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अंग ९३८ · रामकली

अंग
938
रामकली
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  1. बिदिआ सोधै ततु लहै राम नाम लिव लाइ ॥
  2. सिध सभा करि आसणि बैठे संत सभा जैकारो ॥
  3. घटि घटि बैसि निरंतरि रहीऐ चालहि सतिगुर भाए ॥
  4. जैसे जल महि कमलु निरालमु मुरगाई नै साणे ॥
  5. हाटी बाटी रहहि निराले रूखि बिरखि उदिआने ॥

बिदिआ सोधै ततु लहै राम नाम लिव लाइ ॥

अंग ९२९ से चला आ रहा अंश

बिदिआ सोधै ततु लहै राम नाम लिव लाइ ॥
मनमुखु बिदिआ बिक्रदा बिखु खटे बिखु खाइ ॥
मूरखु सबदु न चीनई सूझ बूझ नह काइ ॥53॥
पाधा गुरमुखि आखीऐ चाटड़िआ मति देइ ॥
नामु समालहु नामु संगरहु लाहा जग महि लेइ ॥
सची पटी सचु मनि पड़ीऐ सबदु सु सारु ॥
नानक सो पड़िआ सो पंडितु बीना जिसु राम नामु गलि हारु ॥54॥1॥

हिन्दी अर्थ: जो विद्या के द्वारा ही अपने असल की विचार करता है। और परमात्मा के नाम के साथ सुरति जोड़ के जीवन का असल मनोरथ हासिल कर लेता है। (पर) जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है। वह विद्या को (सिर्फ) बेचता ही है (भाव। सिर्फ आजीविका के लिए इस्तेमाल करता है। विद्या के बदले आत्मिक मौत लाने वाली) माया-विष को ही कमाता है। वह मूर्ख गुरू के शबद को नहीं पहचानता। शबद की सुध-बुध उसको रक्ती भर भी नहीं होती। 53। वह पांधा (पंडित। शिक्षक व अध्यापक) गुरमुखि कहा जाना चाहिए। (वह पांधा) दुनिया में (असल) लाभ कमाता है जो अपने शागिर्दों को ये शिक्षा देता है कि (हे विद्यार्थियो !) प्रभू का नाम जपो और नाम-धन एकत्र करो। सच्चा प्रभू मन में बस जाना - यही सच्ची पट्टी है (जो पांधे को अपने चेलों को पढ़ाना चाहिए)। (प्रभू को हृदय में बसाने के लिए) सतिगुरू का श्रेष्ठ शबद पढ़ना चाहिए। हे नानक ! वही मनुष्य विद्वान है वही पंडित है और समझदार है जिसके गले में प्रभू का नाम-रूप हार है (भाव। जो हर वक्त प्रभू को याद रखता है और हर जगह देखता है)। 54। 1।

सिध सभा करि आसणि बैठे संत सभा जैकारो ॥

रामकली महला 1 सिध गोसटि
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिध सभा करि आसणि बैठे संत सभा जैकारो ॥
तिसु आगै रहरासि हमारी साचा अपर अपारो ॥
मसतकु काटि धरी तिसु आगै तनु मनु आगै देउ ॥
नानक संतु मिलै सचु पाईऐ सहज भाइ जसु लेउ ॥1॥
किआ भवीऐ सचि सूचा होइ ॥
साच सबद बिनु मुकति न कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
कवन तुमे किआ नाउ तुमारा कउनु मारगु कउनु सुआओ ॥
साचु कहउ अरदासि हमारी हउ संत जना बलि जाओ ॥
कह बैसहु कह रहीऐ बाले कह आवहु कह जाहो ॥
नानकु बोलै सुणि बैरागी किआ तुमारा राहो ॥2॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 सिध गोसटि सतिगुर प्रसादि ॥ (हमारी) नमस्कार उन संतों की सभा को है जो 'ईश्वरीय सभा' (सत्संग) बना के अडोल बैठे हैं। हमारी अरदास उस संत सभा के आगे है जिसमें सदा कायम रहने वाला अपर-अपार प्रभू (प्रत्यक्ष बसता) है। मैं उस संत-सभा के आगे सिर काट के धर दूँ। तन और मन भेट कर दूँ (ताकि) आसानी से ही प्रभू के गुण गा सकूँ; (क्योंकि) हे नानक ! संत मिल जाए तो ईश्वर मिल जाता है। 1। (हे चरपट ! देश-देसांतरों और तीर्थों पर) भ्रमण करने से क्या लाभ। सदा कायम रहने वाले प्रभू में जुड़ने से ही पवित्र हुआ जा सकता है; (सतिगुरू के) सच्चे शबद के बिना ('दुनिया सागर दुतर से' अर्थात दुश्वार दुनिया सागर से) निजात नहीं मिलती। 1। रहाउ। (चरपट जोगी ने पूछा-) आप कौन हैं। आपका क्या नाम है। आपका क्या मत है। (उस मत का) मनोरथ क्या है। (गुरू नानक देव जी का उक्तर-) मैं सदा कायम रहने वाले प्रभू को जपता हूँ। हमारी (प्रभू के आगे ही सदा) प्रार्थना है और मैं संत जनों से बलिहार जाता हूँ (बस ! यह मेरा मत है)। हे बालक ! आप किस के आसरे शांत-चित्त हैं। आपकी सुरति किसमें जुड़ती है। कहाँ से आते हैं। कहाँ जाते हैं। (नानक कहता है- चरपट ने पूछा-) हे संत ! सुन। आपका क्या मत है। 2।

