Lulla Family

अंग ९३७ · रामकली

अंग
937
रामकली
अंग बदलें या अंश चुनें · १ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. आपु गइआ दुखु कटिआ हरि वरु पाइआ नारि ॥47॥

आपु गइआ दुखु कटिआ हरि वरु पाइआ नारि ॥47॥

अंग ९२९ से चला आ रहा अंशअगले अंग पर आगे पढ़िए →

आपु गइआ दुखु कटिआ हरि वरु पाइआ नारि ॥47॥
सुइना रुपा संचीऐ धनु काचा बिखु छारु ॥
साहु सदाए संचि धनु दुबिधा होइ खुआरु ॥
सचिआरी सचु संचिआ साचउ नामु अमोलु ॥
हरि निरमाइलु ऊजलो पति साची सचु बोलु ॥
साजनु मीतु सुजाणु तू तू सरवरु तू हंसु ॥
साचउ ठाकुरु मनि वसै हउ बलिहारी तिसु ॥
माइआ ममता मोहणी जिनि कीती सो जाणु ॥
बिखिआ अंम्रितु एकु है बूझै पुरखु सुजाणु ॥48॥
खिमा विहूणे खपि गए खूहणि लख असंख ॥
गणत न आवै किउ गणी खपि खपि मुए बिसंख ॥
खसमु पछाणै आपणा खूलै बंधु न पाइ ॥
सबदि महली खरा तू खिमा सचु सुख भाइ ॥
खरचु खरा धनु धिआनु तू आपे वसहि सरीरि ॥
मनि तनि मुखि जापै सदा गुण अंतरि मनि धीर ॥
हउमै खपै खपाइसी बीजउ वथु विकारु ॥
जंत उपाइ विचि पाइअनु करता अलगु अपारु ॥49॥
स्रिसटे भेउ न जाणै कोइ ॥
स्रिसटा करै सु निहचउ होइ ॥
संपै कउ ईसरु धिआईऐ ॥
संपै पुरबि लिखे की पाईऐ ॥
संपै कारणि चाकर चोर ॥
संपै साथि न चालै होर ॥
बिनु साचे नही दरगह मानु ॥
हरि रसु पीवै छुटै निदानि ॥50॥
हेरत हेरत हे सखी होइ रही हैरानु ॥
हउ हउ करती मै मुई सबदि रवै मनि गिआनु ॥
हार डोर कंकन घणे करि थाकी सीगारु ॥
मिलि प्रीतम सुखु पाइआ सगल गुणा गलि हारु ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ हरि सिउ प्रीति पिआरु ॥
हरि बिनु किनि सुखु पाइआ देखहु मनि बीचारि ॥
हरि पड़णा हरि बुझणा हरि सिउ रखहु पिआरु ॥
हरि जपीऐ हरि धिआईऐ हरि का नामु अधारु ॥51॥
लेखु न मिटई हे सखी जो लिखिआ करतारि ॥
आपे कारणु जिनि कीआ करि किरपा पगु धारि ॥
करते हथि वडिआईआ बूझहु गुर बीचारि ॥
लिखिआ फेरि न सकीऐ जिउ भावी तिउ सारि ॥
नदरि तेरी सुखु पाइआ नानक सबदु वीचारि ॥
मनमुख भूले पचि मुए उबरे गुर बीचारि ॥
जि पुरखु नदरि न आवई तिस का किआ करि कहिआ जाइ ॥
बलिहारी गुर आपणे जिनि हिरदै दिता दिखाइ ॥52॥
पाधा पड़िआ आखीऐ बिदिआ बिचरै सहजि सुभाइ ॥

