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अंग 940

अंग
940
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कितु बिधि आसा मनसा खाई ॥
कितु बिधि जोति निरंतरि पाई ॥
बिनु दंता किउ खाईऐ सारु ॥
नानक साचा करहु बीचारु ॥19॥
सतिगुर कै जनमे गवनु मिटाइआ ॥
अनहति राते इहु मनु लाइआ ॥
मनसा आसा सबदि जलाई ॥
गुरमुखि जोति निरंतरि पाई ॥
त्रै गुण मेटे खाईऐ सारु ॥
नानक तारे तारणहारु ॥20॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: मन की आशाएं और मन के फुरने तूने कैसे खत्म कर लिए हैं। रॅबी प्रकाश आपको एक-रस कैसे मिल गया है। (माया के इस प्रभाव सें बचना वैसे ही मुश्किल है जैसे दाँतों के बिना लोहे चबाना) दाँतों के बिना लोहा कैसे चबाया जाय। हे नानक ! कोई सही विचार बताओ। (भाव। कोई ऐसा तरीका बताओ जिससे हम संतुष्ट हो जाएं)। 19। (उक्तर।) ज्यों-ज्यों सतिगुरू की शिक्षा पर चले। त्यों-त्यों मन की भटकना समाप्त होती गई। ज्यों-ज्यों एक-रस व्यापक प्रभू में जुड़ने का आनंद आया। त्यों-त्यों ये मन परचता गया (प्रभावित हो के उसमें समाता चला गया)। मन के फुरने और दुनियावी आशाएं हमने गुरू के शबद से जला दी हैं। गुरू के सन्मुख होने से ही एक-रस रॅबी-प्रकाश मिला है। (इस ईश्वरीय-रौशनी की बरकति से) हमने माया के झलक की तीनों ही किस्मों के प्रभाव (तमो। रजो। सतो) अपने ऊपर नहीं पड़ने दिए। और (इस तरह माया की चोट से बचने का अत्यंत आसान कार्य-रूपी) लोहा चबाया गया है। (पर) हे नानक ! (इस ‘दुश्तर सागर’ से) तैराने का समर्थ प्रभू स्वयं ही उद्धार करता है। 20।
आदि कउ कवनु बीचारु कथीअले सुंन कहा घर वासो ॥
गिआन की मुद्रा कवन कथीअले घटि घटि कवन निवासो ॥
काल का ठीगा किउ जलाईअले किउ निरभउ घरि जाईऐ ॥
सहज संतोख का आसणु जाणै किउ छेदे बैराईऐ ॥
गुर कै सबदि हउमै बिखु मारै ता निज घरि होवै वासो ॥
जिनि रचि रचिआ तिसु सबदि पछाणै नानकु ता का दासो ॥21॥
कहा ते आवै कहा इहु जावै कहा इहु रहै समाई ॥
एसु सबद कउ जो अरथावै तिसु गुर तिलु न तमाई ॥
किउ ततै अविगतै पावै गुरमुखि लगै पिआरो ॥
आपे सुरता आपे करता कहु नानक बीचारो ॥
हुकमे आवै हुकमे जावै हुकमे रहै समाई ॥
पूरे गुर ते साचु कमावै गति मिति सबदे पाई ॥22॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (प्रश्न।) आप (सृष्टि के) के आदि के बारे में क्या कहते हैं। (तब) अफुर परमात्मा का कहाँ निवास था। परमात्मा को जानने के साधन क्या बताते हैं। हरेक घट में किस का निवास है। काल की चोट कैसे समाप्त की जाए। निर्भय अवस्था तक कैसे पहुँच जाता है। कैसे (अहंकार) वैरी का नाश हो जिससे सहज और संतोख के आसन को पहचाना जा सके (भाव। जिसके कारण सहज और संतोख प्राप्त हो) । (उक्तर।) (जो मनुष्य) सतिगुरू के शबद के द्वारा अहंकार के जहर को खत्म कर लेता है। वह निज-स्वरूप में टिक जाता है। जिस प्रभू ने रचना रची है जो मनुष्य उसको गुरू के शबद में जुड़ के पहचानता है। नानक उसका दास है। 21। (प्रश्न।) ये जीव कहाँ से आता है। कहाँ जाता है। कहाँ टिका रहता है। (भाव। जीव कैसे जीवन व्यतीत करता है।) – जो ये बात समझा दे। (हम मानेंगे कि) उस गुरू को रक्ती भर भी लोभ नहीं। जीव जगत के मूल व अदृश्य प्रभू को कैसे मिले। गुरू के द्वारा (प्रभू के साथ इसका) प्यार कैसे बने। हे नानक ! (हमें उस प्रभू की) विचार बता जो स्वयं ही (जीवों को) पैदा करने वाला है और स्वयं ही। (उनकी) सुनने वाला है। (उक्तर।) (जीव प्रभू के) हुकम में ही (यहाँ) आता है। हुकम में ही (यहाँ से) चला जाता है। जीव को हुकम में ही जीवन व्यतीत करना पड़ता है। पूरे गुरू के द्वारा मनुष्य सच्चे प्रभू के (सिमरन की) कमाई करता है। ये बात गुरू के शबद से ही मिलती है कि प्रभू कैसा है और कितना (बेअंत) है। 22।
आदि कउ बिसमादु बीचारु कथीअले सुंन निरंतरि वासु लीआ ॥
अकलपत मुद्रा गुर गिआनु बीचारीअले घटि घटि साचा सरब जीआ ॥
गुर बचनी अविगति समाईऐ ततु निरंजनु सहजि लहै ॥
नानक दूजी कार न करणी सेवै सिखु सु खोजि लहै ॥
