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अंग 926

अंग
926
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बिनवंति नानक प्रभि करी किरपा पूरा सतिगुरु पाइआ ॥2॥
मिलि रहीऐ प्रभ साध जना मिलि हरि कीरतनु सुनीऐ राम ॥
दइआल प्रभू दामोदर माधो अंतु न पाईऐ गुनीऐ राम ॥
दइआल दुख हर सरणि दाता सगल दोख निवारणो ॥
मोह सोग विकार बिखड़े जपत नाम उधारणो ॥
सभि जीअ तेरे प्रभू मेरे करि किरपा सभ रेण थीवा ॥
बिनवंति नानक प्रभ मइआ कीजै नामु तेरा जपि जीवा ॥3॥
राखि लीए प्रभि भगत जना अपणी चरणी लाए राम ॥
आठ पहर अपना प्रभु सिमरह एको नामु धिआए राम ॥
धिआइ सो प्रभु तरे भवजल रहे आवण जाणा ॥
सदा सुखु कलिआण कीरतनु प्रभ लगा मीठा भाणा ॥
सभ इछ पुंनी आस पूरी मिले सतिगुर पूरिआ ॥
बिनवंति नानक प्रभि आपि मेले फिरि नाही दूख विसूरिआ ॥4॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य (फिर) एक परमात्मा को ही याद करता रहता है एक परमात्मा (के गुणों) को ही गाता रहता है। एक परमात्मा ही उसको हर जगह बसता नजर आता है। हे भाई ! प्रभू के भगतों की संगति में मिल के रहना चाहिए। भगत-जनों को मिल के परमात्मा का कीर्तन सुनना चाहिए। हे भाई ! दया के श्रोत दामोदर माया के पति प्रभू के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। हे भाई ! प्रभू दया का श्रोत है। दुखों का नाश करने वाला है। शरण-योग है। सबको दातें देने वाला है। सारे पापों का नाश करने वाला है। हे भाई ! नाम जपने वालों को वह प्रभू मोह-सोग और मुश्किल विकारों से बचाने वाला है। हे मेरे प्रभू ! सारे जीव आपके (पैदा किए हुए हैं)। मेहर कर। मैं सबके चरणों की धूल बना रहूँ। नानक विनती करता है- हे प्रभू ! दया कर। मैं आपका नाम जप-जप के आत्मिक जीवन हासिल करता रहूँ। 3। (हे भाई ! सदा से ही) प्रभू ने अपने चरणों में जोड़ के अपने भक्तों की रक्षा की है। सो। हे भाई ! एक हरी नाम का ध्यान धर के। आएँ। हम भी आठों पहर अपने प्रभू का सिमरन करते रहें। (हे भाई ! अनेकों जीव) उस प्रभू का ध्यान धर के संसार-समुंद्र से पार लांघ गए। (उनके) जनम-मरण (के चक्कर) समाप्त हो गए। हे भाई ! प्रभू की सिफत-सालाह करते हुए उनके अंदर सदा सुख-आनंद बना रहा। उनको प्रभू की रजा की रजा मीठी लगने लगी। हे भाई ! जो मनुष्य पूरे गुरू को मिल गए। उनकी हरेक मुराद पूरी हो गई। उनकी हरेक आस पूरी हो गई। नानक विनती करता है- जिनको प्रभू ने स्वयं (अपने चरणों से) मिला लिया। उनको कोई दुख कोई चिंता-फिक्र फिर नहीं व्यापते। 4। 3।
रामकली महला 5 छंत ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 छंत ॥
सलोकु ॥
चरन कमल सरणागती अनद मंगल गुण गाम ॥
नानक प्रभु आराधीऐ बिपति निवारण राम ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु। (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के) सुंदर चरणों की शरण आ के (परमात्मा के) गुण गाते हैं। (उनके हृदय में सदा) आनंद-सुख बने रहते हैं। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा की आराधना करनी चाहिए। परमात्मा हरेक विपदा दूर करने वाला है। 1।
छंतु ॥
प्रभ बिपति निवारणो तिसु बिनु अवरु न कोइ जीउ ॥
सदा सदा हरि सिमरीऐ जलि थलि महीअलि सोइ जीउ ॥
जलि थलि महीअलि पूरि रहिआ इक निमख मनहु न वीसरै ॥
गुर चरन लागे दिन सभागे सरब गुण जगदीसरै ॥
करि सेव सेवक दिनसु रैणी तिसु भावै सो होइ जीउ ॥
