अंग
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रामकली
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जिउ बैसंतरि धातु सुधु होइ तिउ हरि का भउ दुरमति मैलु गवाइ ॥
जिउ बैसंतरि धातु सुधु होइ तिउ हरि का भउ दुरमति मैलु गवाइ ॥
नानक ते जन सोहणे जो रते हरि रंगु लाइ ॥1॥
नानक ते जन सोहणे जो रते हरि रंगु लाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: जैसे आग में (डालने पर सोना आदि) धातु साफ हो जाती है। इसी तरह परमात्मा का डर (मनुष्य की) दुर्मति की मैल को काट देता है। हे नानक ! वह लोग सुंदर हैं जो परमात्मा के साथ प्रेम जोड़ के (उसके प्रेम में) रंगे हुए हैं। 1।
रामकली रामु मनि वसिआ ता बनिआ सीगारु ॥
मः 3 ॥
रामकली रामु मनि वसिआ ता बनिआ सीगारु ॥
गुर कै सबदि कमलु बिगसिआ ता सउपिआ भगति भंडारु ॥
भरमु गइआ ता जागिआ चूका अगिआन अंधारु ॥
तिस नो रूपु अति अगला जिसु हरि नालि पिआरु ॥
सदा रवै पिरु आपणा सोभावंती नारि ॥
मनमुखि सीगारु न जाणनी जासनि जनमु सभु हारि ॥
बिनु हरि भगती सीगारु करहि नित जंमहि होइ खुआरु ॥
सैसारै विचि सोभ न पाइनी अगै जि करे सु जाणै करतारु ॥
नानक सचा एकु है दुहु विचि है संसारु ॥
चंगै मंदै आपि लाइअनु सो करनि जि आपि कराए करतारु ॥2॥
रामकली रामु मनि वसिआ ता बनिआ सीगारु ॥
गुर कै सबदि कमलु बिगसिआ ता सउपिआ भगति भंडारु ॥
भरमु गइआ ता जागिआ चूका अगिआन अंधारु ॥
तिस नो रूपु अति अगला जिसु हरि नालि पिआरु ॥
सदा रवै पिरु आपणा सोभावंती नारि ॥
मनमुखि सीगारु न जाणनी जासनि जनमु सभु हारि ॥
बिनु हरि भगती सीगारु करहि नित जंमहि होइ खुआरु ॥
सैसारै विचि सोभ न पाइनी अगै जि करे सु जाणै करतारु ॥
नानक सचा एकु है दुहु विचि है संसारु ॥
चंगै मंदै आपि लाइअनु सो करनि जि आपि कराए करतारु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ रामकली (रागिनी) के माध्यम से अगर राम (जीव-स्त्री) के मन में बस जाए तब ही उसका (प्रभू-पति को मिलने के लिए किया हुआ उद्यम रूप) श्रृंगार सफल है। अगर सतिगुरू के शबद के द्वारा हृदय-कमल खिल जाए तो ही भक्ति का खजाना मिलता है। अगर (गुरू-शबद के द्वारा) मन की भटकना दूर हो जाए तो ही मन जागा हुआ (समझो। क्योंकि) अज्ञान का अंधकार समाप्त हो जाता है। जिस (जीव-स्त्री) का प्रभू (-पति) के साथ प्यार बन जाता है उस (की आत्मा) को बहुत सुंदर रूप चढ़ता है। वह शोभावंती (जीव-) स्त्री सदा अपने (प्रभू-) पति को सिमरती है। मन के पीछे चलने वाली (जीव-सि्त्रयाँ प्रभू को प्रसन्न करने वाला) श्रृंगार करना नहीं जानतीं; वे सारा (मनुष्य-) जनम हार के जाएंगी; प्रभू (-पति) की भक्ति के बिना (और कर्म-धर्म आदि) श्रंृगार जो (जीव-सि्त्रयाँ) करती हैं वह नित्य ख्वार हो के पैदा होती हैं (भाव। जनम-मरण के चक्कर में पड़ती हैं और दुखी रहती हैं); ना तो उन्हें इस लोक में शोभा मिलती है और परलोक में जो उनके साथ बर्ताव होता हैं वह प्रभू ही जानता है। हे नानक ! (जनम-मरण से रहित) सदा कायम रहने वाला एक परमात्मा ही है। संसार (भाव। दुनियादार) जनम-मरण (के चक्कर) में है। अच्छे काम में और बुरे काम में (जीव) प्रभू ने स्वयं ही लगाए हुए हैं। जो कुछ करतार (उनसे) करवाता है वही वे करते हैं। 2।
