Lulla Family

अंग 939

अंग
939
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तीरथि नाईऐ सुखु फलु पाईऐ मैलु न लागै काई ॥
गोरख पूतु लोहारीपा बोलै जोग जुगति बिधि साई ॥7॥
हाटी बाटी नीद न आवै पर घरि चितु न डोुलाई ॥
बिनु नावै मनु टेक न टिकई नानक भूख न जाई ॥
हाटु पटणु घरु गुरू दिखाइआ सहजे सचु वापारो ॥
खंडित निद्रा अलप अहारं नानक ततु बीचारो ॥8॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: तीर्थों पर स्नान करते हैं; इसका फल मिलता है ‘सुख’। और (मन को) कोई मैल (भी) नहीं लगती। गोरखनाथ का चेला लोहारीपा बोलाकि यही है जोग की जुगती। जोग की बिधि। 7। हे नानक ! असल (ज्ञान की) विचार यह है कि दुनियावी धंधों में रहते हुए मनुष्य को नींद ना आए (भाव। धंधों में ही ना ग़र्क हो जाए)। पराए घर में मन को डोलने ना दे; (पर) हे नानक ! प्रभू के नाम के बिना मन टिक के नहीं रह सकता और (माया की) तृष्णा हटती नहीं। (जिस मनुष्य को) सतिगुरू ने (नाम विहाजने का असल) ठिकाना। शहर और घर दिखा दिया है वह (दुनियां के धंधों में भी) अडोल रह कर ‘नाम’ विहाजता है; उस मनुष्य की नींद भी कम और खुराक भी थोड़ी होती है। (भाव। वह चस्कों में नहीं पड़ता)। 8।
दरसनु भेख करहु जोगिंद्रा मुंद्रा झोली खिंथा ॥
बारह अंतरि एकु सरेवहु खटु दरसन इक पंथा ॥
इन बिधि मनु समझाईऐ पुरखा बाहुड़ि चोट न खाईऐ ॥
नानकु बोलै गुरमुखि बूझै जोग जुगति इव पाईऐ ॥9॥
अंतरि सबदु निरंतरि मुद्रा हउमै ममता दूरि करी ॥
कामु क्रोधु अहंकारु निवारै गुर कै सबदि सु समझ परी ॥
खिंथा झोली भरिपुरि रहिआ नानक तारै एकु हरी ॥
साचा साहिबु साची नाई परखै गुर की बात खरी ॥10॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: नानक कहता है (कि जोगी ने कहा-) हे पुरख (नानक !) छे भेखों में एक जोगी पंथ है। उसके बारह फिरके हैं। उनमें से हमारे ‘आई पंथ’ को धारण करो। जोगियों के इस बड़े भेख का मत स्वीकार करो। मुद्रा। झोली और गोदड़ी पहनो। हे पुरखा ! ठस तरह मन को बुद्धि दी जा सकती है और फिर (माया की) चोट नहीं खानी पड़ती। (उक्तर।) नानक कहता है- गुरू के सन्मुख होने से मनुष्य (मन को समझाने का ढंग) समझता है। जोग की जुगति (तो) इस तरह मिलती है (कि)। 9। मन में सतिगुरू के शबद को एक रस बसाना – ये (कानों में) मुद्राएं (पहननी) हैं। (जो मनुष्य गुरू शबद को बसाता है वह) अपने अहंकार और ममता को दूर कर लेता है; काम। क्रोध और अहंकार को मिटा लेता है। गुरू के शबद के द्वारा उसको सोहानी सूझ पड़ जाती है। हे नानक ! प्रभू को सब जगह व्यापक समझना उस मनुष्य की गोदड़ी और झोली है। सतिगुरू के सच्चे शबद के द्वारा वह मनुष्य ये निर्णय कर लेता है कि एक परमात्मा ही (माया की चोट से) बचाता है जो सदा कायम रहने वाला मालिक है और जिसकी महिमा भी सदा टिकी रहने वाली है। 10।
ऊंधउ खपरु पंच भू टोपी ॥
कांइआ कड़ासणु मनु जागोटी ॥
सतु संतोखु संजमु है नालि ॥
नानक गुरमुखि नामु समालि ॥11॥
कवनु सु गुपता कवनु सु मुकता ॥
कवनु सु अंतरि बाहरि जुगता ॥
कवनु सु आवै कवनु सु जाइ ॥
कवनु सु त्रिभवणि रहिआ समाइ ॥12॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: सांसारिक ख्वाहिशों से पलटी हुई सुरति उसका खप्पर है। पाँच तत्वों के दैवी गुण उसकी टोपी हैं। शरीर (को विकारों से निर्मल रखना) उसका दभ का आसन है। (बस में आया हुआ) मन उसकी लंगोटी है। सत संतोख और संयम उसके साथ (तीन चेले) हैं। हे नानक ! (जो मनुष्य) गुरू के द्वारा (प्रभू का) नाम याद करता है। 11। (प्रश्न।) छुपा हुआ कौन है। वह कौन है जो मुक्त है। वह कौन है जो अंदर बाहर से (भाव। जिसका मन भी और शारीरिक इन्द्रियां भी) मिली हुई हैं। (सदा) पैदा होता व मरता कौन है। त्रिलोकी के नाथ में लीन कौन है। 12।
घटि घटि गुपता गुरमुखि मुकता ॥