बलि जाइ नानकु सुखह दाते परगासु मनि तनि होइ जीउ ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: छंत। (हे भाई !) परमात्मा ही (जीवों की हरेक) विपदा दूर करने वाला है। उसके बिना और कोई (ऐसी समर्था वाला) नहीं। (हे भाई !) सदा ही सदा ही परमात्मा का सिमरन करना चाहिए। जल में। धरती में। आकाश में (हर जगह) वह परमात्मा ही मौजूद है। हे भाई ! वह परमात्मा जल में धरती में अंतरिक्ष में (हर जगह) व्यापक है आँख झपकने जितने समय के लिए भी वह प्रभू हमारे मन से भूलना नहीं चाहिए। वह दिन भाग्यशाली (समझो। जब हमारा मन) गुरू के चरणों में जुड़ा रहे। (पर। ये हमारे अपने वश की बात नहीं। ये तब ही होता है जब) उस जगत के मालिक प्रभू की मेहर (हो)। हे भाई ! दिन-रात सेवकों की तरह उस प्रभू की सेवा-भक्ति किया कर; जो कुछ उसको भाता है वही (जगत में) हो रहा है। नानक तो उस सुख-दाते प्रभू से सदके जाता है (उसकी मेहर से ही हमारे) मन में तन में (सही आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो सकता है। 1।
सलोकु ॥
हरि सिमरत मनु तनु सुखी बिनसी दुतीआ सोच ॥
नानक टेक गोुपाल की गोविंद संकट मोच ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक। परमात्मा का नाम सिमरते हुए उसका मन सुखी हो गया उसका तन सुखी हो गया (क्योंकि प्रभू की याद के कारण उसके) अन्य सारे चिंता-फिक्र दूर हो गए। 1। हे नानक ! जिस मनुष्य ने सारे संकट दूर करने वाले गोबिंद गोपाल का आसरा लिया।
छंतु ॥
भै संकट काटे नाराइण दइआल जीउ ॥
हरि गुण आनंद गाए प्रभ दीना नाथ प्रतिपाल जीउ ॥
प्रतिपाल अचुत पुरखु एको तिसहि सिउ रंगु लागा ॥
कर चरन मसतकु मेलि लीने सदा अनदिनु जागा ॥
जीउ पिंडु ग्रिहु थानु तिस का तनु जोबनु धनु मालु जीउ ॥
सद सदा बलि जाइ नानकु सरब जीआ प्रतिपाल जीउ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: छंत। दया के श्रोत नारायण ने उसके सारे डर और दुख-कलेश काट दिए। हे भाई ! जिस मनुष्य ने दीनों के नाथ पालनहार हरी प्रभू के गुण गाने आरम्भ किए। हे भाई ! सबको पालने वाला अविनाशी सिर्फ अकाल-पुरख ही है। जिस मनुष्य का प्यार उसके साथ बन गया। जिसने अपने हाथों से अपना माथा उसके चरणों में रख दिया। प्रभू ने उसको अपने साथ जोड़ लिया। (माया के हमलों की तरफ से वह) सदा हर वक्त सचेत रहने लग पड़ा। हे भाई ! (हमारी यह) जीवात्मा (हमारा ये) शरीर। घर। जगह। तन। जोबन और धन-माल सब कुछ उस परमात्मा का ही दिया हुआ है। वह प्रभू सारे जीवों को पालने वाला है। नानक उससे सदा ही सदके जाता है। 2।
सलोकु ॥
रसना उचरै हरि हरे गुण गोविंद वखिआन ॥
नानक पकड़ी टेक एक परमेसरु रखै निदान ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक। हे नानक ! जो मनुष्य अपनी जीभ से परमात्मा का नाम उचारता रहता है। गोबिंद के गुण बयान करता रहता है। सदा एक परमेश्वर का आसरा लिए रखता है। परमात्मा आखिर उसकी रक्षा करता है। 1।
छंतु ॥
सो सुआमी प्रभु रखको अंचलि ता कै लागु जीउ ॥
भजु साधू संगि दइआल देव मन की मति तिआगु जीउ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: छंतु। हे भाई ! वही मालिक प्रभू जी (हम जीवों का) रखवाला है। सदा उसके लड़ लगा रह। अपने मन की समझदारी छोड़ दे। गुरू की संगति में टिक के उस दया-के-घर प्रभू का भजन किया कर।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह मनुष्य (फिर) एक परमात्मा को ही याद करता रहता है एक परमात्मा (के गुणों) को ही गाता रहता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।