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अंग ९५२ · रामकली

अंग
952
रामकली
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  1. विणु गुर पीरै को थाइ न पाई ॥
  2. हरि का मंदरु आखीऐ काइआ कोटु गड़ु ॥
  3. ना सति दुखीआ ना सति सुखीआ ना सति पाणी जंत फिरहि ॥
  4. सो गिरही जो निग्रहु करै ॥
  5. सो अउधूती जो धूपै आपु ॥
  6. सो उदासी जि पाले उदासु ॥
  7. सो पाखंडी जि काइआ पखाले ॥

विणु गुर पीरै को थाइ न पाई ॥

अंग ९५१ से चला आ रहा अंश

विणु गुर पीरै को थाइ न पाई ॥
राहु दसाइ ओथै को जाइ ॥
करणी बाझहु भिसति न पाइ ॥
जोगी कै घरि जुगति दसाई ॥
तितु कारणि कनि मुंद्रा पाई ॥
मुंद्रा पाइ फिरै संसारि ॥
जिथै किथै सिरजणहारु ॥
जेते जीअ तेते वाटाऊ ॥
चीरी आई ढिल न काऊ ॥
एथै जाणै सु जाइ सिञाणै ॥
होरु फकड़ु हिंदू मुसलमाणै ॥
सभना का दरि लेखा होइ ॥
करणी बाझहु तरै न कोइ ॥
सचो सचु वखाणै कोइ ॥
नानक अगै पुछ न होइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: गुरू-पीर के हुकम में नहीं चलता तो (दरगाह में) कबूल नहीं हो सकता। (बहिश्त का) रास्ता तो हर कोई पूछता है पर उस रास्ते पर चलता कोई विरला है और ने क अमलों के बिना बहिश्त नहीं मिलता। जोगी के डेरे पर (मनुष्य जोग की) जुगति पूछने जाता है उस ('जुगति') की खातिर कान में मुंद्राएं डाल लेता है; मुंद्राएं डाल के संसार में चक्कर लगाता है (भाव। गृहस्त छोड़ के बाहर जगत में भटकता है)। पर सृजनहार तो हर जगह मौजूद है (बाहर जंगलों में तलाशना व्यर्थ है)। (जगत में) जितने भी जीव (आते) हैं सारे मुसाफिर हैं। जिस-जिस को आमंत्रण आता है वह यहाँ देरी नहीं कर सकता (जाना ही पड़ता है); जिसने इस जनम में ईश्वर को पहचान लिया है वह (परलोक में) जा के भी पहचान लेता है (अगर ये उद्यम नहीं किया तो) और दावा कि मैं हिन्दू हूँ अथवा मुसलमान हूँ। सब फोका है। (हिंदू हो चाहे मुसलमान) हरेक के कर्मों का लेखा प्रभू की हजूरी में होता है। अपने नेक आचरण के बिना कभी कोई पार नहीं लांघा। जो मनुष्य (इस जन्म में) केवल सच्चे ईश्वर को याद करता है। हे नानक ! परलोक में उसको लेखा नहीं पूछा जाता। 2।

हरि का मंदरु आखीऐ काइआ कोटु गड़ु ॥

पउड़ी ॥
हरि का मंदरु आखीऐ काइआ कोटु गड़ु ॥
अंदरि लाल जवेहरी गुरमुखि हरि नामु पड़ु ॥
हरि का मंदरु सरीरु अति सोहणा हरि हरि नामु दिड़ु ॥
मनमुख आपि खुआइअनु माइआ मोह नित कड़ु ॥
सभना साहिबु एकु है पूरै भागि पाइआ जाई ॥11॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ इस शरीर को परमात्मा के रहने के लिए सुंदर घर कहना चाहिए। किला गढ़ कहा जाना चाहिए। अगर गुरू के हुकम में चल के परमात्मा का नाम जपोगे तो इस शरीर के अंदर ही अच्छे गुण-रूपी लाल-जवाहर मिल जाएंगे। (हे मन !) परमात्मा का नाम (हृदय में) पक्का करके रख। तब ही ये शरीर ये प्रभू का मन्दिर बहुत सुंदर हो सकता है। (पर) जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलते हैं उन्हें प्रभू ने स्वयं तोड़ा हुआ है उनको माया के मोह की चिंता नित्य (दुखी करती) है। सारे जीवों का मालिक वही एक परमात्मा है। पर मिलता पूरी किस्मत से है। 11।