हिन्दी अर्थ: (गुरू-शबद से जिसका) अहंकार दूर हुआ है (स्वै। अहम् का) दुख काटा गया है उस जीव-स्त्री ने प्रभू-पति को पा लिया है। 47। (आम तौर जगत में) सोना-चाँदी ही इकट्ठा किया जाता है। पर ये धन होछा है। विष (-रूप। भाव दुखदाई) है। तुच्छ है। जो मनुष्य (ये) धन जोड़ के (अपने आप को) शाह कहलवाता है वह मेर-तेर में दुखी होता है। सच्चे व्यापारियों ने सदा-स्थिर रहने वाला नाम-धन इकट्ठा किया है। सच्चा अमूल्य नाम-धन सम्भाला है। उज्जवल और पवित्र प्रभू (का नाम कमाया है)। उनको सच्ची इज्जत मिलती है (प्रभू के) सच्चे (मीठे आदर वाले) बोल (मिलते हैं)। (हे पांडे ! आप भी मन की तख्ती पर गोपाल का नाम लिख और उसके आगे ऐसे अरदास कर - हे प्रभू !) आप ही (सच्चे) समझदार सज्जन-मित्र हैं। आप ही (जगत-रूप) सरोवर हैं और आप ही (इस सरोवर का जीव-रूप) हँस हैं; मैं सदके हूँ उस (हँस) से जिसके मन में आप सच्चे ठाकुर बसते हैं। (हे पांडे !) उस गोपाल को याद रख जिसने मोहनी माया की ममता (जीवों को) लगा दी है। जिस किसी ने उस सुजान पुरख को समझ लिया है। उसके लिए सिर्फ (नाम-) अमृत ही 'माया' है। 48। (मोहनी माया की ममता से पैदा हुए भेदभाव के कारण) क्षमा-हीन हो के बेअंत। लाखों अनगिनत जीव खप के मर गए हैं। गिने नहीं जा सकते। गिनती का भी क्या लाभ। अगिनत ही जीव (क्षमा-विहीन हो के) दुखी हुए हैं। जो मनुष्य अपने मालिक प्रभू को पहचानता है। वह खुले दिल वाला हो जाता है। तंग-दिली (उसमें) नहीं रहती। गुरू के शबद के द्वारा वह टिक जाता है (भाव।जिगरे वाला हो जाता है) (हे प्रभू !) आप उसे प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे जाते हैं। क्षमा और सत्य उसको आसानी से मिल जाते हैं। (हे प्रभू !) आप ही उसका (जिंदगी के सफर का) खर्च बन जाते हैं। आप ही उसका खरा (सच्चा) धन हो जाते हैं। आप स्वयं ही उसका ध्यान (सुरति का निशाना) बन जाते हैं। आप स्वयं ही उसके शरीर में (प्रत्यक्ष) बसने लग जाते हैं। वह मन से। तन से। मुँह से सदा (आपको ही) जपता है। उसके अंदर (आपके) गुण पैदा हो जाते हैं। उसके मन में धीरज आ जाता है। (गोपाल के नाम के बिना) दूसरा पदार्थ विकार (-रूप) है। (इसके कारण) जीव अहंकार में खपता-खपाता है। (आश्चर्यजनक खेल ये है) करतार ने जंतु पैदा करके (अहंकार) में डाल दिए हैं। (पर) वह बेअंत करतार अलग ही रहता है। 49। कोई जीव सृजनहार प्रभू का भेद नहीं पा सकता (और। कोई उसकी रजा में दख़ल नहीं दे सकता। क्योंकि जगत में) अवश्य ही वही होता है जो सृजनहार करतार करता है। (सृजनहार की यह एक अजब खेल है कि आम तौर पर मनुष्य) धन की खातिर ही परमात्मा को ध्याता है। और अबतक की हुई मेहनत के अनुसार धन मिल (भी) जाता है। धन की खातिर मनुष्य दूसरों के नौकर (भी) बनते हैं। चोर (भी) बनते हैं (भाव। चोरी भी करते हैं)। पर। धन किसी के साथ नहीं निभता। (मरने पर) औरों का बन जाता है। सदा-स्थिर रहने वाला गोपाल (के नाम) के बिना उसकी हजूरी में आदर नहीं मिलता। जो मनुष्य परमात्मा के नाम का रस पीता है वह (वह धन-संपक्ति के मोह से) अंत को बच जाता है। 