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अंग 933

अंग
933
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
काइआ छीजै भई सिबालु ॥24॥
जापै आपि प्रभू तिहु लोइ ॥
जुगि जुगि दाता अवरु न कोइ ॥
जिउ भावै तिउ राखहि राखु ॥
जसु जाचउ देवै पति साखु ॥
जागतु जागि रहा तुधु भावा ॥
जा तू मेलहि ता तुझै समावा ॥
जै जै कारु जपउ जगदीस ॥
गुरमति मिलीऐ बीस इकीस ॥25॥
झखि बोलणु किआ जग सिउ वादु ॥
झूरि मरै देखै परमादु ॥
जनमि मूए नही जीवण आसा ॥
आइ चले भए आस निरासा ॥
झुरि झुरि झखि माटी रलि जाइ ॥
कालु न चांपै हरि गुण गाइ ॥
पाई नव निधि हरि कै नाइ ॥
आपे देवै सहजि सुभाइ ॥26॥
ञिआनो बोलै आपे बूझै ॥
आपे समझै आपे सूझै ॥
गुर का कहिआ अंकि समावै ॥
निरमल सूचे साचो भावै ॥
गुरु सागरु रतनी नही तोट ॥
लाल पदारथ साचु अखोट ॥
गुरि कहिआ सा कार कमावहु ॥
गुर की करणी काहे धावहु ॥
नानक गुरमति साचि समावहु ॥27॥
टूटै नेहु कि बोलहि सही ॥
टूटै बाह दुहू दिस गही ॥
टूटि परीति गई बुर बोलि ॥
दुरमति परहरि छाडी ढोलि ॥
टूटै गंठि पड़ै वीचारि ॥
गुर सबदी घरि कारजु सारि ॥
लाहा साचु न आवै तोटा ॥
त्रिभवण ठाकुरु प्रीतमु मोटा ॥28॥
ठाकहु मनूआ राखहु ठाइ ॥
ठहकि मुई अवगुणि पछुताइ ॥
ठाकुरु एकु सबाई नारि ॥
बहुते वेस करे कूड़िआरि ॥
पर घरि जाती ठाकि रहाई ॥
महलि बुलाई ठाक न पाई ॥
सबदि सवारी साचि पिआरी ॥
साई सोुहागणि ठाकुरि धारी ॥29॥
डोलत डोलत हे सखी फाटे चीर सीगार ॥
डाहपणि तनि सुखु नही बिनु डर बिणठी डार ॥
डरपि मुई घरि आपणै डीठी कंति सुजाणि ॥
डरु राखिआ गुरि आपणै निरभउ नामु वखाणि ॥
डूगरि वासु तिखा घणी जब देखा नही दूरि ॥
तिखा निवारी सबदु मंनि अंम्रितु पीआ भरपूरि ॥
देहि देहि आखै सभु कोई जै भावै तै देइ ॥
गुरू दुआरै देवसी तिखा निवारै सोइ ॥30॥
ढंढोलत ढूढत हउ फिरी ढहि ढहि पवनि करारि ॥
भारे ढहते ढहि पए हउले निकसे पारि ॥
अमर अजाची हरि मिले तिन कै हउ बलि जाउ ॥
तिन की धूड़ि अघुलीऐ संगति मेलि मिलाउ ॥
मनु दीआ गुरि आपणै पाइआ निरमल नाउ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: शरीर कमजोर हो जाता है (और मनुष्य की चमड़ी पानी के) जाले की तरह ढीली हो जाती है (फिर भी इस का माया का प्यार समाप्त नहीं होता)। 24। (हे पांडे ! उस गोपाल का नाम मन की पट्टी के ऊपर लिख। जो) खुद सारे जगत में प्रकट है। जो सदा (जीवों का) दाता है (जिसके बिना) और कोई (दाता) नहीं। (हे पांडे ! गोपाल ओंकार के आगे अरदास कर और कह- हे प्रभू !) जैसे आप (मुझे) रखना चाहता है वैसे रख; (पर) मैं आपकी सिफत-सालाह (की दाति) माँगता हूँ। आपकी उपमा ही मुझे आदर और नाम देती है। (हे प्रभू !) अगर मैं आपको अच्छा लगूँ तो मैं सदा जागता रहूँ (माया के हमलों से सचेत रहूँ)। अगर आप (खुद) मुझे (अपने में) जोड़ के रखे। तो मैं आपके (चरणों) में लीन रहूँ। मैं जगत के मालिक (प्रभू) की सदा जै-जैकार कहता हूँ। (हे पांडे ! इस तरह) सतिगुरू की मति ले के बीस-बिसवे एक परमात्मा को मिल सकते हैं। 