गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: जीव गुरू के शबद में जुड़ के उस सर्व-व्यापक परमात्मा की सहायता से ही संसार के विकारों से बचते हैं। और गुरू के बताए हुए राह पर चल के संसार-समुंद्र से पार लांघते हैं। (हे पांडे ! आप अपने विद्यार्थियों की पट्टियों पर ‘ओं नमह्’ लिखते हैं। पर इस मूर्ति को ही ‘ओअं’ समझ रहे हो) उस महान हस्ती की बाबत भी बात सुनो जिसके लिए आप शब्द ‘ओं नम। लिखते हैं। यह शब्द ‘ओं नम। उस (अकाल-पुरख) के लिए है जो सारी सृष्टि का कर्ता है। 1। हे पांडे ! सुन। निरी (वाद-विवाद और सांसारिक) झमेलों वाली लिखाई लिखने से (कोई आत्मिक) लाभ नहीं हो सकता। (अगर तूने अपना जीवन सफल करना है तो) गुरू के सन्मुख हो के सृष्टि के मालिक परमात्मा का नाम (भी अपने मन में) लिख। 1। रहाउ। जिस परमात्मा ने किसी विशेष उद्यम के बिना ही ये संसार पैदा किया है उसकी ज्योति सारे जगत में पसर रही है। जो मनुष्य गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलता है उसको उस परमात्मा का नाम-पदार्थ मिल जाता है। गुरमुखि मनुष्य परमात्मा का नाम-रूपी कीमती धन इकट्ठा कर लेता है। वह मनुष्य सतिगुरू (की बाणी) के दृष्टिकोण से ही समझता और सोचता है। सतिगुरू की बाणी बार-बार पढ़ के उसको ये भेद खुल जाता है कि सारी सृष्टि में व्यापक परमात्मा ही अंत में सदा स्थिर रहने वाला है। गुरू के राह पर चलने वाला मनुष्य उस सदा-स्थिर परमात्मा को ही (हर जगह) देखता है और अपने हृदय में बसाता है। परमात्मा के अलावा बाकी सारा जगत उसको नाशवंत दिखाई देता है। 2। (हे पांडे ! गुरू की शरण पड़ कर करतार का नाम अपने मन की तख्ती पर लिख। वह बड़ा ही बेअंत है) करतार की वडिआई करतार स्वयं ही जानता है। या शूरवीर सतिगुरू जानता है (भाव। सतिगुरू ही परमात्मा की महिमा की कद्र करता है) सतिगुरू सत्संग में (उस करतार के सिमरन रूप) धर्म का उपदेश करता है। (सिमरन की बरकति से) सतिगुरू का अपना मन टिका रहता है। और वह औरों में भी (ये) गुण पैदा करता है। जिस मनुष्य के मुँह-माथे पर गुरू के चरणों की धूड़ पड़े। वह नकारे सड़े हुए लोहे से सोना बन जाता है। सतिगुरू तोल में बोल में सच्चा और पूर्ण होता है। और जो परमात्मा सृष्टि का आसरा है जिसका कोई शरीक नहीं है और जो जनम-रहत है वही सतिगुरू का धन है। उस कर्ता-प्रभु की गति वह प्रभु स्वयं ही जानता है या शूरवीर गुरु जानता है॥ 3 ॥ जो मनुष्य सतिगुरू का उपदेश विसार देता है व किसी और जीवन-राह को पसंद करता है। वह अहंकार में रसातल की ओर चला जाता है। और वह (आत्मिक मौत का मूल अहंकार-रूपी) जहर खाता है। उस मनुष्य को (दूसरे भाव के कारण) सतिगुरू की बाणी का आनंद और गुरू के वचन नहीं भाते। वह मनुष्य अथाह गुणों के मालिक परमात्मा से विछुड़ जाता है। जिस मनुष्य ने सतिगुरू के द्वारा सदा-स्थिर प्रभू को सिमरा है। उसने नाम-अमृत हासिल कर लिया है। फिर उसको वह परमात्मा मन-तन में प्यारा लगता है। (पर। ये उसकी बख्शिश ही है) वह स्वयं ही गुरू की शरण डाल के (सिमरन की दाति) देता है और खुद ही नाम-अमृत पिलाता है। 4। (वैसे तो) हर कोई कहता है कि एक परमात्मा ही परमात्मा है। पर (जिस मन पर परमात्मा का नाम लिखना है। उस पर) अहम्-अहंकार का प्रभाव बनाए रखता है। अगर मनुष्य (अहंकार का साया दूर करके) अपने हृदय में और सारी सृष्टि में एक परमात्मा को पहचान ले। तो इस तरह उसको परमात्मा के स्थान का ज्ञान हो जाता है। (हे पांडे !) परमात्मा (आपके) नजदीक (भाव। हृदय में बस रहा) है। उसको (अपने से) दूर ना समझ। एक परमात्मा ही सारी सृष्टि में मौजूद है। हे नानक ! एक सर्व-व्यापक परमात्मा ही (हर जगह) समाया हुआ है। उसके बिना और कोई दूसरा नहीं। 