राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
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तिसु पाखंडी जरा न मरणा ॥ बोलै चरपटु सति सरूपु ॥ परम तंत महि रेख न रूपु ॥5॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: उस नास्तिक को (भाव। उस मनुष्य को जिसने अपने अंदर से पापों का नाश कर दिया है) बुढ़ापा और मौत (उसे) छू नहीं सकते (भाव। वह इनके डर से मुक्त हो जाता है)। अगर चरपट (भी ऐसी नास्तिक जुगति बरत के) सति-स्वरूप प्रभू को जपे तो (ये चरपट भी) परम ब्रहम में लीन हो जाए। इसकी कोई (अलग) रूप-रेखा ना रह जाए। 5।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (असल) बैरागी वह है जो प्रभू को (अपने हृदय की ओर) पलटाता है (अर्थात। जो प्रभू पति को अपनी हृदय-सेज पर ला बसाता है)। जो प्रभू का नाम-रूप दसम द्वार (रूपी शामियाने) में खड़ा करता है (भाव। जो मनुष्य प्रभू के नाम को इस तरह अपना सहारा बनाता है कि उसकी सुरति सदा ऊपर को प्रभू-चरणों में टिकी रहती है। मायावी पदार्थों के प्रभाव में नीचे नहीं गिरती)। जो दिन-रात अपने अंदर ही (भाव। हृदय में ही) प्रभू की याद में जुड़ा रहता है। ऐसे बैरागी प्रभू का रूप हो जाते हैं। अगर भरथरी (भी ऐसे बैरागी की जुगति बरत के) सति-स्वरूप प्रभू को जपे तो (ये भरथरी भी) परम ब्रहम में लीन हो जाए। इसकी कोई (अलग) रूप-रेखा ना रह जाए। 6।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ इस जुगति से ना (मन में से) विकार दूर होता है ना ही (ऊँचा) जीवन मिलता है।(अत:) कान फड़वा के चूरमा खाने का कोई (आत्मिक) लाभ नहीं केवल वही (प्रभू का) नाम है जो संसार का अस्तित्व और अस्तित्व-हीन दोनों अवस्थाओं के वक्त मौजूद है। (अगर कोई पूछे कि यदि कान छेद करवाने से मन नहीं टिकता तो) वह कौन सा अक्षर है जिसमें हृदय जुड़ा रह सकता है (और बुराई मिट जाती है। तो इसका उक्तर ये है कि वह प्र्भु का नाम है) अगर कोई मनुष्य (इस ‘नाम’ की बरकति से) दुख और सुख को एक-समान सहता है। तो। नानक कहता है। वह मनुष्य ही (असल में) गुरू को याद रखता है (भाव। गुरू के वचन के मुताबिक चलता है)। (नाथ ने) चेले (भाव। जोगी लोग) (जो निरे) छे भेषों में ही व्यस्त हैं। (दरअसल) ना वे गृहस्ती हैं और ना ही विरक्त। जो मनुष्य एक निरंकार में जुड़ा रहता है वह क्यों कहीं ख़ैर माँगने जाए। (भाव। उसको फकीर बनने की आवश्यक्ता नहीं पड़ती। हाथों से किरत-कमाई करता हुआ भी प्रभू के चरणों में लीन रहता है)। 7।
पउड़ी ॥ हरि मंदरु सोई आखीऐ जिथहु हरि जाता ॥ मानस देह गुर बचनी पाइआ सभु आतम रामु पछाता ॥ बाहरि मूलि न खोजीऐ घर माहि बिधाता ॥ मनमुख हरि मंदर की सार न जाणनी तिनी जनमु गवाता ॥ सभ महि इकु वरतदा गुर सबदी पाइआ जाई ॥12॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (वैसे तो सारे शरीर ही ‘हरि मंदरु’ अर्थात। ईश्वर के रहने की जगह हैं। पर असल में) वही शरीर ‘हरि मंदरु’ कहा जाना चाहिए जिसमें ईश्वर पहचाना जाए; (सो। मनुष्य का शरीर ‘हरि मंदरु’ है। क्योंकि) मनुष्य-शरीर में गुरू के हुकम में चल के ईश्वर को पा सकता है। हर जगह व्यापक ज्योति दिखती है। (शरीर से) बाहर तलाशने की बिल्कुल ही आवश्यक्ता नहीं। (इस शरीर-) घर में ही सृजनहार बस रहा है। पर मन के पीछे चलने वाले बंदे (इस मनुष्य-शरीर) ‘हरि मंदरु’ की कद्र नहीं जानते। वे मानस जन्म (मन के पीछे चल के ही) गवा जाते हैं। (वैसे तो) सभी में एक ही प्रभू व्यापक है। पर मिलता है गुरू के शबद से ही। 12।
