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अंग 931

अंग
931
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ओहु बिधाता मनु तनु देइ ॥
ओहु बिधाता मनि मुखि सोइ ॥
प्रभु जगजीवनु अवरु न कोइ ॥
नानक नामि रते पति होइ ॥9॥
राजन राम रवै हितकारि ॥
रण महि लूझै मनूआ मारि ॥
राति दिनंति रहै रंगि राता ॥
तीनि भवन जुग चारे जाता ॥
जिनि जाता सो तिस ही जेहा ॥
अति निरमाइलु सीझसि देहा ॥
रहसी रामु रिदै इक भाइ ॥
अंतरि सबदु साचि लिव लाइ ॥10॥
रोसु न कीजै अंम्रितु पीजै रहणु नही संसारे ॥
राजे राइ रंक नही रहणा आइ जाइ जुग चारे ॥
रहण कहण ते रहै न कोई किसु पहि करउ बिनंती ॥
एकु सबदु राम नाम निरोधरु गुरु देवै पति मती ॥11॥
लाज मरंती मरि गई घूघटु खोलि चली ॥
सासु दिवानी बावरी सिर ते संक टली ॥
प्रेमि बुलाई रली सिउ मन महि सबदु अनंदु ॥
लालि रती लाली भई गुरमुखि भई निचिंदु ॥12॥
लाहा नामु रतनु जपि सारु ॥
लबु लोभु बुरा अहंकारु ॥
लाड़ी चाड़ी लाइतबारु ॥
मनमुखु अंधा मुगधु गवारु ॥
लाहे कारणि आइआ जगि ॥
होइ मजूरु गइआ ठगाइ ठगि ॥
लाहा नामु पूंजी वेसाहु ॥
नानक सची पति सचा पातिसाहु ॥13॥
आइ विगूता जगु जम पंथु ॥
आई न मेटण को समरथु ॥
आथि सैल नीच घरि होइ ॥
आथि देखि निवै जिसु दोइ ॥
आथि होइ ता मुगधु सिआना ॥
भगति बिहूना जगु बउराना ॥
सभ महि वरतै एको सोइ ॥
जिस नो किरपा करे तिसु परगटु होइ ॥14॥
जुगि जुगि थापि सदा निरवैरु ॥
जनमि मरणि नही धंधा धैरु ॥
जो दीसै सो आपे आपि ॥
आपि उपाइ आपे घट थापि ॥
आपि अगोचरु धंधै लोई ॥
जोग जुगति जगजीवनु सोई ॥
करि आचारु सचु सुखु होई ॥
नाम विहूणा मुकति किव होई ॥15॥
विणु नावै वेरोधु सरीर ॥
किउ न मिलहि काटहि मन पीर ॥
वाट वटाऊ आवै जाइ ॥
किआ ले आइआ किआ पलै पाइ ॥
विणु नावै तोटा सभ थाइ ॥
लाहा मिलै जा देइ बुझाइ ॥
वणजु वापारु वणजै वापारी ॥
विणु नावै कैसी पति सारी ॥16॥
गुण वीचारे गिआनी सोइ ॥
गुण महि गिआनु परापति होइ ॥
गुणदाता विरला संसारि ॥
साची करणी गुर वीचारि ॥
अगम अगोचरु कीमति नही पाइ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: वह सृजनहार (सब जीवों) को जीवात्मा और शरीर देता है। सब जीवों के अंदर बैठ के वह खुद ही बोलता है। और। परमात्मा (ही) जगत का आसरा है। (उसके बिना) कोई और (आसरा) नहीं। हे नानक ! (उस) परमात्मा के नाम में रंगीज के (ही) आदर-मान मिलता है। 9। (जो मनुष्य) प्रकाश-स्वरूप परमात्मा को प्रेम से सिमरता है। वह अपने कोझे मन को वश में ला के इस जगत-अखाड़े में (कामादिक वैरियों के साथ) लड़ता है। वह मनुष्य दिन-रात परमात्मा के प्यार में रंगा रहता है। तीन भवनों में व्यापक और सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के साथ वह मनुष्य (पक्की) जान-पहचान डाल लेता है। जिस मनुष्य ने परमात्मा के साथ जान-पहचान डाल ली। वह उस जैसा ही हो गया (भाव। वह माया की मार से ऊपर उठ गया)। उसकी आत्मा बड़ी ही पवित्र हो जाती है। और उसका शरीर भी सफल हो जाता है। आनंद-स्वरूप परमात्मा सदा उसके हृदय में टिका रहता है। उसके मन में सतिगुरू का शबद बसता है और वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू में सुरति जोड़े रखता है। 