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अंग ९२६ · रामकली

अंग
926
रामकली
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  1. बिनवंति नानक प्रभि करी किरपा पूरा सतिगुरु पाइआ ॥2॥
  2. रामकली महला 5 छंत ॥
  3. चरन कमल सरणागती अनद मंगल गुण गाम ॥
  4. छंतु ॥
  5. हरि सिमरत मनु तनु सुखी बिनसी दुतीआ सोच ॥
  6. छंतु ॥
  7. रसना उचरै हरि हरे गुण गोविंद वखिआन ॥
  8. छंतु ॥

बिनवंति नानक प्रभि करी किरपा पूरा सतिगुरु पाइआ ॥2॥

अंग ९२५ से चला आ रहा अंश

बिनवंति नानक प्रभि करी किरपा पूरा सतिगुरु पाइआ ॥2॥
मिलि रहीऐ प्रभ साध जना मिलि हरि कीरतनु सुनीऐ राम ॥
दइआल प्रभू दामोदर माधो अंतु न पाईऐ गुनीऐ राम ॥
दइआल दुख हर सरणि दाता सगल दोख निवारणो ॥
मोह सोग विकार बिखड़े जपत नाम उधारणो ॥
सभि जीअ तेरे प्रभू मेरे करि किरपा सभ रेण थीवा ॥
बिनवंति नानक प्रभ मइआ कीजै नामु तेरा जपि जीवा ॥3॥
राखि लीए प्रभि भगत जना अपणी चरणी लाए राम ॥
आठ पहर अपना प्रभु सिमरह एको नामु धिआए राम ॥
धिआइ सो प्रभु तरे भवजल रहे आवण जाणा ॥
सदा सुखु कलिआण कीरतनु प्रभ लगा मीठा भाणा ॥
सभ इछ पुंनी आस पूरी मिले सतिगुर पूरिआ ॥
बिनवंति नानक प्रभि आपि मेले फिरि नाही दूख विसूरिआ ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य (फिर) एक परमात्मा को ही याद करता रहता है एक परमात्मा (के गुणों) को ही गाता रहता है। एक परमात्मा ही उसको हर जगह बसता नजर आता है। हे भाई ! प्रभू के भगतों की संगति में मिल के रहना चाहिए। भगत-जनों को मिल के परमात्मा का कीर्तन सुनना चाहिए। हे भाई ! दया के श्रोत दामोदर माया के पति प्रभू के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। हे भाई ! प्रभू दया का श्रोत है। दुखों का नाश करने वाला है। शरण-योग है। सबको दातें देने वाला है। सारे पापों का नाश करने वाला है। हे भाई ! नाम जपने वालों को वह प्रभू मोह-सोग और मुश्किल विकारों से बचाने वाला है। हे मेरे प्रभू ! सारे जीव आपके (पैदा किए हुए हैं)। मेहर कर। मैं सबके चरणों की धूल बना रहूँ। नानक विनती करता है- हे प्रभू ! दया कर। मैं आपका नाम जप-जप के आत्मिक जीवन हासिल करता रहूँ। 3। (हे भाई ! सदा से ही) प्रभू ने अपने चरणों में जोड़ के अपने भक्तों की रक्षा की है। सो। हे भाई ! एक हरी नाम का ध्यान धर के। आएँ। हम भी आठों पहर अपने प्रभू का सिमरन करते रहें। (हे भाई ! अनेकों जीव) उस प्रभू का ध्यान धर के संसार-समुंद्र से पार लांघ गए। (उनके) जनम-मरण (के चक्कर) समाप्त हो गए। हे भाई ! प्रभू की सिफत-सालाह करते हुए उनके अंदर सदा सुख-आनंद बना रहा। उनको प्रभू की रजा की रजा मीठी लगने लगी। हे भाई ! जो मनुष्य पूरे गुरू को मिल गए। उनकी हरेक मुराद पूरी हो गई। उनकी हरेक आस पूरी हो गई। नानक विनती करता है- जिनको प्रभू ने स्वयं (अपने चरणों से) मिला लिया। उनको कोई दुख कोई चिंता-फिक्र फिर नहीं व्यापते। 4। 3।

रामकली महला 5 छंत ॥

रामकली महला 5 छंत ॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 छंत ॥

चरन कमल सरणागती अनद मंगल गुण गाम ॥

सलोकु ॥
चरन कमल सरणागती अनद मंगल गुण गाम ॥
नानक प्रभु आराधीऐ बिपति निवारण राम ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु। (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के) सुंदर चरणों की शरण आ के (परमात्मा के) गुण गाते हैं। (उनके हृदय में सदा) आनंद-सुख बने रहते हैं। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा की आराधना करनी चाहिए। परमात्मा हरेक विपदा दूर करने वाला है। 1।

