Lulla Family

अंग ९४० · रामकली

अंग
940
रामकली
अंग बदलें या अंश चुनें · ४ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. कितु बिधि आसा मनसा खाई ॥
  2. आदि कउ कवनु बीचारु कथीअले सुंन कहा घर वासो ॥
  3. आदि कउ बिसमादु बीचारु कथीअले सुंन निरंतरि वासु लीआ ॥
  4. साचौ उपजै साचि समावै साचे सूचे एक मइआ ॥

कितु बिधि आसा मनसा खाई ॥

अंग ९३९ से चला आ रहा अंश

कितु बिधि आसा मनसा खाई ॥
कितु बिधि जोति निरंतरि पाई ॥
बिनु दंता किउ खाईऐ सारु ॥
नानक साचा करहु बीचारु ॥19॥
सतिगुर कै जनमे गवनु मिटाइआ ॥
अनहति राते इहु मनु लाइआ ॥
मनसा आसा सबदि जलाई ॥
गुरमुखि जोति निरंतरि पाई ॥
त्रै गुण मेटे खाईऐ सारु ॥
नानक तारे तारणहारु ॥20॥

हिन्दी अर्थ: मन की आशाएं और मन के फुरने आपने कैसे खत्म कर लिए हैं। रॅबी प्रकाश आपको एक-रस कैसे मिल गया है। (माया के इस प्रभाव सें बचना वैसे ही मुश्किल है जैसे दाँतों के बिना लोहे चबाना) दाँतों के बिना लोहा कैसे चबाया जाय। हे नानक ! कोई सही विचार बताओ। (भाव। कोई ऐसा तरीका बताओ जिससे हम संतुष्ट हो जाएं)। 19। (उक्तर।) ज्यों-ज्यों सतिगुरू की शिक्षा पर चले। त्यों-त्यों मन की भटकना समाप्त होती गई। ज्यों-ज्यों एक-रस व्यापक प्रभू में जुड़ने का आनंद आया। त्यों-त्यों ये मन परचता गया (प्रभावित हो के उसमें समाता चला गया)। मन के फुरने और दुनियावी आशाएं हमने गुरू के शबद से जला दी हैं। गुरू के सन्मुख होने से ही एक-रस रॅबी-प्रकाश मिला है। (इस ईश्वरीय-रौशनी की बरकति से) हमने माया के झलक की तीनों ही किस्मों के प्रभाव (तमो। रजो। सतो) अपने ऊपर नहीं पड़ने दिए। और (इस तरह माया की चोट से बचने का अत्यंत आसान कार्य-रूपी) लोहा चबाया गया है। (पर) हे नानक ! (इस 'दुश्तर सागर' से) तैराने का समर्थ प्रभू स्वयं ही उद्धार करता है। 20।

आदि कउ कवनु बीचारु कथीअले सुंन कहा घर वासो ॥

आदि कउ कवनु बीचारु कथीअले सुंन कहा घर वासो ॥
गिआन की मुद्रा कवन कथीअले घटि घटि कवन निवासो ॥
काल का ठीगा किउ जलाईअले किउ निरभउ घरि जाईऐ ॥
सहज संतोख का आसणु जाणै किउ छेदे बैराईऐ ॥
गुर कै सबदि हउमै बिखु मारै ता निज घरि होवै वासो ॥
जिनि रचि रचिआ तिसु सबदि पछाणै नानकु ता का दासो ॥21॥
कहा ते आवै कहा इहु जावै कहा इहु रहै समाई ॥
एसु सबद कउ जो अरथावै तिसु गुर तिलु न तमाई ॥
किउ ततै अविगतै पावै गुरमुखि लगै पिआरो ॥
आपे सुरता आपे करता कहु नानक बीचारो ॥
हुकमे आवै हुकमे जावै हुकमे रहै समाई ॥
पूरे गुर ते साचु कमावै गति मिति सबदे पाई ॥22॥