10। उस गोपाल से) नाराजगी ही ना किए रखो। उसका नाम-अमृत पीयो। इस संसार में सदा के लिए बसेरा नहीं। राजे हों। अमीर हो। चाहे कंगाल हों। कोई भी यहाँ सदा नहीं रह सकता। जो पैदा हुआ है उसने मरना है। यहाँ सदा टिके रहने के लिए तरले करने से भी कोई टिका नहीं रह सकता। इस बात के लिए किसी के आगे तरले लेने व्यर्थ हैं। (हाँ। हे पांडे ! गुरू की शरण आओ) सतिगुरू परमात्मा के नाम की महिमा भरा शबद बख्शता है जो विकारों से बचा लेता है। और। सतिगुरू प्रभू-पति से मिलने की मति देता है। 11। (हे पांडे !) जो जीव-स्त्री गुरू की शरण आती है उसको दुनियावी कोई भी चिंता नहीं सता सकती। प्रीतम पति (के प्रेम) में रंगी हुई के मुँह पर लाली आ जाती है। उसको प्रभू-पति प्यार और चाव से बुलाता है (भाव। अपनी याद की कशिश बख्शता है)। उसके मन में (सतिगुरू का) शबद (आ बसता है। उसके मन में) आनंद (टिका रहता) है। (गुरू की शरण पड़ कर) दुनियावी लोक-लाज का हमेशा ध्यान रखने वाली (उसकी पहले वाली बुद्धि) खत्म हो जाती है। अब वह लोक-लाज का घूंघट उतार के चलती है; (जिस माया ने उसको पति-प्रभू में जुड़ने से रोका था। उस) झल्ली कमली माया का सहम उसके सिर पर से हट जाता है। 12। (हे पांडे ! परमात्मा का) श्रेष्ठ नाम जप। श्रेष्ठ नाम ही असल लाभ-कमाई है। जीभ का चस्का। माया का लालच। अहंकार। निंदा। खुशामद। चुगली- ये हरेक काम गलत है (बुरा है)। जो मनुष्य (परमात्मा का सिमरन छोड़ के) अपने मन के पीछे चलता है (और लब-लोभ आदि करता है) वह मूर्ख। मूढ़ और अंधा है (भाव। उसको जीवन का सही रास्ता नहीं दिखता)। जीव जगत में कुछ कमाने की खातिर आता है। पर (माया का) चाकर बन के मोह के हाथों जीवन-खेल हार के जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य श्रद्धा को राशि पूँजी बनाता है और (इस पूँजी से) परमात्मा का नाम खरीदता-कमाता है। उसको सदा-स्थिर पातशाह सदा टिकी रहने वाली इज्जत बख्शता है। 13। (गोपाल की) भगती के बिना जगत (माया के पीछे) पागल हो रहा है। माया की तृष्णा को मिटाने-योग्य नहीं होता और आत्मिक मौत का राह पकड़ लेता है। (जगत का पागल-पन देखिए कि) अगर बहुत सारी माया किसी दुष्ट व बुरे व्यक्ति के घर में हो तो उस माया को देख के (गरीब और अमीर) दोनों ही (उस दुष्ट बुरे व्यक्ति के आगे भी) झुकते हैं; अगर माया (पल्ले) हो तो मूर्ख व्यक्ति भी समझदार (माना जाता) है। जीव (संसार में) जनम ले के (गोपाल की भक्ति की जगह माया की खातिर) दुखी होता है। (हे पांडे ! गोपाल का नाम अपने मन की पट्टी पर लिख) वह (गोपाल) स्वयं ही सब जीवों में मौजूद है। पर ये सूझ उस मनुष्य को आती है जिस पर (गोपाल स्वयं) कृपा करता है। 