गुरमती घटि चानणा आनेरु बिनासणि ॥ हुकमे ही सभ साजीअनु रविआ सभ वणि त्रिणि ॥ सभु किछु आपे आपि है गुरमुखि सदा हरि भणि ॥ सबदे ही सोझी पई सचै आपि बुझाई ॥5॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: (जीवों के दिलों में) अंधेरा (जो उसने स्वयं ही बनाया है) दूर करने के लिए सतिगुरू की मति के द्वारा (मनुष्य के) हृदय में रौशनी (भी वह खुद ही पैदा करने वाला है)। सारी सृष्टि उसने अपने हुकम में ही रची है और वह हरेक वन में तृण में खुद ही मौजूद है। (जो कुछ बना हुआ है वह) सब कुछ स्वयं ही स्वयं है। गुरू के हुकम में चल के सदा उस प्रभू को सिमरा जा सकता है। गुरू के शबद के द्वारा ही (जीव को) सूझ पड़ती है। प्रभू स्वयं समझ देता है। 5।
सलोक मः 3 ॥ अभिआगत एहि न आखीअनि जिन के चित महि भरमु ॥ तिस दै दितै नानका तेहो जेहा धरमु ॥ अभै निरंजनु परम पदु ता का भूखा होइ ॥ तिस का भोजनु नानका विरला पाए कोइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जिन मनुष्यों के मन में भटकना हो (भाव। जो दर-दर पर भटक के रोटियाँ आटा माँगते फिरें) उनको ‘अभ्यागत’ नहीं कहते; हे नानक ! ऐसे व्यक्ति को देने से पुन्य भी ऐसा ही होता है (भाव। कोई पुन्य-कर्म नहीं)। सबसे ऊँचा दर्जा है निर्भय और माया-रहित प्रभू को मिलना। जो मनुष्य इस ‘परम पद’ का अभिलाषी है। हे नानक ! उसकी आवश्यक खुराक कोई विरला सख्श ही देता है। 1।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य पराए घर में रोटी खाते हैं उनको अभ्यागत (साधू) नहीं कहा जाता। और अपना पेट भरने की खातिर कई भेष करते हैं। हे नानक ! ‘अभ्यागत’ वही हैं जो आत्मिक मण्डल की सैर करते हैं। अपने असल घर (प्रभू) में निवास रखते हैं और अपने पति-प्रभू को पा लेते हैं। 2।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (इस ‘वेकी सृष्टि’ में) आकाश और धरती उस प्रभू ने खुद ही अलग-अलग किए हैं। और इनके अंदर वह सदा स्थिर प्रभू अपना हुकम चला रहा है; (इस सृष्टि में) हरेक घर हरेक दर सदा-स्थिर प्रभू (का ठिकाना) है क्योंकि इसमें (हर जगह) सच्चा ‘नाम’ मौजूद है। हर जगह (प्रभू का) सदा कायम रहने वाला हुकम चल रहा है। गुरू के हुकम में चल के उस सदा-स्थिर प्रभू में लीनता होती है। प्रभू स्वयं सदा एक-रस रहने वाला है। (जगत-रूप उसका) तख्त (भी) (उसी का स्वरूप) सच्चा है। (इस तख़्त पर) बैठ के वह अॅटल न्याय कर रहा है। हर जगह वही सच्चा निरोल प्रभू मौजूद है। (पर) वह अलख प्रभू लखा तभी जा सकता है अगर सतिगुरू के सन्मुख हों (घर-घाट को त्याग के नहीं)। 6।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3। (इस संसार-) समुंद्र में बेअंत प्रभू स्वयं बस रहा है। पर (उस ‘अनंत’ को छोड़ के) नाशवंत पदार्थों में लगी हुई जिंद पैदा होती-मरती रहती है। जो मनुष्य अपनी मर्जी के अनुसार चलता है उसको बहुत दुख प्राप्त होता है (क्योंकि वह ‘अनंत’ को छोड़ के नाशवंत पदार्थों के पीछे दौड़ता है); सब कुछ इस सागर में मौजूद है। पर प्रभू की मेहर से मिलता है। हे नानक ! मनुष्य को सारे ही नौ खजाने मिल जाते हैं अगर मनुष्य (इस सागर में व्यापक प्रभू की) रजा में चले। 1।
