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अंग ९३६ · रामकली

अंग
936
रामकली
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  1. मेरी मेरी करि मुए विणु नावै दुखु भालि ॥

मेरी मेरी करि मुए विणु नावै दुखु भालि ॥

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मेरी मेरी करि मुए विणु नावै दुखु भालि ॥
गड़ मंदर महला कहा जिउ बाजी दीबाणु ॥
नानक सचे नाम विणु झूठा आवण जाणु ॥
आपे चतुरु सरूपु है आपे जाणु सुजाणु ॥42॥
जो आवहि से जाहि फुनि आइ गए पछुताहि ॥
लख चउरासीह मेदनी घटै न वधै उताहि ॥
से जन उबरे जिन हरि भाइआ ॥
धंधा मुआ विगूती माइआ ॥
जो दीसै सो चालसी किस कउ मीतु करेउ ॥
जीउ समपउ आपणा तनु मनु आगै देउ ॥
असथिरु करता तू धणी तिस ही की मै ओट ॥
गुण की मारी हउ मुई सबदि रती मनि चोट ॥43॥
राणा राउ न को रहै रंगु न तुंगु फकीरु ॥
वारी आपो आपणी कोइ न बंधै धीर ॥
राहु बुरा भीहावला सर डूगर असगाह ॥
मै तनि अवगण झुरि मुई विणु गुण किउ घरि जाह ॥
गुणीआ गुण ले प्रभ मिले किउ तिन मिलउ पिआरि ॥
तिन ही जैसी थी रहां जपि जपि रिदै मुरारि ॥
अवगुणी भरपूर है गुण भी वसहि नालि ॥
विणु सतगुर गुण न जापनी जिचरु सबदि न करे बीचारु ॥44॥
लसकरीआ घर संमले आए वजहु लिखाइ ॥
कार कमावहि सिरि धणी लाहा पलै पाइ ॥
लबु लोभु बुरिआईआ छोडे मनहु विसारि ॥
गड़ि दोही पातिसाह की कदे न आवै हारि ॥
चाकरु कहीऐ खसम का सउहे उतर देइ ॥
वजहु गवाए आपणा तखति न बैसहि सेइ ॥
प्रीतम हथि वडिआईआ जै भावै तै देइ ॥
आपि करे किसु आखीऐ अवरु न कोइ करेइ ॥45॥
बीजउ सूझै को नही बहै दुलीचा पाइ ॥
नरक निवारणु नरह नरु साचउ साचै नाइ ॥
वणु त्रिणु ढूढत फिरि रही मन महि करउ बीचारु ॥
लाल रतन बहु माणकी सतिगुर हाथि भंडारु ॥
ऊतमु होवा प्रभु मिलै इक मनि एकै भाइ ॥
नानक प्रीतम रसि मिले लाहा लै परथाइ ॥
रचना राचि जिनि रची जिनि सिरिआ आकारु ॥
गुरमुखि बेअंतु धिआईऐ अंतु न पारावारु ॥46॥
ड़ाड़ै रूड़ा हरि जीउ सोई ॥
तिसु बिनु राजा अवरु न कोई ॥
ड़ाड़ै गारुड़ु तुम सुणहु हरि वसै मन माहि ॥
गुर परसादी हरि पाईऐ मतु को भरमि भुलाहि ॥
सो साहु साचा जिसु हरि धनु रासि ॥
गुरमुखि पूरा तिसु साबासि ॥
रूड़ी बाणी हरि पाइआ गुर सबदी बीचारि ॥

