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अंग 951

अंग
951
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मलु कूड़ी नामि उतारीअनु जपि नामु होआ सचिआरु ॥
जन नानक जिस दे एहि चलत हहि सो जीवउ देवणहारु ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: झूठे पदार्थों (के मोह) की मैल उस मनुष्य ने प्रभू के नाम के द्वारा उतार ली है। नाम जप के वह सत्य का व्यापारी बन गया है। हे दास नानक ! (अरदास कर कि) जिस प्रभू के नाम में ये बरकतें हैं वह दाता जीता रहे (भाव। सदा हमारे सिर पर हाथ रखी रखे)। 2।
पउड़ी ॥
तुधु जेवडु दाता नाहि किसु आखि सुणाईऐ ॥
गुर परसादी पाइ जिथहु हउमै जाईऐ ॥
रस कस सादा बाहरा सची वडिआईऐ ॥
जिस नो बखसे तिसु देइ आपि लए मिलाईऐ ॥
घट अंतरि अंम्रितु रखिओनु गुरमुखि किसै पिआई ॥9॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (हे प्रभू !) आपके जितना कोई दाता नहीं। किस की बाबत कह के बताएं (कि वह आपके जितना दाता है) । (भावसब दातें आपसे ही मिलती हैं। नाम-अमृत का दाता भी आप ही है)। (अमृत) सतिगुरू की कृपा से ही मिलता है। जहाँ से (भाव। गुरू से ही) अहंकार नाश होता है। (नाम अमृत का दाता प्रभू) सारे रसों और स्वादों (के प्रभाव) से ऊपर है। उसकी बुजुर्गी सदा कायम रहने वाली है। प्रभू जिस पर मेहर करता है उसको (अमृत) बख्शता है और उसको स्वयं ही (अपने में) जोड़ लेता है। (वैसे तो यह) अमृत उसने हरेक के हृदय में रखा हुआ है पर जिस किसी को मिलाता है गुरू के माध्यम से मिलाता है। 9।
सलोक मः 3 ॥
बाबाणीआ कहाणीआ पुत सपुत करेनि ॥
जि सतिगुर भावै सु मंनि लैनि सेई करम करेनि ॥
जाइ पुछहु सिम्रिति सासत बिआस सुक नारद बचन सभ स्रिसटि करेनि ॥
सचै लाए सचि लगे सदा सचु समालेनि ॥
नानक आए से परवाणु भए जि सगले कुल तारेनि ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ सतिगुरू की साखियाँ (सिख-) पुत्रों को (गुरमुख) पुत्र बना देती हैं; (गुरू-साखियों की बरकति से। गुरमुख सिख-पुत्र) उन बातों पर विश्वास करने लगते हैं और वह काम करते हैं जो सतिगुरू को भाते हैं। (अगर इस बात की तस्दीक करनी हो तो पुरातन धर्म-पुस्तक) स्मृतियाँ और शास्त्र (और पुरातन ऋषी) व्यास। सुक और नारद (आदि) को पूछ के देख लो (भाव। उनकी रचनाएं पढ़ के देख लो) जो सारी सृष्टि को (सांझा) उपदेश देते हैं। जिनको सच्चे प्रभू ने (सतिगुरू के करिश्मों की याद में) लगाया। वह सच्चे प्रभू में (भी) जुड़े। वह सदा सच्चे प्रभू को (भी) याद रखते हैं। हे नानक ! (वे सिर्फ स्वयं ही नहीं पार हुए। अपनी) सारी कुलों को भी पार लंघाते हैं। उनका ही जगत में आना कबूल है। 1।
मः 3 ॥
गुरू जिना का अंधुला सिख भी अंधे करम करेनि ॥
ओइ भाणै चलनि आपणै नित झूठो झूठु बोलेनि ॥
कूड़ु कुसतु कमावदे पर निंदा सदा करेनि ॥
ओइ आपि डुबे पर निंदका सगले कुल डोबेनि ॥
नानक जितु ओइ लाए तितु लगे उइ बपुड़े किआ करेनि ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जिन मनुष्यों का गुरू (खुद) अज्ञानी अंधा है वह सिख भी अंधे काम (भाव। बुरे काम) ही करते हैं; (अंधे गुरू के) वह (सिख) अपने मर्जी के पीछे लगते हैं। और सदा झूठ बोलते हैं; झूठ और ठगी कमाते हैं। सदा दूसरों की निंदा करते हैं; दूसरों की निंदा करने वाले वह मनुष्य खुद भी डूबते हैं और अपनी सारी कुलों को भी ग़रक करते हैं। (पर) हे नानक ! वह बिचारे करें भी क्या। जिधर उनको (प्रभू ने) लगाया है वे उधर ही लगे हुए हैं। 2।
पउड़ी ॥
सभ नदरी अंदरि रखदा जेती सिसटि सभ कीती ॥
इकि कूड़ि कुसति लाइअनु मनमुख विगूती ॥
गुरमुखि सदा धिआईऐ अंदरि हरि प्रीती ॥