मः 3 ॥ सहजे सतिगुरु न सेविओ विचि हउमै जनमि बिनासु ॥ रसना हरि रसु न चखिओ कमलु न होइओ परगासु ॥ बिखु खाधी मनमुखु मुआ माइआ मोहि विणासु ॥ इकसु हरि के नाम विणु ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वासु ॥ जा आपे नदरि करे प्रभु सचा ता होवै दासनि दासु ॥ ता अनदिनु सेवा करे सतिगुरू की कबहि न छोडै पासु ॥ जिउ जल महि कमलु अलिपतो वरतै तिउ विचे गिरह उदासु ॥ जन नानक करे कराइआ सभु को जिउ भावै तिव हरि गुणतासु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य सिदक-श्रद्धा से सतिगुरू के हुकम में नहीं चला। वह अहंकार में (रह के) (जगत में) जनम ले के (जीवन) वयर्थ गवा गया; जिसने जीभ से प्रभू के नाम का आनंद नहीं लिया उसका हृदय-रूप कमल पुष्प नहीं खिला। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (विकारों की) विष खाता रहा। (असल जीवन की ओर से) मरा ही रहा और माया के मोह में उसकी जिंदगी तबाह हो गई। एक प्रभू का नाम सिमरन बिना (जगत में) जीना-बसना धिक्कारयोग्य है। जब सच्चा प्रभू स्वयं ही मेहर की नजर करता है तो मनुष्य (प्रभू के) सेवकों का सेवक बन जाता है। नित्य सतिगुरू के हुकम में चलता है। कभी गुरू का पल्ला नहीं छोड़ता। (फिर) वह गृहस्त में रहता हुआ भी ऐसे उपराम सा रहता है जैसे पानी में (उगा हुआ) कमल-फूल (पानी के असर से) बचा रहता है। हे दास नानक ! जैसे गुणों के खजाने परमात्मा को अच्छा लगता है वैसे हरेक जीव उसका कराया हुआ (जो वह करवाना चाहता है) ही करता है। 2।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (पहले जब प्रभू निर्गुण रूप में थे तब) कई युगों तक (बहुत समय) अंधकार था (अर्थात। तब क्या स्वरूप था- ये बात बताई नहीं जा सकती)। (फिर सरगुण रूप रच के) उसने स्वयं ही (जगत-रचना की) विचार की; उस (प्रभू) ने स्वयं ही सृष्टि पैदा की और स्वयं ही (जीवों को) बुद्धि दी; (इस तरह मनुष्य) बुद्धिवानों के द्वारा उसने स्वयं ही स्मृतियाँ और शास्त्र (आदि धर्म-पुस्तकें) बनाए। (उनमें) पाप और पुन्य का निखेड़ा किया (भाव। बताया कि ‘पाप’ क्या है और ‘पुन्य’ क्या है)। जिस मनुष्य को (ये सारा राज़) समझाता है वही समझता है। उस मनुष्य का मन गुरू के सच्चे शबद में श्रद्धा धार लेता है। हरेक कार्य में प्रभू स्वयं ही स्वयं मौजूद है। स्वयं ही मेहर करके (जीव को अपने में) मिलाता है। 7।
सलोक मः 3 ॥ इहु तनु सभो रतु है रतु बिनु तंनु न होइ ॥ जो सहि रते आपणै तिन तनि लोभ रतु न होइ ॥ भै पइऐ तनु खीणु होइ लोभ रतु विचहु जाइ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ ये सारा शरीर लहू है (भाव। सारे शरीर में लहू मौजूद है)। लहू के बिना शरीर रह नहीं सकता (फिर शरीर को चीरने से। अर्थात शरीर की पड़ताल करने से कौन सा लहू नहीं निकलता।) जो बंदे अपने पति (-प्रभू के प्यार) में रंगे हुए हैं उनके शरीर में लालच का लहू नहीं होता। अगर (परमात्मा के) डर में जीएं तो शरीर (इस तरह) क्षीण हो जाता है (कि) इसमें से लोभ का लहू निकल जाता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जीवों के दिलों में) अंधेरा (जो उसने स्वयं ही बनाया है) दूर करने के लिए सतिगुरू की मति के द्वारा (मनुष्य के) हृदय में रौशनी (भी वह खुद ही पैदा करने वाला है)।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।