14। (हे पांडे ! उस गोपाल का नाम अपने मन की पट्टी पर लिख) जो सदा ही (बहुरंगी दुनिया) पैदा करके खुद निर्वैर रहता है। जो जनम-मरण में नहीं है और (जिसके अंदर जगत का कोई) धंधा भटकना पैदा नहीं करता। जो कुछ (जगत में) दिखाई दे रहा है वह गोपाल स्वयं ही स्वयं है (भाव। उस गोपाल का ही स्व्रूप है)। वह गोपाल स्वयं ही (सृष्टि) पैदा करके स्वयं ही सारे जीव बनाता है। (हे पांडे !) जगत भटकना में (फसा हुआ) है। जगत का सहारा वह अपहुँच गोपाल स्वयं ही (जीव को इस भटकना में से निकाल के) अपने साथ मिलने की जाच सिखाता है। योग की युक्ति में भी जग का जीवन वह परमेश्वर ही है। (हे पांडे !) उस सदा-स्थिर (गोपाल की याद) को अपना कर्तव्य बना। तब ही सुख मिलता है। उसके नाम से वंचित रह के धंधों से खलासी नहीं हो सकती। 15। (गोपाल का) नाम सिमरन के बिना ज्ञान-इन्द्रियों का आत्मिक जीवन से विरोध पड़ जाता है। (हे पांडे ! आप क्यों गोपाल का नाम अपने मन की पट्टी पर नहीं लिखता।) आप क्यों (गोपाल की याद में) नहीं जुड़ता। और। क्यों अपने मन का रोग दूर नहीं करता। (गोपाल का नाम अपने मन की तख्ती पर लिखे बिना) जीव-यात्री जगत में (जैसा) आता है और (वैसा ही यहाँ से) चला जाता है। (नाम की कमाई के) बगैर ही यहाँ आता है और (यहाँ रह के भी) कोई आत्मिक कमाई नहीं कमाता। नाम से टूटे रहने के कारण हर जगह घाटा ही घाटा होता है (भाव। मनुष्य प्रभू को बिसार के जो भी काम-काज करता है वह खोटी होने के कारण ऊँचे जीवन से परे-परे ही ले जाती है)। पर मनुष्य को प्रभू के नाम की कमाई तब ही प्राप्त होती है जब गोपाल खुद ये सूझ बख्शता है। नाम से वंचित रह के जीव-बन्जारा और तरह के वणज-व्यापार करता है। और (परमात्मा की हजूरी में) इसकी अच्छी साख इज्जत नहीं बनती। 16। (हे पांडे !) वही मनुष्य गोपाल-प्रभू के साथ सांझ वाला होता है जो उसके गुणों को अपने मन में जगह देता है; गोपाल के गुणों में (चित्त जोड़ने से ही) गोपाल के साथ सांझ बनती है। पर जगत में कोई विरला (महापुरख जीव की) गोपाल के साथ सांझ करवाता है; गोपाल के गुण याद करने का सच्चा कर्तव्य सतिगुरू के उपदेश से ही हो सकता है। (हे पांडे !) वह गोपाल अपहुँच है। जीव की ज्ञान-इन्द्रियाँ उस तक नहीं पहुँच सकतीं। (सतिगुरू की दी हुई सूझ के बिना) उसके गुणों की कद्र नहीं पड़ सकती।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “वह सृजनहार (सब जीवों) को जीवात्मा और शरीर देता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।