राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
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बिदिआ सोधै ततु लहै राम नाम लिव लाइ ॥ मनमुखु बिदिआ बिक्रदा बिखु खटे बिखु खाइ ॥ मूरखु सबदु न चीनई सूझ बूझ नह काइ ॥53॥ पाधा गुरमुखि आखीऐ चाटड़िआ मति देइ ॥ नामु समालहु नामु संगरहु लाहा जग महि लेइ ॥ सची पटी सचु मनि पड़ीऐ सबदु सु सारु ॥ नानक सो पड़िआ सो पंडितु बीना जिसु राम नामु गलि हारु ॥54॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: जो विद्या के द्वारा ही अपने असल की विचार करता है। और परमात्मा के नाम के साथ सुरति जोड़ के जीवन का असल मनोरथ हासिल कर लेता है। (पर) जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है। वह विद्या को (सिर्फ) बेचता ही है (भाव। सिर्फ आजीविका के लिए इस्तेमाल करता है। विद्या के बदले आत्मिक मौत लाने वाली) माया-विष को ही कमाता है। वह मूर्ख गुरू के शबद को नहीं पहचानता। शबद की सुध-बुध उसको रक्ती भर भी नहीं होती। 53। वह पांधा (पंडित। शिक्षक व अध्यापक) गुरमुखि कहा जाना चाहिए। (वह पांधा) दुनिया में (असल) लाभ कमाता है जो अपने शागिर्दों को ये शिक्षा देता है कि (हे विद्यार्थियो !) प्रभू का नाम जपो और नाम-धन एकत्र करो। सच्चा प्रभू मन में बस जाना – यही सच्ची पट्टी है (जो पांधे को अपने चेलों को पढ़ाना चाहिए)। (प्रभू को हृदय में बसाने के लिए) सतिगुरू का श्रेष्ठ शबद पढ़ना चाहिए। हे नानक ! वही मनुष्य विद्वान है वही पंडित है और समझदार है जिसके गले में प्रभू का नाम-रूप हार है (भाव। जो हर वक्त प्रभू को याद रखता है और हर जगह देखता है)। 54। 1।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 सिध गोसटि सतिगुर प्रसादि ॥ (हमारी) नमस्कार उन संतों की सभा को है जो ‘ईश्वरीय सभा’ (सत्संग) बना के अडोल बैठे हैं। हमारी अरदास उस संत सभा के आगे है जिसमें सदा कायम रहने वाला अपर-अपार प्रभू (प्रत्यक्ष बसता) है। मैं उस संत-सभा के आगे सिर काट के धर दूँ। तन और मन भेट कर दूँ (ताकि) आसानी से ही प्रभू के गुण गा सकूँ; (क्योंकि) हे नानक ! संत मिल जाए तो ईश्वर मिल जाता है। 1। (हे चरपट ! देश-देसांतरों और तीर्थों पर) भ्रमण करने से क्या लाभ। सदा कायम रहने वाले प्रभू में जुड़ने से ही पवित्र हुआ जा सकता है; (सतिगुरू के) सच्चे शबद के बिना (‘दुनिया सागर दुतर से’ अर्थात दुश्वार दुनिया सागर से) निजात नहीं मिलती। 1। रहाउ। (चरपट जोगी ने पूछा-) आप कौन हैं। आपका क्या नाम है। आपका क्या मत है। (उस मत का) मनोरथ क्या है। (गुरू नानक देव जी का उक्तर-) मैं सदा कायम रहने वाले प्रभू को जपता हूँ। हमारी (प्रभू के आगे ही सदा) प्रार्थना है और मैं संत जनों से बलिहार जाता हूँ (बस ! यह मेरा मत है)। हे बालक ! आप किस के आसरे शांत-चित्त हैं। आपकी सुरति किसमें जुड़ती है। कहाँ से आते हैं। कहाँ जाते हैं। (नानक कहता है- चरपट ने पूछा-) हे संत ! सुन। आपका क्या मत है। 2।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: (सतिगुरू जी का उक्तर-) (हे चरपट !-) सर्व-व्यापक प्रभू (की याद) में जुड़ के सदा शांत-चित रहते हैं। हम सतिगुरू जी की मर्जी से चलते हैं। हे नानक- (कह-) प्रभू के हुकम में सहज ही (जगत में) आए। हुकम में विचर रहे हैं। सदा उसकी ही रजा में रहते हैं। (पक्के) आसन वाला। (सदा) टिके रहने वाला प्रभू खुद ही है। हमने यही गुरू-शिक्षा ली है। गुरू के राह पर चलने वाला मनुष्य ज्ञानवान हो जाता है। अपने आप को पहचानता है। और। सदा सच्चे प्रभू में जुड़ा रहता है। 3। चरपट कहता है (भाव। चरपट ने कहा-) जगत (एक ऐसा) समुंद्र कहा जाता है जिसको तैरना मुश्किल है। हे विरक्त नानक ! ठीक विचार बता कि (इस संसार समुंद्र का) परला किनारा कैसे मिले। उक्तर- (जो मनुष्य जो कुछ) स्वयं कहता है और स्वयं ही (उसको) समझता (भी) है उसको (उसके प्रश्न का) उक्तर देने की आवश्यक्ता नहीं होती; (इस वास्ते। हे चरपट !) आपके (प्रश्न) में कोई कमी ढूँढने की जरूरत नहीं। (वैसे उक्तर ये है कि) सदा कायम रहने वाले प्रभू को जपो तो आप (इस दुष्तर सागर से) पार लांघ जाएँगे। 4।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: जैसे पानी में (उगा हुआ) कमल का फूल (पानी से) निराला रहता है। जैसे नदी में (तैरती) मुरगाई (भाव। उसके पंख पानी से नहीं भीगते। इसी तरह) हे नानक ! गुरू के शबद में सुरति (जोड़ के) नाम जपने से संसार समुंद्र तैरा जा सकता है। (जो मनुष्य संसार की) आशाओं में निराश रहते हैं। जिनके मन में एक प्रभू ही बसता है (वे संसार में रहते हुए भी संसार से अलग) एकांत में बसते हैं। (ऐसे जीवन वाला जो मनुष्य) अगम और अगोचर प्रभू के दर्शन करके औरों को दर्शन करवाता है। नानक उसका दास है। 5। (चरपट के प्रश्न।) हे स्वामी ! मेरी विनती सुन। मैं सही विचार पूछता हूँ; गुस्सा ना करना। उक्तर देना कि गुरू का दर कैसे प्राप्त होता है। (भाव। कैसे पता लगे कि गुरू का दर प्राप्त हो गया है) । (उक्तर।) (जब सच-मुच गुरू का दर प्राप्त हो जाता है तब) हे नानक ! ये चंचल मन प्रभू की याद में जुड़ा रहता है। (प्रभू का) नाम (जिंदगी का) आसरा हो जाता है। (पर ऐसा) प्यार सच्चे प्रभू में (तब ही) लगता है (जब) करतार स्वयं (जीव को) अपनी याद में जोड़ लेता है। 6।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: जोगी ने (जोग का) ज्ञान-मार्ग इस तरह बताया- हम (दुनिया के) मेलों-मसाधों (भाव। सांसारिक झमेलों) से अलग जंगलों में किसी पेड़-वृक्ष के तले रहते हैं और गाजर-मूली पर गुजारा करते हैं;
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो विद्या के द्वारा ही अपने असल की विचार करता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।