50। हे सखी ! (ये बात) देख-देख के मैं हैरान हो रही हूँ कि (मेरे अंदर) 'मैं मैं' करने वाली 'मैं' मर गई है (भाव। अहंकार करने वाली आदत खत्म हो गई है)। (अब मेरी सुरति) गुरू-शबद में जुड़ रही है। और (मेरे) मन में प्रभू के साथ जान-पहचान बन गई है। मैं बहुत सारे हारों-कंगनों के हार श्रृंगार करके थक चुकी थी (पर प्रीतम-प्रभू के मिलाप का सुख ना मिला। भाव। बाहरी धार्मिक उद्यमों से आनंद नहीं मिल पाया। पर। अब जब 'अहंकार' खत्म हो गया) प्रीतम-प्रभू को मिल के सुख मिल गया है (उसके गुण मेरे हृदय में आ बसे हैं। यही उसके) सारे गुणों का मेरे गले में हार है (अब किसी और हार-श्रृंगार की आवश्यक्ता नहीं रही)। हे नानक ! प्रभू के साथ प्रीत। प्रभू से प्यार। सतिगुरू के माध्यम से ही हो सकता है; और। (बेशक) मन में विचार के देख लो। (भाव। आपको अपनी आत्म-बीती ही बता देगी कि) प्रभू के मेल के बिना कभी किसी को सुख नहीं मिला। (सो। हे पांडे ! अगर सुख तलाशता है तो) प्रभू का नाम पढ़। प्रभू का नाम विचार। प्रभू के साथ ही प्यार बना। (जीभ से) प्रभू का नाम जपें। (मन में) प्रभू को ही सिमरें। और प्रभू का नाम ही (जिंदगी का) आसरा (बनाएं)। 51। हे सखी ! (हमारे किए कर्मों के अनुसार। अहंकार का) जो लेख करतार ने (हमारे माथे पर) लिख दिया है वह (हमारी अपनी चतुराई व हिम्मत से) नहीं मिट सकते। (यह लेख तब ही मिटता है। जब) जिस प्रभू ने खुद ही (इस अहंकार के लेख का) सबब। (भाव। विछोड़ा) बनाया है वह मेहर करके (हमारे अंदर) आ बसे। करतार के गुण गाने की दाति करतार के अपने हाथ में है; गुरू के शबद की विचार के द्वारा समझने का यत्न करो (तो समझ आ जाएगी)। (हे प्रभू ! अहंकार के) जो संस्कार (हमारे मन में हमारे कर्मों के अनुसार) उकरे जाते हैं वह (हमारी अपनी चतुराई से) बदले नहीं जा सकते; जैसे आपको अच्छा लगे आप स्वयं (हमारी) संभाल कर। हे नानक ! (कह-) गुरू के शबद को विचार के (देख लिया है कि हे प्रभू !) आपकी मेहर की नजर से ही सुख मिलता है। जो मनुष्य अपने मन के पीछे चले वह (इस अहंकार के चक्र-व्यूह में फस के) दुखी हुए। बचे वह जो गुरू-शबद की विचार में (जुड़े)। (मनुष्य अपनी चतुराई करे भी क्या। क्योंकि) जो प्रभू (इन आँखों से) दिखता ही नहीं। उसके गुण गाए नहीं जा सकते। (तभी तो) मैं अपने गुरू से सदके हूँ जिसने (मुझे मेरे) हृदय में ही (प्रभू) दिखा दिया है। 52। उस पांधे (पंडित व अध्यापक) को विद्वान कहना चाहिए। जो विद्या के द्वारा शांति के स्वभाव में जीवन व्यतीत करता है।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 937 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९३७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English