जिन कउ पोतै पुंनु है तिन॑ वाति सिपीती ॥
नानक नामु धिआईऐ सचु सिफति सनाई ॥10॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (प्रभू ने) जितनी सृष्टि पैदा की है। उस सारी को अपनी नजर तले रखता है। उसने कई जीवों को झूठ और ठॅगी में लगा रखा है। वह जीव अपने मन के पीछे चल के ख्वार हो रहे हैं। जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलते हैं वे सदा प्रभू का ध्यान धरते हैं क्योंकि उनके हृदय में प्रभू की प्रीति है। जिनके पल्ले (कोई पिछली की हुई) भलाई है उनके मुँह में (प्रभू की) सिफत सालाह टिकी रहती है। हे नानक ! नाम ही सिमरना चाहिए। परमातमा की सिफत-सालाह ही सदा कायम रहने वाली चीज है। 10।
सलोकु मः 1 ॥
सती पापु करि सतु कमाहि ॥
गुर दीखिआ घरि देवण जाहि ॥
इसतरी पुरखै खटिऐ भाउ ॥
भावै आवउ भावै जाउ ॥
सासतु बेदु न मानै कोइ ॥
आपो आपै पूजा होइ ॥
काजी होइ कै बहै निआइ ॥
फेरे तसबी करे खुदाइ ॥
वढी लै कै हकु गवाए ॥
जे को पुछै ता पड़ि सुणाए ॥
तुरक मंत्रु कनि रिदै समाहि ॥
लोक मुहावहि चाड़ी खाहि ॥
चउका दे कै सुचा होइ ॥
ऐसा हिंदू वेखहु कोइ ॥
जोगी गिरही जटा बिभूत ॥
आगै पाछै रोवहि पूत ॥
जोगु न पाइआ जुगति गवाई ॥
कितु कारणि सिरि छाई पाई ॥
नानक कलि का एहु परवाणु ॥
आपे आखणु आपे जाणु ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ जो मनुष्य अपने आप को धर्मी (भाव। सदाचारी) कहलवाते हैं वे (छुप के) विकार करके भी (बाहर) जाहिर यही करते हैं कि धर्म कमा रहे हैं। (अपने आप को) गुरू (कहलवाने वाले) (माया की खातिर) चेलों के घर में शिक्षा देने जाते हैं। (कहलवाती पतिव्रता है पर) स्त्री का अपने पति के साथ प्यार तभी है जब वह कमा के लाए (वरना) पति चाहे घर आए चाहे चला जाए (स्त्री परवाह नहीं करती)। (ब्राह्मण का हाल देखो। अपने) कोई भी वेद-शास्त्र नहीं मान रहा। अपनी-अपनी मतलब की ही पूजा हो रही है। काज़ी बन के (दूसरों का) न्याय करने बैठता है। तसब्बी फेरता है खुदा खुदा कहता है। (पर न्याय करने के वक्त) रिश्वत ले के (दूसरे का) हक मारता है। अगर कोई (उसके इस काम पर) ऐतराज़ करे तो (कोई ना कोई शरा की बात) पढ़ के सुना देता है (हिन्दू आगुओं का हाल देखो। अपने) कान और हृदय में (तो) तुर्क (हाकिमों) का हुकम टिकाए रखते हैं। लोगों को लुटवाते हैं उनकी चुगली (हाकिमों के पास) करते हैं। जो (सिर्फ) चौका दे के ही स्वच्छ बना फिरता है ऐसे हिन्दू को देखो जोगी ने जटाएं रखी हुई हैं। राख भी मली हुई है। पर है गृहस्ती। उसके आगे-पीछे बच्चे रोते-फिरते हैं। जोग-मार्ग भी नहीं मिला और जीने की जुगति भी गवा बैठे हैं। सिर पर राख उसने किस लिए डाली है। हे नानक ! ये है कलियुग का प्रभाव कि कलिजुग खुद ही (भाव। कलियुगी स्वभाव वाला आदमी खुद ही) चौधरी है और खुद ही अपनी करतूत की महिमा करने वाला है। 1।
मः 1 ॥
हिंदू कै घरि हिंदू आवै ॥
सूतु जनेऊ पड़ि गलि पावै ॥
सूतु पाइ करे बुरिआई ॥
नाता धोता थाइ न पाई ॥
मुसलमानु करे वडिआई ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ (किसी खत्री आदि) हिन्दू के घर में ब्राहमण आता है और (मंत्र आदि) पढ़ के (उस खत्री के) गले में धागा जनेऊ डाल देता है; (ये मनुष्य जनेऊ पहन तो लेता है। पर) जनेऊ पहन के भी बुरे-कर्म किए जाता है (इस तरह नित्य) नहाने-धोने से वह (प्रभू के दर पर) कबूल नहीं हो जाता। मुसलमान मनुष्य (दीन की) वडिआई (बड़ाई) करता है पर अगर

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “झूठे पदार्थों (के मोह) की मैल उस मनुष्य ने प्रभू के नाम के द्वारा उतार ली है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।