घटि घटि बैसि निरंतरि रहीऐ चालहि सतिगुर भाए ॥

घटि घटि बैसि निरंतरि रहीऐ चालहि सतिगुर भाए ॥
सहजे आए हुकमि सिधाए नानक सदा रजाए ॥
आसणि बैसणि थिरु नाराइणु ऐसी गुरमति पाए ॥
गुरमुखि बूझै आपु पछाणै सचे सचि समाए ॥3॥
दुनीआ सागरु दुतरु कहीऐ किउ करि पाईऐ पारो ॥
चरपटु बोलै अउधू नानक देहु सचा बीचारो ॥
आपे आखै आपे समझै तिसु किआ उतरु दीजै ॥
साचु कहहु तुम पारगरामी तुझु किआ बैसणु दीजै ॥4॥

हिन्दी अर्थ: (सतिगुरू जी का उक्तर-) (हे चरपट !-) सर्व-व्यापक प्रभू (की याद) में जुड़ के सदा शांत-चित रहते हैं। हम सतिगुरू जी की मर्जी से चलते हैं। हे नानक- (कह-) प्रभू के हुकम में सहज ही (जगत में) आए। हुकम में विचर रहे हैं। सदा उसकी ही रजा में रहते हैं। (पक्के) आसन वाला। (सदा) टिके रहने वाला प्रभू खुद ही है। हमने यही गुरू-शिक्षा ली है। गुरू के राह पर चलने वाला मनुष्य ज्ञानवान हो जाता है। अपने आप को पहचानता है। और। सदा सच्चे प्रभू में जुड़ा रहता है। 3। चरपट कहता है (भाव। चरपट ने कहा-) जगत (एक ऐसा) समुंद्र कहा जाता है जिसको तैरना मुश्किल है। हे विरक्त नानक ! ठीक विचार बता कि (इस संसार समुंद्र का) परला किनारा कैसे मिले। उक्तर- (जो मनुष्य जो कुछ) स्वयं कहता है और स्वयं ही (उसको) समझता (भी) है उसको (उसके प्रश्न का) उक्तर देने की आवश्यक्ता नहीं होती; (इस वास्ते। हे चरपट !) आपके (प्रश्न) में कोई कमी ढूँढने की जरूरत नहीं। (वैसे उक्तर ये है कि) सदा कायम रहने वाले प्रभू को जपो तो आप (इस दुष्तर सागर से) पार लांघ जाएँगे। 4।

जैसे जल महि कमलु निरालमु मुरगाई नै साणे ॥

जैसे जल महि कमलु निरालमु मुरगाई नै साणे ॥
सुरति सबदि भव सागरु तरीऐ नानक नामु वखाणे ॥
रहहि इकांति एको मनि वसिआ आसा माहि निरासो ॥
अगमु अगोचरु देखि दिखाए नानकु ता का दासो ॥5॥
सुणि सुआमी अरदासि हमारी पूछउ साचु बीचारो ॥
रोसु न कीजै उतरु दीजै किउ पाईऐ गुर दुआरो ॥
इहु मनु चलतउ सच घरि बैसै नानक नामु अधारो ॥
आपे मेलि मिलाए करता लागै साचि पिआरो ॥6॥

हिन्दी अर्थ: जैसे पानी में (उगा हुआ) कमल का फूल (पानी से) निराला रहता है। जैसे नदी में (तैरती) मुरगाई (भाव। उसके पंख पानी से नहीं भीगते। इसी तरह) हे नानक ! गुरू के शबद में सुरति (जोड़ के) नाम जपने से संसार समुंद्र तैरा जा सकता है। (जो मनुष्य संसार की) आशाओं में निराश रहते हैं। जिनके मन में एक प्रभू ही बसता है (वे संसार में रहते हुए भी संसार से अलग) एकांत में बसते हैं। (ऐसे जीवन वाला जो मनुष्य) अगम और अगोचर प्रभू के दर्शन करके औरों को दर्शन करवाता है। नानक उसका दास है। 5। (चरपट के प्रश्न।) हे स्वामी ! मेरी विनती सुन। मैं सही विचार पूछता हूँ; गुस्सा ना करना। उक्तर देना कि गुरू का दर कैसे प्राप्त होता है। (भाव। कैसे पता लगे कि गुरू का दर प्राप्त हो गया है) । (उक्तर।) (जब सच-मुच गुरू का दर प्राप्त हो जाता है तब) हे नानक ! ये चंचल मन प्रभू की याद में जुड़ा रहता है। (प्रभू का) नाम (जिंदगी का) आसरा हो जाता है। (पर ऐसा) प्यार सच्चे प्रभू में (तब ही) लगता है (जब) करतार स्वयं (जीव को) अपनी याद में जोड़ लेता है। 6।

हाटी बाटी रहहि निराले रूखि बिरखि उदिआने ॥

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हाटी बाटी रहहि निराले रूखि बिरखि उदिआने ॥
कंद मूलु अहारो खाईऐ अउधू बोलै गिआने ॥

हिन्दी अर्थ: जोगी ने (जोग का) ज्ञान-मार्ग इस तरह बताया- हम (दुनिया के) मेलों-मसाधों (भाव। सांसारिक झमेलों) से अलग जंगलों में किसी पेड़-वृक्ष के तले रहते हैं और गाजर-मूली पर गुजारा करते हैं;

रचयिता और स्रोत

इस अंग पर ओअंकार की अंतिम पंक्तियों के बाद गुरु नानक देव जी की सिध गोस्टि आरम्भ होती है। संवाद आगे अंग 946 तक चलता है।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९३८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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