जिउ बैसंतरि धातु सुधु होइ तिउ हरि का भउ दुरमति मैलु गवाइ ॥ नानक ते जन सोहणे जो रते हरि रंगु लाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: जैसे आग में (डालने पर सोना आदि) धातु साफ हो जाती है। इसी तरह परमात्मा का डर (मनुष्य की) दुर्मति की मैल को काट देता है। हे नानक ! वह लोग सुंदर हैं जो परमात्मा के साथ प्रेम जोड़ के (उसके प्रेम में) रंगे हुए हैं। 1।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ रामकली (रागिनी) के माध्यम से अगर राम (जीव-स्त्री) के मन में बस जाए तब ही उसका (प्रभू-पति को मिलने के लिए किया हुआ उद्यम रूप) श्रृंगार सफल है। अगर सतिगुरू के शबद के द्वारा हृदय-कमल खिल जाए तो ही भक्ति का खजाना मिलता है। अगर (गुरू-शबद के द्वारा) मन की भटकना दूर हो जाए तो ही मन जागा हुआ (समझो। क्योंकि) अज्ञान का अंधकार समाप्त हो जाता है। जिस (जीव-स्त्री) का प्रभू (-पति) के साथ प्यार बन जाता है उस (की आत्मा) को बहुत सुंदर रूप चढ़ता है। वह शोभावंती (जीव-) स्त्री सदा अपने (प्रभू-) पति को सिमरती है। मन के पीछे चलने वाली (जीव-सि्त्रयाँ प्रभू को प्रसन्न करने वाला) श्रृंगार करना नहीं जानतीं; वे सारा (मनुष्य-) जनम हार के जाएंगी; प्रभू (-पति) की भक्ति के बिना (और कर्म-धर्म आदि) श्रंृगार जो (जीव-सि्त्रयाँ) करती हैं वह नित्य ख्वार हो के पैदा होती हैं (भाव। जनम-मरण के चक्कर में पड़ती हैं और दुखी रहती हैं); ना तो उन्हें इस लोक में शोभा मिलती है और परलोक में जो उनके साथ बर्ताव होता हैं वह प्रभू ही जानता है। हे नानक ! (जनम-मरण से रहित) सदा कायम रहने वाला एक परमात्मा ही है। संसार (भाव। दुनियादार) जनम-मरण (के चक्कर) में है। अच्छे काम में और बुरे काम में (जीव) प्रभू ने स्वयं ही लगाए हुए हैं। जो कुछ करतार (उनसे) करवाता है वही वे करते हैं। 2।
मः 3 ॥ बिनु सतिगुर सेवे सांति न आवई दूजी नाही जाइ ॥ जे बहुतेरा लोचीऐ विणु करमा पाइआ न जाइ ॥ अंतरि लोभु विकारु है दूजै भाइ खुआइ ॥ तिन जंमणु मरणु न चुकई हउमै विचि दुखु पाइ ॥ जिनी सतिगुर सिउ चितु लाइआ सो खाली कोई नाहि ॥ तिन जम की तलब न होवई ना ओइ दुख सहाहि ॥ नानक गुरमुखि उबरे सचै सबदि समाहि ॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ सतिगुरू के हुकम में चले बिना (मन को) शांति नहीं आती (और इस शांति के लिए गुरू के बिना) कोई (और) जगह नहीं; चाहे कितनी तमन्ना करें। भाग्यों के बिना (गुरू) मिलता भी नहीं (क्योंकि जितने समय तक मनुष्य के) अंदर लोभ -रूपी विकार है (तब तक वह प्रभू को छोड़ के) औरों के प्यार में ही भटकता फिरता है। (जिनका ये हाल है) उनका जनम-मरण का चक्कर समाप्त नहीं होता। उन्हें अहंकार में (ग्रसित हुओं को) दुख मिलता है। जिन मनुष्यों ने सतिगुरू से मन लगाया है उनमें से कोई भी (प्यार से) सूने हृदय वाला नहीं है; उन्हें जम का बुलावा नहीं आता (भाव। उनको मौत से डर नहीं लगता) ना ही वे किसी तरह दुखी होते हैं। हे नानक ! गुरू के हुकम में चलने वाले लोग (‘जम की तलब’ से) बचे हुए हैं (क्योंकि) वे गुरू के शबद द्वारा सच्चे प्रभू में लीन रहते हैं। 3।