अंतरि बाहरि सबदि सु जुगता ॥
मनमुखि बिनसै आवै जाइ ॥
नानक गुरमुखि साचि समाइ ॥13॥
किउ करि बाधा सरपनि खाधा ॥
किउ करि खोइआ किउ करि लाधा ॥
किउ करि निरमलु किउ करि अंधिआरा ॥
इहु ततु बीचारै सु गुरू हमारा ॥14॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: (उक्तर।) जो (प्रभू) हरेक शरीर में मौजूद है वह गुप्त है; गुरू के बताए हुए राह पर चलने वाला मनुष्य (माया के बँधनों से) मुक्त है। मन के पीछे चलने वाला मनुष्य पैदा होता मरता रहता है। जो मनुष्य गुरू-शबद में जुड़ा है वह मन और तन से (प्रभू में) जुड़ा हुआ है। हे नानक ! गुरमुख मनुष्य सच्चे प्रभू में लीन रहता है। 13। (प्रश्न।) (ये जीव) कैसे (ऐसा) बँधा पड़ा है कि सर्पनी (माया इस को) खाई जा रही है (और ये आगे से अपने बचाव के लिए भाग भी नहीं सकता) । (इस जीव ने) कैसे (अपने जीवन का लाभ) गवा लिया है। कैसे (दोबारा वह लाभ) पा सके। (ये जीव) कैसे पवित्र हो सके। कैसे (इसके आगे) अंधेरा (टिका हुआ) है। जो इस अस्लियत को (ठीक तरह) विचारे। हमारी उसको नमस्कार है। 14।
दुरमति बाधा सरपनि खाधा ॥
मनमुखि खोइआ गुरमुखि लाधा ॥
सतिगुरु मिलै अंधेरा जाइ ॥
नानक हउमै मेटि समाइ ॥15॥
सुंन निरंतरि दीजै बंधु ॥
उडै न हंसा पड़ै न कंधु ॥
सहज गुफा घरु जाणै साचा ॥
नानक साचे भावै साचा ॥16॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: (उक्तर।) (यह जीव) बुरी मति में (ऐसे) बँधा पड़ा है कि सर्पनी (माया इसको) खाए जा रही है (और इन चस्कों में से इसका निकलने को जी नहीं करता); मन के पीछे लगने वाले ने (जीवन का लाभ) गवा लिया है। और। गुरू के हुकम में चलने वाले ने कमा लिया है। (माया के चस्कों का) अंधकार तब ही दूर होता है अगर सतिगुरू मिल जाए (भाव। अगर मनुष्य गुरू के बताए रास्ते पर चलने लग जाए)। हे नानक ! (मनुष्य) अहंकार को मिटा के ही प्रभू में लीन हो सकता है। 15। (यदि माया के हमलों के राह में) एक-रस अफुर परमात्मा (की याद) की अटुट दीवार बना दें। (तो फिर माया की खातिर) मन भटकता नहीं। और शरीर भी जर्जर नहीं होता (भाव। शरीर का सत्यानाश नहीं होता)। हे नानक ! जो मनुष्य सहज-अवस्था की गुफा को अपना सदा टिके रहने का घर समझ ले (भाव। जिस मनुष्य का मन सदा अडोल रहे)। वह परमात्मा का रूप हो के उस प्रभू को प्यारा लगने लगता है। 16।
किसु कारणि ग्रिहु तजिओ उदासी ॥
किसु कारणि इहु भेखु निवासी ॥
किसु वखर के तुम वणजारे ॥
किउ करि साथु लंघावहु पारे ॥17॥
गुरमुखि खोजत भए उदासी ॥
दरसन कै ताई भेख निवासी ॥
साच वखर के हम वणजारे ॥
नानक गुरमुखि उतरसि पारे ॥18॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (प्रश्न।) (अगर ‘हाटी बाटी’ को त्यागना नहीं था। तो) आपने क्यों घर छोड़ा था और ‘उदासी’ बने थे। क्यों यह (उदासी-) भेष (पहले) धारण किया था। आप किस सौदे के व्यापारी हैं। (अपने श्रद्धालुओं की) जमात को (इस ‘दुष्तर सागर’ से) कैसे पार करवाओगे। (भाव। अपने सिखों को इस संसार से पार लंघाने का उद्धार का आपने कौन सा राह बताया है) । 17। (उक्तर।) हम गुरमुखों को तलाशने के लिए उदासी बने थे। हमने गुरमुखों के दर्शनों के लिए (उदासी-) भेष धारण किया था। हम सच्चे प्रभू के नाम के सौदे के व्यापारी हैं। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के बताए राह पर चलता है वह (दुष्तर सागर से) पार लांघ जाता है। 18।
कितु बिधि पुरखा जनमु वटाइआ ॥
काहे कउ तुझु इहु मनु लाइआ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: (प्रश्न।) हे पुरखा ! तूने अपनी जिंदगी किस ढंग से पलट ली है। तूने अपना ये मन किसमें जोड़ा है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “तीर्थों पर स्नान करते हैं; इसका फल मिलता है ‘सुख’।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।