25। (हे पांडे ! गोपाल का नाम मन की तख्ती पर लिखने की बजाए माया की खातिर) जगत से झगड़ा सहेड़ना व्यर्थ है। ये तो झख मारने वाली बात है; (जो मनुष्य गोपाल का सिमरन छोड़ के झगड़े वाली राह पर पड़ता है) वह झुर-झुर के मरता है (भाव। अंदर-अंदर से अशांत ही रहता है। क्योंकि) उसकी आँखों के सामने (माया का) अहंकार फिरा रहता है। ऐसे लोग जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। सच्चे आत्मिक जीवन की (उनसे) आस नहीं की जा सकती। वे दुनिया से किसी कमाई के बिना ही चले जाते हैं। (नाम बिसार के दुनिया के झमेलों में परचने वाला मनुष्य इसी) पचड़े में खप-खप के जीवन व्यर्थ गवा जाता है। पर जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता है उसको मौत का भी डर सता नहीं सकता। प्रभू के नाम की बरकति से वह। सारी धरती का धन प्राप्त कर लेता है। यह दाति प्रभू खुद ही अपनी रजा के अनुसार देता है। 29। (सतिगुरू रूप हो के) प्रभू स्वयं ही ज्ञान उचारता है। और विचारता है। स्वयं ही इस ज्ञान को सुनता है समझता है (जिन मनुष्यों के) हृदय में सतिगुरू का बताया हुआ (ज्ञान) आ बसता है। वह मनुष्य पवित्र स्वच्छ सच्चे हो जाते हैं। उन्हें सच्चा प्रभू प्यारा लगता है। सतिगुरू समुंद्र है। उसमें (गोपाल के गुणों के) रत्नों की कमी नहीं। वह सच्चे प्रभू का रूप है। लालों का ना खत्म होने वाला (खजाना) है (भाव। सतिगुरू में बेअंत ईश्वरीय गुण हैं)। (हे पांडे !) वह काम करो जो सतिगुरू ने बताया है। सतिगुरू की बताई हुई करणी से परे ना दौड़ो। हे नानक ! सतिगुरू की शिक्षा ले के प्रभू में लीन हो जाएँगे। 27। किसी को सामने (लगा के) बात कहने से प्यार टूट जाता है दोनों तरफ से पकड़ने से (खींचने से) बाँह टूट जाती है। कुबोल बोलने से प्रीति टूट जाती है। बुरी स्त्री को पति छोड़ देता है। यदि अच्छी तरह विचार आ जाएं तो (समस्या) मुश्किल हल हो जाती है। (हे पांडे !) आप भी गुरू के शबद के द्वारा अपने मन में (गोपाल का नाम-सिमरन का) काम संभाल (इस तरह गोपाल के प्रति पड़ी हुई गाँठ खुल जाती है; फिर इस तरफ की ओर कभी) घाटा नहीं पड़ता (गोपाल-प्रभू के नाम का) सदा टिका रहने वाला नफा नित्य बना रहता है। और सारे जगत का बड़ा मालिक प्रीतम-प्रभू (सिर पर सहायक) दिखता है। 