ना सति दुखीआ ना सति सुखीआ ना सति पाणी जंत फिरहि ॥

सलोक मः 1 ॥
ना सति दुखीआ ना सति सुखीआ ना सति पाणी जंत फिरहि ॥
ना सति मूंड मुडाई केसी ना सति पड़िआ देस फिरहि ॥
ना सति रुखी बिरखी पथर आपु तछावहि दुख सहहि ॥
ना सति हसती बधे संगल ना सति गाई घाहु चरहि ॥
जिसु हथि सिधि देवै जे सोई जिस नो देइ तिसु आइ मिलै ॥
नानक ता कउ मिलै वडाई जिसु घट भीतरि सबदु रवै ॥
सभि घट मेरे हउ सभना अंदरि जिसहि खुआई तिसु कउणु कहै ॥
जिसहि दिखाला वाटड़ी तिसहि भुलावै कउणु ॥
जिसहि भुलाई पंध सिरि तिसहि दिखावै कउणु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (तप आदि से) दुखी होने में (सिद्धि और महानता की प्राप्ति) नहीं। सुख में भी नहीं। और पानी में खड़े हो के भी नहीं है (अगर ऐसा होता तो बेअंत) जीव जो पानी में ही विचरते हैं (उन्हें सहज ही सिद्धि मिल जाती)। सिर के केश मुनाने में (भाव। रुंड-मुंड हो जाने पर) सिद्धि नहीं है; इस बात में भी (जीवन-मनोरथ की) सिद्धि नहीं कि विद्वान बन के (और लोगों को चर्चा में जीतने के लिए) देश-देशांतरों में फिरें। रुखों-वृक्षों और पत्थरों पर भी सिद्धि नहीं है ये अपने आप को कटाते हैं और (कई किस्म के) दुख बर्दाश्त करते हैं (भाव। रुखो-वृक्षों व पत्थरों की तरह ही जड़ हो के अपने ऊपर कई तरह के कष्ट सहने से भी जनम-मनोरथ की सिद्धि प्राप्त नहीं होती)। (कमर के साथ संगल बाँधने से भी) सिद्धि नहीं। हाथी संगलों से ही बँधे होते हैं; (कंद-मूल खाने में भी) सिद्धि नहीं। गाएं घास चुगती ही हैं (भाव। हाथियों की तरह संगल बाँधने में और गायों की तरह कंद-मूल खाने में भी सिद्धि की प्राप्ति नहीं है)। जिस प्रभू के हाथ में सफलता है अगर वह स्वयं दे और जिसको देता है उसको प्राप्त होती है। हे नानक ! महानता (आदर व वडिआई) उस जीव को मिलता है जिसके हृदय में (प्रभू की सिफतसालाह का) शबद हर वक्त मौजूद है। (प्रभू तो ऐसे कहता है कि जीवों के) सारे शरीर मेरे (शरीर) हैं। मैं सबमें बसता हूँ। जिस जीव को मैं गलत रास्ते पर डाल देता हूँ उसको कौन समझा सकता है। जिसको मैं सुंदर (बढ़िया) रास्ता दिखा देता हूँ उसको कौन भुला सकता है। जिसको मैंने (जिंदगी के) सफर के आरम्भ में भटका दिया उसको रास्ता कौन दिखा सकता है। 1।

