मोती है जो (गुरू-) सरोवर में मिलते हैं। कौए और बगुला (मनमुख) भले ही कितना ही समझदार (चतुर) हो वहाँ (गुरू की संगति में) नहीं रह सकता। (क्योंकि) उन (कौए बगुले मनमुखों) की ख़ुराक वहाँ नहीं। उनकी खुराक अलग ही होती है। अगर सदा कायम रहने वाले प्रभू की बँदगी-रूपी कमाई करें तो सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू मिलता है। (पर) झूठ की कमाई का गुमान भी झूठा ही है। (पर। इन मनमुखों के भी क्या वश।) हे नानक ! जिनको धुर से प्रभू की आज्ञा मिली है उनको ही सतिगुरू (-सरोवर) मिलता है। 1।
साहिबु मेरा उजला जे को चिति करेइ ॥
मः 1 ॥
साहिबु मेरा उजला जे को चिति करेइ ॥
नानक सोई सेवीऐ सदा सदा जो देइ ॥
नानक सोई सेवीऐ जितु सेविऐ दुखु जाइ ॥
अवगुण वंञनि गुण रवहि मनि सुखु वसै आइ ॥2॥
साहिबु मेरा उजला जे को चिति करेइ ॥
नानक सोई सेवीऐ सदा सदा जो देइ ॥
नानक सोई सेवीऐ जितु सेविऐ दुखु जाइ ॥
अवगुण वंञनि गुण रवहि मनि सुखु वसै आइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ मेरा मालिक (-प्रभू) पवित्र है जो कोई भी उसको अपने हृदय में बसाता है (वह भी पवित्र हो जाता है)। हे नानक ! जो प्रभू सदा ही (जीवों को दातें) देता है उसको सिमरना चाहिए। हे नानक ! उस प्रभू को ही सिमरना चाहिए जिसका सिमरन करने से दुख दूर हो जाता है। अवगुण दूर हो जाते हैं। गुण (हृदय में) बस जाते हैं और सुख मन में आ बसता है। 2।
आपे आपि वरतदा आपि ताड़ी लाईअनु ॥
पउड़ी ॥
आपे आपि वरतदा आपि ताड़ी लाईअनु ॥
आपे ही उपदेसदा गुरमुखि पतीआईअनु ॥
इकि आपे उझड़ि पाइअनु इकि भगती लाइअनु ॥
जिसु आपि बुझाए सो बुझसी आपे नाइ लाईअनु ॥
नानक नामु धिआईऐ सची वडिआई ॥21॥1॥ सुधु ॥
आपे आपि वरतदा आपि ताड़ी लाईअनु ॥
आपे ही उपदेसदा गुरमुखि पतीआईअनु ॥
इकि आपे उझड़ि पाइअनु इकि भगती लाइअनु ॥
जिसु आपि बुझाए सो बुझसी आपे नाइ लाईअनु ॥
नानक नामु धिआईऐ सची वडिआई ॥21॥1॥ सुधु ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (सृष्टि में) प्रभू स्वयं ही (हर जगह) मौजूद है उसने स्वयं ही ताड़ी (समाधि) लगाई हुई है (भाव। खुद ही गुप्त रूप में व्याप्त है)। (गुरू-रूप हो के) स्वयं ही (जीवों को) उपदेश दे रहा है। गुरू के माध्यम से स्वयं ही उसने सृष्टि को पतियाया हुआ है। कई जीव उसने खुद ही गलत राह पर डाले हुए हैं और कई जीव उसने बँदगी में लगाए हुए हैं। प्रभू स्वयं जिस जीव को समझ देता है वह ही (सही रास्ते को) समझता है। उसने स्वयं ही (सृष्टि) अपने नाम में लगाई हुई है। हे नानक ! प्रभू का नाम सिमरना चाहिए। ये ही सदा कायम रहने वाली वडिआई है। 21।
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 956 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 956 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।