28। (हे पांडे ! गोपाल का नाम मन की पट्टी पर लिख के। माया की ओर दौड़ते) इस चंचल मन को रोके रख। और जगह पर (भाव। अंतरात्मे) टिका के रख। (सृष्टि माया की तृष्णा के) अवगुण में (फस के आपस में) भिड़-भिड़ के आत्मिक मौत सहेड़ रही है और दुखी हैं रही है। (हे पांडे !) प्रभू- पालनहार एक है। और सारे जीव उसकी नारियाँ हैं। (पर) माया-ग्रसित (जीव-स्त्री पति को नहीं पहचानती। और बाहर) कई भेस करती है (और कई आसरे ताकती है)। (जिस जीव-स्त्री को प्रभू ने) पराए घर को जाती को (और आसरे ताकती को) रोक लिया है। उसको (उसने अपने महल में बुला लिया है। उसके जीवन-राह में तृष्णा की) कोई रोक नहीं पड़ती। (गुरू के) शबद द्वारा (उसको प्रभू ने) सँवार लिया है। (वह जीव-स्त्री) सदा-स्थिर प्रभू की प्यारी हो जाती है। वही सोहाग-भाग वाली हो जाती है (क्योंकि) प्रभू ने उसको अपनी बना लिया है। 29। हे सखी ! भटक-भटक के सारे वस्त्र और श्रृंगार फट गए हैं (भाव। तृष्णा की आग के कारण और-और आसरे देखने से सारे धार्मिक उद्यम व्यर्थ जाते हैं); तृष्णा में जलते हुए हृदय में सुख नहीं हो सकता; (तृष्णा के कारण प्रभू का) डर (हृदय में से) गवाने से बेअंत जीव खप रहे हैं। (जो जीव-स्त्री प्रभू के) डर से अपने हृदय में (तृष्णा की ओर से) मर गई है (भाव। जिसने तृष्णा की आग बुझा ली है) उसको सुजान कंत (प्रभू) ने (प्यार से) देखा है; अपने गुरू के द्वारा उसने निर्भय प्रभू का नाम सिमर के (प्रभू का) डर (हृदय में) बना रखा है। (हे सखी ! जब तक मेरा) बसेरा पर्बत पर रहा। (अर्थात। अहंकार के कारण सिर ऊँचा उठा रहा) माया की बहुत प्यास थी। जब से मैंने प्रभू के दीदार कर लिए। तब इस प्यास को मिटाने वाला अमृत पास ही दिखाई दे गया। मैंने गुरू के शबद को मान के (माया की) प्यास दूर कर ली और (नाम-) अमृत पेट भर के पी लिया। हरेक जीव कहता है- (हे प्रभू ! मुझे ये अमृत) दे; (मुझे ये अमृत) दे; पर प्रभू उस जीव को देता है जो उसको भाता है। प्रभू जिसको सतिगुरू के माध्यम से (ये अमृत) देगा। वही जीव (माया वाली) प्यास मिटा सकेगा। 30। मैं बहुत ढूँढती फिरी हूँ (हर जगह यही देखा है कि तृष्णा के भाव से) भारी हुए अनेकों लोग (संसार-समुंद्र के) इस छोर पर ही गिरते जा रहे है; (पर जिनके सिर पर माया की पोटली का भार नहीं। वे) हल्के (होने के कारण) पार लांघ जाते हैं। मैं (पार लांघने वाले) उन लोगों से सदके हूँ। उनको अविनाशी और बड़ा प्रभू मिल गया है। उनकी चरण-धूड़ लेने से (माया की तृष्णा से) छूटा जाता है। (प्रभू मेहर करे) मैं भी उनकी संगति में उनके साथ रहूँ। जिस मनुष्य ने अपने सतिगुरू के द्वारा (अपना) मन (प्रभू को) दिया है। उसको (प्रभू का) पवित्र नाम मिल गया है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “शरीर कमजोर हो जाता है (और मनुष्य की चमड़ी पानी के) जाले की तरह ढीली हो जाती है (फिर भी इस का माया का प्यार समाप्त नहीं होता)।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।