Lulla Family

अंग 943

अंग
943
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पवन अरंभु सतिगुर मति वेला ॥
सबदु गुरू सुरति धुनि चेला ॥
अकथ कथा ले रहउ निराला ॥
नानक जुगि जुगि गुर गोपाला ॥
एकु सबदु जितु कथा वीचारी ॥
गुरमुखि हउमै अगनि निवारी ॥44॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: (उक्तर।) प्राण ही अस्तित्व का मूल हैं। (ये मनुष्य जनम का) समय सतिगुरू की शिक्षा लेने का है। शबद (मेरा) गुरू है। मेरी सुरति का टिकाव (उस गुरू का) सिख है। मैं अकथ प्रभू की बातें करके (भाव। गुण गा के) माया से निर्लिप रहता हूँ। और। हे नानक ! वह गुरु गोपाल हरेक जुग में मौजूद है। केवल गुरू-शबद ही है जिससे प्रभू के गुण विचारे जा सकते हैं। (इस शबद से ही) गुरमुख मनुष्य ने अहंकार (खुदगर्जी की) आग (अपने अंदर से) दूर की है। 44।
मैण के दंत किउ खाईऐ सारु ॥
जितु गरबु जाइ सु कवणु आहारु ॥
हिवै का घरु मंदरु अगनि पिराहनु ॥
कवन गुफा जितु रहै अवाहनु ॥
इत उत किस कउ जाणि समावै ॥
कवन धिआनु मनु मनहि समावै ॥45॥
हउ हउ मै मै विचहु खोवै ॥
दूजा मेटै एको होवै ॥
जगु करड़ा मनमुखु गावारु ॥
सबदु कमाईऐ खाईऐ सारु ॥
अंतरि बाहरि एको जाणै ॥
नानक अगनि मरै सतिगुर कै भाणै ॥46॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (प्रश्न।) मोम के दातों से लोहा कैसे खाया जाए। वह कौन सा खाना है जिससे (मन का) अहंकार दूर हो जाय। अगर बरफ का मन्दिर हो। उस पर आग का चोला हो। तो उसको किस गुफा में रखें कि टिका रहे। यहां-वहां (हर जगह) किस को पहचान के (उस में ये मन) लीन रहे। वह कौन सा ध्यान है जिससे मन अपने अंदर ही टिका रहे (और बाहर ना भटके) । 45। (उक्तर।) (जो मनुष्य गुरू के सन्मुख है वह) मन में से खुदगर्जी दूर करता है। भेदभाव मिटा देता है। (सब से) सांझ बनाता है। (पर) जो मूर्ख मनुष्य मन के पीछे चलता है उसके लिए जगत कठिन (राह) है (भाव जीवन दुखों की खान है)। यह (जगत का दुख-रूपी) लोहा तभी खाया जा सकता है अगर सतिगुरू का शबद कमाएं (भाव। गुरू के हुकम में चलें)। (बस ! यह है मोम के दातों से लोहे को चबाना)। हे नानक ! जो मनुष्य (अपने) अंदर और बाहर (सारे जगत में) एक प्रभू को (मौजूद) समझता है उसकी तृष्णा की आग सतिगुरू की रजा में चलने से मिट जाती है। 46।
सच भै राता गरबु निवारै ॥
एको जाता सबदु वीचारै ॥
सबदु वसै सचु अंतरि हीआ ॥
तनु मनु सीतलु रंगि रंगीआ ॥
कामु क्रोधु बिखु अगनि निवारे ॥
नानक नदरी नदरि पिआरे ॥47॥
कवन मुखि चंदु हिवै घरु छाइआ ॥
कवन मुखि सूरजु तपै तपाइआ ॥
कवन मुखि कालु जोहत नित रहै ॥
कवन बुधि गुरमुखि पति रहै ॥
कवनु जोधु जो कालु संघारै ॥
