नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: ऐसे मनुष्य की ना गोपाल के साथ गहरी सांझ होती है। ना ही ऊँची सुरति। और ना ही धर्म। (इस अहंकार के कारण) ‘नाम’ के बिना ‘निर्भय’ प्रभू की प्राप्ति नहीं हो सकती। ‘अहंकार’ को समझा नहीं जा सकता (भाव। अहंकार में टिके रहने से ये समझ भी नहीं आती कि हमारे ऊपर अहंकार की काठी पड़ी हुई है)। (ये एक ऐसा समुंद्र है कि) इसकी गहराई का परला सिरा नहीं मिल सकता। मैं यतन कर-कर के थक गई हूँ। पर नहीं पा सकी; गोपाल के नाम में रंगे हुए गुरमुखों के बिना और किसी के आगे ये दुख बताया भी नहीं जा सकता। हे नानक ! अगर मैं उस प्यारे प्रभू को बार-बार याद करूँ तो वह मिलाने में समर्थ प्यारा स्वयं ही मिला लेता है। जिस प्रभू ने (‘अभिमान’ की दूरी बना के) विछोड़ा हुआ है वह गुरू के अथाह प्यार के माध्यम से ही मिलाएगा। 37। (हे पांडे !) पाप बुरा (काम) है। पर पापी को प्यारा लगता है। वह (पापी) पाप के साथ लदा हुआ पाप का ही पसारा पसारता है। अगर मनुष्य पाप छोड़ के अपने असल को पहचाने तो उसको चिंता। विछोड़ा और दुख नहीं व्यापते। (जब तक) झूठ पाप-रूपी मौत (जीव के आत्मिक जीवन को) तबाह कर रही है। तब तक इसका पैदा होना मरना कैसे खत्म हो। और जमकाल (भाव। मौत के डर) को ये कैसे टाल सके। (जब तक) मन (पापों के) जंजालों से घिरा हुआ है। यह (इन पापों के) और-और जंजालों में पड़ता है। गोपाल के नाम के बिना (इन जंजालों से) बचा नहीं जा सकता। (बल्कि जीव) पापों में ही बार-बार दुखी होते हैं। 38। कालियां करतूतों वाला मनुष्य बार-बार जाल में फसता है। (फस के) फिर पछताता है कि ये क्या हैं गया; फसा हुआ भी (जाल में फसाने वाला) चोगा ही चुगे जाता है और होश नहीं करता। अगर सतिगुरू (इसको) मिल जाए। तो आँखों से (अस्लियत) दिखाई दे जाती है। जैसे मछली मौत लाने वाले जाल में फस जाती है (वैसे ही जीव आत्मिक मौत लाने वाले पापों में फसता है)। (हे पांडे ! गोपाल के नाम की) दाति देने वाले गुरू के बिना (इस जाल में से) छुटकारा (भी) ना तलाश (भाव। नहीं मिलता)। (इस जाल में फसा हुआ जीव) बार-बार पैदा होता है और मरता है। जो जीव एक गोपाल के प्यार में जुड़ता है और सुरति लगाए रखता है; वह इस तरह विकारों की जंजीरों में से निकल जाता है। और फिर उस को बँधन नहीं पड़ते। 39। (हे पांडे !) ये काया (जीवात्मा को) ‘वीर वीर’ कहती रह जाती है (पर मौत के आने पर) वीर जी बेगाने हो जाते हैं। वीर (जी) (परलोक में) अपने घर चले जाते हैं और बहन (काया) विछोड़े में (भाव। मौत के आने पर) जल जाती है। (फिर भी यह) अंजान (काया) बच्ची पिता के घर में रहती हुई गुड्डे-गुड्डियों के प्यार में ही लगी रहती है (भाव। शरीर और जीवात्मा का मेल चार दिनों का जानते हुए भी जीव दुनियां के पदार्थों में मस्त रहता है)। (जीवात्मा को ये शिक्षा देनी चाहिए कि) हे (जीव-) स्त्री ! अगर पति (-प्रभू) को मिलना चाहती है तो प्यार से सतिगुरू के बताए हुए राह पर चल। जिस जीव को गोपाल की कृपा से सतिगुरू मिलता है वह (इस बात को) समझता है। पर कोई विरला मनुष्य ही यह सूझ हासिल करता है। गोपाल-प्रभू के गुण गाने गोपाल के अपने हाथ में है। (यह दाति वह) उसको देता है जो उसको भाता है। कोई विरला गुरमुख सतिगुरू की बाणी को विचारता है। वह बाणी सतिगुरू की (ऐसी) है कि (इसकी विचार से) मनुष्य स्वै-स्वरूप में टिक जाता है। 40। (इस जगत की संरचना) बार-बार तोड़ी जाती है और बनाई जाती है। बार बार निर्माण और विनाश की प्रक्रिया चलती है। (वह गोपाल इस संसार-) सरोवर को भर के सुखा देता है। फिर और लबालब भर देता है। वह गोपाल प्रभू सब कुछ कर सकने योग्य है। बेपरवाह है। (हे पांडे ! उस गोपाल प्रभू को भुला के) जो जीव भटकना में पड़ कर गलत राह पर पड़े हुए हैं वह (माया के पीछे ही) पागल हुए पड़े हैं। (उनको) भाग्यों के बगैर (उस बेपरवाह की सिफतसालाह के तौर पर) कुछ नहीं मिलता। सतिगुरू की ज्ञान-रूप डोरी प्रभू ने (अपने) हाथ में पकड़ रखी है। जिनको (इस डोरी से अपनी ओर) खींचता है वह (उसकी ओर) चल पड़ते हैं (भाव। जिन पर गोपाल प्रभू मेहर करता है वे गुरू के बताए हुए राह पर चल कर उसके चरणों में जुड़ते हैं) वह प्रभू के गुण गा के उसके प्यार में मस्त रहते हैं। फिर उन्हें पछताना नहीं पड़ता। वह (प्रभू की ही) तलाश करते हैं। (जब) सतिगुरू के द्वारा (रास्ता) समझ लेते हैं तो अपने (असल) घर में टिक जाते हैं (भटकने से हट जाते हैं)। यह संसार-समुंद्र (जीवों के वास्ते) मुश्किल रास्ता है। इसमें से तभी तैरा जा सकता है अगर (दुनिया वाली) आशाएं बाँधनी छोड़ दें। सतिगुरू की मेहर से अपने आप को (अपनी अस्लियत को) पहचानें; इस तरह जीते हुए मर जाना है (भाव। इसी जीवन में ही मन को विकारों से हटा लेना है)। 41। (बेअंत जीव) माया के लिए तरले लेते मर गए। पर माया किसी के साथ ना निभी। जब (जीव-) हंस दुचिक्ती में हो के (मौत आने पर) उठ चलता है तो माया का साथ छूट जाता है। जो मन माया में फसा होता है उसको जम की ओर से ताड़ना मिलती है (भाव। वह मौत का नाम सुन-सुन के डरता है)। (माया तो यहीं ही रह गई। पर माया की खातिर किए हुए) अवगुण साथ चल पड़ते हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “ऐसे मनुष्य की ना गोपाल के साथ गहरी सांझ होती है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।