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अंग 949 · रामकली

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अंग
949
रामकली
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  1. गुरमती घटि चानणा आनेरु बिनासणि ॥
  2. अभिआगत एहि न आखीअनि जिन के चित महि भरमु ॥
  3. अभिआगत एहि न आखीअनि जि पर घरि भोजनु करेनि ॥
  4. अंबरु धरति विछोड़िअनु विचि सचा असराउ ॥
  5. रैणाइर माहि अनंतु है कूड़ी आवै जाइ ॥
  6. सहजे सतिगुरु न सेविओ विचि हउमै जनमि बिनासु ॥
  7. छतीह जुग गुबारु सा आपे गणत कीनी ॥
  8. इहु तनु सभो रतु है रतु बिनु तंनु न होइ ॥

गुरु अमर दास जी · रामकली की वार, पउड़ी · राग रामकली

गुरमती घटि चानणा आनेरु बिनासणि ॥

अंग 948 से चला आ रहा अंश

गुरमती घटि चानणा आनेरु बिनासणि ॥
हुकमे ही सभ साजीअनु रविआ सभ वणि त्रिणि ॥
सभु किछु आपे आपि है गुरमुखि सदा हरि भणि ॥
सबदे ही सोझी पई सचै आपि बुझाई ॥5॥

हिन्दी अर्थ: (जीवों के दिलों में) अंधेरा (जो उसने स्वयं ही बनाया है) दूर करने के लिए सतिगुरू की मति के द्वारा (मनुष्य के) हृदय में रौशनी (भी वह खुद ही पैदा करने वाला है)। सारी सृष्टि उसने अपने हुकम में ही रची है और वह हरेक वन में तृण में खुद ही मौजूद है। (जो कुछ बना हुआ है वह) सब कुछ स्वयं ही स्वयं है। गुरू के हुकम में चल के सदा उस प्रभू को सिमरा जा सकता है। गुरू के शबद के द्वारा ही (जीव को) सूझ पड़ती है। प्रभू स्वयं समझ देता है। 5।

गुरु अमर दास जी · रामकली की वार, सलोक · राग रामकली

अभिआगत एहि न आखीअनि जिन के चित महि भरमु ॥

सलोक मः 3 ॥
अभिआगत एहि न आखीअनि जिन के चित महि भरमु ॥
तिस दै दितै नानका तेहो जेहा धरमु ॥
अभै निरंजनु परम पदु ता का भूखा होइ ॥
तिस का भोजनु नानका विरला पाए कोइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जिन मनुष्यों के मन में भटकना हो (भाव, जो दर-दर पर भटक के रोटियाँ आटा माँगते फिरें) उनको 'अभ्यागत' नहीं कहते; हे नानक! ऐसे व्यक्ति को देने से पुन्य भी ऐसा ही होता है (भाव, कोई पुन्य-कर्म नहीं)। सबसे ऊँचा दर्जा है निर्भय और माया-रहित प्रभू को मिलना। जो मनुष्य इस 'परम पद' का अभिलाषी है। हे नानक! उसकी आवश्यक खुराक कोई विरला सख्श ही देता है। 1।

गुरु अमर दास जी · रामकली की वार, सलोक · राग रामकली

अभिआगत एहि न आखीअनि जि पर घरि भोजनु करेनि ॥

मः 3 ॥
अभिआगत एहि न आखीअनि जि पर घरि भोजनु करेनि ॥
उदरै कारणि आपणे बहले भेखि करेनि ॥
अभिआगत सेई नानका जि आतम गउणु करेनि ॥
भालि लहनि सहु आपणा निज घरि रहणु करेनि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य पराए घर में रोटी खाते हैं उनको अभ्यागत (साधू) नहीं कहा जाता। और अपना पेट भरने की खातिर कई भेष करते हैं। हे नानक! 'अभ्यागत' वही हैं जो आत्मिक मण्डल की सैर करते हैं। अपने असल घर (प्रभू) में निवास रखते हैं और अपने पति-प्रभू को पा लेते हैं। 2।

