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अंग 954

अंग
954
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अंगद देव जी (महला 2)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सीता लखमणु विछुड़ि गइआ ॥
रोवै दहसिरु लंक गवाइ ॥ जिनि सीता आदी डउरू वाइ ॥
रोवहि पांडव भए मजूर ॥ जिन कै सुआमी रहत हदूरि ॥
रोवै जनमेजा खुइ गइआ ॥
एकी कारणि पापी भइआ ॥
रोवहि सेख मसाइक पीर ॥
अंति कालि मतु लागै भीड़ ॥
रोवहि राजे कंन पड़ाइ ॥
घरि घरि मागहि भीखिआ जाइ ॥
रोवहि किरपन संचहि धनु जाइ ॥
पंडित रोवहि गिआनु गवाइ ॥
बाली रोवै नाहि भतारु ॥
नानक दुखीआ सभु संसारु ॥
मंने नाउ सोई जिणि जाइ ॥
अउरी करम न लेखै लाइ ॥1॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: सीता लक्ष्मण विछुड़े तब राम जी भी रोए। रावण। लंका गवा के रोया। जिसने साधू बन के सीता (का हरण करके) ले आया था (पाँचों) पाण्डव। जब (राजा वैराट के) मजदूर बने तब रोए। जिनके पास श्री कृष्ण जी रहते थे (भाव। जिनका पक्ष करते थे)। राजा जनमेजा चूक गया (18 ब्राहमणों को जान से मार बैठा। प्रायश्चित के लिए ‘महाभारत’ सुना। पर शंका की। इस) एक गलती के कारण पापी ही बना रहा (भाव। कोढ़ ना हटा) और रोया। शेख पीर आदि भी रोते हैं कि कहीं ऐसा ना हो कि अंत के समय कोई बिपता आ पड़े। (भरथरी गोपीचंद आदिक) राजा। जोगी बन के दुखी होते हैं जब घर-घर जा के भिक्षा माँगते हैं। कँजूस धन इकट्ठा करते हैं पर रोते हैं ज बवह धन (उनके पास से) चला जाता है। ज्ञान की कमी के कारण पण्डित भी ख्वार होते हैं। स्त्री रोती है जब (सिर पर) पति ना रहे। हे नानक ! सारा जगत ही दुखी है। जो मनुष्य प्रभू के नाम को मानता है (भाव। जिसका मन प्रभू के नाम में पतीजता है) वह (जिंदगी की बाजी) जीत के जाता है। (‘नाम’ के बिना) कोई और काम (जिंदगी की बाजी जीतने के लिए) सफल नहीं होता।
मः 2 ॥
जपु तपु सभु किछु मंनिऐ अवरि कारा सभि बादि ॥
नानक मंनिआ मंनीऐ बुझीऐ गुर परसादि ॥2॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ यदि मन प्रभू के नाम में पतीज जाए जो जप-तप आदि हरेक उद्यम (उसी में आ जाता है)। (नाम के बिना) और सारे कर्म व्यर्थ हैं। हे नानक ! ‘नाम’ को मानने वाला आदर पाता है। ये बात गुरू की कृपा से समझी जा सकती है। 2।
पउड़ी ॥
काइआ हंस धुरि मेलु करतै लिखि पाइआ ॥
सभ महि गुपतु वरतदा गुरमुखि प्रगटाइआ ॥
गुण गावै गुण उचरै गुण माहि समाइआ ॥
सची बाणी सचु है सचु मेलि मिलाइआ ॥
सभु किछु आपे आपि है आपे देइ वडिआई ॥14॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ शरीर और जीवात्मा का संजोग धुर से करतार ने अपने हुकम के अनुसार बना दिया है। प्रभू सब जीवों में छुपा हुआ मौजूद है। गुरू के द्वारा प्रकट होता है। (जो मनुष्य गुरू की शरण आ के प्रभू के) गुण गाता है गुण उचारता है वह गुणों में लीन हो जाता है। (सतिगुरू की) सच्ची बाणी के द्वारा वह मनुष्य सच्चे प्रभू का रूप हो जाता है। गुरू ने सच्चा प्रभू उसको संगति में (रख के) मिला दिया। हरेक हस्ती में (अस्तित्व में) प्रभू स्वयं ही मौजूद है और स्वयं ही वडिआई (महानता। महिमा) बख्शता है। 14।
सलोक मः 2 ॥
नानक अंधा होइ कै रतना परखण जाइ ॥
रतना सार न जाणई आवै आपु लखाइ ॥1॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ हे नानक ! जो मनुष्य खुद अंधा हो और चल पड़े रत्न परखने। वह रत्नों की कद्र तो जानता नहीं। पर अपने आप को उजागर करा आता है (भाव। अपना अंधापन जाहिर कर आता है)। 1।
मः 2 ॥
रतना केरी गुथली रतनी खोली आइ ॥
वखर तै वणजारिआ दुहा रही समाइ ॥
