नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: (गुरू-शबद से जिसका) अहंकार दूर हुआ है (स्वै। अहम् का) दुख काटा गया है उस जीव-स्त्री ने प्रभू-पति को पा लिया है। 47। (आम तौर जगत में) सोना-चाँदी ही इकट्ठा किया जाता है। पर ये धन होछा है। विष (-रूप। भाव दुखदाई) है। तुच्छ है। जो मनुष्य (ये) धन जोड़ के (अपने आप को) शाह कहलवाता है वह मेर-तेर में दुखी होता है। सच्चे व्यापारियों ने सदा-स्थिर रहने वाला नाम-धन इकट्ठा किया है। सच्चा अमूल्य नाम-धन सम्भाला है। उज्जवल और पवित्र प्रभू (का नाम कमाया है)। उनको सच्ची इज्जत मिलती है (प्रभू के) सच्चे (मीठे आदर वाले) बोल (मिलते हैं)। (हे पांडे ! आप भी मन की तख्ती पर गोपाल का नाम लिख और उसके आगे ऐसे अरदास कर – हे प्रभू !) आप ही (सच्चा) समझदार सज्जन-मित्र है। आप ही (जगत-रूप) सरोवर है और आप ही (इस सरोवर का जीव-रूप) हँस है; मैं सदके हूँ उस (हँस) से जिसके मन में आप सच्चा ठाकुर बसता है। (हे पांडे !) उस गोपाल को याद रख जिसने मोहनी माया की ममता (जीवों को) लगा दी है। जिस किसी ने उस सुजान पुरख को समझ लिया है। उसके लिए सिर्फ (नाम-) अमृत ही ‘माया’ है। 48। (मोहनी माया की ममता से पैदा हुए भेदभाव के कारण) क्षमा-हीन हो के बेअंत। लाखों अनगिनत जीव खप के मर गए हैं। गिने नहीं जा सकते। गिनती का भी क्या लाभ। अगिनत ही जीव (क्षमा-विहीन हो के) दुखी हुए हैं। जो मनुष्य अपने मालिक प्रभू को पहचानता है। वह खुले दिल वाला हो जाता है। तंग-दिली (उसमें) नहीं रहती। गुरू के शबद के द्वारा वह टिक जाता है (भाव।जिगरे वाला हो जाता है) (हे प्रभू !) आप उसे प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे जाता है। क्षमा और सत्य उसको आसानी से मिल जाते हैं। (हे प्रभू !) आप ही उसका (जिंदगी के सफर का) खर्च बन जाता है। आप ही उसका खरा (सच्चा) धन हैं जाता है। आप स्वयं ही उसका ध्यान (सुरति का निशाना) बन जाता है। आप स्वयं ही उसके शरीर में (प्रत्यक्ष) बसने लग जाता है। वह मन से। तन से। मुँह से सदा (आपको ही) जपता है। उसके अंदर (आपके) गुण पैदा हैं जाते हैं। उसके मन में धीरज आ जाता है। (गोपाल के नाम के बिना) दूसरा पदार्थ विकार (-रूप) है। (इसके कारण) जीव अहंकार में खपता-खपाता है। (आश्चर्यजनक खेल ये है) करतार ने जंतु पैदा करके (अहंकार) में डाल दिए हैं। (पर) वह बेअंत करतार अलग ही रहता है। 49। कोई जीव सृजनहार प्रभू का भेद नहीं पा सकता (और। कोई उसकी रजा में दख़ल नहीं दे सकता। क्योंकि जगत में) अवश्य ही वही होता है जो सृजनहार करतार करता है। (सृजनहार की यह एक अजब खेल है कि आम तौर पर मनुष्य) धन की खातिर ही परमात्मा को ध्याता है। और अबतक की हुई मेहनत के अनुसार धन मिल (भी) जाता है। धन की खातिर मनुष्य दूसरों के नौकर (भी) बनते हैं। चोर (भी) बनते हैं (भाव। चोरी भी करते हैं)। पर। धन किसी के साथ नहीं निभता। (मरने पर) औरों का बन जाता है। सदा-स्थिर रहने वाला गोपाल (के नाम) के बिना उसकी हजूरी में आदर नहीं मिलता। जो मनुष्य परमात्मा के नाम का रस पीता है वह (वह धन-संपक्ति के मोह से) अंत को बच जाता है। 