Lulla Family

अंग 952

अंग
952
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
विणु गुर पीरै को थाइ न पाई ॥
राहु दसाइ ओथै को जाइ ॥
करणी बाझहु भिसति न पाइ ॥
जोगी कै घरि जुगति दसाई ॥
तितु कारणि कनि मुंद्रा पाई ॥
मुंद्रा पाइ फिरै संसारि ॥
जिथै किथै सिरजणहारु ॥
जेते जीअ तेते वाटाऊ ॥
चीरी आई ढिल न काऊ ॥
एथै जाणै सु जाइ सिञाणै ॥
होरु फकड़ु हिंदू मुसलमाणै ॥
सभना का दरि लेखा होइ ॥
करणी बाझहु तरै न कोइ ॥
सचो सचु वखाणै कोइ ॥
नानक अगै पुछ न होइ ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: गुरू-पीर के हुकम में नहीं चलता तो (दरगाह में) कबूल नहीं हो सकता। (बहिश्त का) रास्ता तो हर कोई पूछता है पर उस रास्ते पर चलता कोई विरला है और ने क अमलों के बिना बहिश्त नहीं मिलता। जोगी के डेरे पर (मनुष्य जोग की) जुगति पूछने जाता है उस (‘जुगति’) की खातिर कान में मुंद्राएं डाल लेता है; मुंद्राएं डाल के संसार में चक्कर लगाता है (भाव। गृहस्त छोड़ के बाहर जगत में भटकता है)। पर सृजनहार तो हर जगह मौजूद है (बाहर जंगलों में तलाशना व्यर्थ है)। (जगत में) जितने भी जीव (आते) हैं सारे मुसाफिर हैं। जिस-जिस को आमंत्रण आता है वह यहाँ देरी नहीं कर सकता (जाना ही पड़ता है); जिसने इस जनम में ईश्वर को पहचान लिया है वह (परलोक में) जा के भी पहचान लेता है (अगर ये उद्यम नहीं किया तो) और दावा कि मैं हिन्दू हूँ अथवा मुसलमान हूँ। सब फोका है। (हिंदू हो चाहे मुसलमान) हरेक के कर्मों का लेखा प्रभू की हजूरी में होता है। अपने नेक आचरण के बिना कभी कोई पार नहीं लांघा। जो मनुष्य (इस जन्म में) केवल सच्चे ईश्वर को याद करता है। हे नानक ! परलोक में उसको लेखा नहीं पूछा जाता। 2।
पउड़ी ॥
हरि का मंदरु आखीऐ काइआ कोटु गड़ु ॥
अंदरि लाल जवेहरी गुरमुखि हरि नामु पड़ु ॥
हरि का मंदरु सरीरु अति सोहणा हरि हरि नामु दिड़ु ॥
मनमुख आपि खुआइअनु माइआ मोह नित कड़ु ॥
सभना साहिबु एकु है पूरै भागि पाइआ जाई ॥11॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ इस शरीर को परमात्मा के रहने के लिए सुंदर घर कहना चाहिए। किला गढ़ कहा जाना चाहिए। अगर गुरू के हुकम में चल के परमात्मा का नाम जपोगे तो इस शरीर के अंदर ही अच्छे गुण-रूपी लाल-जवाहर मिल जाएंगे। (हे मन !) परमात्मा का नाम (हृदय में) पक्का करके रख। तब ही ये शरीर ये प्रभू का मन्दिर बहुत सुंदर हो सकता है। (पर) जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलते हैं उन्हें प्रभू ने स्वयं तोड़ा हुआ है उनको माया के मोह की चिंता नित्य (दुखी करती) है। सारे जीवों का मालिक वही एक परमात्मा है। पर मिलता पूरी किस्मत से है। 11।
सलोक मः 1 ॥
ना सति दुखीआ ना सति सुखीआ ना सति पाणी जंत फिरहि ॥
ना सति मूंड मुडाई केसी ना सति पड़िआ देस फिरहि ॥
ना सति रुखी बिरखी पथर आपु तछावहि दुख सहहि ॥
ना सति हसती बधे संगल ना सति गाई घाहु चरहि ॥
जिसु हथि सिधि देवै जे सोई जिस नो देइ तिसु आइ मिलै ॥
नानक ता कउ मिलै वडाई जिसु घट भीतरि सबदु रवै ॥
सभि घट मेरे हउ सभना अंदरि जिसहि खुआई तिसु कउणु कहै ॥
जिसहि दिखाला वाटड़ी तिसहि भुलावै कउणु ॥
जिसहि भुलाई पंध सिरि तिसहि दिखावै कउणु ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (तप आदि से) दुखी होने में (सिद्धि और महानता की प्राप्ति) नहीं। सुख में भी नहीं। और पानी में खड़े हो के भी नहीं है (अगर ऐसा होता तो बेअंत) जीव जो पानी में ही विचरते हैं (उन्हें सहज ही सिद्धि मिल जाती)। सिर के केश मुनाने में (भाव। रुंड-मुंड हो जाने पर) सिद्धि नहीं है; इस बात में भी (जीवन-मनोरथ की) सिद्धि नहीं कि विद्वान बन के (और लोगों को चर्चा में जीतने के लिए) देश-देशांतरों में फिरें। रुखों-वृक्षों और पत्थरों पर भी सिद्धि नहीं है ये अपने आप को कटाते हैं और (कई किस्म के) दुख बर्दाश्त करते हैं (भाव। रुखो-वृक्षों व पत्थरों की तरह ही जड़ हो के अपने ऊपर कई तरह के कष्ट सहने से भी जनम-मनोरथ की सिद्धि प्राप्त नहीं होती)। (कमर