जिन गुणु पलै नानका माणक वणजहि सेइ ॥
रतना सार न जाणनी अंधे वतहि लोइ ॥2॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ प्रभू के गुण रूपी थैली सतिगुरू ने आ के खोली है। से गुत्थी बेचने वाले सतिगुरू और लेने वाले गुरमुख दोनों के हृदय में टिक रही है (भाव। दोनों को ये गुण प्यारे लग रहे हैं)। हे नानक ! जिनके पास (भाव। हृदय में) प्रभू की सिफत सालाह के गुण मौजूद हैं वही मनुष्य ही नाम-रत्न का लेन-देन (व्यापार) करते हैं; पर जो इन रत्नों की कद्र नहीं जानते वे अंधों की तरह जगत में फिरते हैं। 2।
पउड़ी ॥
नउ दरवाजे काइआ कोटु है दसवै गुपतु रखीजै ॥
बजर कपाट न खुलनी गुर सबदि खुलीजै ॥
अनहद वाजे धुनि वजदे गुर सबदि सुणीजै ॥
तितु घट अंतरि चानणा करि भगति मिलीजै ॥
सभ महि एकु वरतदा जिनि आपे रचन रचाई ॥15॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ शरीर (मानो एक) किला है। इसकी नौ इन्द्रियों के रूप में गुप्त दरवाजे (प्रकट) हैं। और दसवाँ द्वार गुप्त रखा हुआ है; (उस दसवें दरवाजे के) किवाड़ बड़े कठोर हैं खुलते नहीं। खुलते (केवल) सतिगुरू के शबद से ही हैं। (जब ये कठोर किवाड़ खुल जाते हैं तो। मानो।) एक-रस वाले बाजे बज पड़ते हैं जो सतिगुरू के शबद के द्वारा सुने जाते हैं। (जिस हृदय में ये आनंद पैदा होता है) उस हृदय में (ज्ञान का) प्रकाश हो जाता है। प्रभू की भक्ति करके वह मनुष्य प्रभू में मिल जाता है। जिस प्रभू ने यह सारी रचना रची है वह सारे जीवों में व्यापक है (पर उस से मेल गुरू के द्वारा ही होता है)। 15।
सलोक मः 2 ॥
अंधे कै राहि दसिऐ अंधा होइ सु जाइ ॥
होइ सुजाखा नानका सो किउ उझड़ि पाइ ॥
अंधे एहि न आखीअनि जिन मुखि लोइण नाहि ॥
अंधे सेई नानका खसमहु घुथे जाहि ॥1॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ अगर कोई अंधा मनुष्य (किसी और को) राह बताए तो (उस राह पर) वही चलता है जो खुद अंधा हो; हे नानक ! आँख वाला मनुष्य (अंधे के कहने पर) गलत राह पर नहीं पड़ता। (पर आत्मिक जीवन में) ऐसे लोगों को अंधे नहीं कहा जाता जिनके मुँह पर आँखें नहीं हैं। हे नानक ! अंधे वही हैं जो मालिक प्रभू से टूटे हुए हैं। 1।
मः 2 ॥
साहिबि अंधा जो कीआ करे सुजाखा होइ ॥
जेहा जाणै तेहो वरतै जे सउ आखै कोइ ॥
जिथै सु वसतु न जापई आपे वरतउ जाणि ॥
नानक गाहकु किउ लए सकै न वसतु पछाणि ॥2॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ जिस मनुष्य को मालिक-प्रभू ने स्वयं अंधा कर दिया है वह तब ही आँख वाला हो सकता है यदि प्रभू स्वयं (आँख वाला) बनाए। (नहीं तो। अंधा मनुष्य तो) जिस तरह की समझ रखता है उसी तरह किए जाता है चाहे उसको कोई सौ बार समझाए। जिस मनुष्य के अंदर ‘नाम’-रूप पदार्थ की समझ नहीं वहाँ अहंकार वाला व्यवहार ही समझो। (क्योंकि) हे नानक ! गाहक जिस सौदे को पहचान ही नहीं सकता उसका वह वणज ही कैसे करे। 2।
मः 2 ॥
सो किउ अंधा आखीऐ जि हुकमहु अंधा होइ ॥
नानक हुकमु न बुझई अंधा कहीऐ सोइ ॥3॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ जो मनुष्य प्रभू की रजा में नेत्र-हीन हो गया उसको हम अंधा नहीं कहते। हे नानक ! वह मनुष्य अंधा कहा जाता है जो रजा को समझता नहीं। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अंगद जी के समय गुरमुखी ने अपनी रूप-रेखा पायी। उनकी अपनी रचनाएँ कम मगर पठनीय हैं, और बाद के गुरुओं की वाणी को संग्रहित-करने की संरचना उन्हीं की देन है।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सीता लक्ष्मण विछुड़े तब राम जी भी रोए।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।