छंतु ॥

छंतु ॥
प्रभ बिपति निवारणो तिसु बिनु अवरु न कोइ जीउ ॥
सदा सदा हरि सिमरीऐ जलि थलि महीअलि सोइ जीउ ॥
जलि थलि महीअलि पूरि रहिआ इक निमख मनहु न वीसरै ॥
गुर चरन लागे दिन सभागे सरब गुण जगदीसरै ॥
करि सेव सेवक दिनसु रैणी तिसु भावै सो होइ जीउ ॥
बलि जाइ नानकु सुखह दाते परगासु मनि तनि होइ जीउ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: छंत। (हे भाई !) परमात्मा ही (जीवों की हरेक) विपदा दूर करने वाला है। उसके बिना और कोई (ऐसी समर्था वाला) नहीं। (हे भाई !) सदा ही सदा ही परमात्मा का सिमरन करना चाहिए। जल में। धरती में। आकाश में (हर जगह) वह परमात्मा ही मौजूद है। हे भाई ! वह परमात्मा जल में धरती में अंतरिक्ष में (हर जगह) व्यापक है आँख झपकने जितने समय के लिए भी वह प्रभू हमारे मन से भूलना नहीं चाहिए। वह दिन भाग्यशाली (समझो। जब हमारा मन) गुरू के चरणों में जुड़ा रहे। (पर। ये हमारे अपने वश की बात नहीं। ये तब ही होता है जब) उस जगत के मालिक प्रभू की मेहर (हो)। हे भाई ! दिन-रात सेवकों की तरह उस प्रभू की सेवा-भक्ति किया कर; जो कुछ उसको भाता है वही (जगत में) हो रहा है। नानक तो उस सुख-दाते प्रभू से सदके जाता है (उसकी मेहर से ही हमारे) मन में तन में (सही आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो सकता है। 1।

हरि सिमरत मनु तनु सुखी बिनसी दुतीआ सोच ॥

सलोकु ॥
हरि सिमरत मनु तनु सुखी बिनसी दुतीआ सोच ॥
नानक टेक गोुपाल की गोविंद संकट मोच ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक। परमात्मा का नाम सिमरते हुए उसका मन सुखी हो गया उसका तन सुखी हो गया (क्योंकि प्रभू की याद के कारण उसके) अन्य सारे चिंता-फिक्र दूर हो गए। 1। हे नानक ! जिस मनुष्य ने सारे संकट दूर करने वाले गोबिंद गोपाल का आसरा लिया।

छंतु ॥

छंतु ॥
भै संकट काटे नाराइण दइआल जीउ ॥
हरि गुण आनंद गाए प्रभ दीना नाथ प्रतिपाल जीउ ॥
प्रतिपाल अचुत पुरखु एको तिसहि सिउ रंगु लागा ॥
कर चरन मसतकु मेलि लीने सदा अनदिनु जागा ॥
जीउ पिंडु ग्रिहु थानु तिस का तनु जोबनु धनु मालु जीउ ॥
सद सदा बलि जाइ नानकु सरब जीआ प्रतिपाल जीउ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: छंत। दया के श्रोत नारायण ने उसके सारे डर और दुख-कलेश काट दिए। हे भाई ! जिस मनुष्य ने दीनों के नाथ पालनहार हरी प्रभू के गुण गाने आरम्भ किए। हे भाई ! सबको पालने वाला अविनाशी सिर्फ अकाल-पुरख ही है। जिस मनुष्य का प्यार उसके साथ बन गया। जिसने अपने हाथों से अपना माथा उसके चरणों में रख दिया। प्रभू ने उसको अपने साथ जोड़ लिया। (माया के हमलों की तरफ से वह) सदा हर वक्त सचेत रहने लग पड़ा। हे भाई ! (हमारी यह) जीवात्मा (हमारा ये) शरीर। घर। जगह। तन। जोबन और धन-माल सब कुछ उस परमात्मा का ही दिया हुआ है। वह प्रभू सारे जीवों को पालने वाला है। नानक उससे सदा ही सदके जाता है। 2।

रसना उचरै हरि हरे गुण गोविंद वखिआन ॥

सलोकु ॥
रसना उचरै हरि हरे गुण गोविंद वखिआन ॥
नानक पकड़ी टेक एक परमेसरु रखै निदान ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक। हे नानक ! जो मनुष्य अपनी जीभ से परमात्मा का नाम उचारता रहता है। गोबिंद के गुण बयान करता रहता है। सदा एक परमेश्वर का आसरा लिए रखता है। परमात्मा आखिर उसकी रक्षा करता है। 1।

छंतु ॥

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छंतु ॥
सो सुआमी प्रभु रखको अंचलि ता कै लागु जीउ ॥
भजु साधू संगि दइआल देव मन की मति तिआगु जीउ ॥

हिन्दी अर्थ: छंतु। हे भाई ! वही मालिक प्रभू जी (हम जीवों का) रखवाला है। सदा उसके लड़ लगा रह। अपने मन की समझदारी छोड़ दे। गुरू की संगति में टिक के उस दया-के-घर प्रभू का भजन किया कर।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 926 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९२६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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