गुरु अमर दास जी · रामकली की वार, पउड़ी · राग रामकली

अंबरु धरति विछोड़िअनु विचि सचा असराउ ॥

पउड़ी ॥
अंबरु धरति विछोड़िअनु विचि सचा असराउ ॥
घरु दरु सभो सचु है जिसु विचि सचा नाउ ॥
सभु सचा हुकमु वरतदा गुरमुखि सचि समाउ ॥
सचा आपि तखतु सचा बहि सचा करे निआउ ॥
सभु सचो सचु वरतदा गुरमुखि अलखु लखाई ॥6॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (इस 'वेकी सृष्टि' में) आकाश और धरती उस प्रभू ने खुद ही अलग-अलग किए हैं। और इनके अंदर वह सदा स्थिर प्रभू अपना हुकम चला रहा है; (इस सृष्टि में) हरेक घर हरेक दर सदा-स्थिर प्रभू (का ठिकाना) है क्योंकि इसमें (हर जगह) सच्चा 'नाम' मौजूद है। हर जगह (प्रभू का) सदा कायम रहने वाला हुकम चल रहा है। गुरू के हुकम में चल के उस सदा-स्थिर प्रभू में लीनता होती है। प्रभू स्वयं सदा एक-रस रहने वाला है। (जगत-रूप उसका) तख्त (भी) (उसी का स्वरूप) सच्चा है। (इस तख़्त पर) बैठ के वह अॅटल न्याय कर रहा है। हर जगह वही सच्चा निरोल प्रभू मौजूद है। (पर) वह अलख प्रभू लखा तभी जा सकता है अगर सतिगुरू के सन्मुख हों (घर-घाट को त्याग के नहीं)। 6।

गुरु अमर दास जी · रामकली की वार, सलोक · राग रामकली

रैणाइर माहि अनंतु है कूड़ी आवै जाइ ॥

सलोकु मः 3 ॥
रैणाइर माहि अनंतु है कूड़ी आवै जाइ ॥
भाणै चलै आपणै बहुती लहै सजाइ ॥
रैणाइर महि सभु किछु है करमी पलै पाइ ॥
नानक नउ निधि पाईऐ जे चलै तिसै रजाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3। (इस संसार-) समुंद्र में बेअंत प्रभू स्वयं बस रहा है। पर (उस 'अनंत' को छोड़ के) नाशवंत पदार्थों में लगी हुई जिंद पैदा होती-मरती रहती है। जो मनुष्य अपनी मर्जी के अनुसार चलता है उसको बहुत दुख प्राप्त होता है (क्योंकि वह 'अनंत' को छोड़ के नाशवंत पदार्थों के पीछे दौड़ता है); सब कुछ इस सागर में मौजूद है। पर प्रभू की मेहर से मिलता है। हे नानक! मनुष्य को सारे ही नौ खजाने मिल जाते हैं अगर मनुष्य (इस सागर में व्यापक प्रभू की) रजा में चले। 1।

