मिलि रहीऐ प्रभ साध जना मिलि हरि कीरतनु सुनीऐ राम ॥
दइआल प्रभू दामोदर माधो अंतु न पाईऐ गुनीऐ राम ॥
दइआल दुख हर सरणि दाता सगल दोख निवारणो ॥
मोह सोग विकार बिखड़े जपत नाम उधारणो ॥
सभि जीअ तेरे प्रभू मेरे करि किरपा सभ रेण थीवा ॥
बिनवंति नानक प्रभ मइआ कीजै नामु तेरा जपि जीवा ॥3॥
राखि लीए प्रभि भगत जना अपणी चरणी लाए राम ॥
आठ पहर अपना प्रभु सिमरह एको नामु धिआए राम ॥
धिआइ सो प्रभु तरे भवजल रहे आवण जाणा ॥
सदा सुखु कलिआण कीरतनु प्रभ लगा मीठा भाणा ॥
सभ इछ पुंनी आस पूरी मिले सतिगुर पूरिआ ॥
बिनवंति नानक प्रभि आपि मेले फिरि नाही दूख विसूरिआ ॥4॥3॥
चरन कमल सरणागती अनद मंगल गुण गाम ॥
नानक प्रभु आराधीऐ बिपति निवारण राम ॥1॥
प्रभ बिपति निवारणो तिसु बिनु अवरु न कोइ जीउ ॥
सदा सदा हरि सिमरीऐ जलि थलि महीअलि सोइ जीउ ॥
जलि थलि महीअलि पूरि रहिआ इक निमख मनहु न वीसरै ॥
गुर चरन लागे दिन सभागे सरब गुण जगदीसरै ॥
करि सेव सेवक दिनसु रैणी तिसु भावै सो होइ जीउ ॥
बलि जाइ नानकु सुखह दाते परगासु मनि तनि होइ जीउ ॥1॥
हरि सिमरत मनु तनु सुखी बिनसी दुतीआ सोच ॥
नानक टेक गोुपाल की गोविंद संकट मोच ॥1॥
भै संकट काटे नाराइण दइआल जीउ ॥
हरि गुण आनंद गाए प्रभ दीना नाथ प्रतिपाल जीउ ॥
प्रतिपाल अचुत पुरखु एको तिसहि सिउ रंगु लागा ॥
कर चरन मसतकु मेलि लीने सदा अनदिनु जागा ॥
जीउ पिंडु ग्रिहु थानु तिस का तनु जोबनु धनु मालु जीउ ॥
सद सदा बलि जाइ नानकु सरब जीआ प्रतिपाल जीउ ॥2॥
रसना उचरै हरि हरे गुण गोविंद वखिआन ॥
नानक पकड़ी टेक एक परमेसरु रखै निदान ॥1॥
सो सुआमी प्रभु रखको अंचलि ता कै लागु जीउ ॥
भजु साधू संगि दइआल देव मन की मति तिआगु जीउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह मनुष्य (फिर) एक परमात्मा को ही याद करता रहता है एक परमात्मा (के गुणों) को ही गाता रहता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।