नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: (ये भेद) वह मनुष्य समझता है जिसको प्रभू खुद समझ बख्शता है। गुरू के शबद में जुड़ने के कारण वह मनुष्य (अहंकार से) आजाद हो जाता है। हे नानक ! जिसने अहंकार और दूजा भाव त्याग दिया है उसको तारनहार प्रभू तार लेता है। 25। जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है वह (जीवन का सही रास्ता) गवा देता है और जम की मुथाजी में हो जाता है। पराया घर देखता है। उसको (इस कुकर्म में) घाटा ही घाटा रहता है। भुलेखे में पड़ा हुआ मनमुख (मानो) जंगल में भटक रहा है। गलत रास्ते पर पड़ कर (इस प्रकार) ठगा जा रहा है जैसे मसाण में मंत्र पढ़ने वाला मनुष्य (बुरी तरफ पड़ा है)। (मनमुख) गुरू के शबद को नहीं पहचानता (भाव। गुरू के शबद की उसको कद्र नहीं पड़ती)। और दुर्वचन ही बोलता है। हे नानक ! सुख उसको (मिला) जानो जो सच्चे प्रभू में रंगा हुआ है। 26।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य सतिगुरू के अनुसार हो के चलता है वह सच्चे प्रभू का डर अपने हृदय में बसाता है। गुरू की बाणी से अपने अमोड़ मन को तराशता है। निर्मल परमात्मा की सिफत सालाह करता है (और इस तरह) पवित्र और ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। गुरमुख मनुष्य तन-मन से परमात्मा को याद करता है। हे नानक ! (बँदगी से) गुरमुख सदा कायम रहने वाले प्रभू में लीन रहता है। 27। जो मनुष्य गुरू के साथ गहरी सांझ बना लेता है (भाव। जिसको सतिगुरू में पूर्ण विश्वास हो जाता है) वह (मानो) वेदों का ज्ञाता हैं गया है (उसको वेदों की आवश्क्ता नहीं रह जाती)। गुरू के साथ गहरी सांझ बनाने से संसार-समुंद्र से पार हुआ जाता है। गुरू शबद के माध्यम से परमात्मा के साथ जान-पहचान वाला बना जाता है और (अपने) अंदर की सूझ आ जाती है। गुरू के सन्मुख होने से अदृश्य और बे-अंत प्रभू मिल जाता है; हे नानक ! गुरू के द्वारा ही (अहंकार से) खलासी का रास्ता मिलता है। 28।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: गुरू के बताए हुए राह पर चलने वाला मनुष्य (गुरू की बताई) विचार से उस प्रभू के गुण गाता है जिसका सही रूप बयान नहीं किया जा सकता। (इस तरह) गुरमुख घर-बार वाला होते हुए ही (जिंदगी की बाजी में) सिद्ध (सफल। माहिर) हो जाता है। गुरू के सन्मुख होने से ही हृदय में प्यार से प्रभू का नाम जपा जा सकता है। और गुर-शबद के द्वारा ऊँचा आचरण बन के प्रभू मिलता है। (गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलने वाला मनुष्य) गुरू के शबद द्वारा (अपने मन को) परो के (प्रभू को) पहचानता है व औरों को पहचान करवाता है। हे नानक ! गुरमुख (अपने) अहंकार (खुदगर्जी को) जला के (प्रभू में) लीन रहता है। 29। सच्चे प्रभू ने गुरमुख मनुष्य (पैदा करने) के लिए धरती बनाई है; इस धरती में उत्पक्ति और नाश (गुरमुखता के विकास के लिए) एक खेल है; जब मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा प्रभू के साथ प्यार जोड़ के (प्रभू के रंग में) रंगा जाता है तो सच्चे में रति हुआ (गुरमुखि) इज्जत ले के अपने घर में पहुँचता है (और उसकी बनने-टूटने की खेल समाप्त हो जाती है)। सच्चे शबद के बिना कोई मनुष्य इज्जत हासिल नहीं कर सकता। हे नानक ! प्रभू के नाम के बिना प्रभू में मनुष्य कैसे समा सकता है। (नहीं समा सकता)। 30।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: गुरू के बताए हुए राह पर चलना ही सारी आठों करामाती ताकतों और कौशल की प्राप्ति है। गुरू के सन्मुख होने से संसार-समुंद्र से पार हुआ जाता है और सच्चे की सुंदर मति आ जाती है। गुरू के बताए हुए राह पर चलने वाला मनुष्य अच्छे-बुरे समय की हालत को जान लेता है। और पहचान लेता है कि क्या छोड़ना है और क्या ग्रहण करना है। गुरमुख मनुष्य (औरों को संसार-समुंद्र से) तैरा के उस पार लगा देता है। हे नानक ! गुरू की शिक्षा पर चलने वाला बंदा (गुरू के) शबद से (दूसरों की भी) उद्धार कर देता है। 31। (प्रभू के) नाम में रंगे हुए का अहंकार नाश होता है। जो मनुष्य प्रभू के नाम में रंगे हुए हैं वह प्रभू में समाए रहते हैं। जो प्राणी प्रभू के नाम में रंगे हुए हैं उन्हें ही जोग की जुगति और विचार प्राप्त हूई है। प्रभू के नाम में रंगे हुए बंदे ही अहंकार से छुटकारा पाने का रास्ता पाते हैं। (क्योंकि) नाम में रति हुए (रंगे हुए) बंदों को त्रिलोकी की सूझ पड़ जाती है (भाव। अपनी छोटी सी अपनत्व की पकड़ की जगह सारी त्रिलोकी ही उन्हें रॅबी सांझ के कारण अपनी ही दिखती है)। हे नानक ! प्रभू के नाम में रते हुए को सदा टिके रहने वाला सुख मिलता हैं। 32।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: (प्रभू के) नाम में रति रहने पर ही प्रभू से मिलाप होता है। प्रभू-नाम में रंगे रहना ही सदा कायम रहने वाला पुन्य कर्म है। नाम में लगना ही सच्ची और उक्तम करणी है। नाम में रति रहने से ही प्रभू के गुणों के साथ जान-पहचान होती है और सांझ बनती है। (प्रभू के) नाम के बिना मनुष्य जो बोलता है व्यर्थ है। हे नानक ! जो मनुष्य नाम में रति हैं। उनको हमारी नमस्कार है। 33। (प्रभू का) नाम गुरू से मिलता है। सच्चे प्रभू में लीन रहना- यही है (असल) जोग की जुगति। (पर) जोगी लोग (अपने) बारह फिरकों (के बँटवारे) में (इस असल निशाने से) टूट रहे हैं और संयासी लोग (अपने) दस फिरकों (अलग-अलग साधनों) में। जो मनुष्य सतिगुरू के शबद के द्वारा (माया की ओर से) मर के जीता है वह (अहंकार से) मुक्ति का राह ढूँढ लेता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(ये भेद) वह मनुष्य समझता है जिसको प्रभू खुद समझ बख्शता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।