Lulla Family

अंग 942

अंग
942
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बिनु सबदै सभि दूजै लागे देखहु रिदै बीचारि ॥
नानक वडे से वडभागी जिनी सचु रखिआ उर धारि ॥34॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: हृदय में विचार के देख लो (भाव। अपना जाती तजरबा ही इस बात की गवाही दे देगा कि) गुरू के शबद (में जुड़े) बिना सारे लोग (प्रभू को छोड़ के) और ही (व्यस्तता) में लगे रहते हैं। हे नानक ! वे मनुष्य बड़े हैं और बहुत भाग्यशाली हैं जिन्होंने सच्चे प्रभू को टिका रखा है। 34।
गुरमुखि रतनु लहै लिव लाइ ॥
गुरमुखि परखै रतनु सुभाइ ॥
गुरमुखि साची कार कमाइ ॥
गुरमुखि साचे मनु पतीआइ ॥
गुरमुखि अलखु लखाए तिसु भावै ॥
नानक गुरमुखि चोट न खावै ॥35॥
गुरमुखि नामु दानु इसनानु ॥
गुरमुखि लागै सहजि धिआनु ॥
गुरमुखि पावै दरगह मानु ॥
गुरमुखि भउ भंजनु परधानु ॥
गुरमुखि करणी कार कराए ॥
नानक गुरमुखि मेलि मिलाए ॥36॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के कहे पर चलता है वह (प्रभू में) सुरति जोड़ के प्रभू-नाम-रूप रतन पा लेता है। वह मनुष्य (इस) अपनी लगन से ही नाम-रतन की कद्र जान लेता है। (बस ! यही) सच्ची कार गुरमुख कमाता है और सच्चे प्रभू में अपने मन को मिला लेता है। (जब) उस प्रभू को भाता है तब गुरमुख उस अलख प्रभू (के गुणों की औरों को भी) सूझ दे देता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के कहे पर चलता है वह (वह) विकारों की मार नहीं खाता। 35। जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलता है। उसका नाम जपना दान करना और स्नान करना परवान है। गुरू के सन्मुख होने से ही अडोल अवस्था में सुरति जुड़ती है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख है वह प्रभू की हजूरी में आदर पाता है वह उस प्रभू को मिल जाता है जो डर-सहम नाश करने वाला है और जो सबका मालिक है। गुरमुख मनुष्य (औरों से भी यही। भाव। गुरू के हुकम में चलने वाला) करने-योग्य काम करवाता है। (और इस तरह उनको) हे नानक ! (प्रभू के) मेल में मिला देता है। 36।
गुरमुखि सासत्र सिम्रिति बेद ॥
गुरमुखि पावै घटि घटि भेद ॥
गुरमुखि वैर विरोध गवावै ॥
गुरमुखि सगली गणत मिटावै ॥
गुरमुखि राम नाम रंगि राता ॥
नानक गुरमुखि खसमु पछाता ॥37॥
बिनु गुर भरमै आवै जाइ ॥
बिनु गुर घाल न पवई थाइ ॥
बिनु गुर मनूआ अति डोलाइ ॥
बिनु गुर त्रिपति नही बिखु खाइ ॥
बिनु गुर बिसीअरु डसै मरि वाट ॥
नानक गुर बिनु घाटे घाट ॥38॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलता है। वह (मानो) शास्त्रों स्मृतियों और वेदों का ज्ञान हासिल कर चुका है। (भाव। गुरू के हुकम में चलना ही गुरसिख के लिए वेद-शास्त्रों व वेदों का ज्ञान है)। गुरू के हुकम में चल के वह हरेक घट में व्यापक प्रभू का (सर्र्व-व्यापकता का) भेद समझ लेता है। (इस वास्ते) गुरमुखि (दूसरों के साथ) वैर-विरोध रखना भुला देता है। (इस वैर-विरोध का) सारा लेखा ही मिटा देता है (भाव। कभी ये सोच आने ही नहीं देता कि किसी ने कभी उसके साथ धक्केशाही की)। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख है। वह प्रभू के नाम के प्यार में रंगा रहता है। हे नानक ! गुरू के सन्मुख मनुष्य ने पति (-प्रभू) को पहचान लिया है। 37। सतिगुरू (की शरण आए) बिना (मनुष्य माया में) भटकता है और पैदा होता मरता रहता है। गुरू की शरण के बिना कोई मेहनत कबूल नहीं होती (क्योंकि ‘अहंकार’ टिका रहता है)। सतिगुरू के बिना ये चंचल मन बहुत शंकाओं में घिरा रहता है। जहर खा-खा के भी (भाव दुनिया के पदार्थ भोग भोग के) तृप्त नहीं होता। गुरू (की राह पर चले) बिना (जगत का मोह-रूपी) साँप डंग मारता रहता है। (जिंदगी के सफर के) आधे रास्ते पर ही (आत्मिक मौत) मर जाता है। हे नानक ! सतिगुरू के (हुकम में चले) बिना मनुष्य को (आत्मिक जीवन में) घाटा ही घाटा रहता है। 38।
