Lulla Family

अंग 955

अंग
955
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पउड़ी ॥
काइआ अंदरि गड़ु कोटु है सभि दिसंतर देसा ॥
आपे ताड़ी लाईअनु सभ महि परवेसा ॥
आपे स्रिसटि साजीअनु आपि गुपतु रखेसा ॥
गुर सेवा ते जाणिआ सचु परगटीएसा ॥
सभु किछु सचो सचु है गुरि सोझी पाई ॥16॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (मनुष्य का) शरीर के अंदर (मनुष्य का हृदय-रूप) जिस प्रभू का किला है गढ़ है वह प्रभू सारे देश-देशांतरों में मौजूद है। सारे जीवों के अंदर परवेश करके उसने खुद ही (जीवों के अंदर) समाधि (ताड़ी) लगाई हुई है (वह खुद ही जीवों के अंदर टिका हुआ है)। प्रभू ने खुद ही सृष्टि रची है और खुद ही (उस सृष्टि में उसने अपने आप को) छुपाया हुआ है। उस प्रभू की सूझ सतिगुरू के हुकम में चलने से आती है (तब ही) सच्चा प्रभू प्रकट होता है। है तो हर जगह सच्चा प्रभू खुद ही खुद। पर ये समझ सतिगुरू के द्वारा ही आती है। 16।
सलोक मः 1 ॥
सावणु राति अहाड़ु दिहु कामु क्रोधु दुइ खेत ॥
लबु वत्र दरोगु बीउ हाली राहकु हेत ॥
हलु बीचारु विकार मण हुकमी खटे खाइ ॥
नानक लेखै मंगिऐ अउतु जणेदा जाइ ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (जिस जीव की) रात खरीफ (सावणी) की फसल है और ‘काम’ जिसका खेत है (भाव। जो जीव अपनी रात ‘काम’ के अधीन हो के गुजारता है)। जिसका दिन रबी (हाड़ी) की फसल है और ‘क्रोध’ जिसका खेत है (भाव। जो दिन का समय क्रोध में बिताता है)। जिस जीव के लिए ‘लब’ वत्र (वतर- जोत के सींच के तैयार की गई जमीन की उपयुक्त अवस्था जो बीज बीजने का सही समय होता है) का काम (देता) है और झूठ (जिसकी फसल के लिए) बीज है (भाव। जो लब अर्थात लालच का प्रेरा हुआ झूठ बोलता है)। ‘मोह’ जिस जीव के लिए हल चलाने वाला है और बीज बीजने वाला है; विकारों की विचार जिस जीव का ‘हल’ है; जिसने विकारों के बोहल (अनाज की ढेरी) इकट्ठे किए हैं। वह मनुष्य प्रभू के हुकम में अपनी की हुई कमाई का कमाया खाता है। हे नानक ! जब जीव की करतूत का लेखा माँगा जाता है तब पता लगता है कि ऐसा (जीव-रूप) पिता (जगत से) बे-औलाद ही चला जाता है (भाव। जीवन व्यर्थ गवा के जाता है)। 1।
मः 1 ॥
भउ भुइ पवितु पाणी सतु संतोखु बलेद ॥
हलु हलेमी हाली चितु चेता वत्र वखत संजोगु ॥
नाउ बीजु बखसीस बोहल दुनीआ सगल दरोग ॥
नानक नदरी करमु होइ जावहि सगल विजोग ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ अगर प्रभू का डर भूमि बने। शुद्ध आचरण (उस खेती के लिए) (सिंचाई का) पानी हो। सत् और संतोख (उस खेती को जोतने के लिए) बैल हो; विनम्रता हल हो। (जुड़ा हुआ) चित्त हल जोतने वाला हो। प्रभू के सिमरन का वतर (बीज बीजने के लिए तैयार भूमि) हो और गुरू का मिलाप (बीज बीजने का) समय हो। प्रभू का ‘नाम’ बीज हो तो प्रभू की बख्शिश का बोहल (फसल का ढेर) इकट्ठा होता है और (तब) दुनिया सारी झूठी दिख पड़ती है (भाव। ये समझ आ जाती है कि दुनिया का साथ सदा निभने वाला नहीं)। हे नानक ! (इस उद्यम से जब) प्रभू की मेहर होती है तब (उससे) सारे विछोड़े दूर हो जाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
मनमुखि मोहु गुबारु है दूजै भाइ बोलै ॥
दूजै भाइ सदा दुखु है नित नीरु विरोलै ॥
गुरमुखि नामु धिआईऐ मथि ततु कढोलै ॥
अंतरि परगासु घटि चानणा हरि लधा टोलै ॥
आपे भरमि भुलाइदा किछु कहणु न जाई ॥17॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है उसके अंदर मोह-रूपी घोर अंधेरा है। (वह जो बचन बोलता है) माया के मोह में ही बोलता है। वह (मानो) सदा पानी मथता है और माया के मोह के कारण उसको सदा दुख (होता) है। जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है वह प्रभू का नाम सिमरता है वह (मानो। दूध) मथ के प्रभू का नाम-रूप मक्खन निकालता है। उसके हृदय में (प्रभू का) प्रकाश हो जाता है दिल में (ज्ञान की) रौशनी हो जाती है। उसने (गुरू के द्वारा) तलाश करके प्रभू को पा लिया है। (जिस किसी को भुलाता है) प्रभू खुद ही भ्रम में भुलाता है (किसी के सिर क्या दोष।) कोई बात कहीं नहीं जा सकती। 17।
