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953
रामकली
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· रामकली की वार, सलोक · राग रामकली
तिसु पाखंडी जरा न मरणा ॥
तिसु पाखंडी जरा न मरणा ॥
बोलै चरपटु सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥5॥
बोलै चरपटु सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥5॥
हिन्दी अर्थ: उस नास्तिक को (भाव, उस मनुष्य को जिसने अपने अंदर से पापों का नाश कर दिया है) बुढ़ापा और मौत (उसे) छू नहीं सकते (भाव, वह इनके डर से मुक्त हो जाता है)। अगर चरपट (भी ऐसी नास्तिक जुगति बरत के) सति-स्वरूप प्रभू को जपे तो (ये चरपट भी) परम ब्रहम में लीन हो जाए। इसकी कोई (अलग) रूप-रेखा ना रह जाए। 5।
· रामकली की वार, सलोक · राग रामकली
सो बैरागी जि उलटे ब्रहमु ॥
मः 1 ॥
सो बैरागी जि उलटे ब्रहमु ॥
गगन मंडल महि रोपै थंमु ॥
अहिनिसि अंतरि रहै धिआनि ॥
ते बैरागी सत समानि ॥
बोलै भरथरि सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥6॥
सो बैरागी जि उलटे ब्रहमु ॥
गगन मंडल महि रोपै थंमु ॥
अहिनिसि अंतरि रहै धिआनि ॥
ते बैरागी सत समानि ॥
बोलै भरथरि सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥6॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (असल) बैरागी वह है जो प्रभू को (अपने हृदय की ओर) पलटाता है (अर्थात, जो प्रभू पति को अपनी हृदय-सेज पर ला बसाता है)। जो प्रभू का नाम-रूप दसम द्वार (रूपी शामियाने) में खड़ा करता है (भाव, जो मनुष्य प्रभू के नाम को इस तरह अपना सहारा बनाता है कि उसकी सुरति सदा ऊपर को प्रभू-चरणों में टिकी रहती है। मायावी पदार्थों के प्रभाव में नीचे नहीं गिरती)। जो दिन-रात अपने अंदर ही (भाव, हृदय में ही) प्रभू की याद में जुड़ा रहता है। ऐसे बैरागी प्रभू का रूप हो जाते हैं। अगर भरथरी (भी ऐसे बैरागी की जुगति बरत के) सति-स्वरूप प्रभू को जपे तो (ये भरथरी भी) परम ब्रहम में लीन हो जाए। इसकी कोई (अलग) रूप-रेखा ना रह जाए। 6।
· रामकली की वार, सलोक · राग रामकली
किउ मरै मंदा किउ जीवै जुगति ॥
मः 1 ॥
किउ मरै मंदा किउ जीवै जुगति ॥
कंन पड़ाइ किआ खाजै भुगति ॥
आसति नासति एको नाउ ॥
कउणु सु अखरु जितु रहै हिआउ ॥
धूप छाव जे सम करि सहै ॥
ता नानकु आखै गुरु को कहै ॥
छिअ वरतारे वरतहि पूत ॥
ना संसारी ना अउधूत ॥
निरंकारि जो रहै समाइ ॥
काहे भीखिआ मंगणि जाइ ॥7॥
किउ मरै मंदा किउ जीवै जुगति ॥
कंन पड़ाइ किआ खाजै भुगति ॥
आसति नासति एको नाउ ॥
कउणु सु अखरु जितु रहै हिआउ ॥
धूप छाव जे सम करि सहै ॥
ता नानकु आखै गुरु को कहै ॥
छिअ वरतारे वरतहि पूत ॥
ना संसारी ना अउधूत ॥
निरंकारि जो रहै समाइ ॥
काहे भीखिआ मंगणि जाइ ॥7॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ इस जुगति से ना (मन में से) विकार दूर होता है ना ही (ऊँचा) जीवन मिलता है। (अत:) कान फड़वा के चूरमा खाने का कोई (आत्मिक) लाभ नहीं केवल वही (प्रभू का) नाम है जो संसार का अस्तित्व और अस्तित्व-हीन दोनों अवस्थाओं के वक्त मौजूद है। (अगर कोई पूछे कि यदि कान छेद करवाने से मन नहीं टिकता तो) वह कौन सा अक्षर है जिसमें हृदय जुड़ा रह सकता है (और बुराई मिट जाती है। तो इसका उक्तर ये है कि वह प्र्भु का नाम है) अगर कोई मनुष्य (इस 'नाम' की बरकति से) दुख और सुख को एक-समान सहता है। तो। नानक कहता है। वह मनुष्य ही (असल में) गुरू को याद रखता है (भाव, गुरू के वचन के मुताबिक चलता है)। (नाथ ने) चेले (भाव, जोगी लोग) (जो निरे) छे भेषों में ही व्यस्त हैं। (दरअसल) ना वे गृहस्ती हैं और ना ही विरक्त। जो मनुष्य एक निरंकार में जुड़ा रहता है वह क्यों कहीं ख़ैर माँगने जाए। (भाव, उसको फकीर बनने की आवश्यक्ता नहीं पड़ती। हाथों से किरत-कमाई करता हुआ भी प्रभू के चरणों में लीन रहता है)। 7।