हिन्दी अर्थ: (प्रश्न।) आप (सृष्टि के) के आदि के बारे में क्या कहते हैं। (तब) अफुर परमात्मा का कहाँ निवास था। परमात्मा को जानने के साधन क्या बताते हैं। हरेक घट में किस का निवास है। काल की चोट कैसे समाप्त की जाए। निर्भय अवस्था तक कैसे पहुँच जाता है। कैसे (अहंकार) वैरी का नाश हो जिससे सहज और संतोख के आसन को पहचाना जा सके (भाव। जिसके कारण सहज और संतोख प्राप्त हो) । (उक्तर।) (जो मनुष्य) सतिगुरू के शबद के द्वारा अहंकार के जहर को खत्म कर लेता है। वह निज-स्वरूप में टिक जाता है। जिस प्रभू ने रचना रची है जो मनुष्य उसको गुरू के शबद में जुड़ के पहचानता है। नानक उसका दास है। 21। (प्रश्न।) ये जीव कहाँ से आता है। कहाँ जाता है। कहाँ टिका रहता है। (भाव। जीव कैसे जीवन व्यतीत करता है।) - जो ये बात समझा दे। (हम मानेंगे कि) उस गुरू को रक्ती भर भी लोभ नहीं। जीव जगत के मूल व अदृश्य प्रभू को कैसे मिले। गुरू के द्वारा (प्रभू के साथ इसका) प्यार कैसे बने। हे नानक ! (हमें उस प्रभू की) विचार बता जो स्वयं ही (जीवों को) पैदा करने वाला है और स्वयं ही। (उनकी) सुनने वाला है। (उक्तर।) (जीव प्रभू के) हुकम में ही (यहाँ) आता है। हुकम में ही (यहाँ से) चला जाता है। जीव को हुकम में ही जीवन व्यतीत करना पड़ता है। पूरे गुरू के द्वारा मनुष्य सच्चे प्रभू के (सिमरन की) कमाई करता है। ये बात गुरू के शबद से ही मिलती है कि प्रभू कैसा है और कितना (बेअंत) है। 22।

आदि कउ बिसमादु बीचारु कथीअले सुंन निरंतरि वासु लीआ ॥

आदि कउ बिसमादु बीचारु कथीअले सुंन निरंतरि वासु लीआ ॥
अकलपत मुद्रा गुर गिआनु बीचारीअले घटि घटि साचा सरब जीआ ॥
गुर बचनी अविगति समाईऐ ततु निरंजनु सहजि लहै ॥
नानक दूजी कार न करणी सेवै सिखु सु खोजि लहै ॥
हुकमु बिसमादु हुकमि पछाणै जीअ जुगति सचु जाणै सोई ॥
आपु मेटि निरालमु होवै अंतरि साचु जोगी कहीऐ सोई ॥23॥
अविगतो निरमाइलु उपजे निरगुण ते सरगुणु थीआ ॥
सतिगुर परचै परम पदु पाईऐ साचै सबदि समाइ लीआ ॥
एके कउ सचु एका जाणै हउमै दूजा दूरि कीआ ॥
सो जोगी गुर सबदु पछाणै अंतरि कमलु प्रगासु थीआ ॥
जीवतु मरै ता सभु किछु सूझै अंतरि जाणै सरब दइआ ॥
नानक ता कउ मिलै वडाई आपु पछाणै सरब जीआ ॥24॥

