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अंग 932

अंग
932
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ता मिलीऐ जा लए मिलाइ ॥
गुणवंती गुण सारे नीत ॥
नानक गुरमति मिलीऐ मीत ॥17॥
कामु क्रोधु काइआ कउ गालै ॥
जिउ कंचन सोहागा ढालै ॥
कसि कसवटी सहै सु ताउ ॥
नदरि सराफ वंनी सचड़ाउ ॥
जगतु पसू अहं कालु कसाई ॥
करि करतै करणी करि पाई ॥
जिनि कीती तिनि कीमति पाई ॥
होर किआ कहीऐ किछु कहणु न जाई ॥18॥
खोजत खोजत अंम्रितु पीआ ॥
खिमा गही मनु सतगुरि दीआ ॥
खरा खरा आखै सभु कोइ ॥
खरा रतनु जुग चारे होइ ॥
खात पीअंत मूए नही जानिआ ॥
खिन महि मूए जा सबदु पछानिआ ॥
असथिरु चीतु मरनि मनु मानिआ ॥
गुर किरपा ते नामु पछानिआ ॥19॥
गगन गंभीरु गगनंतरि वासु ॥
गुण गावै सुख सहजि निवासु ॥
गइआ न आवै आइ न जाइ ॥
गुर परसादि रहै लिव लाइ ॥
गगनु अगंमु अनाथु अजोनी ॥
असथिरु चीतु समाधि सगोनी ॥
हरि नामु चेति फिरि पवहि न जूनी ॥
गुरमति सारु होर नाम बिहूनी ॥20॥
घर दर फिरि थाकी बहुतेरे ॥
जाति असंख अंत नही मेरे ॥
केते मात पिता सुत धीआ ॥
केते गुर चेले फुनि हूआ ॥
काचे गुर ते मुकति न हूआ ॥
केती नारि वरु एकु समालि ॥
गुरमुखि मरणु जीवणु प्रभ नालि ॥
दह दिस ढूढि घरै महि पाइआ ॥
मेलु भइआ सतिगुरू मिलाइआ ॥21॥
गुरमुखि गावै गुरमुखि बोलै ॥
गुरमुखि तोलि तोुलावै तोलै ॥
गुरमुखि आवै जाइ निसंगु ॥
परहरि मैलु जलाइ कलंकु ॥
गुरमुखि नाद बेद बीचारु ॥
गुरमुखि मजनु चजु अचारु ॥
गुरमुखि सबदु अंम्रितु है सारु ॥
नानक गुरमुखि पावै पारु ॥22॥
चंचलु चीतु न रहई ठाइ ॥
चोरी मिरगु अंगूरी खाइ ॥
चरन कमल उर धारे चीत ॥
चिरु जीवनु चेतनु नित नीत ॥
चिंतत ही दीसै सभु कोइ ॥
चेतहि एकु तही सुखु होइ ॥
चिति वसै राचै हरि नाइ ॥
मुकति भइआ पति सिउ घरि जाइ ॥23॥
छीजै देह खुलै इक गंढि ॥
छेआ नित देखहु जगि हंढि ॥
धूप छाव जे सम करि जाणै ॥
बंधन काटि मुकति घरि आणै ॥
छाइआ छूछी जगतु भुलाना ॥
लिखिआ किरतु धुरे परवाना ॥
छीजै जोबनु जरूआ सिरि कालु ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: उस प्रभू को तब ही मिला जा सकता है जब वह (सतिगुरू के द्वारा) खुद मिला ले। हे नानक ! कोई भाग्यशाली जीव-स्त्री गोपाल के गुण हमेशा याद रखती है। सतिगुरू की शिक्षा की बरकति से ही मित्र प्रभू को मिला जा सकता है। 17। (वैसे ही) काम और क्रोध (मनुष्य के) शरीर को निर्बल कर देता है। जैसे सोहागा (कुठाली में डाले हुए) सोने को नर्म कर देता है। वह (ढला हुआ) सोना (कुठाली में) सेक सहता है। फिर कसवटी का कस सहता है (भाव। कसवटी पर घिसा के परखा जाता है)। और। सुनहरे रंग वाला वह सोना सराफ़ की नजर में कबूल होता है। (काम-क्रोध से निर्बल हुआ जीव भी प्रभू की मेहर से जब गुरू के बताए हुए राह की मेहनत-मुशक्कत करता है। और गुरू की बताई हुई शिक्षा पर पूरा उतरता है तो वह सुंदर आत्मा वाला प्राणी अकाल-पुरख की नजर में कबूल होता है)। जगत (स्वार्थ में) पशु बना हुआ है। अहंकार रूपी मौत इसके आत्मिक जीवन का सत्यानाश करती है। करतार ने सृष्टि रच के यह मर्यादा ही बना दी है कि जैसी करतूत कोई जीव करता है वैसा ही उसको फल मिलता है। पर जिस करतार ने यह मर्यादा बनाई है इसकी कद्र वह खुद ही जानता है। इस मर्यादा में कोई कमी नहीं कही जा सकती। 