50। हे सखी ! (ये बात) देख-देख के मैं हैरान हो रही हूँ कि (मेरे अंदर) ‘मैं मैं’ करने वाली ‘मैं’ मर गई है (भाव। अहंकार करने वाली आदत खत्म हो गई है)। (अब मेरी सुरति) गुरू-शबद में जुड़ रही है। और (मेरे) मन में प्रभू के साथ जान-पहचान बन गई है। मैं बहुत सारे हारों-कंगनों के हार श्रृंगार करके थक चुकी थी (पर प्रीतम-प्रभू के मिलाप का सुख ना मिला। भाव। बाहरी धार्मिक उद्यमों से आनंद नहीं मिल पाया। पर। अब जब ‘अहंकार’ खत्म हो गया) प्रीतम-प्रभू को मिल के सुख मिल गया है (उसके गुण मेरे हृदय में आ बसे हैं। यही उसके) सारे गुणों का मेरे गले में हार है (अब किसी और हार-श्रृंगार की आवश्यक्ता नहीं रही)। हे नानक ! प्रभू के साथ प्रीत। प्रभू से प्यार। सतिगुरू के माध्यम से ही हो सकता है; और। (बेशक) मन में विचार के देख लो। (भाव। तुम्हे अपनी आत्म-बीती ही बता देगी कि) प्रभू के मेल के बिना कभी किसी को सुख नहीं मिला। (सो। हे पांडे ! अगर सुख तलाशता है तो) प्रभू का नाम पढ़। प्रभू का नाम विचार। प्रभू के साथ ही प्यार बना। (जीभ से) प्रभू का नाम जपें। (मन में) प्रभू को ही सिमरें। और प्रभू का नाम ही (जिंदगी का) आसरा (बनाएं)। 51। हे सखी ! (हमारे किए कर्मों के अनुसार। अहंकार का) जो लेख करतार ने (हमारे माथे पर) लिख दिया है वह (हमारी अपनी चतुराई व हिम्मत से) नहीं मिट सकते। (यह लेख तब ही मिटता है। जब) जिस प्रभू ने खुद ही (इस अहंकार के लेख का) सबब। (भाव। विछोड़ा) बनाया है वह मेहर करके (हमारे अंदर) आ बसे। करतार के गुण गाने की दाति करतार के अपने हाथ में है; गुरू के शबद की विचार के द्वारा समझने का यत्न करो (तो समझ आ जाएगी)। (हे प्रभू ! अहंकार के) जो संस्कार (हमारे मन में हमारे कर्मों के अनुसार) उकरे जाते हैं वह (हमारी अपनी चतुराई से) बदले नहीं जा सकते; जैसे आपको अच्छा लगे आप स्वयं (हमारी) संभाल कर। हे नानक ! (कह-) गुरू के शबद को विचार के (देख लिया है कि हे प्रभू !) आपकी मेहर की नजर से ही सुख मिलता है। जो मनुष्य अपने मन के पीछे चले वह (इस अहंकार के चक्र-व्यूह में फस के) दुखी हुए। बचे वह जो गुरू-शबद की विचार में (जुड़े)। (मनुष्य अपनी चतुराई करे भी क्या। क्योंकि) जो प्रभू (इन आँखों से) दिखता ही नहीं। उसके गुण गाए नहीं जा सकते। (तभी तो) मैं अपने गुरू से सदके हूँ जिसने (मुझे मेरे) हृदय में ही (प्रभू) दिखा दिया है। 52। उस पांधे (पंडित व अध्यापक) को विद्वान कहना चाहिए। जो विद्या के द्वारा शांति के स्वभाव में जीवन व्यतीत करता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “(गुरू-शबद से जिसका) अहंकार दूर हुआ है (स्वै।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।