5। (हे पांडे !) चाहे करतार मेरे अंदर ही बस रहा है (जब तक मेरे अंदर अहम्-अहंकार है) मैं उसको अपने मन में नहीं बसा सकता। (जब तक मन में अहंकार है तब तक वह करतार) मन में बसाया नहीं जा सकता। उसकी वडिआई को नहीं आँका जा सकता। माया के मतवाले जीव को (जब तक) झूठ ने ठॅग-बूटी चिपकाई हुई है। (जब तक जीव) चस्के में लालच में और पराई मुहताजी में दुखी हो रहा है। तब तक हर वक्त इसको सहम ही बना रहता है। जब मनुष्य (अहंकार दूर करके) एक परमात्मा को सिमरता है तब परमात्मा के साथ इसकी जान-पहचान हो जाती है। परमात्मा की महिमा की इसको कद्र पड़ती है। और इसका जनम-मरण खत्म हो जाता है। 6। (हे पांडे ! उस गोपाल का नाम अपने मन की पट्टी पर लिख जो) एक खुद ही (हर जगह व्यापक हो के जगत की ये सारी) किरत-कार (कर रहा) है। (जो) एक स्वयं ही (संसार का यह सारा) रूप-रंग (अपने आप से प्रगट कर रहा) है। और (जगत के यह तत्व) हवा-पानी-आग (जिसका अपना ही) स्वरूप हैं। जिस गोपाल की ज्योति ही सारे जगत में पसर रही है। जो मनुष्य उस एक परमात्मा को (हर जगह व्यापक) समझता है। जिसको हर जगह परमात्मा ही दिखाई देता है। वह आदर सत्कार हासिल करता है। परमात्मा के साथ जान-पहचान डाल के। और। उसमें सुरति टिका के कोई विरला मनुष्य सतिगुरू के द्वारा धैर्य भरे जीवन वाला बनता है। ऐसा मनुष्य उस परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। जिस मनुष्य को प्रभू अपनी मेहर से ये दाति देता है। जिसको गुरू के द्वारा (अपनी सर्व-व्यापकता का उपदेश) सुनाता है वह मनुष्य सुख पाता है। 7। जो) सबसे बड़ा गोपाल तीन भवनों में व्यापक है। धरती और आकाश में जिसकी ज्योति का प्रकाश है। (हे पांडे ! उस गोपाल का नाम अपने मन की पट्टी पर लिख। वह गोपाल अपनी कृपा करके (गुरू के द्वारा) प्रकट हो के जिसको अपना (सर्व-व्यापक) स्वरूप् दिखाता है। वह मनुष्य (भटकना से बच के) अपने आप में टिक जाता है। जगत को सुंदर बनाने वाला प्रभू सतिगुरू के श्रेष्ठ शबद द्वारा (जिस मनुष्य के हृदय में) नजदीक हो के (अपनी सिफत-सालाह की) झड़ी लगा के बरसता है। उसका उत्तम शब्द मानव-जीवन को सुन्दर बनाने वाला है। जो व्यक्ति परमात्मा के भेद को जान लेता है, वह मनुष्य (जगत को सवारणहार) इस प्रभू का ये भेद जान लेता है कि प्रभू स्वयं ही सारे जगत को पैदा करने वाला है और खुद ही (अपनी ज्योति से इसको) रौशनी देने वाला है (भाव। प्रभू खुद ही इस जगत को जीवन-राह सिखाने वाला) है। 8। (जिस मनुष्य के अंदर सतिगुरू के बख्शे हुए ज्ञान की) रौशनी पैदा होती है वह (अपने अंदर से) कामादिक विकारों को मार देता है। सतिगुरू के शबद की बरकति से परम पुरख का दीदार करके (वह मनुष्य फिर यॅूँ) सोचता है (कि) जब तक सृष्टि कायम है वह परमात्मा सारे जगत में (हरेक के सिर) पर खुद (रखवाला) है। उसे तीनों लोकों एवं सृष्टि के आदि-अंत तक परमात्मा ही रक्षक नजर आता है। वह स्वयं ही (सब जीवों में व्यापक हो के) काम-काज करता है। बोलता है और सुनता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “जीव गुरू के शबद में जुड़ के उस सर्व-व्यापक परमात्मा की सहायता से ही संसार के विकारों से बचते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।