18। (सतिगुरू की मति की सहायता से) जो मनुष्य बार-बार (अपना आप) खोज के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीता है। वह दूसरों की ज्यादती सहने का स्वभाव पक्का कर लेता है। और। अपना मन अपने सतिगुरू में लीन कर देता है। हरेक जीव उसके खरे (स्वच्छ और सच्चे) जीवन की प्रसंशा करता है। वह सदा के लिए सच्चा-श्रेष्ठ बन जाता है। पर जो जीव दुनिया के भोग भोगते रहते हैं वह आत्मिक जीवन की ओर से मर जाते हैं। उनको (नाम-अमृत की) सूझ नहीं पड़ती। (वही लोग) जब सतिगुरू के शबद से गहरी सांझ डालते हैं। तब वे एक पल में अहंकार को खत्म कर देते हैं। उनका मन (काम-क्रोध आदि की ओर से) अडोल हो जाता है। और स्वै भाव की ओर से मरने पर प्रसन्न होता है। सतिगुरू की मेहर से परमात्मा के नाम के साथ उनकी गहरी सांझ पड़ जाती है। 19। (हे पांडे ! गोपाल का नाम अपने मन की तख्ती पर लिख। वह गोपाल) सर्व-व्यापक है और जीवों के अवगुण देख के क्रोधित नहीं होता। जिस मनुष्य का मन उस सर्व व्यापक गोपाल में टिकता है। जो मनुष्य उसके गुण गाता है। वह शांति और अडोलता में टिक जाता है; वह जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता। सतिगुरू की कृपा से वह (सर्व-व्यापक गोपाल में) सुरति जोड़े रखता है। वह सर्व-व्यापक गोपाल अपहुँच है (भाव। उसके गुणों का अंत नहीं पड़ सकता)। उसके सिर पर कोई अंकुश नहीं। वह जनम-मरण से रहित है। उसमें जोड़ी हुई सुरति मनुष्य के अंदर गुण पैदा करती है। और मन को माया में डोलने से बचा लेती है। (हे पांडे !) आप (भी) उस हरी गोपाल का नाम सिमर। (सिमरन की बरकति से) फिर जनम-मरण में नहीं पड़ेगा। (हे पांडे !) सतिगुरू की मति ही (जीवन के लिए) श्रेष्ठ रास्ता है। और मति उसके नाम से तोड़ती हैं। 20। (हे पांडे ! गुरू की मति वाला रास्ता पकड़े बिना) जीवात्मा कई जूनियों में भटक-भटक के हार-थक जाती है। इतनी अनगिनत जातियों में से गुजरती है जिनका अंत नहीं पाया जा सकता। (इन बेअंत जूनियों में भटकती जीवात्मा के) कई माता-पिता-पुत्र और बेटियाँ बनती हैं। कई गुरू बनते हैं। और कई चेले भी बनते हैं। इस जूनियों से तब तक खलासी नहीं होती जब तक किसी कच्चे गुरू की शरण ली हुई है। (हे पांडे ! सतिगुरू से विछुड़ी हुई ऐसी) कई जीव-सि्त्रयाँ हैं। पति-प्रभू सबकी संभाल करता है। जो जीवात्मा गुरू के सन्मुख रहती है। उसका आसरा-सहारा गोपाल प्रभू हो जाता है। (हे पांडे ! सिर्फ उस जीवात्मा का प्रभू से) मिलाप होता है जिसको सतिगुरू मिलाता है। और हर तरफ ढूँढ-ढूँढ के (गुरू की कृपा से) हृदय-घर में ही गोपाल-प्रभू मिल जाता है। 