हिन्दी अर्थ: सृष्टि के आदि का विचार तो 'आश्चर्य। आश्चर्य' ही कहा जा सकता है। (तब) एक-रस अफुर परमात्मा का ही वजूद था। ज्ञान का असली साधन ये समझो कि सतिगुरू से मिला ज्ञान हो (भाव। ज्ञान प्राप्ति का असली साधन सतिगुरू की शरण ही है)। हरेक घट में। सारे जीवों में। सदा कायम रहने वाला प्रभू ही बसता है। अदृश्य प्रभू में सतिगुरू के शबद द्वारा लीन हुआ जाता है। (गुरू-शबद के द्वारा) अडोल अवस्था में टिका जगत का मूल निरंजन (माया से रहित प्रभू) मिल जाता है। हे नानक ! (निरंजन को तलाशने के लिए गुरू के बचनों पर चलने के अतिरिक्त) और कोई काम करने की आवश्यक्ता नहीं। जो सिख (गुरू के आशय अनुसार) सेवा करता है वह तलाश के 'निरंजन' को पा लेता है। हुकम' मानना आश्चर्य (ख्याल) है। भाव यह (ख्याल कि गुरू के हुकम में चलने से 'अविगत' में समाया जाता है हैरानगी पैदा करने वाला है; पर) जो मनुष्य 'हुकम' में (चल के 'हुकम' को) पहचानता है वह जीवन की (सही) जुगति के 'सच' को जान लेता है; वह 'स्वै भाव' (अहंम्) मिटा के (दुनिया में रहते हुए भी दुनिया से) अलग होता है (क्योंकि उसके) हृदय में सदा कायम रहने वाला प्रभू (साक्षात) है। (बस !) ऐसा मनुष्य ही जोगी कहलवाने के योग्य है। 23। (जब) अदृश्य अवस्था से निर्मल प्रभू प्रकट होता है और निर्गुण रूप से सर्गुण बनता है (भाव। अपने अदृश्य आत्मिक स्वरूप से आकार वाला बन के सूक्ष्म और स्थूल रूप धारण कर लेता है) तब इस दृश्यमान संसार में से जिस जीव का मन सतिगुरू के शबद से पतीजता जाता है (उस जीव को) ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त हो जाती है (तब समझें कि) गुरू के शबद के द्वारा सच्चे प्रभू ने (उसको अपने में) लीन कर लिया है। (तब) वह केवल एक प्रभू को ही (सदा रहने वाली हस्ती) जानता है। उसने अहंकार व दूजा भाव (अर्थात। प्रभू के बिना किसी और ऐसी हस्ती की संभावना का ख्याल) दूर कर लिया होता है। (बस !) वही (असल) जोगी है। वह सतिगुरू के शबद को समझता है उसके अंदर (हृदय-रूप) कमल-फूल खिल उठा होता है। जो मनुष्य जीते हुए ही मर जाता है (भाव। 'अहम्' का त्याग करता है। स्वार्थ मिटाता है) उसको (जिंदगी के) हरेक (पहलू) की समझ आ जाती है। वह मनुष्य सारे जीवों पर दया करने (का असूल) अपने मन में पक्का कर लेता है। हे नानक ! उसी मनुष्य को आदर मिलता है। वह सारे जीवों में अपने आप को देखता है (भाव। वह उसी ज्योति को सबमें देखता है जो उसके अपने अंदर है)। 24।

साचौ उपजै साचि समावै साचे सूचे एक मइआ ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

साचौ उपजै साचि समावै साचे सूचे एक मइआ ॥
झूठे आवहि ठवर न पावहि दूजै आवा गउणु भइआ ॥
आवा गउणु मिटै गुर सबदी आपे परखै बखसि लइआ ॥
एका बेदन दूजै बिआपी नामु रसाइणु वीसरिआ ॥

हिन्दी अर्थ: (गुरमुखि) सच्चे प्रभू से पैदा होता है और सच्चे में ही लीन रहता है; प्रभू और गुरमुख एक-रूप हो जाते हैं। पर झूठे (भाव। नाशवंत माया में लगे हुए लोग) जगत में आते हैं। उनको मन का टिकाव नहीं हासिल होता (सो इस) दूजे-भाव के कारण उनका जनम-मरण का चक्कर बना रहता है। ये जनम-मरण का चक्कर सतिगुरू के शबद से ही मिटता है (गुरू-शबद में जुड़े मनुष्य को) प्रभू स्वयं पहचान लेता है। और (उस पर) मेहर करता है। (पर जिनको) सारे रसों-का-घर-प्रभू का नाम बिसर जाता है उन्हें दूसरे भाव में फसने के कारण यह अहंकार की पीड़ा सताती है।

रचयिता और स्रोत

यह गुरु नानक देव जी की सिध गोस्टि का आगे का अंश है, रामकली राग में। पूरा संवाद अंग ९३८ से ९४६ में पढ़ा जा सकता है।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९४० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English