बिनु सतिगुर सेवे सांति न आवई दूजी नाही जाइ ॥
मः 3 ॥
बिनु सतिगुर सेवे सांति न आवई दूजी नाही जाइ ॥
जे बहुतेरा लोचीऐ विणु करमा पाइआ न जाइ ॥
अंतरि लोभु विकारु है दूजै भाइ खुआइ ॥
तिन जंमणु मरणु न चुकई हउमै विचि दुखु पाइ ॥
जिनी सतिगुर सिउ चितु लाइआ सो खाली कोई नाहि ॥
तिन जम की तलब न होवई ना ओइ दुख सहाहि ॥
नानक गुरमुखि उबरे सचै सबदि समाहि ॥3॥
बिनु सतिगुर सेवे सांति न आवई दूजी नाही जाइ ॥
जे बहुतेरा लोचीऐ विणु करमा पाइआ न जाइ ॥
अंतरि लोभु विकारु है दूजै भाइ खुआइ ॥
तिन जंमणु मरणु न चुकई हउमै विचि दुखु पाइ ॥
जिनी सतिगुर सिउ चितु लाइआ सो खाली कोई नाहि ॥
तिन जम की तलब न होवई ना ओइ दुख सहाहि ॥
नानक गुरमुखि उबरे सचै सबदि समाहि ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ सतिगुरू के हुकम में चले बिना (मन को) शांति नहीं आती (और इस शांति के लिए गुरू के बिना) कोई (और) जगह नहीं; चाहे कितनी तमन्ना करें। भाग्यों के बिना (गुरू) मिलता भी नहीं (क्योंकि जितने समय तक मनुष्य के) अंदर लोभ -रूपी विकार है (तब तक वह प्रभू को छोड़ के) औरों के प्यार में ही भटकता फिरता है। (जिनका ये हाल है) उनका जनम-मरण का चक्कर समाप्त नहीं होता। उन्हें अहंकार में (ग्रसित हुओं को) दुख मिलता है। जिन मनुष्यों ने सतिगुरू से मन लगाया है उनमें से कोई भी (प्यार से) सूने हृदय वाला नहीं है; उन्हें जम का बुलावा नहीं आता (भाव। उनको मौत से डर नहीं लगता) ना ही वे किसी तरह दुखी होते हैं। हे नानक ! गुरू के हुकम में चलने वाले लोग ('जम की तलब' से) बचे हुए हैं (क्योंकि) वे गुरू के शबद द्वारा सच्चे प्रभू में लीन रहते हैं। 3।
आपि अलिपतु सदा रहै होरि धंधै सभि धावहि ॥
पउड़ी ॥
आपि अलिपतु सदा रहै होरि धंधै सभि धावहि ॥
आपि निहचलु अचलु है होरि आवहि जावहि ॥
सदा सदा हरि धिआईऐ गुरमुखि सुखु पावहि ॥
निज घरि वासा पाईऐ सचि सिफति समावहि ॥
सचा गहिर गंभीरु है गुर सबदि बुझाई ॥8॥
आपि अलिपतु सदा रहै होरि धंधै सभि धावहि ॥
आपि निहचलु अचलु है होरि आवहि जावहि ॥
सदा सदा हरि धिआईऐ गुरमुखि सुखु पावहि ॥
निज घरि वासा पाईऐ सचि सिफति समावहि ॥
सचा गहिर गंभीरु है गुर सबदि बुझाई ॥8॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (परमात्मा) स्वयं (माया के प्रभाव से) निराला रहता है। और सारे जीव (माया के) झमेले में भटक रहे हैं। प्रभू स्वयं सदा-स्थिर और अटल है। और जीव पैदा होते-मरते रहते हैं। (ऐसे प्रभू को) सदा सिमरना चाहिए। (जो) गुरू के हुकम में चल के (सिमरते हैं वे) सुख पाते हैं (गुरू के द्वारा प्रभू को सिमर के) अपने असल घर में जगह मिलती है। सिफत सालाह के द्वारा (गुरमुखि) सच्चे प्रभू में लीन रहते हैं। प्रभू सदा कायम रहने वाला और अथाह है (ये बात वह स्वयं ही) सतिगुरू के शबद द्वारा समझाता है। 8।
सचा नामु धिआइ तू सभो वरतै सचु ॥