जिसु गुरु मिलै तिसु पारि उतारै ॥
अवगण मेटै गुणि निसतारै ॥
मुकति महा सुख गुर सबदु बीचारि ॥
गुरमुखि कदे न आवै हारि ॥
तनु हटड़ी इहु मनु वणजारा ॥
नानक सहजे सचु वापारा ॥39॥
गुरमुखि बांधिओ सेतु बिधातै ॥
लंका लूटी दैत संतापै ॥
रामचंदि मारिओ अहि रावणु ॥
भेदु बभीखण गुरमुखि परचाइणु ॥
गुरमुखि साइरि पाहण तारे ॥
गुरमुखि कोटि तेतीस उधारे ॥40॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को सतिगुरू मिल जाता है उसको (वह दुष्तर सागर से) पार लंघा लेता है। गुरू उसके अवगुण मिटा देता है और गुण दे के उसको (विकारों से) बचा लेता है। सतिगुरू का शबद विचार के उसको (माया के बँधनों से) आजादी का बड़ा सुख मिलता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख (है वह जिंदगी की बाज़ी कभी) हार के नहीं आता। हे नानक ! गुरमुख (अपने) शरीर को सुंदर सी दुकान व मन को व्यापारी बनाता है। अडोलता में रह के नाम का व्यापार करता है। 39। करतार ने (संसार-समुंद्र पर) गुरमुखि-रूप पुल बना दिया (जैसे रामचंद्र जी ने सीता को लाने के लिए पुल बाँधा था)। (रामचंद्र जी ने) लंका लूटी और राक्षस मारे। (वेसे ही गुरू ने कामादिकों के वश में हुए शरीर को उनसे छुड़वा लिया और वह पंच दूत भी वश में हो गए)। रामचंद्र (जी) ने रावण को मारा वैसे ही गुरमुख ने मन साँप को मार दिया; सतिगुरू का उपदेश (मन को मारने के लिए यूँ काम आया जैसे) विभीषण का भेद बताना (रावण को मारने के लिए काम आया)। (रामचंद्र जी ने पुल बनाने के लिए पत्थर समुंद्र पर तैराए) सतिगुरू ने (संसार-) समुंदर से (पत्थर दिलों को) पार लंघा दिया। गुरू के द्वारा तेतीस करोड़ (भाव। बेअंत जीवों का) उद्धार हो गया। 40।
गुरमुखि चूकै आवण जाणु ॥
गुरमुखि दरगह पावै माणु ॥
गुरमुखि खोटे खरे पछाणु ॥
गुरमुखि लागै सहजि धिआनु ॥
गुरमुखि दरगह सिफति समाइ ॥
नानक गुरमुखि बंधु न पाइ ॥41॥
गुरमुखि नामु निरंजन पाए ॥
गुरमुखि हउमै सबदि जलाए ॥
गुरमुखि साचे के गुण गाए ॥
गुरमुखि साचै रहै समाए ॥
गुरमुखि साचि नामि पति ऊतम होइ ॥
नानक गुरमुखि सगल भवण की सोझी होइ ॥42॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है उसके जनम-मरन का चक्कर समाप्त हो जाता है। वह प्रभू की हजूरी में आदर लेता है। गुरू के सन्मुख मनुष्य खोटे और खरे कामों का भेदी हो जाता है (इस वास्ते खोटे कामों में फसता नहीं और) अडोलता में उसकी सुरति जुड़ी रहती है। गुरमुखि मनुष्य प्रभू की सिफत-सालाह के द्वारा प्रभू की हजूरी में टिका रहता है। (इस तरह) हे नानक ! गुरमुख (की जिंदगी) के राह में (विकारों की) कोई रोक नहीं पड़ती। 41। गुरू के हुकम में चलने वाला मनुष्य निरंजन का नाम प्राप्त करता है (क्योंकि) वह (अपने) अहंकार को गुरू के शबद द्वारा जला देता है। गुरू के सन्मुख हो के मनुष्य सच्चे प्रभू के गुण गाता है और सदा कायम रहने वाले प्रभू में लीन रहता है। सच्चे नाम में जुड़े रहने के कारण गुरमुखि को उच्च आदर मिलता है। हे नानक ! गुरमुख मनुष्य को सारे भावनों की सोझी हो जाती है (भाव। गुरमुख को ये समझ आ जाती है कि प्रभू सारे ही भवनों में मौजूद है)। 42।
कवण मूलु कवण मति वेला ॥
तेरा कवणु गुरू जिस का तू चेला ॥
कवण कथा ले रहहु निराले ॥
बोलै नानकु सुणहु तुम बाले ॥
एसु कथा का देइ बीचारु ॥
भवजलु सबदि लंघावणहारु ॥43॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (प्रश्न।) – (जीवन का) मूल क्या है। कौन सी शिक्षा लेने का (इस मनुष्य जनम का) समय है। आप किस गुरू का चेला है। कौन सी बात से आप निर्लिप रहता है। नानक कहता है (जोगियों ने कहा-) हे बालक (नानक !) सुन। (हमें) इस बात की विचार बता (हमें ये बात समझा कि कैसे) शबद से (गुरू जीव को) संसार समुंदर से पार लंघाने के समर्थ है। 43।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।