सलोक मः 3 ॥ मूरखु होवै सो सुणै मूरख का कहणा ॥ मूरख के किआ लखण है किआ मूरख का करणा ॥ मूरखु ओहु जि मुगधु है अहंकारे मरणा ॥ एतु कमाणै सदा दुखु दुख ही महि रहणा ॥ अति पिआरा पवै खूहि किहु संजमु करणा ॥ गुरमुखि होइ सु करे वीचारु ओसु अलिपतो रहणा ॥ हरि नामु जपै आपि उधरै ओसु पिछै डुबदे भी तरणा ॥ नानक जो तिसु भावै सो करे जो देइ सु सहणा ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3। मूर्ख का कहा वही सुनता है (भाव। मूर्ख के कहे वही लगता है) जो खुद मूर्ख हो। मूर्ख के क्या लक्षण हैं। कैसी करतूत होती है मूर्ख की। जो मूर्ख माया का ठगा हुआ हो और जो अहंकार में आत्मिक मौत मरा हुआ हो। उसको मूर्ख कहा जाता है। माया की मस्ती ओर अहंकार में जो कुछ करें उससे सदा दुख प्राप्त होता है और सदा दुखी रहा जाता है। माया से ज्यादा प्यार करने वाला मनुष्य (माया के मोह के) कूएं में गिरा रहता है। उसके बचाव के लिए कौन से प्रयास किए जा सकते हैं। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह इस पर विचार करता है और (इस माया के मोह-रूप कूएं से) अलग रहता है; वह प्रभू का नाम जपता है। (नाम की बरकति से) वह खुद बचता है और उसके पद्चिन्हों पर चल कर डूबता हुआ साथी भी बच निकलता है। हे नानक ! जो कुछ प्रभू को भाता है वही कुछ वह करता है (माया के मोह में पड़ के दुख या इससे अलोप रहके सुख) जो कुछ प्रभू देता है वही जीव सहता है। 1।
मः 1 ॥ नानकु आखै रे मना सुणीऐ सिख सही ॥ लेखा रबु मंगेसीआ बैठा कढि वही ॥ तलबा पउसनि आकीआ बाकी जिना रही ॥ अजराईलु फरेसता होसी आइ तई ॥ आवणु जाणु न सुझई भीड़ी गली फही ॥ कूड़ निखुटे नानका ओड़कि सचि रही ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ नानक कहता है- हे मन ! सच्ची शिक्षा सुन। (आपके किए अमलों अर्थात आपके किए कर्मों के लेखे वाली) किताब निकाल के बैठा हुआ ईश्वर (आपसे) हिसाब पूछेगा। जिन-जिन का लेखे का हिसाब बकाया रह जाता है उन-उन लोगों को बुलावे आएंगे। मौत का फरिश्ता (किए हुए कर्मों के अनुसार दुख देने के लिए सिर पर) आ तैयार खड़ा होंगे। उस मुश्किल में फसी हुई जिंद को (उस वक्त) कुछ सूझता नहीं। हे नानक ! झूठ के व्यापारी हार के जाते हैं। सच का सौदा करने से ही अंत को विजय मिलती है। 2।
पउड़ी ॥ हरि का सभु सरीरु है हरि रवि रहिआ सभु आपै ॥ हरि की कीमति न पवै किछु कहणु न जापै ॥ गुर परसादी सालाहीऐ हरि भगती रापै ॥ सभु मनु तनु हरिआ होइआ अहंकारु गवापै ॥ सभु किछु हरि का खेलु है गुरमुखि किसै बुझाई ॥13॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ ये सारा (जगत का आसरा) परमात्मा का (मानो) शरीर है। हर जगह प्रभू खुद ही व्यापक है। परमात्मा (की महानता वडिआई) का मूल्य नहीं आँका जा सकता। कोई बात सूझती नहीं (जिससे) उसकी महानता को बयान कर सकें। सतिगुरू की कृपा से परमात्मा की सिफतसालाह की जा सकती है (जो करता है वह प्रभू की भक्ति में रंगा जाता है। उसका मन और तन खिल उठता है और अहंकार नाश हो जाता है)। ये सारा जगत प्रभू का बनाया हुआ तमाशा है। सतिगुरू के द्वारा किसी विरले को इस खेल की समझ देता है। 13।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (गौतम ऋषि ने) हजार (भगों) का दण्ड दे के इन्द्र का रुला दिया। (श्री रामचंद्र से अपना बल छिनवा के) परस राम घर आ के रोया। राजा अजै रोया जब उसको (लिद की दी हुई) भिक्षा खानी पड़ी। प्रभू की हजूरी से ऐसी ही सजा मिलती है। जब राम (जी) को देश निकाला मिला
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।