गुरु अमर दास जी · रामकली की वार, सलोक · राग रामकली

सहजे सतिगुरु न सेविओ विचि हउमै जनमि बिनासु ॥

मः 3 ॥
सहजे सतिगुरु न सेविओ विचि हउमै जनमि बिनासु ॥
रसना हरि रसु न चखिओ कमलु न होइओ परगासु ॥
बिखु खाधी मनमुखु मुआ माइआ मोहि विणासु ॥
इकसु हरि के नाम विणु ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वासु ॥
जा आपे नदरि करे प्रभु सचा ता होवै दासनि दासु ॥
ता अनदिनु सेवा करे सतिगुरू की कबहि न छोडै पासु ॥
जिउ जल महि कमलु अलिपतो वरतै तिउ विचे गिरह उदासु ॥
जन नानक करे कराइआ सभु को जिउ भावै तिव हरि गुणतासु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य सिदक-श्रद्धा से सतिगुरू के हुकम में नहीं चला। वह अहंकार में (रह के) (जगत में) जनम ले के (जीवन) वयर्थ गवा गया; जिसने जीभ से प्रभू के नाम का आनंद नहीं लिया उसका हृदय-रूप कमल पुष्प नहीं खिला। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (विकारों की) विष खाता रहा। (असल जीवन की ओर से) मरा ही रहा और माया के मोह में उसकी जिंदगी तबाह हो गई। एक प्रभू का नाम सिमरन बिना (जगत में) जीना-बसना धिक्कारयोग्य है। जब सच्चा प्रभू स्वयं ही मेहर की नजर करता है तो मनुष्य (प्रभू के) सेवकों का सेवक बन जाता है। नित्य सतिगुरू के हुकम में चलता है। कभी गुरू का पल्ला नहीं छोड़ता। (फिर) वह गृहस्त में रहता हुआ भी ऐसे उपराम सा रहता है जैसे पानी में (उगा हुआ) कमल-फूल (पानी के असर से) बचा रहता है। हे दास नानक! जैसे गुणों के खजाने परमात्मा को अच्छा लगता है वैसे हरेक जीव उसका कराया हुआ (जो वह करवाना चाहता है) ही करता है। 2।

गुरु अमर दास जी · रामकली की वार, पउड़ी · राग रामकली

छतीह जुग गुबारु सा आपे गणत कीनी ॥

पउड़ी ॥
छतीह जुग गुबारु सा आपे गणत कीनी ॥
आपे स्रिसटि सभ साजीअनु आपि मति दीनी ॥
सिम्रिति सासत साजिअनु पाप पुंन गणत गणीनी ॥
जिसु बुझाए सो बुझसी सचै सबदि पतीनी ॥
सभु आपे आपि वरतदा आपे बखसि मिलाई ॥7॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (पहले जब प्रभू निर्गुण रूप में थे तब) कई युगों तक (बहुत समय) अंधकार था (अर्थात, तब क्या स्वरूप था, ये बात बताई नहीं जा सकती)। (फिर सरगुण रूप रच के) उसने स्वयं ही (जगत-रचना की) विचार की; उस (प्रभू) ने स्वयं ही सृष्टि पैदा की और स्वयं ही (जीवों को) बुद्धि दी; (इस तरह मनुष्य) बुद्धिवानों के द्वारा उसने स्वयं ही स्मृतियाँ और शास्त्र (आदि धर्म-पुस्तकें) बनाए। (उनमें) पाप और पुन्य का निखेड़ा किया (भाव, बताया कि 'पाप' क्या है और 'पुन्य' क्या है)। जिस मनुष्य को (ये सारा राज़) समझाता है वही समझता है। उस मनुष्य का मन गुरू के सच्चे शबद में श्रद्धा धार लेता है। हरेक कार्य में प्रभू स्वयं ही स्वयं मौजूद है। स्वयं ही मेहर करके (जीव को अपने में) मिलाता है। 7।

गुरु अमर दास जी · रामकली की वार, सलोक · राग रामकली

इहु तनु सभो रतु है रतु बिनु तंनु न होइ ॥

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सलोक मः 3 ॥
इहु तनु सभो रतु है रतु बिनु तंनु न होइ ॥
जो सहि रते आपणै तिन तनि लोभ रतु न होइ ॥
भै पइऐ तनु खीणु होइ लोभ रतु विचहु जाइ ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ ये सारा शरीर लहू है (भाव, सारे शरीर में लहू मौजूद है)। लहू के बिना शरीर रह नहीं सकता (फिर शरीर को चीरने से। अर्थात शरीर की पड़ताल करने से कौन सा लहू नहीं निकलता।) जो बंदे अपने पति (-प्रभू के प्यार) में रंगे हुए हैं उनके शरीर में लालच का लहू नहीं होता। अगर (परमात्मा के) डर में जीएं तो शरीर (इस तरह) क्षीण हो जाता है (कि) इसमें से लोभ का लहू निकल जाता है।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 949 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 949 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।