सलोक मः 3 ॥
सचा नामु धिआइ तू सभो वरतै सचु ॥
नानक हुकमै जो बुझै सो फलु पाए सचु ॥
कथनी बदनी करता फिरै हुकमु न बूझै सचु ॥
नानक हरि का भाणा मंने सो भगतु होइ विणु मंने कचु निकचु ॥1॥
सचा नामु धिआइ तू सभो वरतै सचु ॥
नानक हुकमै जो बुझै सो फलु पाए सचु ॥
कथनी बदनी करता फिरै हुकमु न बूझै सचु ॥
नानक हरि का भाणा मंने सो भगतु होइ विणु मंने कचु निकचु ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे नानक ! (उस प्रभू का) सदा-स्थिर रहने वाला नाम सिमर जो हर जगह मौजूद है। जो मनुष्य प्रभू के हुकम को समझता है (भाव। हुकम में चलता है) वह प्रभू की प्राप्ति रूपी फल पाता है। (पर। जो मनुष्य सिर्फ) मुँह की बातें ही करता है वह अटल हुकम को नहीं समझता। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा का हुकम मानता है वह (असल) भगत है। हुकम माने बिना मनुष्य बिल्कुल कच्चा है (भाव। अल्लहड़ मन वाला है जो हर वक्त डोलता है)। 1।
मनमुख बोलि न जाणनी ओना अंदरि कामु क्रोधु अहंकारु ॥
मः 3 ॥
मनमुख बोलि न जाणनी ओना अंदरि कामु क्रोधु अहंकारु ॥
ओइ थाउ कुथाउ न जाणनी उन अंतरि लोभु विकारु ॥
ओइ आपणै सुआइ आइ बहि गला करहि ओना मारे जमु जंदारु ॥
अगै दरगह लेखै मंगिऐ मारि खुआरु कीचहि कूड़िआर ॥
एह कूड़ै की मलु किउ उतरै कोई कढहु इहु वीचारु ॥
सतिगुरु मिलै ता नामु दिड़ाए सभि किलविख कटणहारु ॥
नामु जपे नामो आराधे तिसु जन कउ करहु सभि नमसकारु ॥
मनमुख बोलि न जाणनी ओना अंदरि कामु क्रोधु अहंकारु ॥
ओइ थाउ कुथाउ न जाणनी उन अंतरि लोभु विकारु ॥
ओइ आपणै सुआइ आइ बहि गला करहि ओना मारे जमु जंदारु ॥
अगै दरगह लेखै मंगिऐ मारि खुआरु कीचहि कूड़िआर ॥
एह कूड़ै की मलु किउ उतरै कोई कढहु इहु वीचारु ॥
सतिगुरु मिलै ता नामु दिड़ाए सभि किलविख कटणहारु ॥
नामु जपे नामो आराधे तिसु जन कउ करहु सभि नमसकारु ॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलते हैं ना ही समय सिर सटीक बात करनी जानते हैं वे ना ही जगह वगैरा समझते हैं चुँकि उनके मन में काम-क्रोध और लोभ अहंकार प्रबल हैं और; (जहाँ भी) वह आ के बैठते हैं (सत्संग में आ के भी) अपने स्वार्थ के अनुसार ही बातें करते हैं। (सो हर वक्त) उन्हें भयानक जम मारता रहता है (भाव। हर वक्त आत्मिक मौत उन्हें दबा के रखती है); आगे प्रभू की हजूरी में लेखा माँगे जाने से वह झूठ के व्यापारी मार-मार के ख्वार किए जाते हैं कोई मनुष्य ये विचार बताए कि यह झूठ की मैल (भाव। उन पदार्थों के मोह जो साथ नहीं निभने) कैसे दूर हो। अगर सतिगुरू मिल जाए वह प्रभू का नाम (हृदय में) पक्का करके बैठा देता है (गुरू ये बात दृढ़ करा देता है कि) 'नाम' सारे पापों को काटने में समर्थ है। (सो। गुरू के सन्मुख हो के) जो मनुष्य नाम जपता है नाम ही सिमरता है उस मनुष्य को सारे सिर झुकाओ।
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 950 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९५० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।