सो गिरही जो निग्रहु करै ॥

मः 1 ॥
सो गिरही जो निग्रहु करै ॥
जपु तपु संजमु भीखिआ करै ॥
पुंन दान का करे सरीरु ॥
सो गिरही गंगा का नीरु ॥
बोलै ईसरु सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (असल) गृहस्ती वह है जो इन्द्रियों को विकारों की ओर से रोकता है। जो (प्रभू से) जप-तप और संजम रूपी खैर माँगता है। जो अपना शरीर भी पुन्य-दान वाला ही बना लेता है (भाव। ख़लकत की सेवा व भलाई करने का स्वभाव जिसके शरीर के साथ रच-मिच जाता है); वह गृहस्ती गंगा जल (जैसा पवित्र) हो जाता है। अगर ईशर (जोगी भी असल गृहस्ती वाली ये जुगति लगा के) सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को जपे तो ये भी परम ब्रहम में लीन हो जाए। इसकी कोई (अलग) रूप-रेखा ना रह जाय (अर्थात। हे ईशर जोगी ! अगर आप भी ऊपर बताई हुई जुगति से प्रभू को जपे तो आप भी परम-ब्रहम में एक-मेक हो जाए; गृहस्त त्यागने की आवश्यक्ता ही नहीं पड़ेगी)। 2।

सो अउधूती जो धूपै आपु ॥

मः 1 ॥
सो अउधूती जो धूपै आपु ॥
भिखिआ भोजनु करै संतापु ॥
अउहठ पटण महि भीखिआ करै ॥
सो अउधूती सिव पुरि चड़ै ॥
बोलै गोरखु सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥3॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (असल) अवधूत वह है जो स्वै भाव (अहंकार) को जला देता है; जो संताप (खिझ) को मांग-मांग के लाया हुआ भोजन बनाता है (जो मांग-मांग के लाए हुए टुकड़े खाने की जगह संताप को ही खा जाय। समाप्त कर दे); जो हृदय-रूपी शहर में टिक के (प्रभू से) खैर माँगता है। वह अवधूत कल्याण-रूप प्रभू के देश में पहुँच जाता है। अगर गोरख (जोगी भी इस अवधूत की जुगति प्रयोग करके) सति-स्वरूप प्रभू को जपे तो (ये गोरख भी) परम ब्रहम में लीन हो जाए। इसकी कोई (अलग) रूप-रेखा ना रह जाए। 3।

सो उदासी जि पाले उदासु ॥

मः 1 ॥
सो उदासी जि पाले उदासु ॥
अरध उरध करे निरंजन वासु ॥
चंद सूरज की पाए गंढि ॥
तिसु उदासी का पड़ै न कंधु ॥
बोलै गोपी चंदु सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥4॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (असल) विरक्त वह है जो उपरामता को सदा कायम रखता है। हर जगह माया-रहित प्रभू का निवास जानता है; (अपने हृदय में) शांति और ज्ञान दोनों को इकट्ठा करता है; उस विरक्त मनुष्य का शरीर (विकारों में) नहीं गिरता। अगर गोपी चंद (जोगी) (भी इस उदासी की जुगति बरत के) सति-स्वरूप प्रभू को जपे तो (ये गोपीचंद भी) परम ब्रहम में लीन हो जाए। इसका कोई (अलग) रूप-रेख ना रह जाए। 4।

सो पाखंडी जि काइआ पखाले ॥

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मः 1 ॥
सो पाखंडी जि काइआ पखाले ॥
काइआ की अगनि ब्रहमु परजाले ॥
सुपनै बिंदु न देई झरणा ॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (असली) नास्तिक वह है जो (परमात्मा की हस्ती ना मानने की जगह) शरीर को धोए (भाव। शरीर में से पापों की मौजूदगी मिटा दे)। जो अपने शरीर में ईश्वरीय ज्योति जगाता है। सपने में भी वीर्य को गिरने नहीं देता (भाव। सपने में भी अपने आप को काम-वश नहीं होने देता);

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 952 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९५२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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