· रामकली की वार, पउड़ी · राग रामकली
हरि मंदरु सोई आखीऐ जिथहु हरि जाता ॥
पउड़ी ॥
हरि मंदरु सोई आखीऐ जिथहु हरि जाता ॥
मानस देह गुर बचनी पाइआ सभु आतम रामु पछाता ॥
बाहरि मूलि न खोजीऐ घर माहि बिधाता ॥
मनमुख हरि मंदर की सार न जाणनी तिनी जनमु गवाता ॥
सभ महि इकु वरतदा गुर सबदी पाइआ जाई ॥12॥
हरि मंदरु सोई आखीऐ जिथहु हरि जाता ॥
मानस देह गुर बचनी पाइआ सभु आतम रामु पछाता ॥
बाहरि मूलि न खोजीऐ घर माहि बिधाता ॥
मनमुख हरि मंदर की सार न जाणनी तिनी जनमु गवाता ॥
सभ महि इकु वरतदा गुर सबदी पाइआ जाई ॥12॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (वैसे तो सारे शरीर ही 'हरि मंदरु' अर्थात, ईश्वर के रहने की जगह हैं। पर असल में) वही शरीर 'हरि मंदरु' कहा जाना चाहिए जिसमें ईश्वर पहचाना जाए; (सो, मनुष्य का शरीर 'हरि मंदरु' है। क्योंकि) मनुष्य-शरीर में गुरू के हुकम में चल के ईश्वर को पा सकता है। हर जगह व्यापक ज्योति दिखती है। (शरीर से) बाहर तलाशने की बिल्कुल ही आवश्यक्ता नहीं। (इस शरीर-) घर में ही सृजनहार बस रहा है। पर मन के पीछे चलने वाले बंदे (इस मनुष्य-शरीर) 'हरि मंदरु' की कद्र नहीं जानते। वे मानस जन्म (मन के पीछे चल के ही) गवा जाते हैं। (वैसे तो) सभी में एक ही प्रभू व्यापक है। पर मिलता है गुरू के शबद से ही। 12।
· रामकली की वार, सलोक · राग रामकली
मूरखु होवै सो सुणै मूरख का कहणा ॥
सलोक मः 3 ॥
मूरखु होवै सो सुणै मूरख का कहणा ॥
मूरख के किआ लखण है किआ मूरख का करणा ॥
मूरखु ओहु जि मुगधु है अहंकारे मरणा ॥
एतु कमाणै सदा दुखु दुख ही महि रहणा ॥
अति पिआरा पवै खूहि किहु संजमु करणा ॥
गुरमुखि होइ सु करे वीचारु ओसु अलिपतो रहणा ॥
हरि नामु जपै आपि उधरै ओसु पिछै डुबदे भी तरणा ॥
नानक जो तिसु भावै सो करे जो देइ सु सहणा ॥1॥
मूरखु होवै सो सुणै मूरख का कहणा ॥
मूरख के किआ लखण है किआ मूरख का करणा ॥
मूरखु ओहु जि मुगधु है अहंकारे मरणा ॥
एतु कमाणै सदा दुखु दुख ही महि रहणा ॥
अति पिआरा पवै खूहि किहु संजमु करणा ॥
गुरमुखि होइ सु करे वीचारु ओसु अलिपतो रहणा ॥
हरि नामु जपै आपि उधरै ओसु पिछै डुबदे भी तरणा ॥
नानक जो तिसु भावै सो करे जो देइ सु सहणा ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3। मूर्ख का कहा वही सुनता है (भाव, मूर्ख के कहे वही लगता है) जो खुद मूर्ख हो। मूर्ख के क्या लक्षण हैं। कैसी करतूत होती है मूर्ख की। जो मूर्ख माया का ठगा हुआ हो और जो अहंकार में आत्मिक मौत मरा हुआ हो। उसको मूर्ख कहा जाता है। माया की मस्ती ओर अहंकार में जो कुछ करें उससे सदा दुख प्राप्त होता है और सदा दुखी रहा जाता है। माया से ज्यादा प्यार करने वाला मनुष्य (माया के मोह के) कूएं में गिरा रहता है। उसके बचाव के लिए कौन से प्रयास किए जा सकते हैं। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह इस पर विचार करता है और (इस माया के मोह-रूप कूएं से) अलग रहता है; वह प्रभू का नाम जपता है। (नाम की बरकति से) वह खुद बचता है और उसके पद्चिन्हों पर चल कर डूबता हुआ साथी भी बच निकलता है। हे नानक! जो कुछ प्रभू को भाता है वही कुछ वह करता है (माया के मोह में पड़ के दुख या इससे अलोप रहके सुख) जो कुछ प्रभू देता है वही जीव सहता है। 1।