सलोक मः 2 ॥
नानक चिंता मति करहु चिंता तिस ही हेइ ॥
जल महि जंत उपाइअनु तिना भि रोजी देइ ॥
ओथै हटु न चलई ना को किरस करेइ ॥
सउदा मूलि न होवई ना को लए न देइ ॥
जीआ का आहारु जीअ खाणा एहु करेइ ॥
विचि उपाए साइरा तिना भि सार करेइ ॥
नानक चिंता मत करहु चिंता तिस ही हेइ ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ हे नानक ! (अपनी रोजी के लिए) फिकर-चिंता ना करो। ये फिक्र उस प्रभू को खुद ही है। उसने पानी में जीव पैदा किए हैं उनको भी रिजक देता है; पानी में ना कोई दुकान चलती है ना ही वहाँ कोई खेती करता है। ना वहाँ कोई सौदा-सूत हो रहा है ना ही कोई लेन-देन का व्यापार है; पर वहाँ ये खुराक बना दी है कि जीवों का खाना जीव ही हैं। सो। जिनको समुंद्र में उसने पैदा किया है उनकी भी संभाल करता है। हे नानक ! (रोजी के लिए) चिंता ना करो। उस प्रभू को खुद ही फिक्र है। 1।
मः 1 ॥
नानक इहु जीउ मछुली झीवरु त्रिसना कालु ॥
मनूआ अंधु न चेतई पड़ै अचिंता जालु ॥
नानक चितु अचेतु है चिंता बधा जाइ ॥
नदरि करे जे आपणी ता आपे लए मिलाइ ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हे नानक ! ये जिंद छोटी सी मछली है। आत्मिक मौत लाने वाली तृष्णा रूपी जाल है; मूर्ख मन (इस तृष्णा में) अंधा (होया हुआ परमात्मा को) याद नहीं करता। बेख़बरी में ही (आत्मिक मौत का) जाल (इस पर) पड़ता जाता है। हे नानक ! (तृष्णा में फसा हुआ) मन गाफ़िल हो रहा है। सदा चिंता में जकड़ा रहता है। अगर प्रभू स्वयं अपनी मेहर की नजर करे तो (जीवात्मा को तृष्णा की पकड़ से निकाल के) अपने में मिला लेता है। 2।
पउड़ी ॥
से जन साचे सदा सदा जिनी हरि रसु पीता ॥
गुरमुखि सचा मनि वसै सचु सउदा कीता ॥
सभु किछु घर ही माहि है वडभागी लीता ॥
अंतरि त्रिसना मरि गई हरि गुण गावीता ॥
आपे मेलि मिलाइअनु आपे देइ बुझाई ॥18॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिन मनुष्यों ने प्रभू का नाम-अमृत पीया है वह मनुष्य नित्य प्रभू के साथ एक-रूप रहते हैं। गुरू के हुकम में चलके सदा कायम रहने वाला प्रभू उनके मन में बसता है। उन्होंने प्रभू का नाम-रूपी वणज किया है। ये नाम-रूपी सौदा है तो सारा मनुष्य के हृदय में ही। पर (इसका) वाणिज्य किया है बड़े भाग्यशालियों ने ही; (जिन्होंने ये वाणिज्य किया है) प्रभू के गुण गा के उनके अंदर से तृष्णा मर गई है। (ये नाम-रूप सौदा करने की) मति प्रभू ही देता है। और उसने खुद ही (नाम के व्यापारी अपने) मेल में मिलाए हैं। 18।
सलोक मः 1 ॥
वेलि पिंञाइआ कति वुणाइआ ॥
कटि कुटि करि खुंबि चड़ाइआ ॥
लोहा वढे दरजी पाड़े सूई धागा सीवै ॥
इउ पति पाटी सिफती सीपै नानक जीवत जीवै ॥
होइ पुराणा कपड़ु पाटै सूई धागा गंढै ॥
माहु पखु किहु चलै नाही घड़ी मुहतु किछु हंढै ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (रूई को बेलने में) बेल के पिंजाई की जाती है। कात के (कपड़ा) बुना जाता है। इसके टुकड़े करके (धोने के लिए) साँचे में चढ़ाते हैं। (इस कपड़े को) कैंची कतरती है। दर्जी इसे चीरता है। और सूई-धागा सिलता है। हे नानक ! मनुष्य की खोई हुई इज्जत प्रभू की सिफत-सलाह करने से फिर बन जाती है और मनुष्य सदाचारी जीवन गुजारने लग जाता है। कपड़ा पुराना हो के फट जाता है। सुई-धागा इसको सी देता है। (पर ये सिला हुआ मरम्मत किया हुआ पुराना कपड़ा) कोई महीना आधा महीना नहीं चलता। सिर्फ घड़ी दो घड़ी (थोड़े वक्त) ही चलता है;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पउड़ी॥ (मनुष्य का) शरीर के अंदर (मनुष्य का हृदय-रूप) जिस प्रभू का किला है गढ़ है वह प्रभू सारे देश-देशांतरों में मौजूद है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।