हुकमु बिसमादु हुकमि पछाणै जीअ जुगति सचु जाणै सोई ॥
आपु मेटि निरालमु होवै अंतरि साचु जोगी कहीऐ सोई ॥23॥
अविगतो निरमाइलु उपजे निरगुण ते सरगुणु थीआ ॥
सतिगुर परचै परम पदु पाईऐ साचै सबदि समाइ लीआ ॥
एके कउ सचु एका जाणै हउमै दूजा दूरि कीआ ॥
सो जोगी गुर सबदु पछाणै अंतरि कमलु प्रगासु थीआ ॥
जीवतु मरै ता सभु किछु सूझै अंतरि जाणै सरब दइआ ॥
नानक ता कउ मिलै वडाई आपु पछाणै सरब जीआ ॥24॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: सृष्टि के आदि का विचार तो ‘आश्चर्य। आश्चर्य’ ही कहा जा सकता है। (तब) एक-रस अफुर परमात्मा का ही वजूद था। ज्ञान का असली साधन ये समझो कि सतिगुरू से मिला ज्ञान हो (भाव। ज्ञान प्राप्ति का असली साधन सतिगुरू की शरण ही है)। हरेक घट में। सारे जीवों में। सदा कायम रहने वाला प्रभू ही बसता है। अदृश्य प्रभू में सतिगुरू के शबद द्वारा लीन हुआ जाता है। (गुरू-शबद के द्वारा) अडोल अवस्था में टिका जगत का मूल निरंजन (माया से रहित प्रभू) मिल जाता है। हे नानक ! (निरंजन को तलाशने के लिए गुरू के बचनों पर चलने के अतिरिक्त) और कोई काम करने की आवश्यक्ता नहीं। जो सिख (गुरू के आशय अनुसार) सेवा करता है वह तलाश के ‘निरंजन’ को पा लेता है। हुकम’ मानना आश्चर्य (ख्याल) है। भाव यह (ख्याल कि गुरू के हुकम में चलने से ‘अविगत’ में समाया जाता है हैरानगी पैदा करने वाला है; पर) जो मनुष्य ‘हुकम’ में (चल के ‘हुकम’ को) पहचानता है वह जीवन की (सही) जुगति के ‘सच’ को जान लेता है; वह ‘स्वै भाव’ (अहंम्) मिटा के (दुनिया में रहते हुए भी दुनिया से) अलग होता है (क्योंकि उसके) हृदय में सदा कायम रहने वाला प्रभू (साक्षात) है। (बस !) ऐसा मनुष्य ही जोगी कहलवाने के योग्य है। 23। (जब) अदृश्य अवस्था से निर्मल प्रभू प्रकट होता है और निर्गुण रूप से सर्गुण बनता है (भाव। अपने अदृश्य आत्मिक स्वरूप से आकार वाला बन के सूक्ष्म और स्थूल रूप धारण कर लेता है) तब इस दृश्यमान संसार में से जिस जीव का मन सतिगुरू के शबद से पतीजता जाता है (उस जीव को) ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त हो जाती है (तब समझें कि) गुरू के शबद के द्वारा सच्चे प्रभू ने (उसको अपने में) लीन कर लिया है। (तब) वह केवल एक प्रभू को ही (सदा रहने वाली हस्ती) जानता है। उसने अहंकार व दूजा भाव (अर्थात। प्रभू के बिना किसी और ऐसी हस्ती की संभावना का ख्याल) दूर कर लिया होता है। (बस !) वही (असल) जोगी है। वह सतिगुरू के शबद को समझता है उसके अंदर (हृदय-रूप) कमल-फूल खिल उठा होता है। जो मनुष्य जीते हुए ही मर जाता है (भाव। ‘अहम्’ का त्याग करता है। स्वार्थ मिटाता है) उसको (जिंदगी के) हरेक (पहलू) की समझ आ जाती है। वह मनुष्य सारे जीवों पर दया करने (का असूल) अपने मन में पक्का कर लेता है। हे नानक ! उसी मनुष्य को आदर मिलता है। वह सारे जीवों में अपने आप को देखता है (भाव। वह उसी ज्योति को सबमें देखता है जो उसके अपने अंदर है)। 24।
साचौ उपजै साचि समावै साचे सूचे एक मइआ ॥
झूठे आवहि ठवर न पावहि दूजै आवा गउणु भइआ ॥
आवा गउणु मिटै गुर सबदी आपे परखै बखसि लइआ ॥
एका बेदन दूजै बिआपी नामु रसाइणु वीसरिआ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: (गुरमुखि) सच्चे प्रभू से पैदा होता है और सच्चे में ही लीन रहता है; प्रभू और गुरमुख एक-रूप हो जाते हैं। पर झूठे (भाव। नाशवंत माया में लगे हुए लोग) जगत में आते हैं। उनको मन का टिकाव नहीं हासिल होता (सो इस) दूजे-भाव के कारण उनका जनम-मरण का चक्कर बना रहता है। ये जनम-मरण का चक्कर सतिगुरू के शबद से ही मिटता है (गुरू-शबद में जुड़े मनुष्य को) प्रभू स्वयं पहचान लेता है। और (उस पर) मेहर करता है। (पर जिनको) सारे रसों-का-घर-प्रभू का नाम बिसर जाता है उन्हें दूसरे भाव में फसने के कारण यह अहंकार की पीड़ा सताती है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मन की आशाएं और मन के फुरने तूने कैसे खत्म कर लिए हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।