· रामकली की वार, सलोक · राग रामकली
नानकु आखै रे मना सुणीऐ सिख सही ॥
मः 1 ॥
नानकु आखै रे मना सुणीऐ सिख सही ॥
लेखा रबु मंगेसीआ बैठा कढि वही ॥
तलबा पउसनि आकीआ बाकी जिना रही ॥
अजराईलु फरेसता होसी आइ तई ॥
आवणु जाणु न सुझई भीड़ी गली फही ॥
कूड़ निखुटे नानका ओड़कि सचि रही ॥2॥
नानकु आखै रे मना सुणीऐ सिख सही ॥
लेखा रबु मंगेसीआ बैठा कढि वही ॥
तलबा पउसनि आकीआ बाकी जिना रही ॥
अजराईलु फरेसता होसी आइ तई ॥
आवणु जाणु न सुझई भीड़ी गली फही ॥
कूड़ निखुटे नानका ओड़कि सचि रही ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ नानक कहता है: हे मन! सच्ची शिक्षा सुनें। (आपके किए अमलों अर्थात आपके किए कर्मों के लेखे वाली) किताब निकाल के बैठा हुआ ईश्वर (आपसे) हिसाब पूछेगा। जिन-जिन का लेखे का हिसाब बकाया रह जाता है उन-उन लोगों को बुलावे आएंगे। मौत का फरिश्ता (किए हुए कर्मों के अनुसार दुख देने के लिए सिर पर) आ तैयार खड़ा होंगे। उस मुश्किल में फसी हुई जिंद को (उस वक्त) कुछ सूझता नहीं। हे नानक! झूठ के व्यापारी हार के जाते हैं। सच का सौदा करने से ही अंत को विजय मिलती है। 2।
· रामकली की वार, पउड़ी · राग रामकली
हरि का सभु सरीरु है हरि रवि रहिआ सभु आपै ॥
पउड़ी ॥
हरि का सभु सरीरु है हरि रवि रहिआ सभु आपै ॥
हरि की कीमति न पवै किछु कहणु न जापै ॥
गुर परसादी सालाहीऐ हरि भगती रापै ॥
सभु मनु तनु हरिआ होइआ अहंकारु गवापै ॥
सभु किछु हरि का खेलु है गुरमुखि किसै बुझाई ॥13॥
हरि का सभु सरीरु है हरि रवि रहिआ सभु आपै ॥
हरि की कीमति न पवै किछु कहणु न जापै ॥
गुर परसादी सालाहीऐ हरि भगती रापै ॥
सभु मनु तनु हरिआ होइआ अहंकारु गवापै ॥
सभु किछु हरि का खेलु है गुरमुखि किसै बुझाई ॥13॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ ये सारा (जगत का आसरा) परमात्मा का (मानो) शरीर है। हर जगह प्रभू खुद ही व्यापक है। परमात्मा (की महानता वडिआई) का मूल्य नहीं आँका जा सकता। कोई बात सूझती नहीं (जिससे) उसकी महानता को बयान कर सकें। सतिगुरू की कृपा से परमात्मा की सिफतसालाह की जा सकती है (जो करता है वह प्रभू की भक्ति में रंगा जाता है। उसका मन और तन खिल उठता है और अहंकार नाश हो जाता है)। ये सारा जगत प्रभू का बनाया हुआ तमाशा है। सतिगुरू के द्वारा किसी विरले को इस खेल की समझ देता है। 13।
· रामकली की वार, सलोक · राग रामकली
सहंसर दान दे इंद्रु रोआइआ ॥
सलोकु मः 1 ॥
सहंसर दान दे इंद्रु रोआइआ ॥
परस रामु रोवै घरि आइआ ॥
अजै सु रोवै भीखिआ खाइ ॥
ऐसी दरगह मिलै सजाइ ॥
रोवै रामु निकाला भइआ ॥
सहंसर दान दे इंद्रु रोआइआ ॥
परस रामु रोवै घरि आइआ ॥
अजै सु रोवै भीखिआ खाइ ॥
ऐसी दरगह मिलै सजाइ ॥
रोवै रामु निकाला भइआ ॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (गौतम ऋषि ने) हजार (भगों) का दण्ड दे के इन्द्र का रुला दिया। (श्री रामचंद्र से अपना बल छिनवा के) परस राम घर आ के रोया। राजा अजै रोया जब उसको (लिद की दी हुई) भिक्षा खानी पड़ी। प्रभू की हजूरी से ऐसी ही सजा मिलती है। जब राम (जी) को देश निकाला मिला
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 953 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 953 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।