बोलै बाणी नानकु बीचारै ॥48॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य सदा कायम रहने वाले प्रभू के डर में रति है (भाव। जिसके अंदर सदा प्रभू का भय मौजूद है) वह अहंकार दूर कर देता है। वह (सदा) सतिगुरू के शबद को विचारता है। (और शबद की सहायता से) उसने (हर जगह) एक प्रभू को पहचान लिया है। जिस मनुष्य के हृदय में गुरू का शबद बसता है उसके अंदर प्रभू (स्वयं) बसता है प्रभू के प्यार में रंग के उसका मन उसका तन शीतल हो जाता है (क्योंकि) वह अपने अंदर से काम-क्रोध रूपी जहर और तृष्णा की आग मिटा देता है। हे नानक ! वह मनुष्य मेहर करने वाले प्यारे प्रभू की नजर में रहता है। 47। कैसे (मनुष्य के मन में) शीतलता का घर चंद्रमा टिका रहे (भाव। किस तरह मन मे हमेशा ठंड-शांति बनी रहे) । कैसे (मन में) ज्ञान का सूरज तपाया तपता रहे। (भाव। कैसे ज्ञान का प्रकाश हमेशा बना रहे।) कैसे काल नित्य देखने से रह जाए (भाव। कैसे हर वक्त बना हुआ मौत का सहम खत्म हो जाए।) वह कौन सी समझ है जिस के कारण गुरमुखि मनुष्य की इज्जत बनी रहती है। वह कौन सा सूरमा है जो मौत को (मौत के भय को) मार लेता है। नानक कहता है। ‘गोष्ठि’ के सिलसिले में (जोगियों ने पूछा-) 48।
सबदु भाखत ससि जोति अपारा ॥
ससि घरि सूरु वसै मिटै अंधिआरा ॥
सुखु दुखु सम करि नामु अधारा ॥
आपे पारि उतारणहारा ॥
गुर परचै मनु साचि समाइ ॥
प्रणवति नानकु कालु न खाइ ॥49॥
नाम ततु सभ ही सिरि जापै ॥
बिनु नावै दुखु कालु संतापै ॥
ततो ततु मिलै मनु मानै ॥
दूजा जाइ इकतु घरि आनै ॥
बोलै पवना गगनु गरजै ॥
नानक निहचलु मिलणु सहजै ॥50॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: (उक्तर।) (जब) सतिगुरू का शबद उचारते हुए (हृदय में) चंद्रमा की अपार ज्योति प्रगट हो जाती है (भाव। हृदय में शांति पैदा होती है) चंद्रमा के घर में सूरज आ बसता है (भाव। शांत हृदय में ज्ञान का सूरज उग आता है। तब अज्ञानता का) अंधकार मिट जाता है। (गुरू-शबद की बरकति से जब गुरमुखि) सुख और दुख को एक-समान समझ के ‘नाम’ को (जिंदगी का) आसरा बनाता है (भाव। जब ना सुख में और ना ही दुख में प्रभू को भुलाए) (तब) तारनहार प्रभू उसको स्वयं ही (‘दुश्तर सागर’ से) पार लंघा लेता है। सतिगुरू के साथ गहरी सांझ बनाने से (गुरमुख का) मन सच्चे प्रभू में लीन रहता है। और नानक विनती करता है कि की उसको मौत का डर नहीं व्यापता। 49। प्रभू के नाम की सच्चाई (हृदय में सही करणी) सारे जापों का शिरोमणि (जाप) है। जब तक हृदय में नाम (-तत्व) सही नहीं होता। (मनुष्य को कई किस्म के) दुख सताते हैं और मौत का डर दुखी करता है। (जब हृदय में) निरोल प्रभू के नाम की सच्चाई (भाव। ये श्रद्धा कि प्रभू का नाम ही सदा स्थिर रहने वाला है) प्रकट हो जाती है तब (मनुष्य का) मन (उस सच्चाई में) पतीज जाता है। मेर-तेर वाला स्वभाव दूर हो जाता है। मनुष्य ऐकता के घर में आ टिकता है। रॅबी जीवन की लहर चल पड़ती है। ईश्वरीय मिलाप की अवस्था बलवान हो जाती है (और। इस तरह) हे नानक ! सहज अवस्था में टिकने से (जीव और प्रभू का) मिलाप (सदा के लिए) पक्का हो जाता है। 50।
अंतरि सुंनं बाहरि सुंनं त्रिभवण सुंन मसुंनं ॥
चउथे सुंनै जो नरु जाणै ता कउ पापु न पुंनं ॥