पउड़ी ॥ आपि अलिपतु सदा रहै होरि धंधै सभि धावहि ॥ आपि निहचलु अचलु है होरि आवहि जावहि ॥ सदा सदा हरि धिआईऐ गुरमुखि सुखु पावहि ॥ निज घरि वासा पाईऐ सचि सिफति समावहि ॥ सचा गहिर गंभीरु है गुर सबदि बुझाई ॥8॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (परमात्मा) स्वयं (माया के प्रभाव से) निराला रहता है। और सारे जीव (माया के) झमेले में भटक रहे हैं। प्रभू स्वयं सदा-स्थिर और अटल है। और जीव पैदा होते-मरते रहते हैं। (ऐसे प्रभू को) सदा सिमरना चाहिए। (जो) गुरू के हुकम में चल के (सिमरते हैं वे) सुख पाते हैं (गुरू के द्वारा प्रभू को सिमर के) अपने असल घर में जगह मिलती है। सिफत सालाह के द्वारा (गुरमुखि) सच्चे प्रभू में लीन रहते हैं। प्रभू सदा कायम रहने वाला और अथाह है (ये बात वह स्वयं ही) सतिगुरू के शबद द्वारा समझाता है। 8।
सलोक मः 3 ॥ सचा नामु धिआइ तू सभो वरतै सचु ॥ नानक हुकमै जो बुझै सो फलु पाए सचु ॥ कथनी बदनी करता फिरै हुकमु न बूझै सचु ॥ नानक हरि का भाणा मंने सो भगतु होइ विणु मंने कचु निकचु ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे नानक ! (उस प्रभू का) सदा-स्थिर रहने वाला नाम सिमर जो हर जगह मौजूद है। जो मनुष्य प्रभू के हुकम को समझता है (भाव। हुकम में चलता है) वह प्रभू की प्राप्ति रूपी फल पाता है। (पर। जो मनुष्य सिर्फ) मुँह की बातें ही करता है वह अटल हुकम को नहीं समझता। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा का हुकम मानता है वह (असल) भगत है। हुकम माने बिना मनुष्य बिल्कुल कच्चा है (भाव। अल्लहड़ मन वाला है जो हर वक्त डोलता है)। 1।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलते हैं ना ही समय सिर सटीक बात करनी जानते हैं वे ना ही जगह वगैरा समझते हैं चुँकि उनके मन में काम-क्रोध और लोभ अहंकार प्रबल हैं और; (जहाँ भी) वह आ के बैठते हैं (सत्संग में आ के भी) अपने स्वार्थ के अनुसार ही बातें करते हैं। (सो हर वक्त) उन्हें भयानक जम मारता रहता है (भाव। हर वक्त आत्मिक मौत उन्हें दबा के रखती है); आगे प्रभू की हजूरी में लेखा माँगे जाने से वह झूठ के व्यापारी मार-मार के ख्वार किए जाते हैं कोई मनुष्य ये विचार बताए कि यह झूठ की मैल (भाव। उन पदार्थों के मोह जो साथ नहीं निभने) कैसे दूर हो। अगर सतिगुरू मिल जाए वह प्रभू का नाम (हृदय में) पक्का करके बैठा देता है (गुरू ये बात दृढ़ करा देता है कि) ‘नाम’ सारे पापों को काटने में समर्थ है। (सो। गुरू के सन्मुख हो के) जो मनुष्य नाम जपता है नाम ही सिमरता है उस मनुष्य को सारे सिर झुकाओ।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जैसे आग में (डालने पर सोना आदि) धातु साफ हो जाती है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।