के साथ संगल बाँधने से भी) सिद्धि नहीं। हाथी संगलों से ही बँधे होते हैं; (कंद-मूल खाने में भी) सिद्धि नहीं। गाएं घास चुगती ही हैं (भाव। हाथियों की तरह संगल बाँधने में और गायों की तरह कंद-मूल खाने में भी सिद्धि की प्राप्ति नहीं है)। जिस प्रभू के हाथ में सफलता है अगर वह स्वयं दे और जिसको देता है उसको प्राप्त होती है। हे नानक ! महानता (आदर व वडिआई) उस जीव को मिलता है जिसके हृदय में (प्रभू की सिफतसालाह का) शबद हर वक्त मौजूद है। (प्रभू तो ऐसे कहता है कि जीवों के) सारे शरीर मेरे (शरीर) हैं। मैं सबमें बसता हूँ। जिस जीव को मैं गलत रास्ते पर डाल देता हूँ उसको कौन समझा सकता है। जिसको मैं सुंदर (बढ़िया) रास्ता दिखा देता हूँ उसको कौन भुला सकता है। जिसको मैंने (जिंदगी के) सफर के आरम्भ में भटका दिया उसको रास्ता कौन दिखा सकता है। 1।
मः 1 ॥
सो गिरही जो निग्रहु करै ॥
जपु तपु संजमु भीखिआ करै ॥
पुंन दान का करे सरीरु ॥
सो गिरही गंगा का नीरु ॥
बोलै ईसरु सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (असल) गृहस्ती वह है जो इन्द्रियों को विकारों की ओर से रोकता है। जो (प्रभू से) जप-तप और संजम रूपी खैर माँगता है। जो अपना शरीर भी पुन्य-दान वाला ही बना लेता है (भाव। ख़लकत की सेवा व भलाई करने का स्वभाव जिसके शरीर के साथ रच-मिच जाता है); वह गृहस्ती गंगा जल (जैसा पवित्र) हो जाता है। अगर ईशर (जोगी भी असल गृहस्ती वाली ये जुगति लगा के) सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को जपे तो ये भी परम ब्रहम में लीन हो जाए। इसकी कोई (अलग) रूप-रेखा ना रह जाय (अर्थात। हे ईशर जोगी ! अगर आप भी ऊपर बताई हुई जुगति से प्रभू को जपे तो आप भी परम-ब्रहम में एक-मेक हैं जाए; गृहस्त त्यागने की आवश्यक्ता ही नहीं पड़ेगी)। 2।
मः 1 ॥
सो अउधूती जो धूपै आपु ॥
भिखिआ भोजनु करै संतापु ॥
अउहठ पटण महि भीखिआ करै ॥
सो अउधूती सिव पुरि चड़ै ॥
बोलै गोरखु सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥3॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (असल) अवधूत वह है जो स्वै भाव (अहंकार) को जला देता है; जो संताप (खिझ) को मांग-मांग के लाया हुआ भोजन बनाता है (जो मांग-मांग के लाए हुए टुकड़े खाने की जगह संताप को ही खा जाय। समाप्त कर दे); जो हृदय-रूपी शहर में टिक के (प्रभू से) खैर माँगता है। वह अवधूत कल्याण-रूप प्रभू के देश में पहुँच जाता है। अगर गोरख (जोगी भी इस अवधूत की जुगति प्रयोग करके) सति-स्वरूप प्रभू को जपे तो (ये गोरख भी) परम ब्रहम में लीन हो जाए। इसकी कोई (अलग) रूप-रेखा ना रह जाए। 3।
मः 1 ॥
सो उदासी जि पाले उदासु ॥
अरध उरध करे निरंजन वासु ॥
चंद सूरज की पाए गंढि ॥
तिसु उदासी का पड़ै न कंधु ॥
बोलै गोपी चंदु सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥4॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (असल) विरक्त वह है जो उपरामता को सदा कायम रखता है। हर जगह माया-रहित प्रभू का निवास जानता है; (अपने हृदय में) शांति और ज्ञान दोनों को इकट्ठा करता है; उस विरक्त मनुष्य का शरीर (विकारों में) नहीं गिरता। अगर गोपी चंद (जोगी) (भी इस उदासी की जुगति बरत के) सति-स्वरूप प्रभू को जपे तो (ये गोपीचंद भी) परम ब्रहम में लीन हो जाए। इसका कोई (अलग) रूप-रेख ना रह जाए। 4।
मः 1 ॥
सो पाखंडी जि काइआ पखाले ॥
काइआ की अगनि ब्रहमु परजाले ॥
सुपनै बिंदु न देई झरणा ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (असली) नास्तिक वह है जो (परमात्मा की हस्ती ना मानने की जगह) शरीर को धोए (भाव। शरीर में से पापों की मौजूदगी मिटा दे)। जो अपने शरीर में ईश्वरीय ज्योति जगाता है। सपने में भी वीर्य को गिरने नहीं देता (भाव। सपने में भी अपने आप को काम-वश नहीं होने देता);

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू-पीर के हुकम में नहीं चलता तो (दरगाह में) कबूल नहीं हो सकता।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।