21। (हे पांडे ! गोपाल का नाम गुरू के सन्मुख होने से ही मन की पट्टी पर लिखा जा सकता है) गुरमुखि ही (प्रभू के) गुण गाता है। और (प्रभू की सिफत) उचारता है। गुरमुख ही (प्रभू के नाम को अपने मन में) तोलता है (व औरों को) तोलने के लिए प्रेरित करता है। गुरमुख ही (जगत में) बंधन-रहित आता है और बँधन-रहित ही यहाँ से जाता है (भाव। ना ही किसी किस्म का फल भोगने आता है ना ही यहाँ से कोई बुरे कर्म का बँधन ले के जाता है)। (क्योंकि गुरमुख मनुष्य मन की) मैल को दूर करके विकारों को (अपने अंदर से) खत्म कर चुका होता है। (प्रभू के गुणों की) विचार गुरमुख के लिए राग और वेद है। ऊँचा आचरण (बनाना) गुरमुख का (तीर्थ-) स्नान है। (सतिगुरू का) शबद गुरमुख के लिए उक्तम अमृत है। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (संसार-समुंद्र का) दूसरा छोर पा लेता है (भाव। विकारों की लहरों में से बच निकलता है)। 22। (हे पांडे ! गोपाल का नाम मन की तख्ती पर लिखे बिना मनुष्य का) चंचल मन टिक के नहीं बैठता। यह (मन) हिरन छुप-छुप के नए-नए भोग भोगता है। (पर) जो मनुष्य (प्रभू के) कमल फूल (जैसे सुंदर) चरण (अपने) चित्त में बसाता है। वह सदा के लिए अमर और सचेत हो जाता है (भाव। ना विकारों की जंजीरों में फसता है और ना ही जन्मों के चक्कर में पड़ता है)। (जिधर देखो चंचलता के कारण) हरेक जीव चिंतातुर दिखता है (पर जो मनुष्य) एक (परमात्मा) को सिमरते हैं। उनके हृदय में सुख होता है। (जिस जीव के) चित्त में प्रभू आ बसता है जो मनुष्य प्रभू के नाम में लीन होता है वह (मायावी भोगों से) मुक्ति पा लेता है (और यहाँ से) इज्जत से (अपने असली) धर में जाता है। 23। जब प्राणी (के प्राणों) की गाँठ खुल जाती है तो शरीर नाश हो जाता है। (हे पांडे !) सारे जगत में फिर-फिर के देख लो। मौत (का यह करिश्मा) नित्य घटित हो रहा है। (हे पांडे !) अगर मनुष्य (इस जीवन में घटित होते) दुखों-सुखों को एक जैसा करके समझ ले तो (माया के) बँधनों को काट के (मायावी भोगों से) आजादी को अपने अंदर ले आता है। (हे पांडे ! गोपाल को विसार के) जगत इस थोथी (भाव। जो अंत तक साथ नहीं निभाती) माया (के प्यार) में गलत राह पर पड़ रहा है। (जीवों के माथे पर यही) कर्म-रूपी लेख आरम्भ से लिखा हुआ है (भाव। शुरू से ही जीवों के अंदर माया के मोह के संस्कार-रूप लेख होने के कारण अब भी ये माया के मोह में फसे हुए हैं)। (हे पांडे !) जवानी खत्म होती जाती है। बुढ़ापा आ जाता है। मौत सिर पर (खड़ी प्रतीत होती है)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “उस प्रभू को तब ही मिला जा सकता है जब वह (सतिगुरू के द्वारा) खुद मिला ले।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।