घटि घटि सुंन का जाणै भेउ ॥ आदि पुरखु निरंजन देउ ॥
जो जनु नाम निरंजन राता ॥
नानक सोई पुरखु बिधाता ॥51॥
सुंनो सुंनु कहै सभु कोई ॥
अनहत सुंनु कहा ते होई ॥
अनहत सुंनि रते से कैसे ॥
जिस ते उपजे तिस ही जैसे ॥
ओइ जनमि न मरहि न आवहि जाहि ॥
नानक गुरमुखि मनु समझाहि ॥52॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (जब हृदय में निरोल प्रभू नाम की सच्चाई प्रकट हो जाती है तब ये यकीन हो जाता है कि) अंदर और बाहर (भाव। गुप्त और प्रकट। दिखाई देते और अदृश्य पदार्थों में हर जगह) सारी त्रिलोकी में वही प्रभू व्यापक है जिसमें माया वाले फुरने नहीं उठते (क्योंकि माया तो उसकी अपनी बनाई खेल है)। जो मनुष्य त्रिगुण माया के असर से ऊपर रहने वाले उस प्रभू को (सही तौर पर) समझ लेता है। उसको भी (चौथी अवस्था में टिका होने के कारण) पाप और पुन्य छू नहीं सकता (भाव। कोई पाप किसी कुकर्म की ओर नहीं प्रेरता और कोई पुन्य कर्म उसके अंदर किसी स्वर्ग आदि की लालसा पैदा नहीं करता)। जो मनुष्य हरेक घट में व्यापक निर्गुण प्रभू का भेद जान लेता है (भाव। जो मनुष्य ये दृढ़ कर लेता है कि प्रभू हरेक घट में मौजूद भी है। और फिर भी निर्लिप है। वह मनुष्य भी दुनिया में रहते हुए निर्लिप हो के) आदि पुरख निरंजन का रूप हो जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य माया से रहित परमात्मा के नाम का मतवाला है। वही सृजनहार प्रभू का रूप हो जाता है। 51। हरेक मनुष्य ‘अफुर अवस्था’ का जिक्र करता है (पर व्यवहारिक जीवन में यह बात कोई विरला ही जानता है कि) सदा टिकी रहने वाली अफुर अवस्था कैसे बन सकती है (क्योंकि इस अवस्था वाला जीवन जीने से ही ये अवस्था समझ में आ सकती है)। (कहने मात्र को अगर कोई पूछे कि) अफुर अवस्था में जुड़े हुए बंदे कैसे होते हैं (तो इसका उक्तर ये है कि) वे मनुष्य उस परमात्मा जैसे ही हो जाते हैं जिससे वे पैदा हुए हैं। वे (बार-बार) ना पैदा होते हैं ना मरते हैं। उनके आवा-गवन का चक्कर समाप्त हो जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के हुकम में चल के मन को सुमति की ओर लगाते हैं।52।
नउ सर सुभर दसवै पूरे ॥
तह अनहत सुंन वजावहि तूरे ॥
साचै राचे देखि हजूरे ॥
घटि घटि साचु रहिआ भरपूरे ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: (नाम की बरकति से) जब नौ द्वार नाको-नाक भर के (भाव। बाहर की ओर का बहाव बंद करके। अर्थात मायावी पदार्थों की ओर की दौड़ मिटा के) दसवें सर में (भाव। प्रभू मिलाप की अवस्था में) जा पड़ते हैं। तब (गुरमुख) एक-रस अफुर अवस्था के बाजे बजाते हैं (भाव। अफुर अवस्था उनके अंदर इतनी बलवान हो जाती है कि और कोई फुरना व विचार वहाँ आ ही नहीं सकता)। (इस अवस्था में पहुँचे हुए गुरमुख) सदा कायम रहने वाले प्रभू को अंग-संग देख के उस में टिके रहते हैं। उन्हें वह सच्चा प्रभू हरेक घट में व्यापक दिखाई देता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।