हिन्दी अर्थ: पर अगर मनुष्य के पल्ले में गुण हों तो मन माया की तरफ से पलट के अपने अंदर ही अहं भाव को मार लेता है (और इस तरह इसमें मोह आदि विकार नहीं रह जाते)। परमात्मा का 'नाम' भुला के (सिर्फ) माया को ही अपनी समझ के (इस तरह बल्कि) दुख ले के ही (बेअंत जीव) चले गए। किले। पक्के घर। महल-माढ़ियां और हकूमतें (सब) साथ छोड़ गए। ये तो (मदारी का) तमाशा ही था। हे नानक ! प्रभू के नाम के बिना सारा जीवन व्यर्थ जाता है (पर जीव विचारों के भी क्या वश। ये बेसमझ है) प्रभू खुद ही समझदार है। स्वयं ही सब कुछ जानता है (वही समझाए तो जीव समझे)। 42। जो जीव (माया की ममता के बँधे हुए जगत में) आते हैं वह (इस ममता में फसे हुए यहॉँ से) चले जाते हैं। बार-बार पैदा होते मरते हैं और दुखी होते हैं; (उनके लिए) ये चौरासी लाख जूनियों वाली सृष्टि रक्ती भर भी कम-ज्यादा नहीं होती (भाव। उन्हें ममता के कारण चौरासी लाख जूनियों में से गुजरना पड़ता है)। (उनमें से) बचते सिर्फ वे हैं जिनको प्रभू प्यारा लगता है (क्योंकि उनकी माया के पीछे) भटकना समाप्त हो जाती है। माया (उनकी ओर आने पर) दुखी होती है (उन्हें मोह नहीं सकती)। (जगत में तो) जो भी दिखाई देता है नाशवंत है। मैं किस को मित्र बनाऊँ। (साथ निभाने वाला मित्र तो सिर्फ परमात्मा ही है। उसके आगे ही) मैं अपनी जीवात्मा अर्पित करूँ और तन-मन की भेट रखूँ। हे करतार ! आप ही सदा कायम रहने वाले मालिक हैं। (हे पांडे !) मुझे करतार का ही आसरा है। प्रभू के गुण गाने पर ही अहंकार मरता है। (क्योंकि) सतिगुरू के शबद में रंगीज के मन में ठोकर (लगती है)। 43। (जगत में) ना कोई राणा ना कोई कंगाल हमेशा जीवित रह सकता है; ना कोई अमीर ना कोई फकीर; हरेक अपनी-अपनी बारी आने पर (यहाँ से चल पड़ता है) कोई किसी को ये तसल्ली देने के लायक ही नहीं (कि आप सदा यहाँ टिका रहेगा)। (जगत का) रास्ता बहुत मुश्किल और डरावना है। (यह एक) बहुत ही गहरे समुंद्र (की यात्रा है) पहाड़ी रास्ता है। मेरे अंदर तो कई अवगुण हैं जिनके कारण दुखी हो रही हूँ। (मेरे पल्ले गुण नहीं हैं) गुणों के बगैर कैसे मंजिल तक पहुँचूं। (भाव। प्रभू चरणों में नहीं जुड़ सकती)। गुणों वाले। गुण पल्ले बाँध के प्रभू को मिल चुके हैं (मेरा भी दिल करता है कि) उन प्यारों को मिलूँ (पर) कैसे (मिलूं) । यदि प्रभू को हमेशा हृदय में जपूँ तब ही उन गुणवान गुरमुखों जैसी बन सकती हूँ। (माया-ग्रसित जीव) अवगुणों से नाको-नाक भरा रहता है (वैसे) गुण भी उसके अंदर ही बसते हैं (क्योंकि गुणवान प्रभू अंदर बस रहा है)। पर सतिगुरू के बिना गुणों की समझ नहीं पड़ती। (तब तक नहीं पड़ती) जब तक गुरू के शबद में विचार ना की जाए। 44। (इस जगत रण-भूमि में। जीव) सिपाहियों ने (शरीर रूपी) डेरे सम्भाले हुए हैं। (प्रभू-पति से) रिज़क लिखा के (यहाँ) आए हैं। जो सिपाही हरी नाम की कमाई कमा के मालिक की (रजा-रूपी) कार कमाते हैं उन्होंने चस्का-लालच व अन्य विकार मन में से निकाल दिए हैं। जिस (जीव-) सिपाही ने (शरीर-) किले में (प्रभू-) पातशाह की दुहाई डाली है (भाव। सिमरन को हर वक्त शरीर में बसाया है) वह (कामादिक पाँचों के मुकाबले पर) कभी हार के नहीं आते। (पर जो मनुष्य) प्रभू मालिक का नौकर भी कहलवाए और सामने से (पलट) जवाब भी दे (भाव। उसके हुकम में ना चले) वह अपनी तनख्वाह गवा लेता है (भाव। वह मेहर से वंचित रहता है)। ऐसे जीव (ईश्वरीय) तख्त पर नहीं बैठ सकते (भाव। उसके साथ एक-रूप नहीं हो सकते)। पर। प्रभू के गुण गाने प्रीतम-प्रभू के अपने हाथ में है। जो उसको भाता है उसको (वह) देता है। किसी और के आगे पुकार नहीं की जा सकती। क्योंकि प्रभू स्वयं ही सब कुछ करता है। कोई और कुछ नहीं कर सकता। 45। मुझे कोई और दूसरा नहीं सूझता जो (सदा के लिए) आसन बिछा के बैठ सके (भाव। जो सारे जगत का अटल मालिक कहलवा सके); जीवों के नरक दूर करने वाला और जीवों का मालिक सदा कायम रहने वाला एक प्रभू ही है जो नाम (सिमरन) के द्वारा (मिलता) है। (उस प्रभू की खातिर) मैं जंगल-बेला ढूँढ-ढूँढ के थक गई हूँ। (अब जब) मैं मन में सोचती हूँ (तो समझ आई है कि) लालों-रत्नों और मोतियों (भाव। ईश्वरीय गुणों) का खजाना सतिगुरू के हाथ में है; अगर मैं एक मन हो के (सिमरन करके) शुद्ध-आत्मा हो जाऊँ तो मुझे प्रभू मिल जाए। हे नानक ! जो जीव प्रीतम प्रभू के प्यार में जुड़े हुए हैं वह परलोक की कमाई कमा लेते हैं। (हे पांडे !) जिस (प्रभू) ने रचना रची है जिसने जगत का ढाँचा बनाया है। जो स्वयं बेअंत है। जिसका अंत और हदबंदी नहीं पाई जा सकती। उसको गुरू के बताए हुए राह पर चल के सिमरा जा सकता है। 46। वह प्रभू ही (सबसे ज्यादा) सुंदर है। उसके बिना कोई और (भाव। उसके बराबर का) हाकिम नहीं। (हे पांडे !) आप मन को वश में करने के लिए ('गुरू-शबद रूपी) मंत्र सुन (इससे) यह प्रभू मन में आ बसेगा। (पर) कहीं कोई इस भुलेखे में ना पड़ जाए। (कि प्रभू गुरू के बिना प्राप्त हो सकता है) प्रभू (तो) गुरू की मेहर से ही मिलता है। गुरू ही सच्चा शाह है जिसके पास प्रभू का नाम-रूपी पूँजी है। गुरू ही पूर्ण पुरख है। गुरू को ही धन्य-धन्य कहो। (जिस किसी को मिला है) सतिगुरू की सुंदर बाणी के द्वारा ही। गुरू के शबद के विचार से ही प्रभू मिला है;

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 936 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९३६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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